शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)
Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda
महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंका० २, अ० २, ब्रा० ४, कं० ६-१५ शतपथब्राह्मण / २२७ अब अग्नि चला गया ॥६॥ प्रजापति ने आहुतियां देकर अपने को फिर उत्पन्न कर लिया, और अग्नि-रूपी मृत्यु से अपने को बचा लिया जो उसको खाना चाहती थी। इसलिए जो आदमी समझकर अग्निहोत्र करता है वह प्रजा-रूप में अपने को उत्पन्न करता है जैसे प्रजापति ने किया, और खानेवाली अग्नि से अपने को बचा लेता है ॥७॥ और जब वह मरता है और जब उसको अग्नि में रखते हैं तो वह अग्नि से फिर उठता है। अग्नि उसके शरीर को ही जलाता है। जैसे वह मा या बाप से उत्पन्न होता है उसी प्रकार अग्नि से उत्पन्न होता है। और जो अग्निहोत्र नहीं करता वह उत्पन्न होता ही नहीं। इसलिए अग्निहोत्र अवश्य करना चाहिए ॥८॥ संकोच के द्वारा जन्म के विषय में यह बात है कि जब प्रजापति ने संकोच किया तो न संकोच करते हुए भी श्रेय पर आरूढ़ रहा, यहाँ तक कि उसने अपने को उत्पन्न किया और अपने को मृत्युरूपी अग्नि से बचाया जबकि वह उसे खाना चाहता था; इसी प्रकार वह भी जो संकोच से जन्म को जानता है, यदि कभी संकोच करता है तो भी श्रेय पर आरूढ़ रहता है ॥९॥ आहुति देकर उसने (हथेलियां) मलीं। तब विकङ्कत वृक्ष उत्पन्न हुआ। इसीलिए यह यज्ञ-सम्बन्धी वृक्ष है और यज्ञ-सम्बन्धी पात्र इससे बनाये जाते हैं। अब देवों में जो वीर हैं वे उत्पन्न हुए, अर्थात् अग्नि, वायु और सूर्य। सचमुच जो इन वीर देवों को जानता है उसके वीर उत्पन्न होता है ॥१०॥ उन्होंने कहा, 'हम पिता प्रजापति के पीछे हुए हैं। अब हम प्रजा उत्पन्न करें जो हमारे पीछे हो।' उन्होंने एक घेरा घेरकर गायत्री से हिङ्कार छोड़कर प्रार्थना की । जिससे उन्होंने घेरा था वह समुद्र था; और पृथिवी आस्ताव (अर्थात् प्रार्थना की) जगह हो गई ॥११॥ वे स्तुति करके पूर्व को गये, यह कहकर कि 'हम लौटे जाते हैं।' देव एक गाय के पास आये जो उत्पन्न हो गई थी। उसने उनकी ओर देखकर 'हिंकार' किया। देवों ने जाना कि यह सामवेदीय हिंकार है। पहले वह हिंकार-शून्य था। अब ठीक शाम हो गया। यह सामवेदीय हिंकार गाय के मध्य में थी। इसलिए यह (गाय) जीविका का साधन हो गई। जो कोई गाय में इस सामवेदीय हिंकार के भेद को जानता है, वह जीविका का साधन हो जाता है ॥१२॥ उन्होंने कहा, 'यह जो हमने उत्पन्न किया वह भद्र है, यह जो हमने गाय उत्पन्न की; इसलिए कि यह तो यज्ञ ही है, क्योंकि गाय के बिना यज्ञ हो ही नहीं सकता। यह अन्न भी है, क्योंकि जो भी कुछ अन्न है वह गाय ही है ॥१३॥ यह ('गो' नाम) उन (गौओं) का भी है और यज्ञ का भी। इसलिए उसको दुहराना चाहिए यह कहकर 'साधु है, पुण्य है।' जो कोई इस रहस्य को समझकर 'साधु, पुण्य' दुहराता है, (गायँ) उसके लिए बहुतायत देती हैं और यज्ञ उसकी ओर झुकता है ॥१४॥ अब अग्नि ने उससे प्रेम किया कि मैं इसके साथ मैथुन करूँ। उसने उसके साथ मैथुन