शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)
Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda
महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 393, कुल 699 में से
संदर्भ में पढ़ेंका० ३, अ० ३, ब्रा० १, कं० २-१२ शतपथब्राह्मण / ३७५ कथन का तात्पर्य है कि 'बृहस्पति अच्छे काम के द्वारा तुझे यहाँ तक लौटा लेवे।' “रुद्रो वसुभि- राचके” (यजु० ४।२१) - "रुद्र वसुओं के सहित तुझसे प्रसन्न हैं।" इस कथन से यह तात्पर्य निकलता है कि 'वह गाय बिना किसी हानि के लौट आवे' क्योंकि पशु रुद्र के आगे नहीं जा सकते ॥२॥ वे सातवें पद में बैठ जाते हैं। और पद-चिह्न पर सोना रखकर वह आहुति देता है। आहुति अग्नि के सिवाय इतर स्थान में तो हो नहीं सकती। स्वर्ण अग्नि के वीर्य से उत्पन्न हुआ है, इसलिए ऐसा करने से मानो वह अग्नि में ही आहुति देता है। घी वज्र है। इस वज्ररूपी घी के द्वारा वह उसकी रक्षा करता है और रक्षा करके उसको स्वीकार करता है ॥३॥ वह इस मन्त्र से आहुति देता है- "अदित्यास्त्वा मूर्धन्नाजिघर्मि" (यजु० ४।२२) - "मैं तुझको अदिति के सिर पर रखता हूँ।" यह पृथिवी अदिति है। उसी के सिर पर आहुति देता है। “देवयजने पृथिव्याः" (यजु० ४।२२) - "पृथिवी के यज्ञ-स्थल पर आहुति देता है।" "इडाया- स्पदमसि घृतवत् स्वाहा" (यजु० ४।२२) - "तू घृत-युक्त इडा का पद है।" गौ ही 'इडा' है। गौ के पद पर आहुति देता है। 'घृत-युक्त' यों कहा कि जब आहुति देता है तो वह घी से भर जाता है ॥४॥ अब स्फ्या से चारों ओर लकीर देता है। स्फ्या वज्र है, इसलिए वज्र से लकीर करता है। तीन लकीरें करता है, जिससे तिहरे वज्र से घिर जाय और कोई उसको लाँघ न सके ॥५॥ वह लकीर खींचने के समय यह मन्त्र पढ़ता है- "अस्मे रमस्व” (यजु० ४।२२) - "हम में रम” अर्थात् 'यजमान में रम।' अब वह पद के चिह्न को (स्फ्या से खुरचकर) थाली में रख देता है। “अस्मे ते बन्धुः" (यजु० ४।२२) - "हम में तेरा सम्बन्ध है।" अर्थात् 'यजमान में' ॥६॥ अब (उस स्थान पर) पानी छिड़कता है। जहाँ कहीं खोदते या खुरचते हैं वहाँ घाव हो जाता है। जल शान्ति देता है। जल से शान्त करता है। इसलिए जल को छिड़कता है ॥७॥ अब पैर (की रेणु) को यजमान को देता है। “त्वे रायः" (यजु० ४।२२) -- "तुझको धन मिले।" पशु ही धन हैं। इससे तात्पर्य है कि तुझे पशु मिलें। यजमान यह कहकर लेता है- "मे रायः” (यजु० ४।२२) - "मेरे लिए धन हो।" पशु ही धन हैं। इससे तात्पर्य है कि मुझे पशु मिलें ॥८॥ अब अध्वर्यु इस मन्त्रांश को पढ़कर अपने (सीने) को छूता है- "मा वय्॒ रायस्पोषेण वियौष्म" (यजु० ४।२२) - "हम धन से रहित न हों।" इस प्रकार अध्वर्यु अपने को भी पशुओं से अलग नहीं करता ॥६॥ अब वे पद-रेणु को यजमान की पत्नी को दे देते हैं। पत्नी की प्रतिष्ठा घर है। इस प्रकार उसको घर में स्थापित कर देते हैं। इसीलिए पद-धूलि को यजमान की पत्नी को दे देते हैं ॥१०॥ नेष्टा उससे कहता है- “तो तो रायः” (यजु० ४।२२) -- "यह धन तेरा है, तेरा है।" इस प्रकार वह सोम-गौ को उसे दिखाता है ॥११॥ इसको दिखाने में यह मन्त्र पढ़ता है- "समख्ये देव्या धिया सं दक्षिणयोरुचक्षसा । मा