शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)
Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda
महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंका० १, अ० २, ब्रा० २, कं० १-४ शतपथब्राह्मण / २७ आयु बढ़ाता है। यह जो कहा कि 'सविता देव, सोने के हाथोंवाला, छिद्र-रहित हाथों से तुझे स्वीकार करे' यह इसलिये कि उसको भलीभाँति स्वीकार किया जाय। 'आंख के लिए तुझको' इससे आंख को धारण कराता है। यही जीवन के चिह्न हैं। इनसे हवि जीवित होता है। अमरों के लिए अमृत हो जाता है। इसीलिये हवि पीसते हैं। हवि को पीसने और कपालों को गर्म करते समय—॥२१॥ एक पुरुष (अग्नीध्र) आज्यस्थाली में घी डालता है। जब किसी निर्दिष्ट देवता के लिए हवि ली जाती है तो उसी देवता की हो जाती है। उसको विशेष यजुष्-मन्त्र पढ़कर लेते हैं। यह घी किसी विशेष देवता के लिए नहीं है, अतः सामान्य यजुष्-मन्त्र पढ़कर (यजु० १।२०) लिया। 'तू बड़ों का दूध है', बड़ों का अर्थ है गाय; यह गाय का रस है, इसलिये कहा 'बड़ों का दूध'; यह भी इसी यजुष्-मन्त्र से लिया जाता है, इसलिये कहा 'बड़ों का दूध' ॥२२॥ अध्याय २-ब्राह्मण २ जिस पात्री में दो पवित्रे रखे थे उसमें पिसे हवि को डालता है यह मन्त्र पढ़कर (यजु० १।२१)—"देव सविता की प्रेरणा से अश्विन को दो भुजाओं से, पूषा के दो हाथों से तुझको उडेला हूँ।" इस यजु० का तात्पर्य तो वही है (जो १।१।२।१७ में कह दिया गया) ॥१॥ अब वेदी के भीतर बैठता है। अब एक (अग्नीध्र) उपसर्जनी जल (आटा सानने का जल) लेकर आता है और उसको उसके पास लाता है। वह इसको पवित्रों के द्वारा यह मंत्र पढ़- कर लेता है (यजु० १।२१)-'जल ओषधियों से मिले।" इस प्रकार जल पिसे हुए चावल रूपी ओषधियों में मिलता है। 'ओषधियां रस के साथ मिलें।' इस प्रकार जल पिसे हुए चावलों के रस के साथ मिलते हैं। 'रेवती जगती के साथ मिलें।' जल रेवती हैं और ओषधियां जगती हैं। ये दोनों परस्पर मिलते हैं। 'मधुवाले मधुवालों के साथ मिलें' अर्थात् रसवाले रसवालों के साथ मिलें ॥२॥ अब सानता है यजु० १।२२ को पढ़कर—"जनने के लिए तुझे मिलाता हूँ।" वह पिसे आटे को गूंधता है कि जिससे वह यजमान के लिए श्री, खाद्य और सन्तान को देवे। वह इसलिये भी गूंधता है कि वह अग्नि के ऊपर रखा जा सके और पक सके ॥३॥ अब उसके दो भाग करता है, यदि दो हवि देनी हों तो। पूर्णमासी की इष्टि में दो हवियाँ दी जाती हैं। अब वह छूकर देखता है कि यह फिर तो नहीं मिल गईं और (यजु० १।२२) पढ़ता है—"यह अग्नि के लिए और यह अग्नि-सोम के लिए।" पहले ये दोनों हवियां अलग-अलग ली गई थीं (देखो १।१।२।१७), फिर इनको साथ फटका, साथ पीसा। अब फिर बांटकर अलग- अलग कर दिया, इसीलिये छूता है। एक (अध्वर्यु) पीठी आग पर रखता है और दूसरा (अग्नीध्र)