शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)
Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda
महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
कां० २, अ० ३, ब्रा० ४, कं० २१-२६ शतपथब्राह्मण / २५३ और शत्रुओं का दमन करनेवाले को।” इसका तात्पर्य यह है कि 'तेरी सहायता से शत्रुओं को सर्वथा दुःखी करें' ॥२१॥ तीन बार इस मन्त्रांश को जपे- “चित्रावसो स्वस्ति ते पारमशीय” (यजु० ३।१८)— “हे चित्रावसो, हम भलीभांति तेरे पार को पा जायें।” 'चित्रावसु' रात है, क्योंकि यह चित्रों को इकट्ठा करके रहती है। इसीलिए (रात में) दूर से चित्र स्पष्ट नहीं दीखता ॥२२॥ इसी मन्त्र से ऋषि लोग रात के पार को भलीभांति पा गये और इसी के कारण दुरात्मा राक्षसों ने उनको न पाया। इसी प्रकार इसी मन्त्र के द्वारा वह रात के पार को भली- भाँति पा जाता है और इसी के कारण दुरात्मा राक्षस उसको नहीं पा सकते। इस मन्त्र को वह खड़े होकर जपता है ॥२३॥ अब बैठे-बैठे यह जपता है - “सं त्वमग्ने सूर्यस्य वर्चसागथाः” (यजु० ३।१६) - “हे अग्नि, तू सूर्य के वर्चस् (प्रकाश) को प्राप्त हो गया।” यह वह कहता है क्योंकि डूबता हुआ सूर्य आहवनीय में घुस जाता है, इसीलिये कहा। अब कहा- “समृषीणाꣳ स्तुतेन।” (यजु० ३।१६) “ऋषियों की स्तुति से।” चूँकि वह खड़े होकर स्वयं प्रार्थना करता है इसलिए ऐसा कहता है- “सं प्रियेण धाम्ना” (यजु० ३।१६) - “प्रिय घर के द्वारा।” आहुतियाँ इसका प्रियधाम हैं। इसलिए 'धाम के द्वारा' का अर्थ है आहुतियों के द्वारा। अब कहा- “समहमायुषा सं वर्चसा सं प्रजया सं॒ रायस्पोषेण गमिषीय” (यजु० ३।१६) - “मैं आयु, वर्चस्, सन्तान और धन की प्राप्ति करूँ।” इसका तात्पर्य यह है कि 'जैसे तूने ये चीजें प्राप्त कीं, वैसे मैं भी आयु, वर्चस्, सन्तान और धन अर्थात् समृद्धि को प्राप्त हो जाऊँ' ॥२४॥ अब इस मन्त्र को पढ़कर गाय के पास जाता है- “अन्ध स्थान्धो वो भक्षीय मह स्थ महो वो भक्षीय” (यजु० ३।२०) - “तुम अन्ध (अन्न) हो, मैं तुम्हारा अन्न खाऊँ; तुम धन हो, मैं तुम्हारा धन खाऊँ।” इसका तात्पर्य है कि तुम्हारे जो पराक्रम हों और जो धन हों उनका मैं उपभोग करूँ। अब कहा- “ऊर्ज स्थोर्जं वो भक्षीय” (यजु० ३।२०) - “तुम ऊर्ज हो, मैं तुम्हारे ऊर्जं को भोगूं।” अर्थात् 'तुम रस हो। मैं तुम्हारे रस को भोगूं।' अब कहा- “रायस्पोष स्थ रायस्पोषं वो भक्षीय” (यजु० ३।२०) - “तुम धन हो, तुम्हारे धन को मैं भोगूँ।” अर्थात् तुम समृद्धि हो, मैं तुम्हारी समृद्धि का भोग करूँ ॥२५॥ अब कहा “रेवती रमध्वम्” (यजु० ३।२१) - “हे धनवालो! रमण करो।” रेवन्त अर्थात् धनवाले पशु हैं। इसलिए कहा, 'रेवती रमध्वम्।' अब कहा- “अस्मिन् योनावस्मिन् गोष्ठेऽस्मिंल्लोकेऽस्मिन्क्षये। इहैव स्त मापेगात।” - “इस स्थान में, इस बाड़े में, इस लोक में, इस घर में, यहाँ ही रहो, यहाँ से न जाओ।” यहाँ अपने लिए कहा है अर्थात् 'मुझको छोड़कर न जाओ' ॥२६॥ अब इस मन्त्र से गाय को छूता है- “सं॒हितासि विश्वरूपी” (यजु० ३।२२) - “तू इकट्ठा करनेवाली और नाना रूपवाली है।” पशु भिन्न-भिन्न रूपवाले होते हैं इसलिए (गाय को) 'विश्वरूपी' कहा। अब कहा- “ऊर्जा माविश गोपत्येन” (यजु० ३।२२) - “(गोपत्येन ऊर्जा) गौओं से युक्त ऊर्ज के द्वारा (मा) मुझमें (विश) प्रविष्ट हो।” यहाँ 'ऊर्ज' कहने से 'रस' का तात्पर्य है और 'गोपत्य' कहने से तात्पर्य है 'संवृद्धि' का ॥२७॥ अब गार्हपत्य में जाता है और उसकी अर्चना करता है इस मन्त्र से— “उप त्वाग्ने दिवे- दिवे दोषावस्तर्धिया वयम्। नमो भरन्त॒एमसि” (यजु० ३।२२) - “हे अग्नि ! दिन-प्रतिदिन नमस्कार करते हुए हम रात को प्रकाशित करनेवाले तुझको बुद्धि से प्राप्त होते हैं। वह इसलिए इसकी अर्चना करता है कि कहीं वह उसको हानि न पहुँचा दे ॥२८॥ अब कहता है, “राजन्तमध्वराणां गोपामृतस्य दीदिवम्। वर्धमानं॒ स्वे दमे” (यजु०
२५४ शतपथ ब्राह्मण तन्नो॑ भूयो॒-भूय॑ ए॒व कु॒र्वित्ये॒वैतदा॑ह ॥ २९॥ स॒ नः॑ पि॒तेव॑ सू॒नवे॑ । अग्ने॑ सू॒पाय॒- नो भ॑व । स॒च॑स्वा नः स्व॒स्तय॒ऽइति॒ यथा॑ पि॒ता पु॒त्राय॑ सूपच॒रो नैवे॑नं॒ केन॑ च॒न हि॒नस्त्ये॒वं नः॑ सूपच॒रो रधि॒ मैव॑ वा॒ केन॑ च॒न हि॑सिषिष्टे॒त्येवैतदा॑ह ॥ ३०॥ अथ॑ द्विपदा॑: । अग्ने॒ त्वं नो॒ऽअन्त॑म उ॒त त्रा॒ता शि॒वो भ॑वा वरू॒थ्यः॑ । वसु॑र॒ग्निर्वसु॑श्रवा॒ अच्छा॒ नक्षि॑ सु॒मत्त॑मं र॒यिं दाः॑ ॥ तं त्वा॑ शोचिष्ठ दीदिवः सु॒म्नाय॑ नू॒नमी॑महे॒ स- खिभ्यः॑ । स नो॑ बोधि श्रु॒धी हव॑मुरु॒ष्या णो॑ऽअघाय॒तः सम॑स्मा॒दिति॑ ॥ ३१॥ यद्वा ऽआ॑हव॒नीय॒मुप॑तिष्ठते । प॒शूंस्तद्या॑चते॒ तस्मा॑त्तुमुच्चावचैश्छन्दो॑भिरु॒पति॑ष्ठत॒ऽउच्चा॑- वचा इव॒ हि पशवो॒ऽथ यद्गार्ह॑पत्यं पु॒रुषां॑स्त॒द्या॑चते॒ तद्गाय॑त्रं प्रथ॒मं तृचं॑ गाय॒त्रं वा॒ऽअग्ने॒श्छन्दः॑ स्वेनै॒वैन॑मेत॒च्छन्द॑सोप॒परै॑ति ॥ ३२॥ अथ द्विपदा॑: । पु॒रुष॒छन्द॑सं॒ वै द्विपदा॑ द्विपाद्वा॒ऽअयं पु॑रुषः पु॒रुष॑मे॒वैतद्या॑चते पु॒रुषान्हि॑ या॑चते॒ तस्मा॑द्द्विपदाः॑ प॒शुमा॒न्त्सु वै पु॑रुष॒वान्भव॑ति॒ य ए॒वं वि॒द्वानुप॑ति॒ष्ठते॑ ॥ ३३॥ अथ गा॒मभ्यै॑ति । इ॒- डऽए॒ह्यदि॑त॒ऽएही॑तो॒डा हि गौरदि॑ति॒र्हि गौस्ताम॑भि॒मृश॑ति का॒म्या ए॒तेति॑ मनु॒- ष्याणां॒ ह्येतासु॒ कामाः॒ प्रवि॑ष्टा॒स्तस्मा॑दाह का॒म्या ए॒तेति॒ मयि॑ वः कामध॒रणं॑ भूया॒दित्य॒हं वः॑ प्रि॒या भू॑यासमित्ये॒वैतदा॑ह ॥ ३४॥ अथा॒न्तरे॑णाहव॒नीयं॑ च गार्ह॑- पत्यं च । प्राङ् तिष्ठ॑न्न॒ग्निमीक्ष॑माणो जपति सोमा॒न ँ॒ स्वर॑णं कृणु॒हि ब्र॑ह्म॒णस्प॑- ते । कक्षीव॑न्तं॒ य औ॑शि॒जः॑ ॥ यो रे॒वान्योऽअ॑मीव॒हा वसु॑वित्पुष्टि॒वर्धनः॑ । स नः॑ सिषक्तु॒ यस्तुरः॑ ॥ मा नः॒ श ँ॒सोऽअरु॑षो॒ धूर्तिः॒ प्रणङ् मर्त्य॑स्य । र॒क्षा णो॑ ब्रह्मण- स्प॒तऽइति॑ ॥ ३५॥ यद्वा॒ऽआह॑वनी॒यमुप॑तिष्ठते । दिवं॒ तदुप॑तिष्ठ॒तेऽथ॒ यद्गार्ह॑पत्यं पृथि॒वीं तदु॒थैतदु॑त्त॒र्द्धिन्ने॒षा हि दिग्बृहस्प॑ते॒रैता ँ॒ ह्ये॒तद्दिश॒मुप॑तिष्ठते॒ तस्मा॑द्गा- र्ह॑पत्यं॑ जप॑ति ॥ ३६॥ म॒हि त्री॒णामवॊ॑ऽस्तु । द्यु॒क्षं मि॒त्रस्या॑र्य॒म्णः । दु॒राधर्षं॒ व- रुणस्य॑ ॥ न हि ते॒षाममा॑ च॒न नाध॑सु॒ वार॑णेषु । ईशे॑ रि॒पुरघ॒श ँ॒सः॑ ॥ ते हि पु॒त्रासो॒ऽअदि॑तेः॒ प्र जी॒वसे॒ मर्त्या॑य । ज्योति॒र्यच्छ॒न्त्यज॑स्र॒मिति॑ तत्रा॑स्ति नाध॑सु॒ वा-
