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शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished699 पृष्ठ

कां० २, अ० ५, ब्रा० ४, कं० १-११ शतपथब्राह्मण / ३०१ लेता है जो इस यज्ञ को करता है ॥१॥ उसकी विधि इस प्रकार है, एक उत्तर वेदी बनाते हैं। घी की नवनी लेते हैं, और अग्नि को मथते हैं। नौ प्रयाज होते हैं, नौ अनुयाज और तीन समिष्ट-यजु। पहले पाँच हवियें होती हैं ॥२॥ अग्नि के लिए आठ कपालों का पुरोडाश होता है। अग्नि को तीक्ष्ण करके उन्होंने (वृत्र को) मारा था, और अग्नि-तेज विफल नहीं हुआ। इसलिए अग्नि की हवि होती है ॥३॥ अब सोम का चरु होता है। सोम राजा की सहायता से उसको मारा था, इसलिए सोम राजा की हवि होती है ॥४॥ अब सविता के लिए बारह कपालों या आठ कपालों का पुरोडाश होता है। सविता देवों का प्रेरक है। सविता की प्रेरणा से ही उसको मारा था, इसलिए यह सविता की हवि हुई ॥५॥ अब सरस्वती का चरु हुआ। वाणी ही सरस्वती है और वाणी ने ही उनको यह कहकर उत्साह दिलाया, 'मारो। मारो।' इसलिए सरस्वती का चरु हुआ ॥६॥ अब पूषा का चरु होता है। पृथिवी ही पूषा है। इसी ने वध के लिए वृत्र को पेश कर दिया। और पृथिवी के पेश कर देने पर उन्होंने उसे मारा। इसलिए पूषा का चरु हुआ ॥७॥ अब बारह कपालों का पुरोडाश इन्द्र और अग्नि के लिए हुआ। इसी अग्नि के द्वारा उन्होंने उसे मारा था। अग्नि ही तेज है और इन्द्र वीर्य। इन्हीं दोनों शक्तियों के द्वारा उन्होंने उसे मारा। अग्नि ब्राह्मण है, इन्द्र क्षत्रिय। इन दोनों को मिलाकर अर्थात् ब्रह्म-शक्ति और क्षत्र- शक्ति को मिलाकर उन्होंने उसको इन दो शक्तियों के द्वारा मारा था, इसलिए बारह कपालों का पुरोडाश इन्द्र और अग्नि के लिए हुआ ॥८॥ अब महेन्द्र के लिए चरु होता है। वृत्र के वध से पहले वह केवल इन्द्र था। वृत्र के वध के अनन्तर महेन्द्र हो गया, जैसे विजय के पीछे महाराजा। इसलिए महेन्द्र के लिए चरु हुआ। इससे वह वृत्र के मारने के लिए उसको बड़ा (बलिष्ठ) भी कर देता है। इसलिए महेन्द्र के लिए चरु हुआ ॥६॥ अब विश्वकर्मा के लिए एक कपाल का पुरोडाश होता है। देवों ने साकमेध यज्ञ करके और (वृत्र पर) विजय पाकर अपने काम को पूरा कर लिया ('विश्वं कृतं' का अर्थ है पूरा कर लेना) और सब-कुछ जीत लिया। इसी प्रकार जो पुरुष साकमेध यज्ञ कर लेता है और विजय पा लेता है, वह अपने काम को पूरा कर लेता है। इसीलिए विश्वकर्मा के लिए एक कपाल का पुरोडाश होता है ॥१०॥ देवों की जो प्रजाति (फूलना-फलना) और श्री इस समय है, वह सब इसी यज्ञ को करके हुई है। इसी प्रकार जो इस रहस्य को समझकर इस यज्ञ को करता है उसकी सन्तान फूलती-

अध्याय-६, ब्राह्मण-१

यत॒ऽएता॒ꣳ श्रियं॑ गच्छति॒ य ए॒वं वि॒द्वानेते॑न य॒ज्ञेन॒ यज॑ते॒ तस्मा॒द्वाऽए॒तेन॑ यजेत ॥ ११॥ ब्राह्मणम् ॥ [५.४.] ॥ अध्यायः ॥ ५ [१४.] ॥ ॥ महाह॒विषा ह॒ वै दे॒वा वृ॒त्रं ज॑घ्नुः । तेनो॑ऽए॒व व्य॑जयन्त॒ येय॑मेषां विजि॑ति॒स्तस्ता- मथ॒ याने॑वैषां तस्मिंत्स॑ङ्ग्रा॒मेऽघ्नं॑स्तान्पितृय॒ज्ञेन॒ समै॑रयन्त पि॒तरो॒ वै तऽआ॑सं॒स्तस्मा- त्पितृय॒ज्ञो नाम॑ ॥ १॥ तद्वस॒न्तो ग्री॒ष्मो व॒र्षाः । ए॒ते ते ये व्य॑जयन्त श॒रद्धेम॒न्तः शि॒शि॒रस्त॒ऽउ ते यान्पुनः समै॑रयन्त ॥ २॥ अथ॒ यदे॒ष ए॒तेन॒ यज॑ते । तन्नाह॒ न्वे- वैतस्य तथा कं चन घ्नन्ती॑ति दे॒वा अ॑कुर्व॒न्निति॒ न्वेवैष ए॒तत्करोति॒ यमु॒ चैवैभ्यो॒ दे॒वा भा॒गम॑कल्पयं॒स्तमु॒ चैवैभ्य ए॒ष ए॒तद्भा॒गं क॑रोति॒ यानु॒ चैव दे॒वाः समै॑रयन् ता॒न् चैवैतद॑वति॒ स्वा॒न् चैवैतत्पि॒तॄञ्छ्रेया॒ꣳसं लो॒कमुपो॑न्नयति॒ यदु॒ चैवास्या॒त्रात्म॑- नो॒ऽचर॑णेन ही॒यते॒ वा मी॑यते वा॒ तदु॒ चैवा॒स्यैते॑न पुन॒राप्या॑यते॒ तस्मा॒द्वाऽए॒ष ए॒तेन॒ यज॑ते ॥ ३॥ स पि॒तृभ्यः सोमवद्भ्यः । षट्क॑पालं पु॒रोडाशं॒ निव॑पति॒ सोमा॑य वा पि॒तृम॑ते षड्वा॒ऽऋतव॑ ऋ॒तवः॑ पि॒तर॒स्तस्मा॑त्षट्क॑पालो भवति ॥ ४॥ अथ पि॒तृ- भ्यो बर्हि॒षद्भ्यः॑ । अ॒न्वाहा॑र्यपचने धानाः॑ कुर्वन्ति ततो॒ऽर्धाः पि॒षंस्त्य॒र्धा इ॒त्येव॑ धाना अ॑पिष्टा भव॑न्ति ता धानाः॑ पि॒तृभ्यो॑ बर्हि॒षद्भ्यः॑ ॥ ५॥ अथ पि॒तृभ्यो॑ऽग्निष्वा- त्तेभ्यः॑ । नि॒वान्या॑यै दु॒ग्धे स॒कृदु॑पमथित॒ एक॑शलाकया म॒न्थो भ॑वति स॒कृदु॑ ह्येव॒ परा॑ञ्चः पि॒तर॒स्तस्मात्स॒कृदु॑पमथितो॒ भव॒त्येता॑नि ह॒वीꣳ॑षि भवन्ति ॥ ६॥ ॥ शतम् १३०० ॥ ॥ तद्ये सोमे॑न॒ज्ञानाः॑ । ते पि॒तरः॑ सोम॒वन्तोऽथ॒ ये द॒त्तेन॑ प॒क्वेन॑ लो॒कं ज॒यन्ति॒ ते पि॒तरो॑ बर्हि॒षदोऽथ॒ ये ततो॒ नान्यत॑रच्चन यान॒ग्निरि॑व द॒हन्त्स्व॑द॒यति ते पि॒तरो॑ऽग्निष्वा॒त्ता एत॒ऽउ ते ये पि॒तरः॑ ॥ ७॥ स ज॒घने॑न गा॒र्हप॑त्यम् । प्राची॑- नावी॒ती भू॒त्वा दक्षि॑णासी॒न ए॒तꣳ षट्क॑पालं पु॒रोडाशं॑ गृह्णाति स तत ए॒वोप॑- त्थायोत्तरे॑णा॒न्वाहा॑र्यपचनं दक्षि॑णा ति॒ष्ठन्नव॑हन्ति स॒कृत्फ॑लीकरोति स॒कृदु॑ ह्येव परा॑ञ्चः पि॒तर॒स्तस्मात्स॒कृत्फ॑लीकरोति ॥ ८॥ स दक्षि॑णैव॒ दृषदुपले॒ऽउपद॑धाति ।

का० २, अ० ६, ब्रा० १, कं० १-६ शतपथब्राह्मण / ३०३ फलती है और उसको श्री भी प्राप्त होती है। इसलिए इस यज्ञ को करे ॥११॥ अध्याय ६-ब्राह्मण १ देवों ने 'महाहवि' के द्वारा ही वृत्र को मारा और उस विजय को पाया जो इस समय उनको प्राप्त है। और जो उनमें वीर उस संग्राम में मारे गये उनको पितृयज्ञ से जिलाया। वे पितर ही तो थे। इसलिए पितृयज्ञ नाम पड़ा ॥१॥ अब वसन्त, ग्रीष्म और वर्षा। ये वे हैं जिन्होंने (वृत्र) को जीता। शरद्, हेमन्त और शिशिर ये वे हैं जिनको दुबारा जिलाया ॥२॥ जब वह यह यज्ञ करता है तो इसलिए करता है कि एक तो (असुर) उसके किसी (सम्बन्धी) को न मार सकें, दूसरे चूंकि देवों ने यज्ञ किया था। इसके अतिरिक्त वह इसलिए भी यज्ञ करता है कि देवों ने जिन पितरों के लिए भाग निकाला था वह भाग उन तक पहुँच जावे। इस प्रकार जिनको देवों ने पुनर्जीवित किया उनको सन्तुष्ट करता है और अपने पितरों को श्रेय- लोक तक पहुँचाता है। और जो कुछ हानि या मृत्यु अपने अनुचित आचार से होती उसका प्रती- कार हो जाता है! इसलिए यह यज्ञ करता है ॥३॥ छः कपालों का पुरोडाश 'सोमवन्त पितरों' के लिए होता है, या 'पितृमत् सोम' के लिए। छः ऋतुएँ होती हैं। ऋतुएँ ही पितर हैं। इसलिए छः कपाल होते हैं ॥४॥ अब 'बर्हिषद् पितरों के लिए अन्वाहार्यपचन (या दक्षिणाग्नि) पर धान भूनते हैं। आधे धान पीस लेते हैं और आधे बिना पिसे होते हैं। ये धान 'बर्हिषद् पितरों' के लिए होते हैं ॥५॥ अब 'अग्नि-ष्वात्ता पितरों' के लिए हवि को बनाते हैं। इस प्रकार कि (पिसे हुए धानों में) अन्य के बछड़े को पिलानेवाली गाय का दूध मिलाकर और उसे एक शलाका से एक बार ही हिलाकर बनाते हैं। पितर एक बार ही परलोक को चले गये, इसलिए एक ही बार चलाते हैं; ये हवियाँ हुईं ॥६॥ जिन्होंने सोम यज्ञ किया था वे हुए 'सोमवन्त पितर', और जो दिये हुए पके अन्न से लोक को जीतते हैं वे हुए 'बर्हिषद् पितर', और जिन्होंने न यह किया न वह और जिनको अग्नि ने जला दिया वे हुए 'अग्नि-ष्वात्ता'। ये पितर हुए ॥७॥ वह छः कपालों के पुरोडाश के लिए (चावल) गार्हपत्य के पीछे दक्षिण की ओर बैठ- कर और दाहिने कन्धे पर सामने की ओर जनेऊ रखकर निकालता है। वहाँ से उठकर अन्वा- हार्यपचन के उत्तर की ओर खड़ा होकर दक्षिण की ओर मुख किये हुए पछोरता है। उनको एक ही बार साफ करता है ॥८॥ दक्षिण की ओर दृषद् और उपल (चाकी के पाट) को रखता है और गार्हपत्य के दक्षिण

