भारतकोश
शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished699 पृष्ठ

पृष्ठ 441, कुल 699 में से

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कां० ३, अ० ५, ब्रा० २, क० १-१० शतपथब्राह्मण / ४२३ अध्याय ५-ब्राह्मण २ वे (आहवनीय अग्नि पर) समिधाएँ रखते हैं। और उपयमनी (नीचे की तह जो बालू डालकर बनाई जाती है) बनाते हैं। (अध्वर्यु) [गार्हपत्य अग्नि पर] घी रखता है। स्रुवा और स्रुक् दोनों को माँजता है, और घी को छानकर उसमें से पाँच चम्मच (स्रुक् में) लेता है। जब अग्नि प्रज्वलित हो जाती है तो—॥१॥ जलती समिधा को उठाकर उपयमनी पर रखते हैं। अब वह (होता से) कहता है, 'अग्नि को लिये जाते हैं, इसके लिए स्तुति कर।' और (प्रतिप्रस्थाता से) कहता है कि 'एक स्फ्या को लेकर उसके पीछे-पीछे आ।' प्रतिप्रस्थाता एक स्फ्या को लेकर उसके पीछे-पीछे चलता है, वेदी के निचले भाग की बीच की कील तक। उस बीच की कील ने गार्हपत्य का जितना भाग वेदी से अलग कर दिया उसको जोड़ देता है ॥२॥ कुछ लोग उत्तर वेदी तक पीछे-पीछे जाने के पक्ष में हैं, परन्तु ऐसा न करना चाहिए, केवल मध्य की कील तक जाना चाहिए। वे आते हैं और उत्तर वेदी तक पहुँच जाते हैं॥३॥ [शतम् १८००] अध्वर्यु प्रोक्षणी ले लेता है। वह आगे उत्तर की वेदी को सींचता है, दक्षिण की ओर उत्तराभिमुख खड़ा होकर और यह मन्त्र बोलकर—"इन्द्रघोषस्त्वा वसुभिः पुरस्तात् पातु” (यजु० ५।११)—"इन्द्र का शोर वसुओं के साथ तेरी रक्षा करे।" यही उसका तात्पर्य है ॥४॥ अब वह पीछे की ओर जल सींचता है इस मन्त्र को पढ़कर—"प्रचेतास्त्वा रुद्रैः पश्चात्पातु" (यजु० ५।११)—"बुद्धिमान् लोग रुद्रों के साथ पीछे की ओर तेरी रक्षा करें।" इसका तात्पर्य यह है कि बुद्धिमान् लोग रुद्रों के साथ पीछे से तेरी रक्षा करें ॥५॥ अब दक्षिण की ओर जल-सिंचन करता है इस मन्त्र को पढ़कर—"मनोजवास्त्वा पितृ- भिर्दक्षिणतः पातु" (यजु० ५।११)—"तीव्र मनवाले पितरों के साथ दक्षिण की ओर तेरी रक्षा करें।" इसका तात्पर्य यह है कि तीव्र मनवाले पितरों के साथ दक्षिण की ओर तेरी रक्षा करें ॥६॥ अब उत्तर की ओर जल-सिंचन करता है इस मन्त्र को पढ़कर—"विश्वकर्मा त्वादित्यै- रुत्तरतः पातु" (यजु० ५।११)—"विश्वकर्मा आदित्यों के साथ उत्तर की ओर तेरी रक्षा करें।" इसका तात्पर्य है कि विश्वकर्मा उत्तर की ओर आदित्यों के साथ तेरी रक्षा करें ॥७॥ प्रोक्षणी पात्र में जो पानी बच रहता है उसको वह वेदी के बाहर जहाँ उत्तर वेदी के दो पूर्व कोने हैं उनमें से दक्षिणी कोने के पास फेंक देता है यह मन्त्र पढ़कर—"इदमहं तप्तं वार्बहिर्धा यज्ञान्निःसृजामि" (यजु० ५।११)—"इस गर्म जल को मैं यज्ञ के बाहर निकालता हूँ।" चूंकि वह वाणी सिंहिनी बनकर अशान्त फिरती रही, उसके उस शोक को इस प्रकार यज्ञ से निकालता है। यदि किसी के विरुद्ध शाप न देना चाहे तो इतना ही कहे, परन्तु यदि शाप देना चाहे तो इतना कहे कि 'अमुक पुरुष के विरुद्ध इस जल को मैं यज्ञ के बाहर निकालता हूँ।' इस प्रकार वह उस पुरुष को उस शोक से बाँधता है और वह शोक से पीड़ित उस लोक को जाता है ॥८॥ वह अग्नि को लेते हुए उत्तर वेदी पर घी क्यों छोड़ता है? इसलिए कि देवों ने पहले ही वाणी से कह दिया था कि अग्नि से पूर्व तुझको आहुति मिलेगी। इसलिए आहुति अग्नि से पूर्व ही उस तक पहुँच जाती है। और वाणी ने देवों से जो यह कहा था कि जो कुछ मेरा आशीर्वाद होगा वह सब तुमको प्राप्त होगा, इसीलिए ऋत्विज यजमान के लिए वह सब आशीर्वाद प्राप्त कराते हैं, और उसके लिए इस सब की पूर्ति होती है ॥९॥ यह जो उत्तर वेदी पर घी छोड़ता है वह एक बार छोड़ता हुआ मानो दो बार छोड़ता

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