शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)
Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda
महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंका० ४, अ० ५, ब्रा० ३-४, कं० ७-११ व १-५ शतपथब्राह्मण / ६३६ इस समय से रक्खा ही रहता है। इस प्रकार वह इसको सब सबनों से बढ़ा देता है ॥७॥ या आग्रयण के लेने के पीछे दोपहर के सबन में इसको लेवे। यह तो मीमांसा मात्र है। लेना तो प्रातःसवन में ही चाहिए, आग्रयण के पश्चात् । वह प्रातःसवन में लिये जाने के पश्चात् रक्खा ही रहता है ॥८॥ वह उसमें से इस मंत्र से लेता है-"आतिष्ठ वृत्रहन्त्रथं युक्ता ते ब्रह्मणा हरी। अर्वाचीनँ सु ते मनो ग्रावा कृणोतु वग्नुना। उपयामगृहीतोऽसीन्द्राय त्वा षोडशिन ऽ एष ते योनिरिन्द्राय त्वा षोडशिने" (यजु० ८।३३, ऋ० १।८४।३)-"हे वृत्र को मारनेवाले, रथ पर चढ़। तेरे घोड़े मंत्रों द्वारा जोत दिये गए। पत्थर (सोम पीसने का) अपने शब्द द्वारा तेरे मन को इधर खींचे। तू आश्रय के लिए लिया गया है षोडशी इन्द्र के लिए तुझको। यह तेरी योनि है। इन्द्र षोडशी के लिए तुझको" ॥६॥ या इस मंत्र से-"युक्ष्वा हि केशिना हरी वृषण। कक्ष्यप्रा। अथा न ऽ इन्द्र सोमपा गिरा- मुपश्रुतिं चर। उपयामगृहीतोऽसीन्द्राय त्वा षोडशिन ऽएष ते योनिरिन्द्राय त्वा षोडशिने" (यजु० ८।३४, ऋ० १।१०।३) -"बड़े केशवाले, प्रबल और लगामवाले घोड़ों को जोतो। हे सोम या इन्द्र ! हमारी वाणी सुनने के लिए यहाँ आ। तू आश्रय के लिए लिया गया है इन्द्र षोडशी के लिए तुझको। यह तेरी योनि है। तुझको इन्द्र षोडशी के लिए" ॥१०॥ अब लौटकर स्तोत्र पढ़ता है, 'सोम सबके ऊपर हो गया। लौट आओ।' वस्तुतः वह इसे ऊपर बढ़ा देता है (षोडशी ग्रह के द्वारा) । सूर्यास्त से ही पढ़ता है। सूर्यास्त के पीछे शस्त्र पढ़ा जाता है। वह सूर्यास्त से पहले इसको पढ़ता है और सूर्यास्त के पीछे शस्त्र-पाठ करता है। इस प्रकार वह रात और दिन को मिला देता है ॥११॥ अतिग्राह्या ग्रहाः अध्याय ५-ब्राह्मण ४ पहले सब देव एकसमान थे। सब भले थे। उन सब एक-से और पुण्य-देवों में से तीन अर्थात् अग्नि, इन्द्र और सूर्य ने चाहा कि हम बढ़ जावें ