भारतकोश
शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished699 पृष्ठ

पृष्ठ 319, कुल 699 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 319

कां० २, अ० ५, ब्रा० ४, कं० १-११ शतपथब्राह्मण / ३०१ लेता है जो इस यज्ञ को करता है ॥१॥ उसकी विधि इस प्रकार है, एक उत्तर वेदी बनाते हैं। घी की नवनी लेते हैं, और अग्नि को मथते हैं। नौ प्रयाज होते हैं, नौ अनुयाज और तीन समिष्ट-यजु। पहले पाँच हवियें होती हैं ॥२॥ अग्नि के लिए आठ कपालों का पुरोडाश होता है। अग्नि को तीक्ष्ण करके उन्होंने (वृत्र को) मारा था, और अग्नि-तेज विफल नहीं हुआ। इसलिए अग्नि की हवि होती है ॥३॥ अब सोम का चरु होता है। सोम राजा की सहायता से उसको मारा था, इसलिए सोम राजा की हवि होती है ॥४॥ अब सविता के लिए बारह कपालों या आठ कपालों का पुरोडाश होता है। सविता देवों का प्रेरक है। सविता की प्रेरणा से ही उसको मारा था, इसलिए यह सविता की हवि हुई ॥५॥ अब सरस्वती का चरु हुआ। वाणी ही सरस्वती है और वाणी ने ही उनको यह कहकर उत्साह दिलाया, 'मारो। मारो।' इसलिए सरस्वती का चरु हुआ ॥६॥ अब पूषा का चरु होता है। पृथिवी ही पूषा है। इसी ने वध के लिए वृत्र को पेश कर दिया। और पृथिवी के पेश कर देने पर उन्होंने उसे मारा। इसलिए पूषा का चरु हुआ ॥७॥ अब बारह कपालों का पुरोडाश इन्द्र और अग्नि के लिए हुआ। इसी अग्नि के द्वारा उन्होंने उसे मारा था। अग्नि ही तेज है और इन्द्र वीर्य। इन्हीं दोनों शक्तियों के द्वारा उन्होंने उसे मारा। अग्नि ब्राह्मण है, इन्द्र क्षत्रिय। इन दोनों को मिलाकर अर्थात् ब्रह्म-शक्ति और क्षत्र- शक्ति को मिलाकर उन्होंने उसको इन दो शक्तियों के द्वारा मारा था, इसलिए बारह कपालों का पुरोडाश इन्द्र और अग्नि के लिए हुआ ॥८॥ अब महेन्द्र के लिए चरु होता है। वृत्र के वध से पहले वह केवल इन्द्र था। वृत्र के वध के अनन्तर महेन्द्र हो गया, जैसे विजय के पीछे महाराजा। इसलिए महेन्द्र के लिए चरु हुआ। इससे वह वृत्र के मारने के लिए उसको बड़ा (बलिष्ठ) भी कर देता है। इसलिए महेन्द्र के लिए चरु हुआ ॥६॥ अब विश्वकर्मा के लिए एक कपाल का पुरोडाश होता है। देवों ने साकमेध यज्ञ करके और (वृत्र पर) विजय पाकर अपने काम को पूरा कर लिया ('विश्वं कृतं' का अर्थ है पूरा कर लेना) और सब-कुछ जीत लिया। इसी प्रकार जो पुरुष साकमेध यज्ञ कर लेता है और विजय पा लेता है, वह अपने काम को पूरा कर लेता है। इसीलिए विश्वकर्मा के लिए एक कपाल का पुरोडाश होता है ॥१०॥ देवों की जो प्रजाति (फूलना-फलना) और श्री इस समय है, वह सब इसी यज्ञ को करके हुई है। इसी प्रकार जो इस रहस्य को समझकर इस यज्ञ को करता है उसकी सन्तान फूलती-