३०४ शतपथ ब्राह्मण दक्षि॒णार्धे गार्ह॑पत्यस्य षट्प॒न्नान्यु॑पदधाति तद्य॒देतां दक्षि॑णां दिशँ सच॑न्तऽए॒षा हि दिक् पि॑तॄणां तस्मा॑देतां दक्षि॑णां दिशँ सचन्ते ॥ ९॥ अथ दक्षि॑णेनान्वाहार्य- प॒चनं । च॒तुःस्र॑क्तिं वेदिं करोत्यवान्तरदिशोऽनु॒ स्रक्तीः करोति चतस्रो वाऽअ- वान्तरदिशोऽवान्तरदिशो वै पित॒रस्तस्मादवान्तरदिशोऽनु स्रक्तीः करोति ॥ १०॥ तन्मध्येऽग्निँ समाद॑धाति । पुर॒स्ताद्धि दे॒वाः प्रत्यञ्चो मनुष्यानभ्युपा॒वृत्तास्तस्मा॒त्ते- भ्यः प्राङ् तिष्ठञ्जुहोति सर्व॒तः पितरोऽवान्तरदिशो वै पितरः सर्व॒त-इव॒ हीमा अ॒वान्तर॒दिशस्तस्मान्मध्येऽग्निँ समा॒दधाति ॥ ११॥ स तत एव प्राङ् स्तम्बयजुर्ह- रति । स्तम्बयजुर्हृत्वा॑वि॒त्येवाग्रे परिगृह्णात्यवेत्यथेति पूर्वेण परिग्रहेण परिगृह्य लिखति कूरति॒ यद्धार्यं भवति स तथै॒वोत्तरेण परिग्रहेण परिगृह्णात्युत्तरेण परि ग्रहेण परिगृह्य प्रतिमृश्याह प्रोक्षणीरासादयेत्यासादयन्ति प्रोक्षणीरिध्मं बर्हिरुप- सादयन्ति स्रुचः संमार्ष्ट्याग्रेणोदेति स यज्ञोपवीती भूत्वाऽऽज्यानि गृह्णाति ॥ १२॥ तदाहुः । द्विरुपभृति गृह्णीयाद्वौ ह्यत्रानूयाजौ भवत इति तद्वाष्टावेव कृत्व उपभृ- ति गृह्णीयान्नेद्य॒ज्ञस्य विधाया अपयानीति तस्मादष्टावेव कृत्व उपभृति गृह्णीयादा- ज्यानि गृहीत्वा स पुनः प्राचीनावीती भूत्वा ॥ १३॥ प्रोक्षणीरध्वर्युरादत्ते । स इ- ध्ममेवाग्रे प्रोक्ष्य वेदिमथास्मै बर्हिः प्रयच्छन्ति तत्पुरस्तादञ्चासादयति तत्प्रो- क्ष्योपनिनीय विस्रँस्य ग्रन्थिं न प्रस्तरं गृह्णाति सकृदु ह्येव पराचः पितॄस्त- स्मान्न प्रस्तरं गृह्णाति ॥ १४॥ अथ संनहनमनुविस्रँस्य । अपसलवि त्रिः परि- स्तृणन्नेति सोऽपसलवि त्रिः परिस्तीर्य यावत्प्रस्तरभाजनं तावत्परिशिनष्ट्यथ पुनः प्रसलवि त्रिः पर्येति यत्पुनः प्रसलवि त्रिः पर्येति तद्यानेवामूंस्त्रयानृत्वी- नन्ववागात्तेभ्य ए॒वैतत्पुनरपोदेतीमँ स्वं लोकमभि तस्मात्पुनः प्रसलवि त्रिः पर्येति ॥ १५॥ स दक्षिणेव परिधीन्परिदधाति । दक्षिणा प्रस्तरँ स्तृणाति ना- न्तर्दधाति विधृती सकृदु ह्येव पराञ्चः पितरस्तस्मान्नान्तर्दधाति विधृती ॥ १६॥ स

का० २, अ० ६, ब्रा० १, कं० ६-१६ शतपथब्राह्मण / ३०५ भाग में छः कपालों को रखता है। दक्षिण दिशा में इसलिए रखते हैं कि दक्षिण दिशा पितरों की है। इसलिए दक्षिण दिशा की ओर रखते हैं ॥६॥ अब दक्षिणाग्नि के दक्षिण की ओर एक चौकोर वेदि बनाता है, जिसके कोने अवान्तर दिशाओं की ओर होते हैं। अवान्तर दिशा चार हैं और अवान्तर दिशा ही पितर हैं। इसलिए वेदि के कोने अवान्तर दिशाओं की ओर होते हैं ॥१०॥ उसके मध्य में अग्नि को रखता है। देव पूर्व से पश्चिम को मनुष्यों तक आये। इसलिए पूर्व की ओर मुख करके खड़ा होकर आहुति देता है। पितर सभी ओर हैं। अवान्तर दिशा ही पितर है। इसलिए वह अग्नि को मध्य में रखता है ॥११॥ वहाँ से वह स्तम्बयजु (कुश) को पूर्व की ओर फेंकता है। अब कुशों से वेदी को घेरता है—पहले इस प्रकार (पश्चिम की ओर), फिर इस प्रकार (उत्तर की ओर); फिर इस प्रकार (पूर्व की ओर)। पहली लकीर (या पंक्ति) से घेरकर (अध्वर्यु) रेखा खींचता है, और जो कुछ हटाना होता है उसे हटा देता है। अब वह दूसरी लकीर से घेरता है और दूसरी लकीर से घेरकर और चिकनाकर कहता है, 'प्रोक्षणी को रख।' अतः वे प्रोक्षणी को रखते हैं। और समिधा और बर्हि को ये उसके पास रखते हैं। वह स्रुकों को पोंछता है, और घी लेकर आता है। वह यज्ञोपवीत पहने-पहने ही घी को लेता है ॥१२॥ इस सम्बन्ध में कुछ लोग कहते हैं कि अनुयाज दो होते हैं, इसलिए उपभृति में दो बार घी ले। परन्तु उसे आठ बार करके घी लेना चाहिए। कहीं ऐसा न हो कि वह यज्ञ की विधि से दूर हो जाय। इसलिए आठ बार करके घी लेवे। घी लेकर और जनेऊ को दाहिने कन्धे पर करके—॥१३॥ अध्वर्यु प्रोक्षणी लेता है। पहले समिधों पर जल छिड़कता है, फिर वेदी पर। अब वे बर्हि को उसे देते हैं। और वह बर्हि को पूर्व की ओर गाँठ करके रखता है। अब उस पर जल छिड़ककर, गाँठ को खोलकर वह गाँठ को पकड़ता है, न कि प्रस्तर को। पितर एक बार ही चले गये इसलिए वह प्रस्तर को नहीं लेता ॥१४॥ (बर्हि के मुट्ठे को) खोलकर वह दाहिनी ओर से बाईं ओर को तीन बार घूमता है (वेदि पर) बर्हि को फैलाता हुआ। दाहिनी ओर से बाईं ओर को तीन तहों में फैलाकर वह इतने कुश बचा लेता है कि प्रस्तर बन सके। अब वह तीन बार बाईं ओर से दाहिनी ओर को मुड़ता है। वह तीन बार बाईं ओर से दाहिनी ओर को इसलिए मुड़ता है कि पहले वह अपने तीन पितरों के पीछे गया था, अब वह फिर अपने लोक को वापस आ जाता है। इसलिए वह तीन बार बाईं ओर से दाहिनी ओर को मुड़ता है ॥१५॥ वह परिधियों को दक्षिण की ओर रखता है। और प्रस्तर को भी दक्षिण की ओर रखता है। दो विधृतियों को बीच में नहीं रखता। पितर एक बार ही परलोक को सिधार गये, इसलिए दो विधृतियों को बीच में नहीं रखता ॥१६॥

