भारतकोश
शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished699 पृष्ठ

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कां० २, अ० ३, ब्रा० ४, कं० २१-२६ शतपथब्राह्मण / २५३ और शत्रुओं का दमन करनेवाले को।” इसका तात्पर्य यह है कि 'तेरी सहायता से शत्रुओं को सर्वथा दुःखी करें' ॥२१॥ तीन बार इस मन्त्रांश को जपे- “चित्रावसो स्वस्ति ते पारमशीय” (यजु० ३।१८)— “हे चित्रावसो, हम भलीभांति तेरे पार को पा जायें।” 'चित्रावसु' रात है, क्योंकि यह चित्रों को इकट्ठा करके रहती है। इसीलिए (रात में) दूर से चित्र स्पष्ट नहीं दीखता ॥२२॥ इसी मन्त्र से ऋषि लोग रात के पार को भलीभांति पा गये और इसी के कारण दुरात्मा राक्षसों ने उनको न पाया। इसी प्रकार इसी मन्त्र के द्वारा वह रात के पार को भली- भाँति पा जाता है और इसी के कारण दुरात्मा राक्षस उसको नहीं पा सकते। इस मन्त्र को वह खड़े होकर जपता है ॥२३॥ अब बैठे-बैठे यह जपता है - “सं त्वमग्ने सूर्यस्य वर्चसागथाः” (यजु० ३।१६) - “हे अग्नि, तू सूर्य के वर्चस् (प्रकाश) को प्राप्त हो गया।” यह वह कहता है क्योंकि डूबता हुआ सूर्य आहवनीय में घुस जाता है, इसीलिये कहा। अब कहा- “समृषीणाꣳ स्तुतेन।” (यजु० ३।१६) “ऋषियों की स्तुति से।” चूँकि वह खड़े होकर स्वयं प्रार्थना करता है इसलिए ऐसा कहता है- “सं प्रियेण धाम्ना” (यजु० ३।१६) - “प्रिय घर के द्वारा।” आहुतियाँ इसका प्रियधाम हैं। इसलिए 'धाम के द्वारा' का अर्थ है आहुतियों के द्वारा। अब कहा- “समहमायुषा सं वर्चसा सं प्रजया सं॒ रायस्पोषेण गमिषीय” (यजु० ३।१६) - “मैं आयु, वर्चस्, सन्तान और धन की प्राप्ति करूँ।” इसका तात्पर्य यह है कि 'जैसे तूने ये चीजें प्राप्त कीं, वैसे मैं भी आयु, वर्चस्, सन्तान और धन अर्थात् समृद्धि को प्राप्त हो जाऊँ' ॥२४॥ अब इस मन्त्र को पढ़कर गाय के पास जाता है- “अन्ध स्थान्धो वो भक्षीय मह स्थ महो वो भक्षीय” (यजु० ३।२०) - “तुम अन्ध (अन्न) हो, मैं तुम्हारा अन्न खाऊँ; तुम धन हो, मैं तुम्हारा धन खाऊँ।” इसका तात्पर्य है कि तुम्हारे जो पराक्रम हों और जो धन हों उनका मैं उपभोग करूँ। अब कहा- “ऊर्ज स्थोर्जं वो भक्षीय” (यजु० ३।२०) - “तुम ऊर्ज हो, मैं तुम्हारे ऊर्जं को भोगूं।” अर्थात् 'तुम रस हो। मैं तुम्हारे रस को भोगूं।' अब कहा- “रायस्पोष स्थ रायस्पोषं वो भक्षीय” (यजु० ३।२०) - “तुम धन हो, तुम्हारे धन को मैं भोगूँ।” अर्थात् तुम समृद्धि हो, मैं तुम्हारी समृद्धि का भोग करूँ ॥२५॥ अब कहा “रेवती रमध्वम्” (यजु० ३।२१) - “हे धनवालो! रमण करो।” रेवन्त अर्थात् धनवाले पशु हैं। इसलिए कहा, 'रेवती रमध्वम्।' अब कहा- “अस्मिन् योनावस्मिन् गोष्ठेऽस्मिंल्लोकेऽस्मिन्क्षये। इहैव स्त मापेगात।” - “इस स्थान में, इस बाड़े में, इस लोक में, इस घर में, यहाँ ही रहो, यहाँ से न जाओ।” यहाँ अपने लिए कहा है अर्थात् 'मुझको छोड़कर न जाओ' ॥२६॥ अब इस मन्त्र से गाय को छूता है- “सं॒हितासि विश्वरूपी” (यजु० ३।२२) - “तू इकट्ठा करनेवाली और नाना रूपवाली है।” पशु भिन्न-भिन्न रूपवाले होते हैं इसलिए (गाय को) 'विश्वरूपी' कहा। अब कहा- “ऊर्जा माविश गोपत्येन” (यजु० ३।२२) - “(गोपत्येन ऊर्जा) गौओं से युक्त ऊर्ज के द्वारा (मा) मुझमें (विश) प्रविष्ट हो।” यहाँ 'ऊर्ज' कहने से 'रस' का तात्पर्य है और 'गोपत्य' कहने से तात्पर्य है 'संवृद्धि' का ॥२७॥ अब गार्हपत्य में जाता है और उसकी अर्चना करता है इस मन्त्र से— “उप त्वाग्ने दिवे- दिवे दोषावस्तर्धिया वयम्। नमो भरन्त॒एमसि” (यजु० ३।२२) - “हे अग्नि ! दिन-प्रतिदिन नमस्कार करते हुए हम रात को प्रकाशित करनेवाले तुझको बुद्धि से प्राप्त होते हैं। वह इसलिए इसकी अर्चना करता है कि कहीं वह उसको हानि न पहुँचा दे ॥२८॥ अब कहता है, “राजन्तमध्वराणां गोपामृतस्य दीदिवम्। वर्धमानं॒ स्वे दमे” (यजु०