कां० २, अ० ३, ब्रा० ४, कं० २६-३७ शतपथब्राह्मण / २५५ ३।२३) — "यज्ञों के प्रकाशित करनेवाले, ऋत के चमकानेवाले रक्षक, अपने घर में बढ़नेवाले तुझको।" इसका तात्पर्य है कि यह मेरा घर तेरा ही घर है। इसको हमारे लिए समृद्धि-शील कर ॥२६॥ अब कहा, "स नः पितेव सूनवेऽग्ने सूपायनो भव । सचस्वा नः स्वस्तये" (यजु० ३।२४) "हे अग्नि, तू हमारे लिए उसी प्रकार सुलभ हो जैसे पिता पुत्र को । और हमारी स्वस्ति कर।" इसका तात्पर्य है कि जैसे पिता पुत्र के लिए सुलभ होता है और किसी प्रकार उसको हानि नहीं पहुँचाता, इसी प्रकार तू भी हमारे लिए सुलभ हो, किसी प्रकार हानि न पहुँचा ॥३०॥ अब वह दो पदवाले मन्त्र को पढ़ता है, 'अग्ने त्वं नोऽअन्तमऽउत त्राता शिवो भवा वरूथ्यः । वसुर्गनिर्वसुश्रवाऽअच्छा नक्षि द्युमत्तमँ रयिं दाः' (यजु० ३।२५) — "तं त्वा शोचिष्ठ दीदिवः सुम्नाय नूनमीमहे सखिभ्यः । स नो बोधि श्रुधी हवमुरुष्या णोऽअघायतः समस्मात्" (यजु० ३।२६) — "हे अग्नि ! तू मेरे निकट रह । रक्षक, कल्याणकारी और घर का हितकर हो । हे अग्नि, तुम वसु (धन) हो, वसुश्रवा अर्थात् धन देने के लिए प्रसिद्ध हो । हमको अच्छा-अच्छा चमकदार धन दो" (यजु० ३।२५) — "अपने मित्रों को सुख के लिए हम तुझ प्रकाशस्वरूप और चमकानेवाले के पास आते हैं। हमारे साथ रह, हमारी बात सुन और हमको पापी शत्रु से बचा" (यजु० ३।२६) ॥३१॥ जब आहवनीय की अर्चना करता है तो पशुओं की याचना करता है, इसलिए ऊँचे-नीचे मन्त्रों को जपता है, क्योंकि पशु भिन्न आकार के होते हैं। जब गार्हपत्य की अर्चना करता है तो पुरुषों की याचना करता है। इसलिए पहली तीन ऋचाएँ गायत्री छन्द में हैं। गायत्री अग्नि.का छन्द है। इसलिए उसी के छन्द से स्तुति करता है ॥३२॥ अब वह (ऊपर के) दो पदवाले मन्त्र जपता है। दो पदवाले मन्त्र पुरुष छन्द हैं, क्योंकि पुरुष भी दो पैरवाला है, इसलिए पुरुषों की याचना करता है। पुरुषों की याचना करता है इसलिए दो पदोंवाले मन्त्र को जपता है। जो इस रहस्य को समझकर (दोनों अग्नियों की) सेवा करता है उसको पशु और पुरुष दोनों प्राप्त होते हैं ॥३३॥ अब वह इस मन्त्र को जपकर गाय के पास जाता है, "इड एह्यदित ऽएहि" (यजुर्वेद ३।२७) — "हे इडा, आ । हे अदिति, आ ।" इडा गौ है। अदिति गौ है। "काम्याऽ एत" अर्थात् "कामना के योग्य तुम आओ" यह कहकर छूता है। इनमें मनुष्यों की कामनाएँ हैं, इसलिए इनको 'काम्या एत' कहा (यजु० ३।२७) । अब कहा—"मयि वः कामधरणं भूयात्" (यजु० ३।२७) —"आपकी मेरे में इच्छा-पूर्ति हो" अर्थात् मैं आपका प्रिय होऊँ, यह तात्पर्य है ॥३४॥ अब आहवनीय और गार्हपत्य के बीच में खड़ा होकर पूर्व को देखकर (इन तीन मन्त्र) को जपता है—'सोमानँ स्वरणं कृणुहि ब्रह्मणस्पते । कक्षीवन्तं यऽ औशिजः ॥ यो रेवान् योऽ अमीवहा वसुवित् पुष्टिवर्धनः । स नः सिषक्तु यस्तुरः ॥ मा नः शँ सोऽअरुषो धूर्तिः प्रणङ् मर्त्यस्य । रक्षा णो ब्रह्मणस्पते" (यजु० ३।२८, २६, ३०) — "हे वाणी के पति, सोम को अर्पण करनेवाले कक्षीवान औशिज को सुरीला कर", "धनवाला, दुःखनाशक, समृद्धिशील और पुष्टि देनेवाला तथा तीव्र, हमारे पास आवे", "हे वाणी के पति ! हमारी रक्षा कर । बुरों का शाप हम तक न आवे और न किसी मनुष्य की धूर्तता" ॥३५॥ जब वह आहवनीय में जाता है तो मानो द्यौलोक में जाता है और जब गार्हपत्य में जाता है तो मानो पृथिवीलोक में, इससे वह अन्तरिक्ष में जाता है। यह बृहस्पति की दिशा है। इस दिशा को प्राप्त होना चाहता है, इसलिए बृहस्पतिवाला मन्त्र जपता है ॥३६॥ अब जपता है, "महि त्रीणामवोऽस्तु द्युक्षं मित्रस्यार्यम्णः । दुराधर्षं वरुणस्य" (यजु० ३।३१) । "नहि तेषाममा चन नाध्वसु वारणेषु । ईशे रिपुरघशँ सः' (यजु० ३।३२) । "ते हि पुत्रासोऽ अदितेः प्र जीवसे मत्र्याय । ज्योतिर्यच्छन्त्यजस्रम्" (यजु० ३।३३) — "बड़ी द्यौलोक सम्बन्धी, न पराजित होनेवाली मित्र, अर्यमा और वरुण तीनों की रक्षा (हमारे लिए) हो," "(इन देवों से रक्षित) लोगों पर भयानक मागों अथवा घरों में पापी शत्रु स्वत्व नहीं प्राप्त कर सकते", "(ये देव) निरन्तर मनुष्य के लिए अदिति के पुत्रों के जीवन के लिए ज्योति देते हैं।"
अध्याय-४, ब्राह्मण-१
२५६ शतपथ ब्राह्मण र॒णेष्ठित्ये॒ते ह वाऽअ॒ध्वानो वार॑णा य॒ऽइमेऽन्त॒रेण द्यावा॑पृथि॒वीऽए॒तान्त्ये॒तदुप॑- तिष्ठते तस्मादाह॒ नाध॑सु वार॒णेष्ठि॑ति ॥ ३७॥ अथैन्द्री॑ । इन्द्रो॒ वै य॒ज्ञस्य दे॒वता॑ सेन्द्र॑मे॒वैतद॒ग्न्युप॒स्थानं॑ कुरुते क॒दा च॒न स्त॒रीर॑सि॒ नेन्द्र॑ सश्चसि दा॒शुष॒ऽइति य- ज॑मानो॒ वै दा॒श्वाञ् य॒जमा॑नाय दुह्युसीत्ये॒वैतदा॒होपो॑पेन्नु म॑घवन्भूय॒ इन्तु ते दानं॑ दे॒वस्य॑ पृच्यत॒ऽइति॒ भूयो॑-भूय ए॒व न इ॒दं पु॒ष्टं कु॑र्वित्ये॒वैतदाह ॥ ३८॥ अथ सा- वि॒त्री । सवि॒ता वै दे॒वानां॑ प्रसवि॒ता तथो हास्माऽए॒ते स॑वितृप्रसूता ए॒व सर्वे॑ कामाः॒ समृ॑ध्यन्ते तत्स॑वितुर्वरे॑ण्यं॒ भर्गो॑ दे॒वस्य॑ धीमहि । धियो॒ यो नः॑ प्रचो॒दया- दिति॑ ॥ ३९॥ अ॒थाग्ने॒यी । तद॒ग्नय॑ऽए॒वैतदा॒त्मानम॒न्ततः॑ परि॒ददा॑ति गु॒प्त्यै परि॑ ते दू॒डभो॒ रथो॒ऽस्मां॥३७अ॒ग्ने॑तु वि॒श्वत॑ः । येन॑ र॒क्षसि॑ दा॒शुष॒ इति॑ य॒जमाना॒ वै दा॒- श्वां॑सो॒ यो ह वाऽअ॑स्यानाधृष्यतमो॒ रथ॒स्तेने॒ष य॒जमाना॑न॒भिर॑क्षति॒ स यस्ते॑ऽना- धृष्य॑तमो॒ रथो॒ येन॑ य॒जमाना॑न॒भिरक्ष॑सि॒ तेन॑ नः सर्व॑तोऽभिगोपायेत्ये॒वैतदाह त्रि- रेत॑ञ्जपति ॥ ४०॥ अथ पुत्रस्य नाम गृ॑ह्णाति । इ॒दं मे॒ऽयं वी॒र्यं॑ पु॒त्रोऽनु॒संत॑नव- दिति॒ यदि॑ पु॒त्रो न स्याद॒प्यात्मन ए॒व नाम॑ गृ॒ह्णीयात् ॥ ४१॥ ब्राह्म॑णम् ॥ २ [३. ४] ॥ अध्यायः ॥ ३ [१२] ॥ ॥ अथ हुतेऽग्निहोत्र॒ऽउप॑तिष्ठते । भूर्भुवः॒ स्वरिति तत्स॒त्येने॑वैतद्वाच॒ समर्थ॑य- ति यदाह॒ भूर्भुवः॒ स्वरिति तया समृ॑द्ध्याशिषमाशास्ते सुप्र॒जाः प्र॒जाभि॑ स्यामिति॒ तत्प्र॒जामाशा॑स्ते सु॒वीरो वी॒रैरिति॒ तद्वी॒रानाशा॑स्ते सु॒पोषः॒ पोषैरिति तत्पुष्टि॒मा- शास्ते ॥ १॥ यद्वाऽअ॒दो दी॒र्घम॒ग्न्युप॒स्थानम् । अशीरिव ताशीरियं तदे॒ताव॑तैवै- तत्सर्व॑माप्नोति॒ तस्मा॑दे॒तेनै॒वोप॑तिष्ठेतैतेन॒ त्वेव॑ वयमुपचराम॒ इति॑ ह स्माहातु- रिः ॥ २॥ अथ प्रवत्स्यन् । गा॒र्हप॒त्यमे॒वाग्र॒ऽउप॑तिष्ठते॒ऽथाहावनीय॑म् ॥ ३॥ स गा- र्हपत्यमुप॑तिष्ठते । नर्य॑ प्र॒जां मे॑ पा॒हीति॑ प्र॒जाया है॒ष ई॑ष्टे॒ तत्प्र॒जामे॒वास्माऽए॒त- त्परि॑ददाति गु॒प्त्यै ॥ ४॥ अथाहावनीय॒मुप॑तिष्ठते । शं॒स्य पशून्मे पा॒हीति॑ पशूना॒-
