भारतकोश
शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished699 पृष्ठ

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कां० ३, अ० ३, ब्रा० १-२, कं० १२-१६ व १-४ शतपथब्राह्मण / ३७७ मऽआयुः प्रमोषीर्माऽअहं तव वीरं विदेय तव देवि संदृशि" (यजु० ४।२३) - "दिव्य बुद्धि से मैंने तुझको देखा। दीर्घ दृष्टिवाली आँख से मैंने तुझको देखा। तू मेरा जीवन न ले और न मैं तेरा जीवन लूं। हे देवी, तेरे दर्शन करके मैं पुत्र को प्राप्त होऊँ।" इस प्रकार पत्नी आशीर्वाद मांगती है। वीर का अर्थ है पुत्र, अर्थात् वह कहती है कि मैं तेरे दर्शन पाकर पुत्र को प्राप्त होऊँ ॥१२॥ सोम-गौ भूरी होती है और उसकी आँखें पिंगल होती हैं। जब इन्द्र और विष्णु ने एक हजार गायों को तीन भागों में विभक्त किया तो एक रह गई। उससे उन्होंने तीन प्रकार सन्तान जनाई। इसलिए आज भी अगर एक हजार को तीन में बाँटें तो एक बच रहता है ॥१३॥ जो भूरी और पिङ्गल आँखोंवाली है वह सोम-गौ है। जो रोहिणी है वह वृत्र को मारने- वाली है जिसको राजा संग्राम में विजय प्राप्त करके लेता है। जो लाल और सफेद आँखोंवाली है वह पितरों की है और पितरों के लिए मारी जाती है (घ्नन्ति) ॥१४॥ [शतम् १६००] जो भूरी और भूरी आंखवाली हो वही सोम-गौ हो। यदि भूरी और भूरी आंखवाली न मिले तो अरुण हो। यदि अरुण न मिले तो वृत्र को मारनेवाली रोहिणी हो। लेकिन लाल और श्वेत नेत्रवाली कभी न हो ॥१५॥ वह गर्भिणी न हो। क्योंकि जो सोम-गौ है वह वास्तव में वाणी है। यह जो वाणी है वह पूर्ण बलवाली है। पूर्ण बलवाली वही होती है जो गर्भिणी न हो। यह सोम-गौ गर्भिणी न हो। ऐसी हो जो पूंछ-रहित न हो, बिना सींगों की न हो। कानी न हो। न बिना कान की हो, न विशेष चिह्नवाली हो, न सात खुरवाली हो। यह एकरूपा है। वाणी भी एकरूपा है ॥१६॥ अध्याय ३-ब्राह्मण २ पद-धूलि को फेंककर हाथ धोता है। वह हाथ क्यों धोता है ? घी वज्र है। सोम वीर्य है। वह हाथ इसलिए धोता है कि वीर्य-सोम को वज्र-घी से कोई हानि न पहुंचे ॥१॥ इस (अनामिका अँगुली) में सोना बाँधता है। संसार में दो ही होते हैं सत्य और अनृत, तीसरा नहीं। देव सत्य हैं, मनुष्य अनृत है। अँगुली में सोना इसलिए बाँधता है कि अग्नि के वीर्य से सोना उत्पन्न हुआ है। मैं सत्य से सोम की डाली को छुऊँ, अर्थात् सत्य के द्वारा मैं सोम को खरीदूँ ॥२॥ अब वह आदेश देता है कि सोम-वस्त्र को लाओ, सोम का अँगोछा लाओ, सोम की पगड़ी लाओ। सोम-वस्त्र शोभन (सुन्दर) हो, क्योंकि यह सोम राजा का वस्त्र है। जो शोभन वस्तु से सोम की पूजा करता है वह स्वयं भी शोभन हो जाता है। और जो कहता है, 'अभी कैसा भी हो', वह कैसा भी हो जाता है। इसलिए सोम वस्त्र सुन्दर होना चाहिए। सोम का अँगोछा कैसा भी क्यों न हो ॥३॥ उष्णीष (पगड़ी) हो तो हो और न हो तो अँगोछे में से दो या तीन अंगुल फाड़ ले और