३०६ शतपथ ब्राह्मण त॒त्र जुहू॒मासा॑दयति । अथ पूर्व्वा॒मुप॑भृत॒मथ ध्रुवामथ पुरोडाश॒मथ धाना अथ म- न्थ॒मासा॑द्य ह॒वींᳵषि॒ संमृ॑शन्ति ॥ १७ ॥ ते सर्व्व॒ऽए॒व य॒ज्ञोपवी॒तिनो भू॒त्वा । इत्या- द्यज॑मानश्च ब्र॒ह्मा च पश्चा॒त्यरी॑तः पुर॒स्ताद॒ग्नीत् ॥ १८ ॥ तेनो॒पांᳵशु च॑रन्ति । ति॒र्- इव वै पि॒तर॑स्ति॒र्-इ॑वैतद्यदुपां॒ᳵशु तस्मादुपांᳵशु चरन्ति ॥ १९ ॥ प॒रिवृ॑ते चरन्ति । ति॒र्-इ॑व वै पि॒तर॑स्ति॒र्-इ॑वैतद्यत्प॑रिवृतं तस्मात्प॑रिवृते चरन्ति ॥ २० ॥ अ॒ग्नेध्म- म॒भ्याद॑धातु । अ॒ग्नये॑ समिध्यमा॒नाया॑नुब्रूहीति स ए॒कामे॑व होता सामिधेनीं त्रि- र॒न्वाह॒ सकृ॑द्ध्येव प॒राञ्चः पि॒तर॒स्तस्मा॑दे॒काᳵ होता सामिधेनीं त्रि॒रन्वाह॑ ॥ २१॥ सो॒ऽन्वाह॑ । उ॒शन्त॑स्त्वा निधीम॒ह्युश॑न्तः समिधीमहि । उ॒शन्नु॑शत॒ आव॑ह पि॒तॄन्ह॒- वि॒षेऽत्त॑व॒ऽइत्य॒थाग्नि॒माव॑ह॒ सोम॒माव॑ह पि॒तॄन्त्सोम॑वत॒ आव॑ह पि॒तॄन्ब॑र्हि॒षद॒ आव॑ह पि॒तॄन॒ग्निष्वा॒त्तानाव॑ह दे॒वां३ᳵआ॒ज्यपां३ᳵश्चाव॒हाग्निᳵ होत्रा॒याव॑ह॒ स्वं म॑- हि॒मान॒माव॒हेत्या॑वा॒ह्योप॑विशति ॥ २२ ॥ अथा॒श्राव्य॒ न होता॑रं वृणीते । पि॒- तृय॒ज्ञो वा॒ऽअयं नेद्धोतारं॑ पितृ॒षु दधानी॑ति॒ तस्मान्न॒ होता॑रं वृणीते सी॒द हो- तरित्ये॒वाहो॑प॒विश॑ति॒ होता होतृषद॑न॒ऽउप॑विश्य प्र॒सौती॑ प्रसू॒तोऽध्व॒र्युः स्रुचावा- दाय॑ प्रत्य॒ङ्ङुति॑क्रामत्यतिक्रम्या॒श्राव्या॑ह॒ समि॑धो॒ यजे॑ति सो॒ऽपब॑र्हिषश्च॒तुरः॑ प्रया॒जा- न्य॑जति प्र॒जा वै ब॒र्हिर्न्नेत्प्र॒जाः पि॒तृषु दधानी॑ति॒ तस्मा॑दुपब॒र्हिषश्च॒तुरः॑ प्रया॒जान्य- जत्यथा॒ऽऽज्य॑भागाभ्यां चर॒त्याज्य॑भागाभ्यां चरित्वा॒ ॥ २३ ॥ ते सर्व्व॒ऽए॒व प्राची॑नावी- तिनो भू॒त्वा । ए॒तैर्वै ह॒विर्भिः॑ प्रच॑रिष्यन्त इत्या॒द्यज॑मानश्च ब्र॒ह्मा च पु॒रस्तात्प॒- री॑तः पश्चाद॒ग्नीत्त॒दुता॑श्राव॒यन्त्यो॒३ᳵ स्वधेत्य॒स्तु स्व॒धेति॑ प्रत्या॒श्राव॑णं॒ स्वधा नम॒ इति वषट्कारः ॥ २४ ॥ तदु॒ होवा॑चासुरिः । आश्रावयेयु॑रे॒व प्रत्या॒श्राव॑येयुर्वषट्कुर्यु- र्न्नेद्य॒ज्ञस्य विधाया॒ अया॒मेति॑ ॥ २५ ॥ अथा॑ह पि॒तृभ्यः सोम॑वद्भ्यो॒ऽनुब्रू॒हीति॑ । सो- माय॑ वा पि॒तृम॑ते स द्वे पु॒रोऽनुवा॒क्ये॒ऽअन्वाहैकया॒ वै दे॒वान्प्र॒च्याव॑यति द्वाभ्यां॑ पि॒तॄन्सकृ॑द्ध्येव प॒राञ्चः पि॒तर॒स्तस्मा॑द्द्वे पु॒रोऽनुवा॒क्ये॒ऽअन्वाह॑ ॥ २६ ॥ स उप॑-

कां० २, अ० ६, ब्रा० १, कं० १७-२६ शतपथब्राह्मण / ३०७ अब वह जुहू को रखता है और उसके पूर्व को उपभृत को । अब ध्रुवा, पुरोडाश, धान, मन्थ को रखकर हवियों को छूता है ॥१७॥ ये सब यज्ञोपवीती होकर यजमान और ब्रह्मा इस प्रकार पश्चिम को चलते हैं और अग्नीध् पूर्व को ॥१८॥ वे इसको धीरे-धीरे करते हैं। पितर भी छिपे हुए हैं और जो धीरे-धीरे पढ़ा जाय वह भी छिपे के ही समान है। इसलिए धीरे-धीरे ही पढ़ते हैं ॥१९॥ वे इस यज्ञ को घिरे हुए स्थान में करते हैं। पितर छिपे हुए हैं और जो घिरे स्थान में किया जाता है वह भी छिपे के तुल्य है ॥२०॥ अब वह समिधों को रखकर कहता है, 'जलती हुई आग के लिए कह।' होता एक सामिधेनी ऋचा को तीन बार पढ़ता है। पितर लोग एक ही बार परलोक को चले गये, इसलिए एक ही सामिधेनी ऋचा को तीन बार पढ़ता है ॥२१॥ वह जपता है, “उशन्तस्त्वानि धीमहि । उशन्तः समिधीमहि । उशन्नुशत ऽआ वह पितॄन् हविषेऽअत्तवे' (यजु० १९।७०)- "प्रेम से हम तुझको रखते हैं। प्रेम से तुझे प्रज्वलित करते हैं। हे प्यारे, प्यारे पितरों को हवि खाने के लिए ला।" अब कहता है, 'अग्नि को ला, सोम को ला, सोमवन्त पितरों को ला, बर्हिषद् पितरों को ला, अग्निष्वात्ता पितरों को ला, घी पीने- वाले देवों को ला, होता के लिए अग्नि को ला, अपनी महिमा को ला।' इस प्रकार बुलाकर वह बैठ जाता है ॥२२॥ अब 'श्रौषट्' करने के पश्चात् वह होता का वरण नहीं करता। यह पितृयज्ञ है। ऐसा न हो कि होता को पितरों के हवाले कर दे, इसलिए होता का वरण नहीं करता। केवल यह कह- कर कि, 'होता, बैठ', बैठ जाता है। होता होता-के-आसन पर बैठकर (अध्वर्यु को) प्रेरणा करता है। प्रेरित होकर अध्वर्यु दो स्रुकों को लेता है और पश्चिम की ओर जाता है। वहाँ जाकर 'श्रौषट्' कहकर कहता है, 'समिधो यज' (समिधों का यज्ञ कर)। बर्हि को छोड़कर चार प्रयाजों को करता है। बर्हि प्रजा है। ऐसा न हो कि प्रजा पितरों के हवाले हो जाय, इसलिए बर्हि को छोड़कर चार प्रयाजों को करता है। अब दो आज्य भागों को देते हैं और उनको देकर-॥२३॥ वे अपने जनेऊ को दाहिने कन्धे पर कर लेते हैं क्योंकि इन हवियों को देने की इच्छा कर रहे हैं। यजमान और ब्रह्मा इस प्रकार करके (पश्चिम से) पूर्व की ओर मुड़ते हैं, और आग्नीध्र (पूर्व से) पश्चिम की ओर। आगे (अध्वर्यु) श्रौषट् में कहते हैं 'ओ३म् ! स्वधा।' (आग्नीध्र) उत्तर देता है, 'अस्तु स्वधा।' और वषट्कार है 'स्वधा नमः' ॥२४॥ इस पर आसुरि ने कहा, 'श्रौषट् कहो' और उत्तर में श्रौषट् कहना चाहिए और वषट्- कार बोलना चाहिए। कहीं ऐसा न हो कि यज्ञ की विधि से हम हट जायें ॥२५॥ तब (अध्वर्यु) कहता है, 'सोमवन्त पितरों को बुलाओ।' सोमवन्त पितरों के लिए (होता) दो अनुवाक्य बोलता है - एक अनुवाक्य देवों के लिए बोला जाता है और दो पितरों के लिए। पितर एक बार ही परलोक को सिधार गये, इसलिए पितरों के लिए दो अनुवाक्य हुए ॥२६॥

स्तृणी॒तऽआ॒ज्यम् । अथा॑स्य पु॒रोडा॑शस्या॒वद्य॑ति स तेनै॑व स॒ह धा॒नानां॒ तेन॑ स॒क्तु मन्थ॑स्य॒ तत्स॒कृद॒वद्य॑त्यथो॑प॒रिष्टा॑द्द्वि॒राऽज्य॑स्या॒भिघा॑रयति प्रत्यनक्त्यव॒दाना॑नि ना- ति॑क्रामतीत् ए॒वोपोत्थाया॑श्रा॒व्याह पितॄ॑न्त्सोम॒वतो यजेति वषट्कृते जुहोति ॥ २७॥ अथा॑ह पितृभ्यो॑ ब॒र्हिष॒द्भ्योऽनु॑ब्रूहीति । स उपस्तृ॒णीतऽआ॒ज्यमथासां धा॒नाना॑म- वद्य॑ति स तेनै॑व स॒ह मन्थ॑स्य॒ तेन॑ स॒ह पु॒रोडा॑शस्य॒ तत्स॒कृद॒वद्य॑त्यथो॑प॒रिष्टा॑- द्वि॒राऽज्य॑स्या॒भिघा॑रयति प्रत्यनक्त्यव॒दाना॑नि नाति॑क्रामतीत् ए॒वोपोत्थाया॑श्रा॒व्याह पितॄन्ब॒र्हिष॒दो यजेति वषट्कृते जुहोति ॥ २८॥ अथा॑ह पितृभ्यो॑ऽग्निष्वा॒त्तेभ्योऽनु॑- ब्रू॒हीति॑ । स उपस्तृ॒णीतऽआ॒ज्यमथा॑स्य मन्थ॒स्यावद्य॑ति स तेनै॑व स॒ह पु॒रोडा॑श- स्य॒ तेन॑ स॒ह धा॒नानां॒ तत्स॒कृद॒वद्य॑त्यथो॑प॒रिष्टा॑द्द्वि॒राऽज्य॑स्या॒भिघा॑रयति प्रत्यनक्त्य- व॒दाना॑नि नाति॑क्रामतीत् ए॒वोपोत्थाया॑श्रा॒व्याह पितॄन॒ग्निष्वा॒त्तान्त्यजेति वषट्कृते जु॒होति॑ ॥ २९॥ अथा॑हा॒ग्नये॑ कव्यवा॒हनायानु॑ब्रू॒हीति॑ । त॒त्स्विष्टकृते ह॒व्यवा॑हनो वै दे॒वानां॑ कव्यवा॒हनः॑ पितॄणां तस्मादाहा॒ग्नये॑ कव्यवा॒हनायानु॑ब्रू॒हीति॑ ॥ ३०॥ स उपस्तृणीतऽआ॒ज्यम् । अथा॑स्य पु॒रोडा॑शस्या॒वद्य॑ति स तेनै॑व स॒ह धा॒नानां॒ ते- न स॒ह मन्थ॑स्य॒ तत्स॒कृद॒वद्य॑त्यथो॑प॒रिष्टा॑द्द्वि॒राऽज्य॑स्या॒भिघा॑रयति न प्रत्यनक्त्यव दाना॑नि नाति॑क्रामतीत् ए॒वोपोत्थाया॑श्रा॒व्याहा॒ग्निं क॒व्यवा॑हनं यजेति वषट्कृते जु॒होति॑ ॥ ३१॥ स यन्नाति॑क्रामति । इत ए॒वोपोत्थाय॑ जु॒होति स॒कृदु॑ ह्येव परा॑- ञ्चः पितरो॑ऽथ य॒त्सकृ॑त्सकृ॒त्सर्वै॑षाꣳ ह॒विषाꣳ॑ समव॒द्यति सकृदु॑ ह्येव परा॑ञ्चः पि- तरो॑ऽथ यद्व्यतिष॒ङ्गम॑वदाना॒न्यव॒द्यत्यृ॒तवो॒ वै पितर॑ ऋ॒तूने॒वैतद्व्य॑तिषजत्यृ॒तूसं॑- धाति॒ तस्मा॑द्व्यतिष॒ङ्गम॑वदा॒नान्यव॑द्यति ॥ ३२॥ तद्वैके । ए॒तमेव होत्रे॒ मन्थम॑प्र- दधति तꣳ हो॒तोप॑हूया॒वि॑व जिघ्रति तं ब्र॒ह्मणे॒ प्रय॑च्छति तं ब्र॒ह्मावि॑व जिघ्रति तम- ग्रीधे॒ प्रय॑च्छति तमग्नी॒द्वै॑व जिघ्रत्ये॒तद्वै॒तत्कुर्वन्ति॒ यथा॒ त्वे॒वानर॑स्य य॒ज्ञस्येडाप्रा- शित्रꣳ॑ समव॒द्यत्ये॒वमे॒वैतस्या॑पि समवद्येयु॒स्तामुपहूया॒वि॑व जिघ्रन्ति न प्रा॒श्नन्ति प्र

