शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)
Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda
महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 439, कुल 699 में से
संदर्भ में पढ़ेंकां० ३, अ० ५, ब्रा० १, कं० ३०-३६ शतपथब्राह्मण / ४२१ “अवतान् मा व्यथि॒तात्” (यजु० ५।६) – “मुझे व्यथा से बचा ।” इससे भी भूमि से तात्पर्य है अर्थात् 'जहाँ कहीं व्यथा हो वहाँ से बचा' ॥३०॥ अब वह स्फ्या को फेंकता है। जहाँ स्फ्या को फेंकता है वहाँ आग्नीध्र बैठता है। जब वह फेंकता है तो अग्नियों के नाम लेता जाता है। देवों ने जिन अग्नियों को पहले होत्र के लिए चुना था वे चली गईं और पृथिवी में घुस गईं-एक इस पृथिवी में और दो उनमें जो इससे परे हैं। वह उस अग्नि के साथ फेंकता है जो इस (पृथिवी) में घुसी थी ॥३१॥ वह इस मन्त्र को पढ़कर फेंकता है- “वि॒देद॒ग्निर्नभो॒ नामाग्नेऽअ॒ङ्गिर॒ऽआयु॑ना नाम्ना एहि” (यजु० ५।६) – “नभ नामवाली अग्नि तुझे जाने, हे अङ्गिरा अग्नि, आयु नाम के साथ जा ।” जिस आयु से वे गुजर गये उस आयु को दिलाता है। फिर प्राणों से सम्पन्न करता है। नीचे लिखे मन्त्रांश से मिट्टी उठाता है - “योऽस्यां पृथिव्यामसि” (यजु० ५।६) – और नीचे के मन्त्रांश से उस मिट्टी को उत्तर वेदी में रखता है - “यत्ते॒ऽनाधृ॑ष्टं नाम॑ य॒ज्ञियं॒ तेन॑ त्वा दधे” (यजु० ५।६) – “जो तेरा आदर का नाम हो उससे तुझको रखता हूँ ।” इससे उसका तात्पर्य यह है कि मैं तुझको उस नाम से रखता हूँ जिसे राक्षसों ने अपमानित नहीं किया। इस मन्त्रांश से चौथी बार लेता है—"अनु॑ त्वा दे॒ववी॑तये” (यजु० ५।६) – “देवों की प्रसन्नता के लिए तुझको ।” इससे तात्पर्य है कि तुझसे देव प्रसन्न हैं। इसको वह चौकोर चत्वाल से लेता है। चार दिशाएँ हैं। अर्थात् वह चारों दिशाओं से लेता है ॥३२॥ अब वह मिट्टी को इस मन्त्रांश से अलग करता है - “सिँ॒ह्यसि सपत्नसाही देवेभ्यः कल्पस्व” (यजु० ५।१०) – “तू सिंहिनी है। शत्रुओं पर विजयिनी। देवों के योग्य बन ।” चूंकि वह पहले सिंहिनी बन गई और अशान्त विचरती रही, इसलिए वह उसको कहता है, 'तू सिंहिनी है।' 'शत्रुओं पर विजयिनी' से तात्पर्य है कि 'तेरे द्वारा हम अपने शत्रुओं पर विजय पावें।' 'देवों के योग्य बन' अर्थात् उत्तर वेदी स्त्री है, उसको देवों के योग्य बनाता है ॥३३॥ वे इसको चारों ओर से या तो 'युग' के बराबर बनाता है या यजमान के दस-दस पद के बराबर । विराट् छन्द दश अक्षर का होता है। विराट् वाणी है और वाणी यज्ञ है। बीच में नाभि के समान है कि एक ही स्थान पर बैठा-बैठा आहुति दे सकूँ ॥३४॥ वह इसे जल से सींचता है। चूंकि वह सिंहिनी होकर अशान्त विचरती रही, अतः जल शान्ति है, इसलिए वह उसको जल से शान्त करता है। उत्तर वेदी स्त्री है। वह इसको देवों के योग्य बनाता है, इसलिए वह उसको जल से सींचता है ॥३५॥ वह यह मन्त्रांश पढ़कर जल सिंचन करता है— “सिँ॒ह्यसि सपत्नसाही देवेभ्यः शुन्धस्व” (यजु० ५।१०) – “तू सिंहिनी है, शत्रुओं पर विजयिनी, देवों के लिए पवित्र बन ।” अब वह रेत डालता है। रेत अलंकार है क्योंकि रेत चमकता है। रेत अग्नि वैश्वानर की भस्म है। अब वह इस पर अग्नि रखेगा, इसलिए अग्नि उसको हानि नहीं पहुँचाता। इसलिए वह उस पर रेत डालता है। इस मन्त्रांश को पढ़कर - “सिँ॒ह्यसि सपत्नसाही देवेभ्यः शुम्भस्व” (यजु० ५।१०) “तू सिंहिनी है, शत्रुओं पर विजयिनी, देवों के लिए सज ।” अब वह उसे ढक देता है। वह रात- भर ढकी रहती है ॥३६॥