कां० २, अ० ३-४, ब्रा० ४-१, कं० ३७-४१ व १-५ शतपथब्राह्मण / २५७ यहाँ कहा 'नाध्वसु वारणेषु (भयानक मार्गों में)' क्योंकि द्यौ और पृथिवी के बीच के मार्ग भयानक हैं। इन्हीं मार्गों में उसको चलना है। इसलिए कहता है 'भयानक मार्गों में' ॥३७॥ अब इन्द्र की स्तुति है। इन्द्र ही यज्ञ का देवता है। इसलिए इन्द्र से ही अग्नि के उपस्थान को सम्बद्ध करता है, "कदा चन स्तरीरसि नेन्द्र सश्चसि दाशुषे" (यजु० ३।३४)- "हे इन्द्र ! तू कभी रिक्त (barren) नहीं, और कभी अपने सेवक को विफल नहीं करता।" 'दाशुषे' का तात्पर्य है यजमान । 'तू यजमान से कभी द्रोह नहीं करता' इस मन्त्र के पढ़ने से यही तात्पर्य है। अब कहता है, "उपोषेन्नु मघवन् भूयऽ इन्नु ते दानं देवस्य पृच्यते" (यजु० ३।३४)-'हे मघवन्, तुझ देव का दान अधिक ही होता जाता है।" इसका तात्पर्य यह है कि हमको यहाँ अधिक पुष्ट कर ॥३८॥ अब सावित्री का जाप है। सविता देवों का प्रेरक है। सविता की प्रेरणा से ही सब काम सफल होते हैं। इसलिए कहा "तत् सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि। धियो यो नः प्रचोदयात्' (यजु० ३।३५) ॥३९॥ अब अग्नि के लिए एक मन्त्र है। अपने को अन्त में रक्षार्थ अग्नि के ही समर्पण करता है, "परि ते दूडभो रथोऽस्माँऽ अश्नोतु विश्वतः । येन रक्षसि दाशुषः" (यजु० ३।३६)-"तेरा अवध्य रथ हमको चारों ओर से ढक ले जिससे तू पूजकों की रक्षा करता है।" 'दाशुषः' का अर्थ है यजमान । और अग्नि के पास जो अवध्य रथ है उससे वह यजमानों की रक्षा करता है। इस कहने का तात्पर्य है कि 'हे अग्नि, जो अवध्य रथ तेरे पास है और जिससे तू यजमानों की रक्षा किया करता है, उससे हर ओर से हमारी रक्षा कर।' तीन बार इसको जपता है ॥४०॥ अब वह अपने पुत्र का नाम लेता है- 'मेरा यह लड़का (नाम लेकर) मेरे इस एक क्रम को जारी रखे।' यदि उसके पुत्र न हो तो अपना ही नाम ले ले ॥४१॥ अध्याय ४ - ब्राह्मण १ अग्निहोत्र के पश्चात् वह अग्नि को 'भूर्भुवः स्वः' (यजु० ३।३७) कहकर प्रार्थना करता है। ऐसा कहकर वह अपनी वाणी को सत्य से पवित्र करता है, और वाणी को पवित्र करके आशीर्वाद माँगता है- "सुप्रजाः प्रजाभिः स्याँ७" (यजु० ३।३७) अर्थात् "मैं अच्छी सन्तान- वाला होऊँ।" इससे सन्तान को चाहता है। "सुवीरो वीरैः" (यजु० ३।३७), इससे वीरों को चाहता है। "सुपोषः पोषैः" (यजु० ३।३७), इससे पुष्टि चाहता है ॥१॥ वह बड़ी प्रार्थना भी आशीर्वाद थी और यह छोटी प्रार्थना भी उसी के लिए। इसलिए इससे भी वह सबको प्राप्त करता है, इसलिए वह यह प्रार्थना करे। असुरि का कथन है, 'हम इसी से (अग्निहोत्र) करें' ॥२॥ यदि प्रवास (यात्रा) करना हो तो पहले गार्हपत्य में जावे, फिर आहवनीय में ॥३॥ प्रजापति के पास जाकर कहे, "नर्य प्रजां मे पाहि" (यजु० ३।३७)- "हे नरों के मित्र, मेरी सन्तान की रक्षा कर।" (गार्हपत्य अग्नि) प्रजा का अधिष्ठाता है, इसलिए रक्षा के लिए वह प्रजा को उसी के सुपुर्द कर जाता है ॥४॥ अब आहवनीय के पास जाकर कहता है, "शँस्य पशून् मे पाहि" (यजु० ३।३७) -
२५८ शतपथ ब्राह्मण है॒ष इ॑ष्टे तत्पशूने॒वास्मा॒ऽएतत्परि॑ददाति गु॒प्त्यै ॥५॥ अथ॒ प्र वा॑ व्रजति॒ प्र वा धावय॑ति । स यत्र॒ वेलां॒ मन्य॑ते तत्स्यन्द्वा॒ वाचं॒ विसृ॑जतेऽथ॒ प्रोष्य॒ परे॑त्य॒ यत्र वेलां॒ मन्य॑ते तद्वाचं यच्छति स यद्यपि रात्रात्तरेण स्यान्नैव तमुपेयात् ॥६॥ स आ॒ह॒व॒नी॒यमे॒वाग्र॒ऽउप॑तिष्ठते । अथ गार्हपत्यं गृहा वै गार्हपत्यो गृहा वै प्रति- ष्ठा तद्गृ॒हे॒ष्वे॒वैतत्प्रति॑ष्ठायां॒ प्रति॑तिष्ठति ॥७॥ स आ॒ह॒व॒नीय॑मु॒पति॑ष्ठते । आ॒गन्म॒ विश्ववे॑दसम॒स्मभ्यं॒ वसु॑वित्तमम् । अग्ने॒ सम्राड॒भि द्यु॒म्नम॒भि सह॒ आय॑च्छ॒स्वेत्यथो॑प- विश्य॒ तृणा॒न्यप॑ल्लुम्पति ॥८॥ अथ॒ गार्ह॑पत्यमु॒पति॑ष्ठते । अ॒यम॒ग्निर्गृहप॑ति॒र्गार्ह॑प- त्यः प्र॒जाया॒ वसु॑वित्तमः । अग्ने॒ गृह॑पते॒ऽभि द्यु॒म्नम॒भि सह॒ आय॑च्छ॒स्वेत्यथो॑प॒विश्य॒ तृणा॒न्यप॑ल्लुम्पत्ये॒तन्नु॑ रूपे॒नैते॒न न्वे॑व भूयि॑ष्ठा इ॒वोपति॑ष्ठन्ते ॥९॥ स वै खलु तू- ष्णीमे॒वोपति॑ष्ठेत । इदं॒ वै यस्मि॒न्वस॑ति ब्राह्म॒णो वा राजा॑ वा श्रेया॒न्मनु॒ष्यो॒ न्वे॑व॒ तमे॑व॒ नार्ह॑ति॒ वक्तु॑मि॒दं मे॒ त्वं गो॑पाय॒ प्राहुं॑ वत्स्यामी॒त्यास्म॒न्नेते श्रेयाꣳ॑सो वस॑न्ति देवा॒ अग्न॑यः क उ॒ तान॑र्हति॒ वक्तु॑मि॒दं मे यूयं गो॑पायत॒ प्राहुं॑ वत्स्यामी- ति ॥१०॥ मनो॑ ह॒ वै देवा॒ मनुष्य॑स्याजा॒नन्ति॑ । स वे॑द॒ गार्ह॑पत्यः परि॒दां मे॒दमु॑- पागा॒दिति॑ तूष्णीमे॒वाह॑व॒नीय॑मु॒पति॑ष्ठते स वे॑दाहव॒नीयः॑ परि॒दां मे॒दमु॑पागा॒दिति॑ ॥११॥ अथ॒ प्र वा॑ व्रजति॒ प्र वा धावय॑ति । स यत्र॒ वेलां॒ मन्य॑ते तत्स्यन्द्वा॒ वा- चं॒ विसृ॑जतेऽथ॒ प्रोष्य॒ परे॑त्य॒ यत्र॒ वेलां॒ मन्य॑ते तद्वाचं॒ यच्छ॑ति स यद्य॑पि रा॒त्रात्त॑- रेण स्यान्नैव तमुपेयात् ॥१२॥ स आ॒ह॒व॒नीय॑मे॒वाग्र॒ऽउप॑तिष्ठते । अथ॒ गार्ह॑पत्यं तूष्णीमे॒वाह॑व॒नीय॑मु॒पति॑ष्ठते तूष्णीमुप॒विश्य॒ तृणा॒न्यप॑ल्लुम्पति तूष्णीमेव गार्हपत्य- मुपतिष्ठते तूष्णीमुपविश्य तृणान्यपल्लुम्पति ॥१३॥ अथातो गृहाणामेवोपचारः । ए॒तद्वै॒ गृहपतेः प्रो॒षु॒ष आ॒ग॒ताद्गृ॒हाः समुत्त्र॒स्ता इ॑व भवन्ति किम॒यमि॒ह वदि॑- ष्यति॒ किं वा करिष्यतीति स यो॒ ह॒ तत्र॒ किंचि॒द्वद॑ति वा करो॑ति वा तस्मा॒द्गृ- हाः प्रत्र॒सन्ति तस्येश्व॒रः कुलं विलोभ्यो॒रथ॒ यो॒ ह॒ तत्र॒ न वद॑ति॒ न किं च॒न क॑-
का० २, अ० ४, ब्रा० १, कं० ५-१४ शतपथब्राह्मण / २५६ "हे प्रशंसनीय, मेरे पशुओं को बचा।" (आहवनीय अग्नि) पशुओं का अधिष्ठाता है, इसलिए पशुओं की रक्षा के लिए (आहवनीय के) सुपुर्द करता है ॥५॥ अब वह चलता है या (किसी यान में बैठकर) रवाना होता है, और जिस किसी सीमा को मान लेता है वहां तक चलकर बोलता है (अर्थात् अब तक मौन था, अब बोलता है)। और जब यात्रा से वापस आता है तो मानी हुई सीमा के भीतर आने पर मौन रहता है और चाहे उस समय घर में राजा भी उपस्थित हो (तो भी उसके पास न जाकर) पहले अग्नि के पास जाता है ॥६॥ पहले आहवनीय के पास और फिर गार्हपत्य के पास जाता है। गार्हपत्य ही घर है और घर ही प्रतिष्ठा का स्थान है। इसलिए वह अपने को घर में अर्थात् प्रतिष्ठा के स्थान में स्थापित करता है ॥७॥ वह इस मन्त्र से आहवनीय में जाता है—"आगन्म विश्ववेदसमस्मभ्यं वसुवित्तमम् । अग्ने सम्राडभि द्युम्नमभि सहऽ आयच्छस्व" (यजु० ३।३८) —"हे सम्राट् अग्नि ! हम तुझ विश्ववेद (सबके जाननेवाले), वसुवित्तम (धन बांटनेवाले) के पास आते हैं। हमको प्रकाश और बल दे।" और तृणों से आग को हाँकता है ॥८॥ इस मन्त्र से गार्हपत्य के पास जाता है—"अयमग्निर्गृहपतिर्गाहपत्यः प्रजाया वसुवित्तमः । अग्ने गृहपतेऽभि द्युम्नमभि सहऽ आयच्छस्व' (यजु० ३।३९) —"गार्हपत्य अग्नि घर का स्वामी और हमारी सन्तान के लिए दान देनेवाला है। हे घर के स्वामी ! अग्नि हमको प्रकाश और बल दे।" अब वह बैठकर तृणों से अग्नि को हाँकता है। इस प्रकार (यजमान) जपकरके अग्नि के पास जाया करते हैं ॥९॥ मौन होकर भी जा सकता है और वह इसलिए—'यदि किसी स्थान में कोई ब्राह्मण राजा या श्रेष्ठ मनुष्य रहता हो तो कोई उससे यह नहीं कह सकता कि मैं यात्रा पर जा रहा हूँ, तुम मेरें माल की रक्षा करना। यहाँ भी श्रेष्ठ अग्नि देवों का निवास हैं। इसलिए इनसे कौन कह सकता है कि आप रक्षा कीजिए, मैं यात्रा को जा रहा हूँ ॥१०॥ देव मनुष्यों के मन को जानते हैं। गार्हपत्य पर अग्नि को मालूम है कि यह अपने को मुझे सौंपने आया है। आहवनीय में भी मौन होकर जावे, क्योंकि आहवनीय को भी मालूम है कि यह अपने को मुझे सौंपने आया है ॥११॥ अब वह पैदल या सवारी में चल पड़ता है और नियत सीमा तक जाने के बाद बोलता है (मौन तोड़ता है)। और जब लौटता है तो जिसको सीमा मान रक्खा है उसको देखते ही मौन धारण कर लेता है, और चाहे भीतर राजा भी क्यों न हो वह उसके पास नहीं जाता ॥१२॥ वह पहले आहवनीय के पास जाता है और फिर गार्हपत्य के पास। आहवनीय के पास मौन होकर जाता है और मौन ही बैठकर तृणों से अग्नि को हाँकता है। गार्हपत्य में भी मौन होकर जाता है और मौन ही बैठकर तृणों से अग्नि को हाँकता है ॥१३॥ अब घर (में आने) के विषय में यह उपचार है। जब कोई गृहपति बाहर से वापस आता है तो घरवाले डर जाते हैं कि यह क्या कहेगा या क्या करेगा। और जब वह कुछ कहता या करता है तो घरवाले डर जाते हैं और उसके कुल में क्षोभ होता है। और जो गृहपति न
अध्याय-४, ब्राह्मण-२
२६० शतपथ ब्राह्मण रो॒ति॒ तं गृ॒हा उप॒सꣳश्रयन्ते न वाऽअयमि॒हावादी॒न्न किं च॒नाकर॒दिति॒ स यदि॒हा- पि मु॒क्रुद्ध इव स्या॒हू एव तत॒स्तत्कुर्याद्यद्यदि॒ष्यन्वा करिष्यन्वा स्यादे॒ष उ गृ॒हा- णामुपचा॒रः ॥ १४॥ ब्राह्मणम् ॥ ३ [३. १.] ॥ ॥ प्रजाप॑तिं वै भूता॒न्युपा॑सीदन् । प्र॒जा वै भूता॑नि॒ वि नो धेहि॒ यथा जीवामेति॒ ततो देवा॑ य॒ज्ञोपवी॒तिनो भू॒त्वा द॑क्षि॒णं जा॒न्वाच्यो॑पासीदं॒स्तानब्रवीद्य॒ज्ञो वोऽन्न॑- ममृ॒तत्त्वं व ऊ॒र्ग्वः सूर्यो वो॒ ज्योति॒रिति॑ ॥ १॥ अथैनं पितरः । प्राचीनावी॒तिनः स॒व्यं जा॒न्वाच्यो॑पासीदं॒स्तानब्रवीन्मा॒सि-मासि वोऽशनꣳ स्व॒धा वो मनो॒जवी वश्च॒न्द्र॒मा वो ज्योति॒रिति॑ ॥ २॥ अथैनं मनु॒ष्याः । प्रावृ॑ता उप॒स्थं कृ॒त्वोपा॑सीदं- स्तानब्रवीत्सा॒यं प्रातर्वोऽशनं प्र॒जा वो मृत्युर्वोऽग्न॑िर्वो॒ ज्योति॒रिति॑ ॥ ३॥ अथैनं प॒शव उपा॑सीदन् । तेभ्यः स्वैष॑मेव चकार य॑दैव यूयं कदा च लभा॑धै॒ यदि॑ काले यद्य॑नाका॒लेऽथै॒वाश्नी॒येति॒ तस्मादेते यदि॑व क॒दा च लभ॑न्ते॒ यदि॑ काले॒ यद्य॑नाका- लेऽथै॒वाश्न॑न्ति ॥ ४॥ अथ हैनꣳ शश्व॑दप्यसु॒रा उप॑सेदु॒रित्याहुः । तेभ्य॒स्तम॑श्च मा॒यां च प्र॒ददावस्त्ये॒वासु॑रमा॒येतीव परा॑भूता ह्वेव ताः प्र॒जास्ता इ॒माः प्र॒जास्तथै॒वो- पजी॑वन्ति॒ यथैवाभ्यः प्रजाप॑ति॒र्व्यद॑धात् ॥ ५॥ नैव दे॒वा अ॑तिक्रामन्ति । न पि॒तरो न प॒शवो मनु॒ष्या ए॒वैके॑ऽतिक्रामन्ति॒ तस्मा॒द्यो मनु॒ष्याणां॑ मेद्य॒त्यशु॑भे मेद्यति वि- र्द्रू॑हति हि न ह्य॑यनाय चन भ॑वत्यनृ॒तं हि कृ॒त्वा मेद्य॑ति॒ तस्मा॑ड् सा॒यं प्रातरा॒- श्येव स्यात्स यो हैवं वि॒द्वात्सा॒यं प्रातराशी भ॑वति॒ सर्वꣳ है॒वायु॑रेति॒ यडु ह॒ किं च वाचा॒ व्याह॑रति॒ तडु है॒व भ॑वत्ये॒तद्धि दे॒वस॒त्यं गो॑पायति॒ तद्वैतत्तेजो॒ नाम ब्रा॑ह्म॒णं य ए॒तस्य व्र॒तं श॒क्नोति॒ चरि॒तुम् ॥ ६॥ तद्वाऽए॒तत् । मा॒सि-मा॒स्येव पि॒तृभ्यो॑ ददतो॒ यद्वैवैष न पुर॒स्तान्न प॒श्चाद्ददृशेऽथै॑भ्यो ददात्ये॒ष वै सोमो राजा॑ दे॒वाना॒मन्नं यच्च॒न्द्रमाः स ए॒ताꣳ रात्रिं क्षी॒यते॒ तस्मि॑न्क्षी॒णे द॑दाति॒ तथै॑भ्योऽसम॑दं करोत्यथ॒ यद्द॑क्षी॒णे दद्या॑त्सम॒दꣳ ह कुर्याद्दे॒वेभ्य॑श्च पि॒तृभ्य॑श्च॒ तस्मा॒द्यद्वैवैष न पुर-
कां० २, अ० ४, ब्रा० २, कं० १-७ शतपथब्राह्मण / २६१ कुछ कहता है, न करता है तो उसके घरवाले सन्तुष्ट रहते हैं कि इसने कुछ नहीं कहा या कुछ नहीं किया। इसलिए यदि गृहपति किसी कारण क्रुद्ध भी हो तो जो कुछ कहना या करना हो, वह दूसरे दिन कहे या करे। यह घर में आने की विधि है ॥१४॥ पिण्डपितृयज्ञः अध्याय ४—ब्राह्मण २ प्राणि-लोक एक बार प्रजापति के पास गये। ये साधारण प्राणी थे। उन्होंने कहा, 'हमको वह विधि बताओ जिससे जीवन व्यतीत करें।' इस पर यज्ञोपवीत पहने हुए देव दाहिनी जानु को नमाकर, उसके पास आकर बैठे। उसने उनसे कहा, 'यज्ञ तुम्हारा अन्न है, अमृतत्व तुम्हारा बल है और सूर्य तुम्हारी ज्योति' ॥१॥ अब पितर दाहिने कंधे पर यज्ञोपवीत पहने बाईं जानु नमाकर उसके पास बैठे। उसने उनसे कहा, 'तुम्हारा मासिक भोजन होगा। तुम्हारे मन की तेजी (मनोजवा) तुम्हारी स्वधा और चन्द्रमा तुम्हारी ज्योति' ॥२॥ अब मनुष्य उसके पास आये कपड़े पहने (प्रावृत) और शरीर को झुकाये हुए। उनका उसने कहा, 'सायं और प्रातः तुम्हारा भोजन होगा। मृत्यु तुम्हारी प्रजा और अग्नि तुम्हारी ज्योति' ॥३॥ अब उसके पास पशु आए। उनको उसने अपनी इच्छावाला (स्वेच्छाचारी) कर दिया। जब कभी तुम कोई चीज पाओ, चाहे समय पर, चाहे कुसमय, तुम खा जाओ। इसलिए जब वे कोई चीज पाते हैं चाहे समय पर, चाहे कुसमय, वे खा जाते हैं ॥४॥ तत्पश्चात् कहते हैं कि असुर भी (प्रजापति के पास) पहुँचे। उनको उसने अन्धकार और माया दी। इसीलिए आसुरी माया होती है। वे तो नष्ट हो गये, परन्तु आजकल भी वैसी प्रजा है जो उसी प्रकार बरतती है, जैसे प्रजापति ने उनके लिए निर्धारित किया था ॥५॥ देव, पितर या पशु इन नियमों का उल्लंघन नहीं करते। कुछ मनुष्य ही उल्लंघन करते हैं। इसलिए मनुष्यों में जो मोटा हो जाता है वह अशुभ कार्यों के कारण मोटा हो जाता है, और चूंकि वह अनृत के कारण मोटा होता है इसलिए वह चल नहीं सकता और उसके पैर लड़खड़ाते हैं। इसलिए सायं और प्रातःकाल को ही खाना चाहिए। जो इस रहस्य को जानकर सायं और प्रातः ही खाता है वह पूर्ण आयु को प्राप्त होता है। और जो कुछ वह बोलता है वही होता है, क्योंकि देव सत्य की रक्षा करता है। जो आदमी प्रजापति के व्रत को पाल सकता है, उसमें ब्रह्म- तेज आ जाता है ॥६॥ यह तेज उसी को होता है जो मास में एक बार पितरों को भोजन देता है। जब पूर्व या पश्चिम में चाँद न दीखे तब उनको भोजन देता है। क्योंकि चन्द्रमा सोम राजा है जो देवों का भोजन है। (अमावस्या की) रात को वह क्षीण होता है, तब (देवताओं का भोजन भी क्षीण होता है इसलिए उस समय पितरों को) भोजन देता है। इस प्रकार वह (देवों और पितरों में) समन्वय कराता है। परन्तु यदि उस समय देगा जब (चाँद) क्षीण नहीं है तो देवों और पितरों
