शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)
Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda
महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंकां० २, अ० ३, ब्रा० ४, कं० १३-२१ शतपथब्राह्मण / २५१ नो वर्धया रयिम्” (यजु० ३।१४) - "यह तेरी ऋतु के अनुकूल योनि है जहां से उत्पन्न होकर तू चमकता है। हे अग्नि ! इस बात को जानकर उठ और हमारा धन बढ़ा।" 'रयि' का अर्थ है पुष्टि। इस मन्त्र का अर्थ यह है कि 'तू हमारी बढ़ोतरी कर' ॥१३॥ अब कहता है, “अयमिह प्रथमो धायि धातृभिर्होता यजिष्ठोऽअध्वरेष्वीड्यः । यमप्नवानो भृगवो विरुरुचुर्वनेषु चित्रं विभ्वं विशेविशे" (यजु० ३।१५) - "विधाताओं द्वारा प्रथम यह यहाँ बनाया गया, सर्वश्रेष्ठ होता और यज्ञ में पूजा के योग्य, जिसको अप्नवान और भृगु ने प्रज्वलित किया, वनों में विचित्रता से चमकते हुए और घर-घर में फैलते हुए' ॥१४॥ अब कहता है, "अस्य प्रत्नामन्नु द्युतं शुक्रं दुदुह्रे अह्रयः । पयः सहस्रसामृषिम्" (यजुर्वेद ३।१६) - " ( अह्रयः ) न शरमानेवाले लोगों ने (अस्य) इस अग्नि के ( प्रत्नाम् ) सन्तान ( द्युतं ) प्रकाशयुक्त (शुक्रं) शुद्ध (पयः) दूध को (सहस्रसाम् + ऋषिम्) हजारों देनेवाले ऋषि से (दुदुह्रे ) दुहा।" 'सहस्रसा' का अर्थ है परम दान देनेवाला। इसी की प्राप्ति के लिए वह कहता है 'सहस्रसाम् ऋषिम्' ॥१५॥ ये छः ऋचाओं के मन्त्र हैं। पहले में 'उप' शब्द है और पिछले में 'प्रत्न' (अर्थात् यजुर्वेद के तीसरे अध्याय, ११ से १६ मन्त्र तक)। हमने इनका उच्चारण इसलिए किया 'उप' वाली यह अर्थात् पृथिवी है और प्रत्न (सन्तान) वह अर्थात् द्यौ है। क्योंकि जितने देव पहले थे उतने अब भी हैं, इसलिए 'प्रत्न' का अर्थ द्यौलोक है। अब इन्हीं दोनों के बीच में सब कामनाएँ हैं और ये दोनों यजमान के हित के लिए और उसकी कामनाओं की पूर्ति के लिए संयुक्त हैं ॥१६॥ पहला मन्त्र तीन बार जपता है और अन्तिम तीन बार। क्योंकि यज्ञ तीन आरम्भ और तीन अन्तवाले होते हैं, इसलिए तीन बार प्रथम मन्त्र जपता है और तीन बार अन्तिम ॥१७॥ अग्निहोत्र करने में जो कुछ भूल वाणी या कर्म से करता है उससे वह आत्मा आयु, वर्चस् और प्रजा को हानि पहुँचाता है ॥१८॥ इसलिए कहता है, “तनूपाऽअग्नेऽसि तन्वं मे पाह्यायुर्दाऽअग्नेऽस्यायुर्मे देहि वर्चोदाऽअग्नेऽसि वर्चो मे देहि । अग्ने यन्मे तन्वाऽऊनं तन्मऽआपृण” (यजु० ३।१७) - “हे अग्नि ! तू शरीरों का रक्षक है, मेरे शरीर की रक्षा कर। हे अग्नि ! तू आयु को देनेवाला है, मुझे आयु दे। हे अग्नि ! तू वर्चस् को देनेवाला है, मुझे वर्चस् दे । हे अग्नि ! जो मेरे शरीर में कमी है उसको मेरे लिए पूरा कर” ॥१९॥ और अग्निहोत्र करने में वह वाणी या कर्म से जो भूल करता है उससे वह आत्मा आयु, वर्चस् और प्रजा को हानि पहुँचाता है। जब वह इस मन्त्र को पढ़ता है 'मेरी कमी को पूरा कर' तो वह कमी पूरी हो जाती है ॥२०॥ अब कहता है, “इन्धानास्त्वा शतꣳ हिमा द्युमन्तं समिधीमहि” (यजु० ३।१८)— "प्रज्वलित हम सौ वर्षों तक तुझ जलते हुए के ऊपर समिधा रखते हैं।" इससे तात्पर्य है कि हम सौ वर्ष जीते रहें, और 'जलते हुए तुझ पर समिधा रक्खें' का अर्थ है कि 'हे महान् ! हम तुझको प्रज्वलित करते हैं।' अब कहता है- “वयस्वन्तो वयस्कृतꣳ सहस्वन्तः सहस्कृतम्” (यजु० ३।१८) -“अन्नवाले हम तुझ अन्न देनेवाले को, बलवान् हम बल देनेवाले तुझको।" इसका अर्थ है कि 'हम अन्नवाले हों, तू अन्न देनेवाला हो। हम बलवाले हों, तू बल देनेवाला हो।' अब कहा- “अग्ने सपत्नदम्भनमदब्धासोऽअदाम्यम् ।” (यजु० ३।१८) – “हे अग्नि ! क्षतिरहित हम तुझ क्षतिरहित