कां० २, अ० ६, ब्रा० १, कं० २७-३३ शतपथब्राह्मण / ३०६ अब घी को फैलाता है। वह पुरोडाश में से टुकड़ा काटता है, और साथ ही धान और मन्थ। ये सब एक ही साथ (जुहू में) रख देता है। दो बार घी छोड़ता है और टुकड़ों को फिर चुपड़ता है। वह दक्षिण को जाता नहीं, किन्तु उठकर और श्रौषट् कहकर कहता है—‘पितॄन् सोमवतो यज।’ और वषट्कार के पश्चात् आहुति दे देता है ॥२७॥ अब कहता है—'बर्हिषद् पितरों को बुलाओ।' अब घी को फैलाता है और धानों में से एक टुकड़ा लेकर मन्थ तथा पुरोडाश के साथ एक ही बार जुहू में रख देता है। दो बार घी छोड़ता है और उन टुकड़ों को चुपड़ता है। वह जाता नहीं, किन्तु उठकर और ‘श्रौषट्' कह- कर कहता है—‘बर्हिषद् पितरों के लिए हवि दो', और वषट्कार के पश्चात् आहुति दे देता है ॥२८॥ अब कहता है—'अग्निष्वात्ता पितरों को बुलाओ।' घी को फैलाता है। मन्थ में से एक टुकड़ा काटता है और धान और पुरोडाश के साथ एक ही बार में (जुहू में) रख देता है। दो बार ऊपर से घी छोड़ता है, फिर उन टुकड़ों को चुपड़ता है। वह चलता नहीं, किन्तु उठकर 'श्रौषट्' कहकर कहता है—'अग्निष्वात्ता पितरों के लिए आहुति दो।' फिर वषट्कार के पश्चात् आहुति दे देता है ॥२६॥ अब कहता है—'कव्यवाहन अग्नि को बुलाओ।' यह स्विष्टकृत अग्नि के लिए कहा। वह देवों के लिए हव्यवाहन है और पितरों के लिए कव्यवाहन; इसलिए 'कव्यवाहन अग्नि के लिए' ऐसा कहा ॥३०॥ अब वह घी को फैलाता है। पुरोडाश में से टुकड़ा काटता है, धान और मन्थ के साथ (जुहू में) रख देता है। दो बार घी छोड़ता है और टुकड़ों को चुपड़ता नहीं, न चलता है, किन्तु उठकर और श्रौषट् कहकर कहता है—‘कव्यवाहन अग्नि के लिए आहुति दो' और वषट्- कार के पश्चात् आहुति दे देता है ॥३१॥ वह चलता क्यों नहीं और उठकर ही आहुति क्यों दे देता है ? इसका कारण यह है कि पितर लोग एक बार ही परलोक को चले गये। और हवियों में से एक ही टुकड़ा क्यों काटता है ? इसलिए कि पितर एक ही बार परलोक को चले गये। और टुकड़ों को काटकर एक साथ क्यों रखता है ? इसलिए कि ऋतुएँ ही पितर हैं। इस प्रकार वह ऋतुओं को मिलाकर रखता है, ऋतुओं में सन्धि करता है। इसलिए इन टुकड़ों को एक-साथ रखता है ॥३२॥ कुछ लोग सब मन्थ को होता को दे देते हैं। होता उसका आवाहन करके सूंघता है, और ब्रह्मा को दे देता है। उसे ब्रह्मा सूंघता है और आग्नीध्र को देता है। आग्नीध्र भी उसे सूंघता है। वे ऐसा करते हैं। दूसरे यज्ञों में इडा को काटते हैं। इसमें भी काटना चाहिए। (इड का)

३१० शतपथ ब्राह्मण

शितव्य॑ म्नेव वयं॑ मन्यामह॒ऽइति॑ ह स्माह॒ासुरि॒र्यस्य॒ कस्य॒ चाग्नौ जुह्वतीति॑ ॥३३॥ अ॒थ यत॑रो दास्यन्भव॑ति । यद्य॒ध्वर्युर्वा यज॑मानो वा स उद॒पात्र॑मा॒दाया॑पसल॒वि त्रिः परिषिञ्च॒न्पर्य्येति॒ स यज॑मानस्य पि॒तर॑मवनेजयत्यसावव॑नेनिङ्क्ष्वेत्यसावव॑ने- निङ्क्ष्वेति॑ पिताम॒हम॑सावव॑नेनिङ्क्ष्वेति॑ प्रपिताम॒हं तयथाशिष्यतेऽभिषिञ्चेदेवं तत् ॥३४॥ अथास्य पुरोडाशस्यावदाय॑ । सव्ये॑ पाणी॑ कुरुते धानानामवदाय॑ सव्ये॑ पा- णौ॑ कुरुते मन्थस्यावदाय॑ सव्ये॑ पाणी॑ कुरुते ॥३५॥ स॒ येमामवान्तरदिशमनु॒ स्र- क्तिः॑ । तस्यां॒ यज॑मानस्य पि॒त्रे द॑दात्यसावेतत्त॒ऽइत्य॒थ येमामवान्तरदिशमनु॒ सक्ति- स्तस्यां॒ यज॑मानस्य पिताम॒हाय॑ ददात्यसावेतत्त॒ऽइत्य॒थ येमामवान्तरदिशमनु॒ स्र- क्तिस्तस्यां॒ यज॑मानस्य प्रपिताम॒हाय॑ ददात्यसावेतत्त॒ऽइत्य॒थ येमामवान्तरदिशमनु सक्तिस्तस्यां॒ निमृ॒ष्टेऽत्र॑ पितरो मादयध्वं यथाभागमावृ॑षायध्मिति यथाभागमश्नीते- त्येवैतदाह तद्य॒देवं पितृभ्यो॒ ददा॑ति तेनो स्वान्पितॄनेतस्माद्यज्ञात्नान्तरॆति ॥३६॥ ते सर्व्व॒ऽएव य॒ज्ञोपवीतिनो भूत्वा॑ । उद॒ञ्च उपनिष्क्रम्याहवनीयमुपतिष्ठन्ते देवा- न्वा॒ऽएष उपावर्त्तते य आहिताग्निर्भव॑ति यो दर्शपूर्णमासाभ्यां यज॑ते॒ऽथैतत्पितृ- यज्ञेनेवाचारिषुस्तद् दे॒वेभ्यो निह्न॑वते ॥३७॥ ऐन्द्रीभ्यामाहवनीयमुपतिष्ठन्ते । इ- न्द्रो॒ ह्याह॑वनीयो॒ऽक्षन्नमीमदन्त॒ ह्यव॑ प्रि॒या अ॑धुषत । अस्तो॑षत स्वभानवो॒ वि- प्रा नवि॑ष्ठया मती योजा॒ न्विन्द्र॑ ते॒ हरी॑ ॥ सु॒संदृशं॑ त्वा वयं म॑घवन्वन्दिषीमहि । प्र नूनं पूर्णबन्धुर स्तुतो या॑सि॒ वशाँ२ऽअनु योजा॒ न्विन्द्र॑ ते॒ हरी॒ऽइति॑ ॥३८॥ अथ प्रतिपरेत्य गार्हपत्यमुपतिष्ठन्ते । मनो॒ न्वाहुामहे नाराशं॒सेन॒ स्तोमे॑न । पि- तॄणां च॒ मन्म॑भिः ॥ आ न॑ एतु॒ मनः॒ पुनः॒ क्रत्वे॒ दक्षाय जी॒वसे॑ । ज्योक्च॒ सूर्य्यं॑ दृशे ॥ पुनर्नः॑ पितरो॒ मनो॒ ददा॑तु दैव्यो॒ जनः॑ । जीवं॒ व्रातं॑ सचेमहीति पितृयज्ञेनेव वा॒ऽएतदचारिषुस्तद् खलु पुनर्जीवानपि॒पद्य॑न्ते तस्मादाह जीवं॒ व्रातं॑ सचेमही- ति ॥३९॥ अथ यतरो ददा॑ति । स पुनः प्राचीनावीती॒ भूत्वाभिप्रपद्य॑ जपत्यमीम-

कां० २, अ० ६, ब्रा० १, कं० ३३-४० शतपथब्राह्मण / ३११ आवाहन करके सूंघते हैं, खाते नहीं। परन्तु आसुरि की सम्मति है कि 'हमारा विचार है कि जो कुछ अग्नि में डाला जाय उसका कुछ भाग खाना भी चाहिए' ।।३३।। अब जो हवि देनेवाला हो, चाहे अध्वर्यु, चाहे यजमान, वह पानी का बर्तन लेकर तीन बार दाहिनी से बाईं ओर को पानी छिड़कता हुआ चलता है। वह यजमान के (पितरों के) लिए 'असौ अवनेनिक्ष्व' (आप धोवें) इस प्रकार दो बार कहकर पानी डालता है, और 'आप धोवें, आप धोवें' कहकर बाबा (पितामह) के लिए (दक्षिण-पश्चिमी कोने में), फिर परबाबा (प्रपितामह) के लिए 'आप धोवें, आप धोवें' कहकर दक्षिण-पूर्वी कोने में। जैसे अतिथि को सत्कार के लिए जल देते हैं उसी प्रकार यहाँ भी ॥३४॥ अब पुरोडाश में से एक टुकड़ा काटकर बायें हाथ में लेता है। धानों में से भी एक भाग काटकर बायें हाथ में लेता है, और मन्थ में से भी एक टुकड़ा काटकर बायें हाथ में लेता है ॥३५॥ अब वह अवान्तर दिशा के सामने (उत्तर-पश्चिम की ओर) यजमान के बाप के लिए देता है, यह कहकर कि 'यह तुम्हारे लिए', और इस अवान्तर दिशा के सामने (दक्षिण-पश्चिम की ओर) यजमान के बाबा के लिए, यह कहकर कि 'यह तुम्हारे लिए।' और इस अवान्तर दिशा के सामने (दक्षिण-पूर्व की ओर) यजमान के परबाबा के लिए यह कहकर कि 'यह तुम्हारे लिए।' और इस अवान्तर दिशा के सामने (उत्तर-पूर्व की ओर) इस मन्त्र से हाथ धोता है—"अत्र पितरो मादयध्वं यथाभागमावृषायध्वम्" (यजु० २।३१)—'हे पितरो यहाँ खाओ, बैल के समान अपने-अपने भागों को।' इसका तात्पर्य यह है कि 'आप अपना-अपना भाग खाइये।' वह इस प्रकार पितरों को क्यों खिलाता है ? इसलिए कि अपने पितरों को यज्ञ से वंचित नहीं करता ।।३६।। अब वे सब यज्ञोपवीत धारण किये हुए उत्तर की ओर जाकर आहवनीय के (उत्तर को) खड़े होते हैं। जो आहिताग्नि होकर दर्श-पूर्णमास यज्ञ करता है वह देवों का निकटवर्ती होता है। परन्तु ये अभी पितृ-यज्ञ कर रहे थे, इसलिए अब ये देवों को सन्तुष्ट करते हैं ॥३७॥ अब वे इन्द्र-सम्बन्धी दो मन्त्रों को पढ़कर आहवनीय के पास खड़े होते हैं—"अक्षन्न्मीम- दन्त ह्यव प्रियाऽअधुषत । अस्तोषत स्वभानवो विप्रा नविष्ठया मती योजा न्विन्द्र ते हरी ॥ सुसंदृशं त्वा वयं मघवन् वन्दिषीमहि । प्र नूनं पूर्णबन्धुर स्तुतो यासि वशाँ२ऽअनु योजा न्विन्द्र ते हरी" (यजु० ३।५१,५२ या ऋ० १।८२।२,३)—“प्यारों ने खा लिया, वे सन्तुष्ट हो गये और उन्होंने अपने को झाड़ डाला। प्रकाशयुक्त विप्रों ने स्तुति की – हे इन्द्र ! अपने दोनों घोड़ों को जोत। हे इन्द्र, तुझ उत्तम की हम स्तुति करेंगे। इस प्रकार स्तुति किया गया तू अपने रथ में हमारी इच्छा के अनुसार आ। हे इन्द्र ! तू अपने दोनों घोड़ों को जोत" ।।३८॥ अब वे गार्हपत्य तक लौटते हैं और खड़े होकर इन मन्त्रों को पढ़ते हैं—"मनो न्वाह्वामहे नाराशंसेन स्तोमेन । पितॄणां च मन्मभिः ।। आ नऽएतु मनः पुनः क्रत्वे दक्षाय जीवसे । ज्योक् च सूर्य दृशे ।। पुनर्नः पितरो मनो ददातु दैव्यो जनः । जीवं व्रातं सचेमहि।" (यजु० ३।५३, ५४, ५५ या ऋग्वेद १०।५७।३,४,५)—“हम नाराशंसी स्तोम के द्वारा मन का आवाहन करते हैं, और पितरों के स्तोम से। हमारे पास बुद्धि, शक्ति और जीवन के लिए मन फिर आवे कि हम बहुत दिनों तक सूर्य के दर्शन करें। हे पितरो, देव्य जन हम को फिर मन दें कि हम जीवित लोगों के साथ रह सकें।" अब तक वे पितृ-यज्ञ कर रहे थे। अब वे फिर जीवन को लौटते हैं। इसीलिए कहा – 'हम जीवित लोगों के साथ रह सकें' ॥३९॥ अब जिसने पिण्ड दिया था वह फिर दाहिने कन्धे पर जनेऊ रखकर यह मन्त्र जपता

३१२ शतपथ ब्राह्मण दत्त॒ पितरो यथाभागमावृ॑षायिषतेति यथाभागमाशिषुरित्ये॒वैतदाह ॥ ४०॥ अथो॑- दपात्र॒मादा॑य । पुनः प्रस॒व्यं त्रिः परि॑षिञ्चन्पर्य्येति स यज॑मानस्य पितॄ॒नन्वनेन- क्त्यसा॑ववनेनिक्तेत्यसा॑ववनेनिक्तेति पितामह॒मसा॑ववनेनिक्तेति प्रपितामहं त द्यथा॑ ऽनुषे॒कम॑भिषिञ्चे॒देवं तत्तद्यत्पुनः प्रस॒व्यं त्रिः परि॑षिञ्चन्पर्य्येति प्रस॒व्यं न इदं कर्मानु॑संतितिष्ठासा॒दिति॒ तस्मात्पुनः प्रस॒व्यं त्रिः परि॑षिञ्चन्पर्य्येति ॥ ४१॥ अथ नी॒विमु॒द्वृह्य॒ नम॑स्करोति । पितृदेवत्या वै नीवि॒स्तस्मान्नी॒विमु॒द्वृह्य॒ नम॑स्करोति यज्ञो वै नमो यज्ञिया॑ने॒वैना॑नेतत्क॑रोति षट् कृत्वो नम॑स्करोति षड्वाऽऋ॒तव॑ ऋ॒त- वः पितर॒स्तदृतुष्वे॒वैतं॒यज्ञं॒ प्रतिष्ठा॑पयति तस्मात्षट् कृत्वो नम॑स्करोति गृ॒हान्नः॑ पि- तरो दत्तॆति॑ गृ॒हाणां॑ ह पितर॒ ईशत॒ऽएषो॒ऽएतस्याशीः॒ कर्म॑णः ॥ ४२॥ ते सर्व्व ऽएव यज्ञोपवीतिनो भूत्वा । अनुयाजाभ्यां प्रचरिष्यन्त इत्याद्यजमानश्च ब्रह्मा च पश्चात्परीतः पुरस्तादग्नीदुपविशति होता होतृषदने ॥ ४३॥ अथाहा ब्रह्मन्प्रस्था- स्यामि । समिधमाधायाग्निमग्नीत्संमृड्ढ्रीति स्रुचावादाय प्रत्यङ्गतिक्रामत्यतिक्रम्याश्रा- व्याह देवान्यजेति सोऽपबर्हिषौ द्वावनुयाजौ यजति प्रजा वै बर्हिर्नेत्प्रजाः पि- तृषु दधानीति तस्मादपबर्हिषौ द्वावनुयाजौ यजति ॥ ४४॥ अथ सादयित्वा स्रुचौ॒ व्यूहति । स्रुचौ व्यूह्य परिधीन्त्सममृज्य परिधिमभिपद्याश्राव्याहाहेषिता दैव्या होता- रो भद्रवाच्याय प्रेषितो मानुषः सूक्तवाकायेति सूक्तवाकꣳ होता प्रतिपद्यते ना- ध्व॒र्य्युः प्रस्तरꣳ समुद्यम्यतीत्येवोपास्ते यदा होता सूक्तवाकमाह ॥ ४५॥ अथाग्नी- दाहाग्नी॒ननुप्रहरेति । स न किं चनानुप्रहरति तूष्णीमेवात्मानमुपस्पृशति ॥ ४६॥ अ- थाह संवद॒स्वेति॑ । अगानग्नीदगुंश्चावद्य॒ श्रौष॑ट् स्वगा॒ दैव्या॒ होतृ॑भ्यः स्व॒स्तिर्मा॑नु॒षे- भ्यः शं योर्ब्रूहीत्युपस्पृशत्येव परिधीन्नानुप्रहरत्यथैतद्बर्हिरनुसमस्यति परिधींश्च ॥ ४७॥ तद्वैके । हविरुच्छिष्टमनुसमस्यन्ति तदु तथा न कुर्याद्हुतोच्छिष्टं वाऽएतन्नेद्हुतोच्छिष्टम- ग्नौ॒ जुहु॒वानी॑ति तस्मा॒दपो॒ वैवा॑भ्यव॒हरे॑युः प्रा॒श्नीयु॑र्वा ॥ ४८॥ ब्राह्म॑णम् ॥ २ [६-१.]॥ ॥