२६२ शतपथ ब्राह्मण स्तान् पश्चाद्ददृशेऽथैभ्यो॑ ददाति ॥ ७॥ स वाऽअ॒पराह्ने॑ ददाति । पूर्वा॒ह्णो वै दे॒वा- नां म॒ध्यन्दि॑नो मनु॒ष्याणा॑मपराह्लः॑ पितॄणां तस्मादपराह्ने॒ ददा॑ति ॥ ८॥ स ज॒घने॑न गार्हपत्यं । प्राचीनावीती भूत्वा॑ दक्षि॒णासी॑न शृ॒तं गृ॒ह्णाति स तत शृ॒तोपोत्था- योत्तरेणान्वाहार्यपचनं दक्षिणा तिष्ठन्नवहन्ति सकृत्फलीकरोति सकृ॒द्ध्येव प॒- राञ्चः पितर॒स्तस्मात्सकृत्फलीकरोति ॥ ९॥ तꣳ श्र॑पयति । तस्मिन्नधिश्रितऽआ॒ज्यं प्रत्यानयत्यग्नौ वै दे॒वेभ्यो जुह्वत्युद्धरन्ति मनुष्येभ्यो॒ऽथैव पितॄणां तस्मादधिश्रित ऽआ॒ज्यं प्रत्यानय॑ति ॥ १०॥ स उदास्याग्नौ द्वेऽआहुती जुहोति देवेभ्यः । देवान्वा ऽएष उपावर्तते य आहिताग्निर्भवति यो दर्शपूर्णमासाभ्यां यज॒तेऽथैतत्पितृयज्ञेने- वाचारीत्तद् देवेभ्यो निहुते स देवैः प्रसूतोऽथैतत्पितृभ्यो ददाति तस्माद्द्वावस्या- ग्रौ द्वेऽआहुती जुहोति देवेभ्यः ॥ ११॥ स वाऽअ॒ग्नये च सोमाय च जुहोति । स यद॒ग्नये॑ जु॒होति॒ सर्वत्र॒ ह्येवाग्नि॒रन्वा॑भक्तोऽथ यत्सोमा॑य जु॒होति पितृदे॒वत्यो वै सोम॒स्तस्माद॒ग्नये च सोमा॑य च जु॒होति ॥ १२॥ स जुहोति । अग्नये कव्यवा- हनाय स्वाहा सोमाय पितृमते स्वाहेत्यग्नौ मेक्षणमभ्यादधाति तत्स्विष्टकृद्भाजन- मथ दक्षिणेनान्वाहार्यपचनꣳ सकृदुल्लिखति तद्बर्हिर्भाजनꣳ सकृ॒द्ध्येव पराञ्चः पितर॒स्तस्मात्सकृदुल्लिख॑ति ॥ १३॥ अथ पुरस्तादुल्मुकं निद॒धाति । स यदनिधा- योल्मुकमथैतत्पितृभ्यो दद्यादसुररक्षांसानि हैषामेतद्विमथ्नीरंस्तथो हैतत्पितॄणाम- सुररक्षांसानि न विमथ्नते तस्मात्पुरस्तादुल्मुकं निद॒धाति ॥ १४॥ स निद॒धाति । ये रूपा॑णि प्रतिमुञ्चमा॑ना अ॒सुराः सन्तः स्व॒धया चर॑न्ति । परापुरो निपु॒रो ये भर॒- न्त्यग्निष्टांल्लो॒कात्प्र॑णुदात्यस्मादित्याग्निर्हि रक्षसामपहन्ता तस्मादेवं निदधाति ॥ १५॥ अथोदपात्रमादायावनेजयति । असाववनेनिङ्क्ष्वेत्येव यजमानस्य पितरमसाववने- निङ्क्ष्वेति पितामहमसाववनेनिङ्क्ष्वेति प्रपितामहं तद्यथाशिष्यतेऽभिषिञ्चेदेवं तत् ॥ १६॥ अथ सकृदाच्छिन्नान्युपमूलं दिनानि भवन्ति । अग्र॒मिव॒ वै दे॒वानां म॒ध्यमिव
का० २, अ० ४, ब्रा० २, कं० ७-१७ शतपथब्राह्मण / २६३ में झगड़ा हो जायगा। इसलिए तभी भोजन दे जब (चन्द्र) न पूर्व में दीखे न पश्चिम में ॥७॥ वह दोपहर के बाद देता है। देवों का पहला पहर (पूर्वाह्न) है, दोपहर (मध्यन्दिन) मनुष्यों का और तीसरा पहर (अपराह्न) है पितरों का। इसलिए तीसरे पहर देता है ॥८॥ वह गार्हपत्य के पीछे बैठकर जनेऊ दक्षिण कन्धे पर रखे हुए दक्षिण की ओर मुंह करके (गाड़ी में से हवि) लेता है। फिर वहाँ से उठकर अन्वाहार्य-पचन के उत्तर की ओर खड़ा होकर दक्षिण की ओर मुंह करके (चावलों को) फटकता है। एक बार ही फटकता है; क्योंकि एक ही बार पितर गुजर गये इसलिए एक बार ही फटकता है ॥६॥ फिर पकाता है। इसके पकते हुए में घी छोड़ता है। देवों के लिए हवि अग्नि में छोड़ी जाती है, मनुष्यों के लिए (भोजन) अग्नि से निकालकर लिया जाता है और पितरों के लिए इस प्रकार करते हैं।—जब यह आग पर पक रहा हो, उसमें घी छोड़ते हैं ॥१०॥ वहाँ से उठाकर अग्नि में देवों के लिए दो आहुतियाँ देता है। जो अग्नि स्थापित करता है (अग्निहोत्र के लिए) या जो दर्शपूर्णमास करता है, वह देवों की सेवा में उपस्थित होता है। परन्तु यहाँ उसे पितृयज्ञ करना है। इसलिए देवों को प्रसन्न करता है कि उनको प्रसन्न करने के पश्चात् पितरों को देवे। इसलिए वहाँ से (हवि को) उठाकर अग्नि में देवों के लिए दो आहुतियाँ देता है ॥११॥ वह अग्नि और सोम के लिए आहुतियाँ देता है। अग्नि को आहुति इसलिए देता है कि अग्नि का भाग तो सभी जगह दिया जाता है। सोम के लिए यों देता है कि सोम पितरों का देवता है। इसलिए अग्नि और सोम के लिए देता है ॥१२॥ वह इस मन्त्र से आहुति देता है, "अग्नये कव्यवाहनाय स्वाहा। सोमाय पितृमते स्वाहा" (यजु० २।२६)—"बुद्धिमान् कवियों के लिए, ले जानेवाले अग्नि के लिए। पितृयुक्त सोम के लिए।" स्विष्टकृत् के बदले आग पर मेक्षण (चमचा pot-ladle) रखता है। अब दक्षिणाग्नि के दक्षिण को एक रेखा खींचता है, वेदि के पहले। पितर लोग एक ही बार गुजर गये, इसलिए एक ही बार रेखा खींचता है ॥१३॥ अब दूसरे छोर पर जलती हुई लकड़ी (उल्मुक) रखता है। क्योंकि यदि बिना इस लकड़ी के रखे पितरों को भोजन दिया गया तो असुर और राक्षस उसको बिगाड़ ही जायेंगे, जबकि इस प्रकार असुर और राक्षस उसको नहीं बिगाड़ते, इसलिए वह जलती हुई लकड़ी को रखता है ॥१४॥ वह मन्त्र पढ़कर रखता है, "ये रूपाणि प्रतिमुञ्चमानाऽअसुराः सन्तः स्वधया चरन्ति। परापुरो निपुरो ये भरन्त्यग्निष्टांल्लोकात् प्रणुदात्यस्मात्" (यजु० २।३०)—"जो असुर रूपों को बदलते हुए स्वतन्त्रता से विचरते हैं, छोटे शरीरवाले या बड़े शरीरवाले, अग्नि उनको इस लोक से निकाल दे।" अग्नि राक्षसों का भगानेवाला है, इसलिए वह इस लकड़ी को रखता है ॥१५॥ अब जल का पात्र लाकर हाथ धुलाता है। यजमान के बाप का नाम लेकर 'आप हाथ धोइये', यजमान के बाबा का नाम लेकर, 'आप हाथ धोइये', यजमान के परदादा का नाम लेकर, 'आप हाथ धोइये।' जैसे मेहमान को जल देते हैं ऐसे यहाँ भी ॥१६॥ कुश एक चोट में ही मूल से काटे जाते हैं। उनका अगला भाग देवों का होता है, बीच
अध्याय-४, ब्राह्मण-३
मनुष्याणां मू॒लमिव पि॒तॄणां तस्मा॑दपमूलं दि॒नानि भवन्ति सकृदाच्छि॒न्नानि भव- न्ति सकृ॒द्ध्येव॒ परा॑ञ्चः पि॒तर॒स्तस्मा॑त्सकृदाच्छि॒न्नानि भवन्ति ॥ १७ ॥ तानि दक्षि॑- णो॒पस्तृ॑णाति । तत्र॑ ददाति स वा॒ऽइति ददा॒तीती॑व वै दे॒वेभ्यो जु॒ह्वत्यु॑द्धरन्ति मनु॒ष्येभ्यो॒ऽथैवं पि॒तॄणां तस्मा॒दिति॑ ददाति ॥ १८ ॥ स॒ ददाति । असा॑वेत॒त्तऽइत्ये॑- व॒ यज॑मानस्य पि॒त्रे ये च॑ त्वा॒मन्वित्य॑ हैक॒ऽआहु॒स्तदु तथा न ब्रूयात्स्वयं वै ते- षाञ्च॒ सह॒ येषा॑ञ्च॒ सह॒ तस्मा॑ङ् ब्रूयादसा॑वेत॒त्तऽइत्ये॑व॒ यज॑मानस्य पि॒त्रेऽसा॑वेत॒त्त ऽइति॑ पिताम॒हाया॒सावे॑त॒त्तऽइति॑ प्रपितामहाय॒ तद्य॑दितः परा॒ग्ददा॑ति सकृ॒द्ध्ये॑- व॒ परा॑ञ्चः पि॒तरः॑ ॥ १९ ॥ तत्र॑ जपति । अत्र॑ पितरो मादयध्वं यथाभागमावृ॑षायध्व- मिति॑ यथाभागमश्नी॒तेत्ये॒वैतदा॑ह ॥ २० ॥ अथ परा॒ङ् पर्या॑वर्तते । ति॒र्-इव॒ वै पि॒तरो मनुष्येभ्यस्ति॒र्-इवैतद्भवति स वा॒ऽआ त॑मितोरासीतेत्याङ्करेतावान्त्सुसु- रिति॒ स वै मू॒हूर्त॑मे॒वासित्वा॑ ॥ २१ ॥ अथोपपल्य्य जपति । अमी॑मदन्त पि॒तरो यथाभागमावृ॑षायिषतेति यथाभागमशिषि॒रित्ये॒वैतदा॑ह ॥ २२ ॥ अथोदपात्रमादाया॑- वने॑जयति । असा॑ववनेनिक्ष््वेत्ये॒व यज॑मानस्य पि॒तर॑मसा॑ववनेनिक्ष््वेति पिताम- हमसा॑ववनेनिक्ष््वेति प्रपितामहं॒ तद्य॑था जग्मु॒षेऽभि॑षिञ्चे॒देवं तत् ॥ २३ ॥ अथ नी- विमु॑द्वृह्य॒ नम॑स्करोति । पि॒तृदे॑वत्या॒ वै नी॒विस्तस्मा॑न्नी॒विमु॑द्वृह्य॒ नम॑स्करोति य- ज्ञो वै नमो॑ य॒ज्ञिया॑ने॒वैना॑ने॒तत्क॑रोति षट् कृत्वो॑ नमस्करोति षड्वा॒ऽऋत॑व ऋ॒तवः॑ पि॒तर॒स्तस्मा॒त्षट् कृ॒त्वो नम॑स्करोति ॰ गृ॒हान्नः॑ पितरो दत्तेति गृ॒हाणां॑ ह पि॒तर ईश॑त॒ऽएषो॒ऽएत॒स्याशीः॒ कर्म॑णो॒ऽथाव॑जिघ्रति प्रत्यवधाय पि॒ण्डांस्तद्यज॑मानभा॒गो ऽग्नौ सकृ॑दाच्छि॒न्नान्य॒भ्याद॑धाति पुनरु॒ल्मुक॒मपि॑ सृजति ॥ २४ ॥ ब्राह्मणम् ॥ ४ [४. २.] ॥ ५ तद्ध॒ होवाच कहो॑डः कौषी॑तकिः । अ॒न॒योर्वा॒ऽअयं द्यावा॑पृथिव्यो॒ रसो॒ऽस्य र॒सस्य॑ हु॒त्वा दे॒वेभ्यो॒ऽथेमम॑न्ना॒मेति॒ तस्मा॑द्वा॒ऽआग्र॑यणे॒ष्ट्या य॑जत॒ऽइति॑ ॥ १ ॥ तद्ध
