शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)
Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda
महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंकां० ३, अ० ३, ब्रा० २, क० ४-१३ शतपथब्राह्मण / ३७६ उसकी उष्णीष बना ले। सोम-वस्त्र को अध्वर्यु ले या यजमान। अंगोछा कोई और ले ले ॥४॥ अब सोम राजा को चुनते हैं। उसके निकट जल के घड़े को रखते हैं। और एक ब्राह्मण पास बैठता है। अब वे पूर्व की ओर जाते हैं ॥५॥ जाते हुए यह मन्त्र बोलते हैं—‘‘एष ते गायत्रो भागऽइति मे सोमाय ब्रूताद्, एष ते त्रैष्टुभो भागऽइति मे सोमाय ब्रूताद्, एष ते जागतो भागऽइति मे सोमाय ब्रूताच्छन्दोनामानाꣳ साम्राज्यं गच्छेति मे सोमाय ब्रूतात्’’ (यजु० ४।२४)—‘‘मेरे लिए सोम से कहो कि यह तुम्हारा गायत्र भाग है। मेरे लिए सोम से कहो कि यह तुम्हारा त्रैष्टुभ भाग है। मेरे लिए सोम से कहो कि यह तुम्हारा जगती का भाग है। मेरे लिए सोम से कहो कि छन्दों के साम्राज्य को प्राप्त करो।’’ सोम राजा को क्रय करते हैं तो एक उद्देश्य के लिए— छन्दों के राज्य के लिए, छन्दों के साम्राज्य के लिए। उसको निचोड़ते हैं तो मानो उसको मारते हैं। इसीलिए कहते हैं कि तुझे छन्दों के राज्य के लिए और छन्दों के साम्राज्य के लिए मोल लेते हैं, मारने के लिए नहीं। अब चलकर वह (सोम के) पूर्व में बैठता है ॥६॥ इस मन्त्र को पढ़कर (सोम के पौधे को) छूता है—‘‘अस्माकोऽसि’’ (यजु० ४।२४)— ‘‘तू हमारा है।’’ जब सोम आ गया तो वह अपना ही हो गया। इसलिए कहते हैं कि तू हमारा है। ‘‘शुक्रस्ते ग्रह’’ (यजु० ४।२४)—‘‘तेरा शुक्र(रस) ग्रहण के योग्य है’’ क्योंकि वह उसको ग्रहण करेगा ही। ‘‘विचितस्त्वा विचिन्वन्तु’’ (यजु० ४।२४)—‘‘चुननेवाले तुझे चुनें।’’ वह सम्पूर्णता के लिए ऐसा कहता है ॥७॥ कुछ लोग (सोम के साथ) तृण या काष्ठ को देखकर उसे फेंक देते हैं। परन्तु ऐसा नहीं करना चाहिए। सोम राजा है और अन्य वृक्षादि प्रजा। प्रजा राजा का अन्न है, इसलिए (इसको फेंक देना ऐसा ही होगा) जैसा किसी के मुँह में रखे हुए अन्न को निकालकर फेंक देना। इसलिए केवल उसको छूकर कहे कि ‘चुननेवालो, इसको चुन लो।’ चुननेवाले उसको चुन लेंगे ॥८॥ अब वह कपड़े को दुल्लर या चौलर करके बिछाता है इस प्रकार कि झालर पूर्व या उत्तर की ओर रहे। उस पर सोम राजा को तोलता (मापता, मिमीते) है। चूंकि उससे सोम राजा को तोलता है इसलिए उसको मात्रा कहते हैं—चाहे वह मनुष्यों में प्रचलित मात्रा हो या अन्य कुछ ॥६॥ वह सावित्री मन्त्र पढ़कर तोलता है। सविता सब देवों का प्रेरक है। ऐसा करने से मानो सोम-क्रय सविता की प्रेरणा से होता है ॥१०॥ अतिछन्द पढ़कर तोलता है। अतिछन्द में सब छन्द आ जाते हैं। अतिछन्द से इसलिए तोलता है कि वह सब छन्दों से तुला होने के बराबर हो जाता है ॥११॥ वह इस मन्त्र को पढ़कर तोलता है—‘‘अभि त्यं देवँ॒ सवितारमोण्योः कविक्रतुमर्चामि सत्यसवँ॒ रत्नधामभि प्रियं मतिं कविम्। ऊर्ध्वा यस्यामतिर्भाऽअदियुतत् सवीमनि हिरण्य- पाणिरमिमीत सुक्रतुः कृपा स्वः’’ (यजु० ४।२५)—‘‘मैं उस द्यावापृथिवी के प्रेरक, कवि, ऋतु, सत्यसव, रत्नधा, प्रिय, बुद्धिमान्, कवि की पूजा करता हूँ, जिसकी न नापी जानेवाली ज्योति ऊपर चमकती है और जिस प्रकाश-युक्त किरणोंवाले यज्ञ-साधक ने संसार में शक्ति की प्रेरणा की है’’ ॥१२॥ इसी मन्त्र को पढ़कर वह सोम को लेता है सब अँगुलियों से, फिर चार से, फिर तीन