भारतकोश
शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished699 पृष्ठ

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कां० ३, अ० ३, ब्रा० ३, कं० ३-१० शतपथब्राह्मण / ३८३ 'सोम राजा इससे कहीं अधिक कीमती है।' अध्वर्यु कहता है, 'सोम राजा अवश्य कीमती है परन्तु गाय की महिमा भी तो अधिक है।' इस प्रकार दश गुण वर्णन करके अध्वर्यु कहता जाता है कि 'एक पद के बदले खरीदूँगा, आधी गाय के बदले, पूरी गाय के बदले।' यहाँ तक कि सोम बेचनेवाला कह उठता है, 'बस सोम राजा खरीदा जा चुका। क्या-क्या दोगे, यह बताओ' (वयांसि प्रब्रूहि) ॥३॥ अध्वर्यु कहता है, 'चन्द्र (सोना ?) तुम्हारा हुआ, वस्त्र तुम्हारा हुआ, बकरी तुम्हारी हुई, गाय तुम्हारी हुई, एक बैल का जोड़ा तुम्हारा हुआ। तीन और गायें तुम्हारी हुईं।' पहले वे मोल करते हैं और फिर मोल का निश्चय होता है। इसीलिए हर एक बिक्री की चीज में पहले मोल किया जाता है, फिर निश्चय करते हैं। केवल अध्वर्यु ही गाय के गुण क्यों कहता है ? सोमवाला सोम के गुण क्यों नहीं कहता ? इसका कारण यह है कि सोम देवता है, उसकी महिमा तो प्रख्यात है। इसलिए अध्वर्यु गाय के गुण कहता है, सोमवाला सोम के नहीं। सोम- वाला गाय के गुण सुनकर उसको ले लेगा। इसीलिए अध्वर्यु गाय के गुण गाता है, सोमवाला सोम के गुण नहीं कहता ॥४॥ पाँच बार क्यों मोल करता है ? यज्ञ संवत्सर के तुल्य है। संवत्सर में पाँच ऋतु होते हैं। पाँच बार मोल करने से इसको भी पाँच अंगवाला बना देता है ॥५॥ अब वह यजमान से स्वर्ण के लिए कहलवाता है- "शुक्रं त्वा शुक्रेण क्रीणामि" (यजु० ४।२६) - "तुझ शुद्ध को शुद्ध के बदले खरीदता हूँ।" वस्तुतः जब वह स्वर्ण के बदले सोम को लेता है तो शुद्ध के बदले ही शुद्ध को खरीदता है। "चन्द्रं चन्द्रेण" (यजु० ४।२६) - "चन्द्र को चन्द्र के बदले।" सोम को स्वर्ण के बदले लेना मानो चमकी ली चीज के बदले लेना है। "अमृतं अमृतेन" (यजु० ४।२६) - "अमृत को अमृत के बदले।" सोम को स्वर्ण के बदले खरीदना मानो अमृत को अमृत के बदले खरीदना ही है ॥६॥ अब सोमवाले को धमकाता है, "सग्मे ते गोः" (यजु० ४।२६) - "गायवाले अर्थात् यजमान के साथ तेरी गाय हो।" अब (स्वर्ण को) यजमान की ओर लाकर फेंक देता है- "अस्मे ते चन्द्राणि" (यजु० ४।२६) - "ये चमकीले सोने के टुकड़े हमारे हों।" इससे यजमान वीर्य (शक्ति) धारण करता है। और सोम-विक्रेता के पास केवल शरीर रह जाता है। इसके पीछे सोम-विक्रेता उस सोने को ले लेता है ॥७॥ पश्चिमाभिमुखी बकरी के प्रति यजमान से कहलवाता है- "तपस्तनूरसि" (यजु० ४।२६) - "तू तप का शरीर है।" यह जो बकरी है वह प्रजापति के तप से उत्पन्न हुई। इसी- लिए कहता है कि 'तू तपःका शरीर है।' अब कहता है- "प्रजापतेर्वर्णः" (यजु० ४।२६) - "प्रजापति का वर्ण है।" चूंकि वर्ष में तीन बार जनती है, इसलिए प्रजापति के समान हुई। "परमेण पशुना क्रीयसे" (यजु० ४।२६) - "तूपरम पशु के बदले खरीदा गया।" बकरी तीन बार वर्ष में जनती है, इसलिए परम पशु है। "सहस्रपोषं पुषेयम्" (यजु० ४।२६) - "मैं सहस्रों वस्तुओं से पुष्ट हो जाऊँ।" यह आशीर्वाद है। सहस्र का अर्थ है भूमा या बहुत। तात्पर्य यह है कि मुझे बहुत-सी चीजें मिल जायें ॥८॥ इस (बायें हाथ) से बकरी को देता है और इस (दाहिने हाथ) से सोम को लेता है। यह जो 'अजा' है वह 'आजा'। इसी बकरी के द्वारा वह अन्त में सोम को ले जाता है (आजाति) इसलिए उसका परोक्ष नाम 'आजा' या 'अजा' हुआ ॥६॥ इस मन्त्र को पढ़कर सोम राजा को लेता है, "मित्रो नऽएहि सुमित्रधः" (यजु० ४।२७) - "तू मित्र बनकर हमारे पास आ, अच्छे मित्रों का देनेवाला।" इसका अर्थ यह हुआ कि तू कल्याण- कारी है, हमारे लिए कल्याण कर। उसको यजमान की दाहिनी जाँघ पर रखकर वस्त्र से ढाँपकर