कां० २, अ० ४, ब्रा० २-३, कं० १७-२४ व १ शतपथब्राह्मण / २६५ का मनुष्यों का और मूल पितरों का। इसलिए वे मूल से काटे जाते हैं। वे एक ही चोट से इसलिए काटे जाते हैं कि पितर लोग एक ही बार में गुजर गये ॥१७॥ वह उनके सिरों को दक्षिण की ओर करके फैलाता है। तब (पिण्ड) देता है। वह इस प्रकार पिण्ड देता है (हाथ से बनाकर)। देवों को इस प्रकार. दिया जाता है (यहाँ भी हाथ से विधि बताई जाती है)। मनुष्यों को इस प्रकार परोसते हैं, और पितरों के लिए इस प्रकार। इसलिए वह इस प्रकार देता है ॥१८॥ यजमान के बाप का नाम लेकर 'यह तुम्हारे लिए', कुछ लोग इसके साथ यह भी कहते हैं—'और उनके लिए जो तुम्हारे पीछे आवें।' परन्तु उसको ऐसा न कहना चाहिए, क्योंकि वह भी तो उन्हीं में से है। इसलिए पिता का नाम लेकर कहे 'यह तुम्हारे लिए', बाबा का नाम लेकर, 'यह तुम्हारे लिए', पर-दादे का नाम लेकर, 'यह तुम्हारे लिए।' वर्तमान समय से आरम्भ करके पिछले-पिछले के क्रम से देता है, क्योंकि पितरों के गुजरने का वर्तमान की अपेक्षा यही क्रम है ॥१९॥ अब वह जपता है, “अत्र पितरो मादयध्वं यथाभागमावृषायध्वम्” (यजु० २।३१)— “हे पितरो ! यहाँ प्रसन्नता से खाओ जैसे बैल आकर खाते हैं अपने-अपने हिस्से का।” इसका तात्पर्य यह है कि 'अपना-अपना भाग खाओ' ॥२०॥ अब मुड़कर खड़ा होता है (अर्थात् उत्तर की ओर), क्योंकि पितर मनुष्यों से बिल्कुल दूसरी ओर हैं और वह भी पितरों से दूसरी ओर है। कुछ लोग कहते हैं कि जब तक साँस रोक सके उस समय तक खड़ा रहे, क्योंकि प्राण इतने ही होते हैं। अस्तु, एक मुहूर्त्त रहकर—॥२१॥ (दाहिनी ओर) मुड़कर जपता है, “अमीमदन्त पितरो यथा भागमावृषायिषत" (यजु० २।३१) — “पितरों ने खा लिया। बैलों के समान उन्होंने अपना-अपना भाग पा लिया” ॥२२॥ अब जल-पात्र लेकर हाथ धुलाता है। यजमान के बाप का नाम लेकर 'तुम धोओ', बाबा का नाम लेकर 'तुम धोओ', परदादे का नाम लेकर 'तुम धोओ।' जिस प्रकार मेहमानों को खाना खिलाकर धुलाते हैं उसी प्रकार यहाँ भी ॥२३॥ नीवि (निचला कपड़ा और ऊपर का कपड़ा दोनों में गाँठ दी जाती है) को खोलकर नमस्कार करतो है। नीवि पितरों की है इसलिए उसे खोलकर नमस्कार करता है। नमस्कार यज्ञ है। इसलिए इस प्रकार वह उनको यज्ञ के योग्य बनाता है। छः बार नमस्कार करता है। क्योंकि छः ऋतुएँ हैं और पितर ऋतुएँ हैं, इसलिए छः बार नमस्कार करता है। अब वह कहता है, “गृहान्नः पितरो दत्त” (यजु० २।३२)—“हे पितरो, हमको घर दीजिए।” पितर घरों के रक्षक हैं, इसलिए इस कर्म से आशीर्वाद चाहता है। पिण्डों को पीछे हटाकर सूंघता है, क्योंकि यह यजमान का भाग है। एक चोट में काटी हुई (कुश) को अग्नि पर रखता है, और जलती हुई लकड़ी (उल्मुक) को फेंकता है ॥२४॥ अध्याय ४—ब्राह्मण ३ कहोड कौषीतकि ने कहा, यह (वृक्षों का) रस वस्तुतः द्यावापृथिवी का है। हम देवों को आहुति देकर खावें। इसलिए 'आग्रयणेष्टि' यज्ञ किया जाता है ॥१॥
२६६ शतपथ ब्राह्मण
होवा॒च या॑ज्ञव॒ल्क्यः॑ । दे॒वाश्च॒ वाऽअसु॑राश्चो॒भये॑ प्राजाप॒त्याः प॑स्पृधिरे॒ ततो॒ऽसुरा॑ उ॒भयी॒रोष॑धी॒र्याश्च॑ मनु॒ष्या॑ उ॒पजी॑वन्ति॒ याश्च॑ पशवः॑ कृत्यये॑व लद्विषेणे॑व ब॒त्प्रलि॑- लि॒पुरू॒तैवं चि॑द्दे॒वान॑भिभवे॒मेति॒ ततो॒ न म॑नु॒ष्या आ॑श्न्रुव॒न् पश॑व आलि॑लिशिरे ता हे॒माः प्र॒जा अ॑नाश॒केन॒ नोत्प॑राबभूवुः ॥२॥ तद्वै॑ दे॒वाः शु॑श्रुवुः । अ॑नाश॒केन ह वा॒ऽइमाः प्र॒जाः प॑राभव॒न्तीति॒ ते हो॑चुर्ह॒न्तेद॒मासा॒मप॑जिघाꣳसा॒मेति॒ केनेति॑ य॒- ज्ञेनेवे॑ति य॒ज्ञेन॑ ह॒ स्म वै तद्दे॒वाः क॑ल्पयन्ते॒ यदे॑षां क॒ल्पमा॒सैर्यद्य॒ज्ञ ॥३॥ ते हो॒चुः । कस्य॑ न इ॒दं भ॑विष्य॒तीति॒ ते मम॑-म॒मेत्ये॑व न सम्पा॒द्यां च॑क्रुस्ते हास॑- म्पा॒द्योचु॑रा॒जिमे॒वास्मि॒न्नाजा॑महै स॒ यो न॒ उज्जे॑ष्यति॒ तस्य॑ न इ॒दं भ॑विष्य॒तीति॒ त- थेति॒ तस्मि॒न्नाजि॑माजत ॥४॥ ताविन्द्रा॒ग्नीऽउ॑दजयतां । तस्मा॑दिन्द्रा॒ग्नी द्वाद॑शकपा- लः पु॑रो॒डाशो भ॑वतीन्द्रा॒ग्नी ह्य॑स्य भाग॒धेय॒मुद॑जयतां॒ तौ यत्रे॑न्द्रा॒ग्नीऽउ॒ज्जिगि॑वाꣳ- सौ तस्या॒नुस्तद्दिश्ये॑ दे॒वा अन्वा॒ऽऽज॑ग्मुः ॥५॥ क्ष॒त्रं वा॒ऽइन्द्रा॒ग्नी । विशो॑ वि॒श्वे दे॒वा यत्र॒ वै क्ष॒त्रमु॒ञ्जय॑त्यन्वाभ॒क्ता वै तत्र॒ विट्द्वि॒द्यान्वि॒दान्व॒न्वाभ॑जतां॒ तस्मा॒द्वैश्व॑- दे॒वश्च॒रुर्भवति ॥६॥ तं वै पुरा॑णानां कुर्या॒दित्या॑हुः । क्ष॒त्रं वा॒ऽइन्द्रा॒ग्नी नेत्क्षत्र॑- म॒भ्यारो॑हा॒णीति॒ तौ वा॒ऽउभा॑वेव न॑वानाꣳ स्यातां॒ यदि॑ पु॒रोडा॑श इत॒रश्च॒रुस्ति॒- रस्तेनै॑व क्ष॒त्रमन॑भ्यारूढं॒ तस्मा॑दु॒भावे॑व न॑वानाꣳ स्याताम् ॥७॥ तऽउ॑ ह॒ विश्वे॑ दे॒वा ऊ॑चुः । अ॒नयो॒र्वाऽअ॒यं द्या॑वापृथि॒व्यो रसो॒ हन्ते॒मेऽअ॒स्मिन्नाभ॑जा॒मेति॒ ता- भ्यामे॒तं भा॒गम॑कल्पय॒न्नेतं द्या॑वापृथि॒व्यमे॑ककपालं पु॒रोडा॑शं॒ तस्मा॑द्द्यावापृथि॒व्य ए॑ककपालः पु॑रो॒डाशो भ॑वति तस्ये॒यमे॑व क॒पाल॒मेके॑व॒ हीयं॒ तस्मा॒देक॑कपालो भ॑वति ॥८॥ तस्य॑ परि॒चक्षा॑ । यस्यै॒ वै कस्यै॑ च दे॒वता॑यै ह॒विर्गृ॒ह्यते॒ सर्व॑त्रैव स्विष्ट॒कृद॑न्वाभ॒क्तोऽथैतꣳ॑ सर्व॑मेव जु॒होति॒ न स्विष्ट॒कृते॒ऽवद्य॑ति सा परि॒चक्षोतो॑ ह्रु॒तः पर्या॑वर्तते ॥९॥ तदा॑हुः । पर्या॑भूद्वा॒ऽअयमे॑ककपालो मोक्षि॒ष्यति॑ रा॒ष्ट्रमिति॑ नास्य॑ सा परि॒चक्षा॑हव॒नीयो॑ वा॒ऽआहु॑तीनां प्रति॒ष्ठा स यदा॑हव॒नीयं॒ प्राप्यापि॑