कां० २, अ० ६, ब्रा० १, कं० ४०-४८ शतपथब्राह्मण / ३१३ है—"अमीमदन्त पितरो यथाभागमावृषायिषत" (यजु० २।३१)—"पितरों ने खा लिया। बैलों के समान वे अपने-अपने भाग को ले गये।" इससे तात्पर्य यह है कि उन्होंने अपना-अपना भाग खाया ॥४०॥ अब वह जल के पात्र को लेता है और छिड़कता हुआ फिर तीन बार बाईं ओर से दाहिनी ओर को लौटता एवं 'आप धोइये' कहकर यजमान के पिता के लिए जल छोड़ता है, 'आप धोइये' कहकर यजमान के बाबा के लिए, 'आप धोइये' कहकर यजमान के परबाबा के लिए। जैसे अतिथि के सत्कार के लिए, जो खाना खाता है, जल दिया जाता है वैसे ही यहाँ भी किया जाता है। और तीन बार बाईं ओर से दाहिनी ओर जल छिड़कते हुए चलने के विषय में वह सोचता है कि 'हमारा यह काम इसी प्रकार (?) पूरा हो जायगा।' इसलिए वह तीन बार बाईं ओर जल छिड़कता हुआ चलता है ॥४१॥ अब नीवि अर्थात धोती के निचले भाग को नीचे खींचकर नमस्कार करता है। नीवि पितरों की है, इसलिए उसे खींचकर नमस्कार करता है। नमस्कार यज्ञ है। इस प्रकार वह उनको यज्ञ का अधिकारी बनाता है। छः बार नमस्कार करता है, क्योंकि छः ऋतुएँ होती हैं। ऋतुएँ पितर हैं। इस प्रकार ऋतुओं में ही इस यज्ञ की स्थापना करता है। इसलिए छः बार नमस्कार करता है। अब कहता है—'पितरो ! हमको घर दो।' क्योंकि पितर घर के रक्षक हैं, और इस यज्ञ में यह आशीर्वाद है ॥४२॥ वे सब यज्ञोपवीत धारण करके (बायें कन्धे पर जनेऊ लाकर) तैयारी करते हैं। इस प्रकार यजमान और ब्रह्मा पश्चिम की ओर आते हैं और आग्नीध्र पूर्व की ओर, और होता होता के स्थान पर बैठ जाता है ॥४३॥ अब वह कहता है—'हे ब्रह्मा ! मैं आगे चलूंगा।' अब वह समिधा रखकर कहता है— 'आग्नीध्र ! आग ठीक कर।' अब दोनों स्रुकों को लेकर पश्चिम की ओर जाता है। वहाँ जाकर और 'श्रौषट्' कहकर कहता है—'देवों के लिए आहुति दे।' वह दो अनुयाज देता है, बर्हि का अनुयाज छोड़कर। बर्हि प्रजा है। इसलिए बर्हि का अनुयाज छोड़कर दो अनुयाज ही करता है जिससे प्रजा पितरों के हवाले न हो जाय ॥४४॥ अब दोनों स्रुकों को रखकर अलग-अलग कर देता है। उनको अलग करके और परिधियों को घी में भिगोकर एक परिधि को लेता है और 'श्रौषट्' कहकर कहता है--'भद्र कहने के लिए दिव्य-होता बुलाये गये और स्तुति के लिए मनुष्य-होता बुलाया गया। होता सूक्तवाक् या स्तुति कहता है। अध्वर्यु प्रस्तर को नहीं उठाता; केवल देखता रहता है जब कि होता स्तुति करता है ॥४५॥ अब आग्नीध्र कहता है-'छोड़।' अध्वर्यु कुछ छोड़ता नहीं। केवल चुपचाप अपने शरीर को छू लेता है ॥४६॥ अब आग्नीध्र कहता है—'संवाद कर।' अध्वर्यु पूछता है—'हे आग्नीध्र ! वह गया ?' (उत्तर देता है) 'वह गया।' 'देव सुनें।' 'दैवी-होता विदा हों।' 'मनुष्य-होता का कल्याण हो।' 'कल्याण के वाक्य कह।' यह कहकर वह केवल परिधियों को छूता है, परन्तु अग्नि में डालता नहीं। बर्हि और परिधियों को पीछे से छोड़ता है ॥४७॥ कुछ लोग बची-खुची हवि को भी (अग्नि में) डाल देते हैं; परन्तु ऐसा न करना चाहिए, क्योंकि यह आहुति का उच्छिष्ट (जूठा) है। इसलिए ऐसा न हो कि आहुति की जूठन छोड़ दी जाय। इसलिए उसे या तो जल में छोड़ देना चाहिए या खा लेना चाहिए ॥४८॥

अध्याय-६, ब्राह्मण-२

ᳬन्त्काह्विषा ह॒ वै दे॒वा वृ॒त्रं ज॑घ्नुः । तेनो॑ऽए॒व व्य॑जयन्त॒ येय॑मेषां वि॒जिति॒स्ता- मथ॒ याने॑वेषां तस्मिन्त्स॑ङ्ग्रामेऽशव॒ आर्च्छंस्ताने॒तेरे॒व शल्या॑न्निर॑हर॒न्त॒ तान्व्य॑वृञ्ज्त यत्त्र्य॑म्ब॒कैर॒यज॑न्त ॥१॥ अथ॒ यदे॒ष ए॒तैर्यज॑ते । तन्मा॒नू ष्ये॑वैतस्य तथा कं चनेषु- र्ऋच्छतीति॑ दे॒वा अ॑कुर्व॒न्निति॒ त्वेवैष ए॒तत्क॑रोति॒ याश्च॒ त्वे॒वास्य॑ प्र॒जा जा॒ता याश्चा- जा॑तास्ता॒ उभयी॑ रु॒द्रिया॒त्प्रमु॑ञ्चति ता अ॒स्यानमी॒वा अ॑किल्वि॒षाः प्र॒जाः प्र॒जाय॑न्ते तस्मा॒द्वाऽए॒ष ए॒तैर्यज॑ते ॥२॥ ते वै रौ॒द्रा भव॑न्ति । रु॒द्रस्य॒ ही॑षू॒त्तस्मा॑द्रौ॒द्रा भव॑- न्त्ये॑ककपाला भव॒न्त्ये॑कदे॒वत्या॒ अस॒न्निति॒ तस्मा॑देककपाला भव॑न्ति ॥३॥ ते वै प्र॒तिपु॑रुषं । याव॑न्तो गृ॒ह्याः स्युस्ताव॑न्त एके॒नाति॑रिक्ता भव॑न्ति तत्प्र॒तिपु॑रुषमे॒- वैतदे॒कैकेन॒ या अ॒स्य प्र॒जा जा॒तास्ता रु॒द्रिया॒त्प्रमु॑ञ्चत्येके॒नाति॑रिक्ता भव॑न्ति तया॑ ह॒वास्य प्र॒जा अ॑जा॒तास्ता रु॒द्रिया॒त्प्रमु॑ञ्चति॒ तस्मा॑देके॒नाति॑रिक्ता भव॑न्ति ॥४॥ स ज॒घने॑न गार्ह॑पत्यं । य॒ज्ञोप॑वी॒ती भू॒त्वोद॒ङ्ङासी॑न ए॒तान्गृ॑ह्णाति॒ स तत ए॒वोत्था॑- योद॒ङ्तिष्ठ॒न्नवे॑क्ष्य॒दीचौ॑ दृष॒दुप॑लेऽउपदधात्युत्तरार्धे गार्हपत्यस्य कपा॒लान्युप॑दधा- ति तद्य॑दे॒व ता॒मुत्त॑रां दिश॑ꣳ सच॑त॒ऽए॒षा ह्ये॑तस्य दे॒वस्य॒ दिक्स्तस्मा॑देता॒मुत्त॑रां दि॒- शंꣳ सच॑न्ते ॥५॥ ते वा॒ अक्ताः स्युः । अ॒क्तꣳ हि ह॒विस्त्व॑ऽउ वाऽअन॑क्ता ए॒व स्यु॒रभि॑मानुको ह रु॒द्रः प॒शून्त्स्याद्यद॒ञ्ज्यात्तस्मा॑दन॒क्ता ए॒व स्युः ॥६॥ तान्त्सार्धं पा- त्राꣳ समुद्रा॑स्य । अन्वा॒हार्य॑पचनादु॒ल्मुकमादा॑योदङ् परे॒त्य जु॑होत्ये॒षा ह्ये॑तस्य दे॒वस्य॒ दिक् पथि॑ जुहोति पथा हि स दे॒वश्च॑रति चतुष्पथे जुहोत्येतद्द् वा॒ऽअस्य शथि॑तं प्रज्ञातमवसानं यच्चतुष्पथं तस्माच्चतुष्पथे जुहोति ॥७॥ पलाशस्य पला- शेन मध्यमेन जुहोति । ब्रह्म वै पलाशस्य पलाशं ब्रह्म॑णैवैतज्जु॑होति स सर्वे- वानेवावद्यत्येकस्यैव नावद्यति य एषोऽतिरिक्तो भवति ॥८॥ स जुहोति । एष ते रुद्र भागः सह॒ स्वस्रा॑म्बिकया॒ तं जु॑षस्व स्वाहेत्य॑म्बिका ह॒ वै ना॒मास्य॒ स्वसा तया॒स्यैष॒ सह॒ भागस्तद्यदेष॒ स्त्रिया॒ सह॒ भागस्तस्मा॒त्त्र्य॑म्बका नाम तथा॒ अस्य

कां० २, अ० ६, ब्रा० २, कं० १-६ शतपथब्राह्मण / ३१५ अध्याय ६-ब्राह्मण २ देवों ने महाहवि के द्वारा ही वृत्र को मारा था। उसी से उनको वह विजय मिली जो उनको प्राप्त है। उनमें से जिनके शरीर में उस युद्ध में वाण लगे थे उनको निकाला। उनको उन्होंने त्र्यम्बक यज्ञ करके निकाला ॥१॥ इसलिए जो कोई इस प्रकार यज्ञ करता है वह या तो इसलिए करता है कि उसके लोगों के कोई तीर न लगेगा; या इसलिए कि देवताओं ने ऐसा किया था। इस प्रकार वह उस सन्तान को जो उत्पन्न हो चुकी है और उस सन्तान को भी जो अभी उत्पन्न नहीं हुई, रुद्र के फन्दे से छुड़ा देता है और उसकी सन्तान रोगरहित और दोषरहित उत्पन्न होती है। इसीलिये वह यज्ञ करता है ॥२॥ (त्र्यम्बक यज्ञ) रुद्र के लिए किया जाता है। वाण रुद्र के ही हैं। इसलिए रुद्र की ही आहुतियाँ होती हैं। यह एक कपाल (का पुरोडाश) होता है। एक देवता के लिए ही होती है, इसलिए वे एक कपाल की ही होती हैं ॥३॥ प्रति पुरुष के लिए एक-एक। जितने घर के लोग हों उनके लिए एक-एक और एक अधिक। एक-एक के लिए एक-एक। इससे वह उत्पन्न हुई सन्तान को रुद्र के वश से छुड़ाता है। और जो एक अधिक हुई उसके सहारे से जो सन्तान अभी उत्पन्न नहीं हुई उसको रुद्र के वश से छुड़ाता है। इसीलिए वे इतने होते हैं और एक अधिक ॥४॥ यह यज्ञोपवीत धारण किये हुए उत्तराभिमुख गार्हपत्य के पीछे बैठकर (पुरोडाश के लिए चावलों को) निकालता है। वहाँ से वह उठता है और उत्तराभिमुख खड़ा होकर पछोरता है। अब दृषद और उपल (चक्की के पाट) उत्तर की ओर रखता है और गार्हपत्य के उत्तरार्द्ध में कपालों को रखता है। उत्तर की ओर ही क्यों रखता है? इसलिए कि उत्तर देव की दिशा है। इसलिए उत्तर की दिशा में रखते हैं ॥५॥ (कुछ की राय में) उनमें घी मिलाना चाहिए। हवि में घी मिला होता है, परन्तु घी न मिलाना ही अच्छा है। यदि घी मिला दिया जायगा तो रुद्र यजमान के पशुओं के पीछे पड़ेगा। इसलिए घी नहीं मिलाना चाहिए ॥६॥ एक पात्र में सब (पुरोडाश) को करके दक्षिणाग्नि से एक जलती लकड़ी लेकर उत्तर की ओर जाकर आहुति दे देता है, क्योंकि उत्तर की दिशा इस देव की है। मार्ग में ही आहुति देता है, क्योंकि वह देव (रुद्र) मार्ग में ही चलता है। चौराहे पर ही देता है, क्योंकि चौराहे पर ही (रुद्र का) प्राचीन स्थान है। इसलिए चौराहे पर ही आहुति देता है ॥७॥ पलाश पत्र के बीच के पत्ते से आहुति देता है। पलाश ब्रह्म है। इसलिए ब्रह्म के द्वारा ही आहुति देता है। वह सब (पुरोडाशों में से) एक-एक टुकड़ा काटता है, केवल अधिक पुरोडाश (जो एक अधिक था) में से नहीं काटता ॥८॥ वह इस मन्त्र को पढ़कर आहुति देता है—"एष ते रुद्र भागः सह स्वस्राम्बिकया तं जुषस्व स्वाहा” (यजु० ३।५७)—"हे रुद्र, तेरी बहिन अम्बिका के साथ यह तेरा भाग है, तू इसे ग्रहण कर; स्वाहा ।" उसकी बहिन का नाम अम्बिका है। उसके साथ मिला हुआ उसका यह भाग है। और चूंकि एक स्त्री उस भाग में शरीक है, अतः उन आहुतियों का नाम पड़ा 'अम्बिका'। इन

