भारतकोश
शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished699 पृष्ठ

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कां० ३, अ० ३, ब्रा० ४, कं० ७-१४ शतपथब्राह्मण / ३८६ गायों में तो दूध होता ही है। [मेरी धारणा है कि पुमान् का अर्थ है 'नर' और 'उस्रियासु' का मादा। नरों में वीर्य होता है और नारियों में दूध'] । "हृत्सु क्रतुं वरुणो विश्व॑म॒ग्निम्" (यजु० ४।३१)-"मनों में बुद्धि और घरों में अग्नि वरुण ने (स्थापित की) ।" मनों में बुद्धि स्थापित है ही और घरों में या प्रजाओं में अग्नि । "दिवि सूर्य॑मदधात्स सोममद्रौ" (यजु० ४।३१) - "सूर्य को द्युलोक में स्थापित किया और सोम को पहाड़ पर" [यहाँ सोम का अर्थ 'चन्द्र' ठीक नहीं है। सोमलता ही पहाड़ पर होती है और द्यौलोक का सूर्य उसको प्रभावित करता है ? ] द्यौलोक में सूर्य है ही और सोम पहाड़ों में होता ही है। इसलिए कहा 'दिवि सूर्य' इत्यादि ॥७॥ यदि दो मृगचर्म हों तो उनमें से एक को ध्वजा बनाकर लटकाता है। यदि एक हो तो गर्दन के ऊपर से काटकर ध्वजा के रूप में लटकाता है। यह मन्त्र पढ़कर - "सूर्य॑स्य चक्षुरारोहा- ऽग्नेरक्षणः कनीनकम् । यत्रैतशेभिरीयसे भ्राज॑मानो विपश्चिता" (यजु० ४।३२) - "हे मृगचर्म, तू सूर्य की आँख के ऊपर चढ़ और अग्नि की आँख के तारे के ऊपर चढ़। जहाँ सूर्य और अग्नि के साथ चमकता हुआ तू चढ़ता है।" इस प्रकार वह सूर्य को आगे करता है। सूर्य के सामने दुष्ट राक्षस नहीं आने पाते। अब वे सोम को निर्विघ्न गाड़ी में ले जाते हैं ॥८॥ गाड़ी को बल्लियों के आगे के भाग में प्रउग या त्रिभुजाकार दो तख्ते होते हैं। उन दोनों के बीच में सुब्रह्मण्य (उद्गाता का सहायक) खड़ा होकर गाड़ी को चलाता है। सोम राजा उससे बहुत ऊँचा होता है। ऐसा कौन है जो सोम राजा के बराबर बैठ सके ? इसलिए वह खड़ा होकर गाड़ी को चलाता है ॥६॥ पलाश की शाखा से हाँकता है। जब गायत्री सोम की ओर उड़ी और उसको लिये जा रही थी तो एक बिना पैर के मनुष्य ने निशाना लगाकर गायत्री का या सोम राजा का एक पर गिरा दिया। वह गिरकर पर्ण हो गया। इसीलिए उसे पर्ण कहते हैं। वह सोचता है कि जो बात उस सोम के साथ हुई वह यहाँ भी हो। इसलिए वह पलाश से हाँकता है ॥१०॥ दो बैल जुतते हैं। यदि दोनों काले हों या एक काला हो तो जानना चाहिए कि वर्षा बहुत अच्छी होगी। यही विज्ञान है ॥११॥ बैलों को जोतता है यह मन्त्र पढ़कर - "उस्त्रावेतं धूर्षाहौ" (यजु० ४।३३)-"हे धुरे को सहन करनेवाले दो बैलो, तुम आओ।" क्योंकि ये दो बैल हैं और धुरे को सह सकते हैं। "युज्येथामनश्रू" (यजु० ४।३३)-"आँसूरहित तुम जुतो।" 'आँसूरहित' का अर्थ हैदुःख-रहित' । "अवीरहणौ" (यजु० ४।३३)- "पापरहित।" "ब्रह्मचोदनौ" (यजु० ४।३३)- "ब्रह्म के प्रेरक ।" "स्वस्ति यजमानस्य गृहान्गच्छतम्" (यजु० ४।३३)-"यजमान के घर में कल्याणकारक होकर आओ।" इसके कहने का प्रयोजन यह है कि मार्ग में दुष्ट राक्षस उसको न सतावें ॥१२॥ मुड़कर गाड़ी के पीछे जाता है और अपालम्ब (गाड़ी के पीछे एक लकड़ी का टुकड़ा लगा रहता है जिसे अपालम्ब कहते हैं) को पकड़कर (होता से) कहता है, 'खरीदे हुए सोम के लिए पढ़ो' या 'गाड़ी में लाये हुए सोम के लिए पढ़ो' इन दोनों वाक्यों में से जिस वाक्य को चाहे कहे ॥१३॥ अब वह मन्त्र पढ़वाता है - "भद्रो मेऽसि प्रच्यवस्व भुवस्पते" (यजु० ४।३४)-'हे संसार के पति ! तू मेरे लिए कल्याणकारी है, चल।" सोम वस्तुतः उसके लिए कल्याणकारी है। अतः वह सोम के सिवाय और किसी का आदर नहीं करता। जिस प्रकार महाराजा के आधीन राजा