का० २, अं० ४, ब्रा० ३, कं० २-१० शतपथब्राह्मण / २६७ याज्ञवल्क्य का भी कथन है कि प्रजापति की सन्तान देव और असुर बड़ाई के लिए लड़ पड़े। तब असुरों ने दोनों प्रकार की ओषधियों को, अर्थात् उनको भी जिनके सहारे मनुष्य रहते हैं और उनको भी जिनके सहारे पशु रहते हैं, कुछ अपनी चालाकी से (कृत्यया) और कुछ विष के द्वारा नष्ट कर दिया कि इस प्रकार हम देवों पर विजय पा लेंगे। इस पर न मनुष्य कुछ खा सके और न पशु, और भोजन के अभाव में ये सब पराजित-से हो गये ॥२॥ अब देवों ने सुना कि बिना भोजन के यह सब प्रजा पराजित हो रही है। उन्होंने कहा, 'इस सब (विष आदि) को हटाना चाहिए।' 'कैसे?' 'यज्ञ के द्वारा।' देव जो कुछ करना चाहते थे वह उन्होंने यज्ञ के द्वारा किया और ऋषियों ने भी ॥३॥ तब उन्होंने कहा, 'यह (यज्ञ) हममें से किसका होगा?' हर एक ने कहा, 'मेरा'-'मेरा' और निश्चित न कर सके। निश्चय न कर सकने पर उन्होंने कहा, 'चलो बाजी बदकर दौड़ें। हममें से जो जीत जायगा यह (यज्ञ) उसी का होगा।' 'अच्छा' कहकर वे दौड़े ॥४॥ इन्द्र और अग्नि जीत गये। इसलिए पुरोडाश के बारह कपाल इन्द्र और अग्नि के होते हैं। क्योंकि इन्द्र और अग्नि ने अपना भाग जीत लिया और इन्द्र और अग्नि जीतने पर जहाँ खड़े थे वहाँ सब देव भी चले गये ॥५॥ इन्द्र और अग्नि क्षत्रिय हैं, सब देव वैश्य। जहाँ क्षत्रिय जीतता है वहाँ वैश्यों को अवश्य. भाग मिलता है। इसलिए देवों को भाग मिल गया, इसलिए चरु सब देवों (विश्वेदेवा) का होता है॥६॥ कुछ लोगों का विचार है कि (चरु) पुराने (अन्न) का हो, क्योंकि इन्द्र और अग्नि क्षत्रिय हैं इसलिए (विश्वेदेवों को भी यदि इन्द्र और अग्नि के समान नया अन्न दिया जायगा तो) वैश्य क्षत्रियों के बराबर हो जाएँगे। परन्तु दोनों को नया ही होना चाहिए। केवल यह पुरोडाश है और यह चरु है। इन दोनों के नये होने से ही क्षत्रियों के बराबर (वैश्य) नहीं हो सकते। इसलिए दोनों (पुरोडाश और चरु) नये अन्न के ही हों ॥७॥ अब देवों ने कहा, 'यह रस वस्तुतः द्यावापृथिवी का है, इसलिए हम इनको यज्ञ में भाग देवें।' इसलिए उन्होंने उन दोनों को भाग दिया अर्थात् एक कपाल का पुरोडाश द्यावापृथिवी को दिया। इसलिए एक कपाल का पुरोडाश द्यावापृथिवी का होता है। अब चूंकि यह पृथिवी उस (रस) का कपाल है और वह एक ही है, इसलिए (पुरोडाश भी) एक कपाल का होता है ॥८॥ (ऐसा करने में) उसका एक दोष (है)। चाहे किसी देवता को हवि दी जाय, पीछे से एक भाग स्विष्टकृत् का होता है। परन्तु यहाँ (पुरोडाश) की पूरी आहुति दे दी जाती है। स्विष्टकृत् के लिए कुछ बचाया नहीं जाता। यह एक दोष है, इसलिए आहुति उलटी पड़ जाती है ॥६॥ इसलिए कहते हैं, 'यह एक कपाल उलटा पड़ गया। यह राष्ट्र को बिगाड़ देगा।' परन्तु इसमें कुछ दोष नहीं। आहुतियों की प्रतिष्ठा आहवनीय है। जब आहुति आहवनीय में पहुँच गई -
अध्याय-४, ब्राह्मण-४
॑त्रं॒ : ऽआग्रयणम॒न्यद॒ग्निहो॑त्रं॒ (line under ma, line under da, tick on ho, line under traṃ)
- तस्मा॒न्नाग्निहो॑त्रे (tasmā॒nnāgniho॑tre - line under mā, tick on ho)
- जुहुयात् (juhuyāt)
- ॥ १४॥
- ब्रा॒ह्मणम् (brā॒hmaṇam - line under brā)
- ॥ ५ [४. ३.] ॥
तृतीयः प्रपाठकः ॥ ॥ कण्डिकासंख्या ११३ ॥ ॥ (No svaras on this line)
प्र॒जाप॑तिर्ह॒ वाऽ॒एतेनाग्रे॑ य॒ज्ञेने॑जे । प्र॒जाका॑मो बहुः॑ प्र॒जया॑ प॒शुभिः॑ स्याꣳ श्रि- Let's check L18:
- प्र॒जाप॑तिर्ह॒ (pra॒jāpa॑tirha॒ - line under pra, tick on pa, line under ha)
- वाऽ॒एतेनाग्रे॑ (vā'॒etenāgre॑ - line under vā', tick on gre)
- य॒ज्ञेने॑जे (ya॒jñene॑je - line under ya, tick on ne)
- ।
- प्र॒जाका॑मो (pra॒jākā
का० २, अ० ४, ब्रा० ३-४, कं० १०-१४ व १-२ शतपथब्राह्मण / २६६ तो चाहे दस बार उलट जाय कुछ परवाह नहीं। और यदि कोई कहे कि इन (दोषों) के भार को कौन सहे तो केवल घी की ही आहुति दे, क्योंकि इन द्यावा-पृथिवी का प्रत्यक्ष रस घी है। इस प्रकार प्रत्यक्ष रूप में इनको वह इन्हीं के रस या मेध (तत्त्व) से तृप्त करता है, इसलिए घी की ही आहुति दे ॥१०॥ यज्ञ करके देवों ने उन सब ओषधियों को, जिनके सहारे मनुष्य रहते हैं या पशु रहते हैं, (असुरों की) चालाकी और विष (के प्रभाव) से मुक्त कर दिया। इसलिए अब मनुष्य भोजन करने लगे और पशु चरने लगे ॥११॥ अब वह जो यज्ञ करता है, या तो इसलिए करता है कि कोई चालाकी या विष से (वनस्पति) को बिगाड़ने न पाये, या केवल इसलिए कि देवों ने ऐसा किया था। और जो भाग देवों ने अपने लिए निकाला था वह भी उनके लिए निकाल देता है। इसके अतिरिक्त वह दोनों प्रकार के पौधों को अर्थात् जिनके सहारे मनुष्य रहते हैं और जिनके सहारे पशु रहते हैं, उनको विषरहित कर देता है और ये मनुष्य और पशु इसके दोष-रहित पौधों के सहारे जीते हैं। इसलिए वह इस यज्ञ को करता है ॥१२॥ इस यज्ञ की दक्षिणा है पहलोटी बछड़ा, क्योंकि यह (गाय का) अग्र अर्थात् पहला फल होता है। यदि दर्श और पूर्णमास यज्ञ कर चुका हो तो पहले वह आहुतियां दे और फिर इस यज्ञ को पीछे से करे। और यदि (दर्श और पूर्णमास) नहीं किया तो अन्वाहार्य-पचन अग्नि पर चातुष्प्राश्य को पका ले और ब्राह्मणों को खिला दे ॥१३॥ देव दो प्रकार के हैं - एक तो देव; और दूसरे ब्राह्मण जो वेदपाठी हैं, ये मनुष्य-देव हैं। जिस प्रकार वषट्कार की आहुति होती है वैसी यह भी है। इस समय भी वह जितना हो सके उतनी दक्षिणा दे, क्योंकि कहते हैं कि कोई हवि दक्षिणा के बिना पूरी नहीं होती। अग्निहोत्र में (नया अन्न) न डाले, नहीं तो झगड़ा होगा। आग्रयण भिन्न है और अग्निहोत्र भिन्न। इसलिए अग्निहोत्र में (नया अन्न) न डाले ॥१४॥ अध्याय ४-ब्राह्मण ४ प्रजापति ने पहले प्रजा की कामना से यह यज्ञ किया। उसने सोचा- 'मैं बहुत प्रजा और पशु-युक्त हो जाऊँ, श्री मिल जाय, यशस्वी हो जाऊँ, अन्न पचानेवाला हो जाऊँ' ॥१॥ उसका नाम दक्ष था। और चूंकि पहले उसने इस यज्ञ को किया, इसलिए यज्ञ का 'दाक्षायण यज्ञ' नाम पड़ा। कुछ लोग दक्ष को वसिष्ठ-यज्ञ कहते हैं, क्योंकि वह वसिष्ठ ही है। उसी के नाम पर यज्ञ का नाम पड़ा। उसने यज्ञ किया और इस यज्ञ से उस प्रजापति ने जो सन्तान, जो श्री, जो विभूति प्राप्त की उसी सन्तान, उसी श्री को वह भी प्राप्त होता है जो इस
ते॒न य॒ज्ञेन॒ यज॑ते॒ तस्मा॑द्वाऽए॒तेन॒ यजे॑त ॥ २॥ तेनो॑ ह॒ तत॑ ईजे । प्रतीद॒र्शः श्यै॒- क्यः॒ स ये॒ तं प्र॒त्यासु॒स्तेषां॑ वि॒वच॑नमिव॒ास वि॒वच॑नमिव ह॒ वै भ॑वति॒ य ए॒वं वि॒द्वाने॒तेन॒ य॒ज्ञेन॒ यज॑ते॒ तस्मा॑द्वाऽए॒तेन॒ यजे॑त ॥ ३॥ तमा॒जगा॑म । सु॒क्षा सार्ङ्गयो॒ ब्रह्मच॒र्यं॒ तस्मा॑दे॒तं च॑ य॒ज्ञमनू॒चेऽन्य॑मु च॒ सोऽनू॒च्य पुन॑ः सृञ्जया॒न्जगा॑म॒ ते ह॒ सृ॒- ञ्जया वि॒दां च॒क्रुर्यज्ञं॑ वै नो॒ऽनूच्या॑गन्निति॒ ते हो॑चुः सह॒ वै न॒स्तद्देवै॒राग॒न्यो नो॑ य॒ज्ञमनू॒च्याग॒न्निति॒ स वै सह॑देवः सार्ङ्गयस्तदु॒ह्ये॑तद्वि॒वच॑नमिवास्त्यन्य॒द्वाऽअ॒ग्रे सु॒- क्षा नाम॑ दधृ॒ङ्ङिति॒ स ए॒तेन॒ य॒ज्ञेने॑जे॒ स ए॒तेन॒ य॒ज्ञेने॒ष्ट्वा येयं॑ सृञ्जया॒नां प्र॒जाति॒र्या श्रीरे॒तद्बभू॑वेताँ॒ ह॒ वै प्र॒जातिं॑ प्र॒जायत॒ऽएताँ॒ श्रियं॑ गच्छति॒ य ए॒वं वि॒द्वाने॒तेन॒ य॒ज्ञेन॒ यज॑ते॒ तस्मा॑द्वाऽए॒तेन॒ यजे॑त ॥ ४॥ तेनो॑ ह॒ तत॑ ईजे । दे॒वभा॒गः श्रौत॒र्षः स उ॒भये॑षां कु॒रूणां॑ च सृञ्जया॒नां च॑ पु॒रोहि॑त॒ आस॑ पर॒मता॒ वै सा यो न्वेवै॑कस्य॒ राष्ट्रस्य॑ पु॒रोहि॑तोऽसत्सा॒ न्वेव॑ पर॒मता॒ किमु॒ यो द्वयो॑ः पर॒मतामिव ह॒ वै ग॒च्छ- ति॒ य ए॒वं वि॒द्वाने॒तेन॒ य॒ज्ञेन॒ यज॑ते॒ तस्मा॑द्वाऽए॒तेन॒ यजे॑त ॥ ५॥ तेनो॑ ह॒ तत॑ ईजे । द॒क्षः पा॑र्व॒तिस्त॒ऽइमे॒ऽप्येत॑र्हि दाक्षाय॒णा रा॒ज्यमि॑वैव प्राप्ता रा॒ज्यमि॑ह॒ वै प्राप्नो॑ति॒ य ए॒वं वि॒द्वाने॒तेन॒ यज॑ते॒ तस्मा॑द्वाऽए॒तेन॒ यजे॑त॒ स वाऽऐ॒कैक॒ ए॒वानू॒- चीना॒कं पु॒रोडा॒शो भ॑वत्येते॒नो हास्यास॒प्तवा॒नुप॑बाधा॒ श्रीर्भव॑ति॒ स वै द्वे पौर्ण- मा॒स्यौ य॑जते॒ द्वेऽअ॑मावा॒स्ये॑ द्वे वै मि॑थु॒नं मि॑थु॒नमे॒वैतत्प्र॒जननं॑ क्रियते ॥ ६॥ अथ॒ यत्पूर्वेद्यु॑ः । अ॒ग्नीषोमी॑येण॒ यज॑ते पौर्णमा॒स्यां ते द्वे दे॒वते॒ द्वे वै मि॑थु॒नं मि॑थु॒नमे॒- वैतत्प्र॒जननं॑ क्रियते ॥ ७॥ अथ प्रा॒तः । आ॒ग्ने॒यः पु॒रोडा॒शो भ॑वत्यैन्द्रा॒ग्नँ सांना॒य्यं ते द्वे दे॒वते॒ द्वे वै मि॑थु॒नं मि॑थु॒नमे॒वैतत्प्र॒जननं॑ क्रियते ॥ ८॥ अथ॒ यत्पूर्वेद्यु॑ः । ऐ॒- न्द्रा॒ग्नेन॒ यज॑तेऽमावा॒स्या॑यां ते द्वे दे॒वते॒ द्वे वै मि॑थु॒नं मि॑थु॒नमे॒वैतत्प्र॒जननं॑ क्रियते ॥ ९॥ अथ प्रा॒तः । आ॒ग्ने॒यः पु॒रोडा॒शो भ॑वति मैत्रावरु॒णी प॒यस्या॑ नेद्यज्ञा॒द्यानी॒- ति॒ न्वे॒वाग्ने॒यः पु॒रोडा॒शोऽथैतावे॒व मि॑त्रावरु॒णौ द्वे दे॒वते॒ द्वे वै मि॑थु॒नं मि॑थु॒नमे॒-
कां० २, अ० ४, ब्रा० ४, कं० २-१० शतपथब्राह्मण / २७१ यज्ञ को समझकर करता है। इसलिए इस यज्ञ को अवश्य करे ॥२॥ प्रतीदर्श श्वैक्न ने भी इसी यज्ञ को किया। और जिन्होंने उसका अनुकरण किया उनके लिए वह विवचन (authority) से था। जो इस रहस्य को समझकर इस यज्ञ को करता है वह विवचन ही हो जाता है। इसलिए इस यज्ञ को अवश्य करे ॥३॥ सृप्ला साञ्जय ब्रह्मचर्य व्रत के लिए उसके पास आया, इसलिए उसे यह यज्ञ और अन्य भी सिखाया। वह उनको सीखकर साञ्जय वाले लोगों के पास (अपने देश में) चला गया। अब उन्होंने जान लिया कि यह हमारे लिए यज्ञ को सीखकर आया है। उन्होंने कहा, 'यह जो यज्ञ सीखकर आया है मानो 'देवों के साथ' आया है, इसलिए उसका सहदेव साञ्जय नाम पड़ गया। अब तक यह कहावत चली आती है कि अरे सृप्ला का दूसरा नाम रख दिया गया। उसने उस यज्ञ को किया और जो सन्तान और वैभव इस यज्ञ के करने से सृञ्जयों को प्राप्त हुआ, उसी सन्तान को वह भी उत्पन्न करता है और उसी वैभव को प्राप्त होता है जो इस रहस्य को समझ- कर यह यज्ञ करता है। इसलिए इस यज्ञ को अवश्य करे ॥४॥ देवभाग श्रौतष ने भी यह किया था। वह कुरुओं और सृञ्जयों दोनों का पुरोहित था। जो एक राष्ट्र का पुरोहित होता है उसकी बड़ी पदवी होती है, और उसकी पदवी का क्या कहना जो दो राष्ट्रों का पुरोहित हो ! जो इस रहस्य को समझकर इस यज्ञ को करता है वह उसी बड़ी पदवी को पाता है। इसलिए इस यज्ञ को अवश्य करे ॥५॥ दक्ष पार्वति ने भी यही यज्ञ किया था। और आज तक यह दाक्षायण (उसी की सन्तान) राज्य को पाये हुए हैं। जो कोई इस रहस्य को समझकर इस यज्ञ को करता है वह भी राज्य को पा जाता है। इसलिए इस यज्ञ को अवश्य करे। एक-एक पुरोडाश प्रतिदिन देना होता है। इसलिए उसकी श्री बिना सपत्नी के और बिना बाधा के होती है। वह पूर्णमासी के दो दिन और अमावस्या के दो दिन यज्ञ करता है। दो का नाम है जोड़ा। इस प्रकार वह उत्पन्न करनेवाले जोड़े से सम्पन्न हो जाता है ॥६॥ पूर्णमासी को पहले दिन अग्नि और सोम को एक पुरोडाश देता है। ये दो देवता हैं। दो का अर्थ है जोड़ा। इस प्रकार वह उत्पन्न करनेवाले जोड़े से सम्पन्न हो जाता है ॥७॥ दूसरे दिन अग्नि का पुरोडाश और इन्द्र का सान्नाय्य ये दो देवता हैं। दो का अर्थ है जोड़ा। इस प्रकार वह उत्पन्न करनेवाले जोड़े से सम्पन्न हो जाता है ॥८॥ अमावस्या को पहले दिन इन्द्र और अग्नि को पुरोडाश देता है। ये दो देवता हैं। दो का अर्थ है जोड़ा। इस प्रकार एक उत्पत्ति करनेवाले जोड़े से सम्पन्न हो जाता है ॥६॥ दूसरे दिन अग्नि के लिए पुरोडाश और मित्र-वरुण के लिए दही (पयस्या)। अग्नि का पुरोडाश केवल इसलिए कि वह यज्ञ से चला न जाय। मित्र और वरुण दो देवता हैं। दो का अर्थ है जोड़ा। वह इस प्रकार उत्पन्न करनेवाले जोड़े से सम्पन्न हो जाता है। यह उसका वह रूप है
शतपथ ब्राह्मण
वै॒तत्प्र॒जननं॑ क्रिय॒त ऽए॒तद्वा॑स्य॒ तद्रू॒पं येन॑ बहुर्भव॑ति॒ येन॒ प्र॒जाय॑ते ॥१०॥ अथ॑ य॒त्पूर्वेद्यु॑ः । अ॒ग्नीषोमीये॑ण य॒जते॑ पौर्णमा॒स्यां य॒मेवामु॒मुपव॑सथेऽग्नीषोमी॒यं प॒शु- माल॑भते॒ स ए॒वास्य॒ सः ॥११॥ अथ॒ प्रातः॑ । आ॒ग्नेयः॑ पुरो॒डाशो॑ भव॒त्यैन्द्रं॒ सां- नाय्यं॑ प्रातःस॒वन॑मे॒वास्या॑ग्ने॒यः पु॑रो॒डाश॒ आग्ने॒यो हि प्रातःस॒वन॒मैन्द्रं॒ सांनाय्यं॑ माध्यन्दिनमे॒वास्य॒ तत्सवन॒मैन्द्रं॒ हि माध्यन्दिनं॒ सव॑नम् ॥१२॥ अथ॒ यत्पूर्वे॑- द्युः । ऐ॒न्द्रा॒ग्नेन॒ यज॑तेऽमावा॒स्या॑यां तृतीयसवनमे॒वास्य॒ तद्वैश्वदे॒वं वै तृ॑तीयसवन- मिन्द्रा॒ग्नी वै विश्वे॑ दे॒वाः ॥१३॥ अथ॒ प्रातः॑ । आ॒ग्नेयः॑ पुरो॒डाशो॑ भवति मैत्राव- रु॒णी पय॒स्या नेद्य॑ज्ञाद॒यानीति॑ न्वेवाग्ने॒यः पु॑रो॒डाशोऽथ॒ यामे॒वामूं मै॒त्रावरु॒णीं व॒- शामनूबन्ध्या॒मालभ॑ते॒ सैवास्य मैत्रावरु॒णी पय॒स्या स पौ॑र्णमा॒सेन॑ चामावा॒स्येन॑ चे॒ष्ट्वा याव॒त्सौम्ये॑नाध्व॒रेणे॒ष्ट्वा जय॑ति॒ ताव॑ज्जयति॒ तदु॒ खलु॑ महाय॒ज्ञो भ॑वति ॥१४॥ अथ॒ यत्पूर्वेद्युः॑ । अ॒ग्नीषोमीये॑ण य॒जते॑ पौर्णमा॒स्यामे॒तेन॒ वाऽइ॒न्द्रो वृ॒त्रम॑हंस्तेनेनो ऽए॒वै॒ष व्य॑जयत॒ यास्ये॒यं विजि॑ति॒स्तां तथो॑ऽए॒वैष ए॒तेन॑ पा॒प्मानं॒ द्विषन्तं॒ भ्रातृ॑व्यं हन्ति॒ तथो॑ऽए॒व वि॑जयतेऽथ॒ यत्संन॑यत्यामावा॒स्यं वै सांनाय्यं॑ दू॒रे तद्यद॑मावा॒स्ये- ति क्षि॒प्रऽए॒वैतद्भूतं॒ शत्रू॑षे त॒मेते॑न॒ रसे॑नाप्रीणा॒न्क्षिप्रं॑ ह॒ वै पा॒प्मान॒मप॑हते॒ य ए॒वं वि॒द्वान्पौ॑र्णमा॒स्यां संन॑यत्ये॒ष वै सोमो राजा॑ दे॒वाना॒मन्नं॒ यच्च॒न्द्रमा॒स्तमे॒त- त्यू॒र्वेद्युर॑भिषुण्वन्ति प्रा॒तर्भक्ष॑यिष्य॒न्तस्तमे॒तद्र॒द्धय॑न्ति॒ यदप॑क्षीयते ॥१५॥ अथ॒ यत्पू- र्वेद्युः॑ । अ॒ग्नीषोमीये॑ण य॒जते॑ पौर्णमा॒स्याम॑भिषु॒णोत्ये॒वैन॑मेत॒त्तस्मि॒न्नभि॑षुत॒ऽएत॑ रसं दधात्ये॒तेन॒ रसे॑न तीव्रीक॑रोति स्वदय॑ति ह॒ वै दे॒वेभ्यो ह॒व्यं स्वद॑ते हास्य दे॒वेभ्यो ह॒व्यं य ए॒वं वि॒द्वान्पौ॑र्णमा॒स्यां संनय॑ति ॥१६॥ अथ॒ यत्पूर्वेद्युः॑ । ऐ- न्द्रा॒ग्नेन॒ यज॑तेऽमावा॒स्या॑यां दर्शपूर्णमा॒सयो॒र्वे दे॒वते स्तः इन्द्रा॒ग्नीऽए॒व तेऽए॒वैतद्- ञ्ज॒सा प्र॒त्यक्षं॑ यजत्य॒ञ्जसा ह॒ वाऽअ॒स्य दर्श॑पूर्णमा॒साभ्या॒मिष्टं भव॑ति॒ य ए॒वमे॒तद्वेद॑ ॥१७॥ अथ॒ प्रातः॑ । आ॒ग्नेयः॑ पुरो॒डाशो भव॑ति मैत्रावरु॒णी पय॒स्या नेद्य॑ज्ञाद॒यानी-