३१६ शतपथ ब्राह्मण प्रजा जातास्ता रु॒द्रिया॒त्प्रमु॑ञ्चति ॥ ९॥ अथ॒ य ए॒ष एको॑ऽतिरिक्तो॒ भव॑ति । तमा- खूत्क॒रऽउ॑पकिरत्ये॒ष ते॑ रुद्र भा॒गऽआ॒खुस्ते॑ प॒शुरि॑ति॒ तद॒स्मा॒ऽआखु॑मे॒व प॑शूना॒म- न्वि॑दिशति तेनो॒ऽइतरा॒न्पशू॒न्न हि॑नस्ति तद्य॒दुप॑किरति ति॒र् इ॑व॒ वै गर्भास्ति॒र् इ- वैतद्यदुपकीर्णं त॒स्मादा॒ऽउप॑किरति त॒या ए॒वास्य॑ प्र॒जा अ॒जाता॑स्ता रु॒द्रिया॒त्प्रमु॑- ञ्चति ॥ १०॥ अथ॒ पुन॒रेत्य॑ जपन्ति । अव॑ रु॒द्रम॑दीम॒ह्यव॑ दे॒वं त्र्य॑म्बकम् । य॒था नो॒ वस्य॑सस्क॒रद्यथा॑ नः॒ श्रेय॑सस्क॒रद्यथा॑ नो॒ व्यवसा॑ययात् ॥ भेष॒जम॑सि भेष॒जं ग- वे॒ऽश्वाय॒ पुरु॑षाय भेष॒जं सु॒खं मे॒षाय॑ मे॒ष्या॒ऽइत्या॒शीरे॒वैषैतस्य॒ कर्म॑णः ॥ ११॥ अथापसलवि त्रिः प॑रियन्ति । स॒व्यानूरूनुपघ्नाना॒स्त्र्य॑म्बकं यजामहे सुग॒न्धिं पु॑ष्टि- वर्ध॑नम् । उ॒र्वा॒रु॒कमि॑व॒ बन्ध॑नान्मृ॒त्योर्मु॑क्षीय॒ मामृता॒दित्या॒शीरे॒वैषैतस्य॒ कर्म॑ण आ॒शिष॑मे॒वैतदाशा॑सते तद्य॒ क्षेव॒ शमिव॒ यो॑ मृत्योर्मुच्य॑ते॒ नामृ॒तात्तस्मा॑दाह म्- त्योर्मु॑क्षीय॒ मामृता॒दिति॑ ॥ १२॥ तडु हापि कुमा॒र्यः प॑रीयुः । भग॑स्य भजामहा॒ऽइ- ति या ह॒ वै सा रु॒द्रस्य॒ स्वसा॑म्बिका॒ नाम॒ सा ह॒ वै भग॒स्येष्टे॒ तस्मा॑दु ह्वापि कु- मार्यः॒ परी॑युर्भग॑स्य भजामहा॒ऽइति॑ ॥ १३॥ तासा॑मुतासां॒ नल्लो॒ऽस्ति॑ । त्र्य॑म्बकं य- जामहे सुग॒न्धिं प॑तिवे॒दन॑म् । उ॒र्वा॒रु॒कमि॑व॒ बन्ध॑नादितो॑ मुक्षीय॒ मामुत॒ इति॑ सा यदि॑त॒ इत्या॑ह ज्ञातिभ्य॒स्तदा॑ह॒ मामुत॒ इति॒ पति॑भ्यस्तदाह॒ पत॑यो॒ ह्येव॒ स्त्रिये॑ प्र- ति॒ष्ठा तस्मा॑दाह॒ मामुत॒ इति॑ ॥ १४॥ अथ॒ पुनः॑ प्रसल॒वि त्रिः प॑रियन्ति । द॒क्षि- णानूरूनुपघ्नाना॒ ए॒तेनै॑व॒ मन्त्रे॑ण तद्यत्पुनः॑ प्रसल॒वि त्रिः प॑रियन्ति प्रसल॒वि न॒ इदं कर्मानु॒संत॑तिष्ठाता॒ऽइति॒ तस्मा॑त्पुनः प्रसल॒वि त्रिः प॑रियन्ति ॥ १५॥ अथैतान्य्- ज॑मानो॒ऽञ्जलौ॑ समो॒प्य । ऊ॒ध्वानुदस्यति यथा गौर्नीदाद्युपात्तादात्मभ्य ए॒वैतत्कल्या- णम॒भिमि॑मीते तान्विलिप्सन्त उप॒स्पृश॑न्ति भेष॒जमे॒वैतत्कुर्वते तस्मा॑द्विलिप्सन्त उप॒स्पृ- शन्ति ॥ १६॥ तान्द्र्योर्मुत्क॒योरुप॑नह्य । वेणुय॒ष्ट्यां वा कूपे वोभयत आबध्योदङ् परे॒त्य यदि॑ वृ॒क्षं वा स्थाणुं॑ वा वे॒णुं वा वल्मी॒कं वा विन्दे॒त्तस्मि॒न्नास॑ञ्जयत्ये॒ते

कां० २, अ० ६, ब्रा० २, कं० ६-१७ शतपथब्राह्मण / ३१७ आहुतियों के द्वारा, उसके जो सन्तान हुई है उसको रुद्र के पंजे से छुड़ा देता है ॥६॥ और एक जो (पुरोडाश की टिकिया) उसको चूहे के बिल में गाड़ देती है, यह मन्त्र पढ़कर— “एष ते रुद्र भागऽआखुस्ते पशुः” (यजु० ३।५७)— “हे रुद्र ! यह भाग है और चूहा तेरा पशु है।” इस प्रकार वह चूहे को ही (रुद्र का पशु) नियत कर देता है और वह (रुद्र) किसी अन्य पशु को नहीं सताता । गाड़ता क्यों है ? इसलिए कि गर्भ गुप्त होते हैं। और जो गड़ा हुआ होता है वह भी गुप्त होता है। इसीलिए वह उसको गाड़ता है। इसके द्वारा वह अपनी उस सन्तान को जो अभी उत्पन्न नहीं हुई रुद्र के पंजे से छुड़ा देता है ॥१०॥ अब वे लौटकर यह मन्त्र जपते हैं— “अव रुद्रमदीमह्यव देवं त्र्यम्बकम् । यथा नो वस्य- सस्करद्यथा नः श्रेयसस्करद्यथा नो व्यवसाययात् ॥ भेषजमसि भेषजं गवेऽश्वाय पुरुषाय भेषजम् । सुखं मेषाय मेष्यै” (यजु० ३।५८, ५६)— “हम त्र्यम्बक देव रुद्र को सन्तुष्ट करते हैं कि वह हमको घर आदि से युक्त करे, हमको कल्याण दे, और हमको व्यवसायी बनावे” (यजु० ३।५८)— “हे रुद्र ! आप औषध हैं— गाय, घोड़े, पुरुष के लिए औषध हैं। भेड़ और भेड़ी के लिए सुख हैं (अर्थात् सब प्राणियों के लिए सुख के दाता हैं), इस यज्ञ में यह आशीर्वाद है” (यजु० ३।५६) ॥११॥ अब वे तीन बार वेदी के चारों ओर (बाईं ओर से) फिरते हैं, बाईं जांघों को पीटते हुए और यह मन्त्र जपते हुए— “त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम् । उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्यो- र्मुक्षीय माऽमृतात्” (यजु० ३।६०) — “सुगन्धयुक्त और पुष्टि को बढ़ानेवाले त्र्यम्बक की हम स्तुति करते हैं कि वह हमको मौत के बन्धन से इस प्रकार छुड़ा ले जैसे उर्वारुक (लौकी) अपने डण्ठल से; परन्तु मोक्ष से नहीं” ॥१२॥ कुमारियां भी परिक्रमा करें, इसलिए कि उनका कल्याण हो । रुद्र की बहिन अम्बिका भाग्य की अधिष्ठात्री है। इसलिए कुमारियों को भी परिक्रमा देनी चाहिए, इस इच्छा से कि उनका भाग्य जागे ॥१३॥ उनके लिए यह मन्त्र है — “त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पतिवेदनम् । उर्वारुकमिव बन्धना- दितो मुक्षीय मामुतः” (यजु० ३।६०) — “हम सुगन्धयुक्त पतियों को प्राप्त करानेवाले त्र्यम्बक की स्तुति करती हैं कि वह हमको इस (लोक) से लौकी के डण्ठल की भाँति छुड़ा दे, न कि उस (लोक) से” (यजु० ३।६०) । 'इस (लोक) से' का तात्पर्य है 'मेरे माता-पिता आदि से ।' 'वहाँ से नहीं' का तात्पर्य है — 'पति से नहीं' । (अर्थात् वधू अपने माँ-बाप को छोड़कर पति के घर में नित्य रहने की प्रार्थना करती है) पति ही स्त्री की प्रतिष्ठा है । इसलिए कहती है 'वहाँ से नहीं' ॥१४॥ अब वे फिर वेदी के चारों ओर दाहिनी ओर से फिरते हैं, दाहिनी जांघों को पीटते हुए और वही मन्त्र जपते हुए । वे दाहिनी ओर घूमकर तीन बार क्यों फिरते हैं ? इसलिए कि वे समझते हैं कि ऐसा करने से हमारे दाहिनी ओर काम सिद्ध होगा । इसलिए वे तीन बार दाहिनी ओर से परिक्रमा देते हैं ॥१५॥ अब यजमान इन बचे हुए पुरोडाश की टिकियों को अंजलि में लेकर ऊपर को इस प्रकार फेंकता है कि गौ न छू सके, और फिर हाथ में लेता है। जो पकड़ में नहीं आते और गिर पड़ते हैं उनको केवल छू लेता है। इस प्रकार वे उनको औषध के समान बनाते हैं। इसलिए यदि वे पकड़ में नहीं आते तो छू लेता है ॥१६॥ अब इनको दो टोकरियों में रखकर और या तो बाँस के दो सिरों से या तराजू की डण्डी के दो सिरों से बाँधकर उत्तर की ओर चलता है । और रास्ते में कोई वृक्ष, ठूंठ, बाँस या चिटोहर

