भारतकोश
शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished699 पृष्ठ

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कां० २, अ० ३, ब्रा० ३, क० ८-१६ शतपथब्राह्मण / २४५ इस मृत्यु से न बचकर उस लोक में जाता है, उसको बार-बार मारा जाता है, उसी प्रकार जैसे इस लोक में कैदी पर सख्ती करते हैं और जब चाहते हैं तब मार डालते हैं ॥८॥ यह जो शाम को सूर्यास्त होने पर दो आहुतियां देता है वह इन दो अगले पैरों से इस मृत्यु पर प्रतिष्ठा पाता है। और यह जो सूर्योदय से पूर्व ही आहुतियां देता है वह पिछले दो पैरों से इस मृत्यु पर प्रतिष्ठा पाता है, और जब सूर्य निकलता है तो उसको लेकर मृत्यु से छूट जाता है। यह अग्निहोत्र के द्वारा मृत्यु से छूटने का विधान है। जो इस प्रकार अग्निहोत्र द्वारा मृत्यु से छुटकारे का ज्ञान रखता है, वह बार-बार की मौत से छूट जाता है ॥६॥ जैसे तीर की नोक होती है वैसे ही यज्ञ और अग्निहोत्र का सम्बन्ध है। जिधर तीर की नोक जाती है उसी ओर तीर जाता है। इस (अग्निहोत्र) द्वारा सब यज्ञ मृत्यु से छूटने के साधन हैं ॥१०॥ रात और दिन घूमते हुए मनुष्य के सुकृत को उस लोक में क्षीण कर देते हैं। परन्तु दिन और रात उसके इस ओर हैं, इसलिए दिन-रात उसके सुकृत को क्षीण नहीं करते ॥११॥ और जैसे रथ में बैठे हुए ऊपर से रथ के घूमते हुए पहियों को देखता है, उसी प्रकार वह ऊपर से दिन और रात को देखता है। और जो इस प्रकार दिन और रात से छुटकारा पाने का भेद जानता है, उसके सुकृत को दिन और रात क्षीण नहीं कर सकते ॥१२॥ (यजमान) पूर्व की ओर से आहवनीय का चक्कर लगाकर उसके और गार्हपत्य के बीच में होकर (अपने स्थान को) जाता है, क्योंकि (अभी) देव (इस) मनुष्य को पहचानते नहीं। परन्तु जब वह बीच में से जाता है तो पहचानते हैं कि यही हमको आहुति देगा। अग्नि पाप का नाशक है और आहवनीय और गार्हपत्य उसके पाप को नष्ट कर देते हैं जो उन दोनों के बीच में होकर निकलता है। और उसका पाप नष्ट हो जाने पर भी वह श्री और यश से युक्त होकर ज्योति हो जाता है ॥१३॥ अग्निहोत्र का द्वार उत्तर की ओर है। इसलिये वह ऐसे घुसता है मानो द्वार में होकर घुसा। और जो दक्षिण से जाकर बैठ जाय तो मानो वह बाहर चला गया ॥१४॥ अग्निहोत्र स्वर्ग की नाव है। आहवनीय और गार्हपत्य उस स्वर्ग की नाव की दो तरफें हैं, और दूध की आहुति देनेवाला मल्लाह है ॥१५॥ जब वह पूर्व की ओर चलता है तो मानो वह इस नाव को पूर्व की ओर स्वर्ग की ओर ले जाता है और उसके द्वारा स्वर्गलोक को प्राप्त कर लेता है। उस पर उत्तर से चढ़ना उसको स्वर्गलोक में ले जाना है। जो दक्षिण से घुसकर उसमें बैठता है तो ऐसा समझना चाहिए मानो वह उस समय नाव में घुसने लगा जब वह चल पड़ी और वह पीछे ओर बाहर रह गया ॥१६॥