भारतकोश
शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished699 पृष्ठ

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कां० १, अ० १, ब्रा० २, कं० ३-१३ शतपथब्राह्मण / ६ क्योंकि जब देव यज्ञ करने लगे तो डरे कि कहीं असुर-राक्षस यज्ञ में विघ्न न डालें। अतः पहले से ही वह दुष्ट राक्षसों को यज्ञ से दूर कर देता है ॥३॥ अब वह (धान की गाड़ी की ओर) चलता है यह मंत्रांश बोलकर (यजु० १।७)-- “अन्तरिक्ष में चलता हूँ।” राक्षस अन्तरिक्ष में खुले-बन्द दोनों ओर चलता है। इसी प्रकार यह पुरुष (अध्वर्यु) भी खुले-बन्द, दोनों ओर चलता है। इस प्रकार वह यह मंत्रांश पढ़कर अन्तरिक्ष को दुष्ट राक्षसों से मुक्त कर देता है ॥४॥ (हवि के धान को) गाड़ी से ही लेना चाहिये। गाड़ी पहले है और यज्ञ-शाला पीछे। जो पहले है उसको मैं पहले करूँ। इसलिये गाड़ी से ही लेना चाहिये ॥५॥ अनस् (गाड़ी) का अर्थ है भूमा (बहुतायत)। वस्तुतः गाड़ी बहुतायत का चिह्न है। जो चीज बहुत होती है उसको कहते हैं 'गाड़ी भरकर है'। इस प्रकार बहुतायत का सम्पादन करता है। इसलिये गाड़ी से ही लेना चाहिये ॥६॥ यज्ञ गाड़ी है। यज्ञ वस्तुतः गाड़ी है। इसलिये यजुः-मंत्रों का संकेत गाड़ी की ओर है; कोष्ठ (कोठार) या घड़े की ओर नहीं। यह ठीक है कि ऋषियों ने चावलों को चमड़े के थैले से निकाला था। इसलिये यजुः-मंत्र ऋषियों के सम्बन्ध में चमड़े के थैले की ओर संकेत करते हैं। परन्तु यहाँ तो प्रकृत अर्थ ही है- 'यज्ञ से यज्ञ को करूँ।' इसलिये गाड़ी से ही लेना चाहिये ॥७॥ कुछ पात्र से भी लेते हैं। फिर भी यजुः-मंत्रों को पूरा-पूरा पढ़ना चाहिये। इस दशा में स्फ्या को पात्र में डालना चाहिये, यह सोचकर कि जहाँ जोड़ूं वहीं खोलूं। जहाँ जोड़ते हैं वहीं खोलते हैं (गाड़ी का जुआ जहाँ जोड़ा जाता है वहीं खोला जाता है) ॥८॥ इस गाड़ी का जुआ अग्नि हो। जुआ अग्नि है, क्योंकि जुआ जब बैलों के कन्धों पर रक्खा जाता है तो कन्धे जल जाते हैं। डण्डे का जो बीच का भाग है वह मानो वेदी है और गाड़ी में जहाँ चावल रहता है वह मानो हविर्धान है। इस प्रकार गाड़ी की यज्ञ से उपमा दी गई है ॥६॥ अब वह जुए को छूता है, यजु० १।८ के इस अंश को पढ़कर - "तू जुआ है। उसको सता जो सतानेवाला है। उसको सता जो हमको सताता है या जिसको हम सताते हैं।" जुए में अग्नि होता है। जब वह हवि लेने जायगा तो जुए के पास से गुजरेगा। इस प्रकार जुए को प्रसन्न करता है जिससे जुआ उसको कष्ट न दे ॥१०॥ आरुणि ने जो कहा था कि मैं हर आधे मास में शत्रुओं का नाश करता हूँ वह इसी सम्बन्ध में कहा था ॥११॥ डण्डे को छूते हुए, यजु० १।८ और १।६ के इन अंशों का जाप करता है- “तू देवों में सबसे अच्छा ले-जानेवाला, सबसे अच्छा जुड़ा हुआं, सबसे अच्छा भरा हुआ, सबसे अच्छा, प्यारा, सबसे अच्छा निमंत्रण देनेवाला है।" "तू सबसे दृढ़ हविर्धान है। कड़ा रह, ढीला न पड़।" इस प्रकार वह गाड़ी की स्तुति करता है कि इस प्रकार स्तुत और प्रसन्न गाड़ी से वह हवि ले सके। “यज्ञपति स्खलित न हो” (यजु० १।६)। यजमान ही यज्ञपति है। यजमान की दृढ़ता के लिए ही यह प्रार्थना करता है ॥१२॥ (दाहिने पहिये पर से) गाड़ी पर चढ़ता है इस मंत्र से (यजु० १।६)--"विष्णु तुझ पर