अध्याय-६, ब्राह्मण-३

३१८ शतपथ ब्राह्मण

रु॒द्राव॒सं तेन॒ परो॒ मूज॒वतो॒ऽतीहीत्यव॒सेन॒ वा॒ऽअध्वानं॒ यन्ति॒ तदेन॑ꣳ सावस॒मे- वान्त्व॒वार्त्तित॒ यत्र॑-यत्रास्य॒ चरणं॒ तद॒न्वत्र॒ ह वा॒ऽअस्य॒ परो॒ मूज॒वद्भ्यश्च॑रणं॒ तस्मा॑- दाह॒ परो॒ मूज॒वतो॒ऽतीहीत्य॑व॒ततधन्वा॒ पिना॑कावस॒ इत्यहि॑ꣳसन्नः शि॒वो॒ऽतीही॑- त्ये॒वैतदा॑ह॒ कृत्तिवासा॒ इति॒ निष्षापयत्ये॒वैनमेतत्स्वप॒न्न हि॒ न कं च॒न हिन॒स्ति तस्मा॑दाह॒ कृत्तिवासा॒ इति॑ ॥ १७॥ अथ॒ दक्षि॑णाम्बा॒हुमन्वा॑व॒र्त्तन्ते॑ । ते॒ प्रती॑चं॒ पुन॒राय॑न्ति॒ पुन॒रेत्या॒प उप॑स्पृशन्ति रुद्रि॒येणैव॒ वा॒ऽएतद्व्य॑चारिषुः शान्तिराप॒स्तद॒द्भिः शान्त्या॑ शमयन्ते ॥ १८॥ अथ॒ केशश्म॒श्रु व॑पते । स॒मारो॒प्याग्नी॒ऽउद॑व॒सायि॒व श्वो॒तेन॑ यज॑ते॒ न हि॒ तद॒वक॑ल्पते॒ यदु॑त्तरवे॒दाव॒ग्निहोत्रं॑ जुहु॒यात्तस्मा॑दु॒द्वस्य॑ति गृ॒हानिवा॑- निर्मि॒थ्याग्नी॑ पौर्णमा॒सेन॑ यजत॒ऽउत्स॑न्नय॒ज्ञ-इव॒ वा॒ऽएष॒ यच्चातुर्मा॒स्यान्यथैष॒ कॢप्तः॑ प्रति॑ष्ठितो य॒ज्ञो यत्पौ॑र्णमा॒सं तत्कॢप्ते॒नैवैतद्य॒ज्ञेना॒न्तः प्रति॑तिष्ठति॒ तस्मा॑दु॒द्वस्य॑- ति॒ ॥ १९॥ ब्राह्मणम् ॥ ३ [६.२.] ॥ ॥ अ॒क्षय्यं॑ꣳ ह॒ वै सु॒कृतं॒ चातुर्मास्यया॒जिनो॑ भवति । संवत्सरं॑ꣳ हि॒ त्रय॑ति॒ ते- मा॒स्यान्नाय्यं॒ भव॑ति॒ तं वै॒ त्रेधा॒ विभ॑ज्य॒ यज॑ति॒ त्रेधा॒ विभ॑ज्य॒ प्रजय॑ति॒ सर्वं॒ वै सं॑- वत्सरः॒ सर्वं॒ वा॒ऽअक्षय्य॑मे॒तेनो॒ हास्याक्षय्यं॑ꣳ सु॒कृतं॒ भवत्यृतू॒ꣳ हैव॒ तद्देवा॑ दे॒वान- प्येत्य॒न्नाद्यं॒ वै दे॒वाना॑मृ॒तेनो॒ हैवा॒स्यान्नाद्यं॑ꣳ सु॒कृतं॒ भवत्ये॒तन्नु॒ तद्यस्मा॑च्चातुर्मा॒- स्यैर्यज॑ते ॥ १॥ अथ॒ यस्मा॑च्छुनासी॒रीये॑ण॒ यजे॑त । या वै दे॒वाना॑ꣳ श्रीरासी॑त्साकमे॒धे- रीजा॒नानां॑ विजिग्या॒नानां॑ तहु॒नमथ॒ यः सं॑वत्स॒रस्य॑ प्र॒जित॑स्य॒ रस॒ आसी॑त्तत्सीरं॑ꣳ सा या हैव दे॒वाना॑ꣳ श्रीरासी॑त्साकमे॒धेरीजा॒नानां॑ विजिग्या॒नानां॒ य उ॑ च सं॑व- त्स॒रस्य॑ प्र॒जित॑स्य॒ रस॒ आसी॑त्तमे॒वैतदु॒भयं॑ प॒रिगृह्या॒त्मन्कु॑रुते॒ तस्मा॑च्छुनासी॒रीये॑ण य- ज॑ते ॥ २॥ तस्या॒वृत् । नोप॑किर॒त्युत्त॑रवे॒दिं न गृह्णा॑ति पृषदा॒ज्यं न म॑न्थ॒त्यग्निं॒ पञ्च॑ प्रया॒जा भव॑न्ति॒ त्रयो॑ऽनुया॒जा एकं॑ꣳ समिष्टयजुः ॥ ३॥ अथैतान्येव॒ पञ्च॑ ह॒- वीꣳषि॒ भव॑न्ति । ए॒तैर्वै ह॒विर्भिः॑ प्र॒जाप॑तिः प्र॒जा असृ॑जतै॒तैरू॒भय॑तो वरुणापा॒शा-

कां० २, अ० ६, ब्रा० २-३, कं० १७-१६ व १-४ शतपथब्राह्मण / ३१६ मिल जाय तो इस मन्त्र से उसमें बांध देता है—"एतत् ते रुद्रावसं तेन परो मूजवतोऽतीहि" (यजु० ३।६१)—"हे रुद्र! यह तेरा तोशा है। इसे लेकर तू मूजवत के उस पार जा।" तोशा लेकर ही लोग यात्रा को चलते हैं। इसलिए जहाँ जाना हो वहाँ तोशा लेकर विदा करता है। इस प्रसंग में उसकी यात्रा मूजवत के उधर है, इसलिए कहता है कि मूजवत के उधर। अब कहता है—"अवततधन्वा पिनाकावसः" (यजु० ३।६१)—"बिना खिंचे हुए धनुष और वज्र से युक्त ।" इससे तात्पर्य है 'हिंसा न करते हुए, कल्याण करते हुए जाओ।' अब कहता है— "कृत्तिवासा" (यजु० ३।६१) "चमड़ा पहने हुए।" इससे वह उसे सुला देता है। सोते हुए कोई किसी को हानि नहीं पहुँचा सकता। इसलिए कहा 'चमड़ा पहने हुए' ॥१७॥ अब वे दक्षिण की ओर फिरते हैं, बिना पीछे देखते हुए। लौटकर जल का स्पर्श करते हैं। अब तक रुद्र यज्ञ कर रहे थे। जल शान्ति है। इसलिए शान्तिरुपी जल से अपने को पवित्र करते हैं ॥१८॥ अब वह केश और दाढ़ी मुंडवाता है, और (उत्तर वेदी की) अग्नि लेता है, क्योंकि जगह बदलकर ही तो वह (पौर्णमास) यज्ञ कर सकता है। यह ठीक नहीं है कि उत्तर वेदी पर अग्निहोत्र करे, इसलिए वह जगह बदल लेता है। घर जाकर और अग्नियों का मन्थन करके वह पौर्णमास यज्ञ करता है। चातुर्मास्य यज्ञ अलग होते हैं, परन्तु पौर्णमास यज्ञ नियत और प्रतिष्ठित है। इसलिए वह उस नियत यज्ञ को करके अपने को प्रतिष्ठित करता है। इसलिए जगह बदल देता है ॥१९॥ अध्याय ६-ब्राह्मण ३ जो चातुर्मास्य यज्ञ करता है उसका पुण्य कभी नाश नहीं होता। वह संवत्सर को जीत लेता है, इसलिए वह नाश नहीं होता। वह इसके तीन भाग करके यज्ञ करता है। वह इसके तीन भाग करके जीतता है। 'संवत्सर' का अर्थ है 'सम्पूर्ण'। 'सम्पूर्ण' नाश नहीं होता। इसलिए उसका सुकृत भी अक्षय होता है। वह ऋतु हो जाता है और देवों को प्राप्त होता है। देवों में तो 'क्षय' है ही नहीं। इसलिए उसके लिए अक्षय सुकृत होता है। यही प्रयोजन है कि वह चातुर्मास्य यज्ञ करता है ॥१॥ अब शुनासीर यज्ञ क्यों करना चाहिए ? साकमेध करनेवाले और (वृत्र पर) विजय पानेवाले देवों की जो 'श्री' थी वह है 'शुनम्' और प्राप्त हुए 'संवत्सर' का जो रस था वह है 'सीर'। साकमेध करनेवाले और (वृत्र पर) विजय पानेवाले देवों की जो 'श्री' थी और प्राप्त हुए संवत्सर का जो 'रस' था, उन दोनों को ग्रहण करके अपना बना लेता है, इसलिए 'शुनासीर यज्ञ' करता है ॥२॥ इसकी यह विधि है - उत्तरवेदी नहीं बनाते। नौनी घी नहीं लेते। अग्नि का मन्थन नहीं करते। पाँच प्रयाज होते हैं, तीन अनुयाज और एक समिष्ट यजुः ॥३॥ पहले ये साधारण पाँच हवियाँ होती हैं। इन्हीं हवियों से प्रजापति ने प्रजा उत्पन्न की।

३२० शतपथ ब्राह्मण त्त्र॒ताः प्रामु॒खदन्तैरे॒वै देवा॒ वृत्रम॒घ्नन्ने॒तैरै॒व व्य॒जयन् येये॑मे॒षां वि॒त्रित्ति॒स्तां तयोऽहृ॒- वेष॒ तेषां चैव दे॒वाना॒ꣳ श्रीरासी॑त्साकमे॒धैरी॑जानानां॒ विजि॑ग्यानानां॒ य उ॑ च सं॒- वत्सर॑स्य प्र॒जितस्य॒ रस॒ आसी॒त्तमे॒वैतदु॒भयं॒ परि॒गृह्या॒त्मन्कु॑रुते॒ तस्मा॒द्वा ए॒तानि॑ पञ्च॒ ह॒वीꣳ॑षि भवन्ति ॥४॥ अथ शुनासी॒रीयो॑ द्वादशकपालः पुरो॒डाशो॑ भवति । स बन्धु॑: शुनासी॒र्य॑स्य॒ यं पूर्व॑मवोचाम ॥५॥ अथ वाय॒व्यं॑ पयो॑ भवति । पयो॒ ह वै प्र॒जा जाता॒ अभि॒संज्ञा॑नते विजिग्या॒नं मा॒ प्रजा॑: श्रिये॒ यश॑सेऽन्ना॒द्याया॒भिसंज्ञा॑- न