शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)
Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda
महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 327, कुल 699 में से
संदर्भ में पढ़ेंकां० २, अ० ६, ब्रा० १, कं० २७-३३ शतपथब्राह्मण / ३०६ अब घी को फैलाता है। वह पुरोडाश में से टुकड़ा काटता है, और साथ ही धान और मन्थ। ये सब एक ही साथ (जुहू में) रख देता है। दो बार घी छोड़ता है और टुकड़ों को फिर चुपड़ता है। वह दक्षिण को जाता नहीं, किन्तु उठकर और श्रौषट् कहकर कहता है—‘पितॄन् सोमवतो यज।’ और वषट्कार के पश्चात् आहुति दे देता है ॥२७॥ अब कहता है—'बर्हिषद् पितरों को बुलाओ।' अब घी को फैलाता है और धानों में से एक टुकड़ा लेकर मन्थ तथा पुरोडाश के साथ एक ही बार जुहू में रख देता है। दो बार घी छोड़ता है और उन टुकड़ों को चुपड़ता है। वह जाता नहीं, किन्तु उठकर और ‘श्रौषट्' कह- कर कहता है—‘बर्हिषद् पितरों के लिए हवि दो', और वषट्कार के पश्चात् आहुति दे देता है ॥२८॥ अब कहता है—'अग्निष्वात्ता पितरों को बुलाओ।' घी को फैलाता है। मन्थ में से एक टुकड़ा काटता है और धान और पुरोडाश के साथ एक ही बार में (जुहू में) रख देता है। दो बार ऊपर से घी छोड़ता है, फिर उन टुकड़ों को चुपड़ता है। वह चलता नहीं, किन्तु उठकर 'श्रौषट्' कहकर कहता है—'अग्निष्वात्ता पितरों के लिए आहुति दो।' फिर वषट्कार के पश्चात् आहुति दे देता है ॥२६॥ अब कहता है—'कव्यवाहन अग्नि को बुलाओ।' यह स्विष्टकृत अग्नि के लिए कहा। वह देवों के लिए हव्यवाहन है और पितरों के लिए कव्यवाहन; इसलिए 'कव्यवाहन अग्नि के लिए' ऐसा कहा ॥३०॥ अब वह घी को फैलाता है। पुरोडाश में से टुकड़ा काटता है, धान और मन्थ के साथ (जुहू में) रख देता है। दो बार घी छोड़ता है और टुकड़ों को चुपड़ता नहीं, न चलता है, किन्तु उठकर और श्रौषट् कहकर कहता है—‘कव्यवाहन अग्नि के लिए आहुति दो' और वषट्- कार के पश्चात् आहुति दे देता है ॥३१॥ वह चलता क्यों नहीं और उठकर ही आहुति क्यों दे देता है ? इसका कारण यह है कि पितर लोग एक बार ही परलोक को चले गये। और हवियों में से एक ही टुकड़ा क्यों काटता है ? इसलिए कि पितर एक ही बार परलोक को चले गये। और टुकड़ों को काटकर एक साथ क्यों रखता है ? इसलिए कि ऋतुएँ ही पितर हैं। इस प्रकार वह ऋतुओं को मिलाकर रखता है, ऋतुओं में सन्धि करता है। इसलिए इन टुकड़ों को एक-साथ रखता है ॥३२॥ कुछ लोग सब मन्थ को होता को दे देते हैं। होता उसका आवाहन करके सूंघता है, और ब्रह्मा को दे देता है। उसे ब्रह्मा सूंघता है और आग्नीध्र को देता है। आग्नीध्र भी उसे सूंघता है। वे ऐसा करते हैं। दूसरे यज्ञों में इडा को काटते हैं। इसमें भी काटना चाहिए। (इड का)