भारतकोश
शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished699 पृष्ठ

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पृष्ठ 403

कां० ३, अ० ३, ब्रा० ३, कं० १०-१७ शतपथब्राह्मण / ३८५ कहता है, “इन्द्रस्योरुमाविश दक्षिणम्” (यजु० ४।२७)—“इन्द्र की दाहिनी जंघा पर बैठ।” यहाँ यजमान इन्द्र है। इसलिए कहता है कि इन्द्र की जांघ पर बैठ। “उशन्नुशन्तम्” (यजु० ४।२७) —“प्यारा प्यारे के पास।” ’स्योनःस्योनम्” (यजु० ४२७)—“कोमल कोमल के पास।” अर्थात् कल्याणकारक कल्याणकारक के पास ॥१०॥ अब सोम के मोल को सुपुर्द करता है यह कहकर कि—‘हे स्वान, हे भ्राज, हे अंघारि, हे बंभारि, हे हस्त, हे सुहस्त, हे कृशानु, ये-ये चीजें तुम्हारे सोम का मोल हैं। इनकी रक्षा करो। ये तुमको प्रतिकूल सिद्ध न हों (यजु० ४।२७)। स्वान—उपदेश देनेवाला। भ्राज— चमकनेवाला। अंघारि—अघ अर्थात् पाप का शत्रु। बंभारि—विश्व का धारण करनेवाला। हस्त—जिसके द्वारा हँसते या प्रसन्न होते हैं वह। सुहस्त—जिसके द्वारा हाथ की क्रियाएं ठीक होती हैं। कृशानु—जो कृश अर्थात् दुर्बलों को जिलाता है (कृशं अनीति इति) या जो दुष्टों को दुबला करता है (दुष्टान् कृशति इति)। ये सात नाम धिष्ण्या अर्थात् यज्ञ की वेदी के हैं, और इसलिए वेदी के अधिष्ठाताओं के भी ये नाम हैं। अतः इन्हीं के लिए ये अनुदेश हैं ॥११॥ अब वह अपने सिर को खोलता है। जो दीक्षा लेता है वह गर्भ के तुल्य होता है। गर्भ उल्ब और जरायु से लिपटा होता है। उसी गर्भ का अब जन्म हुआ। इसलिए वह सिर को खोल लेता है। अब वह सोम गर्भ का रूप धारण करता है, इसलिए ढका हुआ होता है, क्योंकि गर्भ उल्ब और जरायु से ढका होता है ॥१२॥ अब वह इस वेदमन्त्र को पढ़वाता है—‘‘परि माग्ने दुश्चरिताद् बाधस्वा मा सुचरिते भज” (यजु० ४।२८)—‘हे अग्नि ! तू मुझे दुश्चरित से हटा और अच्छे चरित में ले जा।” जब सोम राजा आया था तब वह यजमान बैठा था। उसके आने पर वह यजमान खड़ा हो जाता है। यही मिथ्या आचरण है। इससे व्रत भंग होता है (क्योंकि उसने व्रत किया था कि सोमरस निकालने तक गर्भ की अवस्था में ही बैठा रहूँगा)। यह मन्त्र पढ़ना मानो इस दोष का प्रायश्चित्त है। इस पाठ से मिथ्या आचरण नहीं होता और न व्रत भंग होता है, इसलिए ‘परि माग्ने’ मन्त्र का पाठ किया जाता है ॥१३॥ अब सोम राजा को लेकर उठता है यह मंत्रांश पढ़कर—“उदायुषा स्वायुषोदस्था- ममृताँ २ ऽ अनु’ (यजु० ४।२८)—“उत्कृष्ट और अच्छी आयु के द्वारा मैं अमृृतों का अनुसरण करके उठूं (उन्नत होऊँ)।” वस्तुतः वह मोल लिये हुए सोम के पीछे उठता है, मानो अमृत के पीछे उठता है। इसलिए इस ‘उदायुषा’ मन्त्र का पाठ करता है ॥१४॥ अब सोम राजा की लेकर गाड़ी तक आता है इस मन्त्र को पढ़कर—“प्रति पन्थामपद्महि स्वस्तिगामनेहसम्। येन विश्वाः परि द्विषो वृणक्ति विन्दते वसु” (यजु० ४।२६)—“हमने कल्याणकारक और पाप-रहित मार्ग का अवलम्बन किया है जिससे मनुष्य सब बुराइयों (शत्रुओं) को छोड़ता और धन को प्राप्त करता है” ॥१५॥ एक बार देवों ने यज्ञ ताना। वे असुर राक्षसों के आक्रमण से भयभीत हुए। तब उन्होंने इस यजुः (प्रार्थना) को कल्याण-गृह के रूप में देखा और इस यजुः के द्वारा राक्षस दुष्टों को मारकर इस यजुः के अभय और क्लेशरहित घर में शान्ति प्राप्त की। इसी प्रकार इस यजुः की सहायता से दुष्ट राक्षसों को मारकर इस यजुः के अभय और क्लेशरहित घर में शान्ति प्राप्त करता है। इसीलिए ‘प्रति पन्थाम्’ मंत्र का पाठ करता है ॥१६॥ इस सोम को पहले इस प्रकार (हाथ में सिर पर रखकर) ले जाते हैं और फिर गाड़ी में ले जाते हैं। इससे वे उसकी महत्ता बढ़ाते हैं। इसलिए वे बीज को सिर पर रखकर (खेत में) ले जाते हैं ॥१७॥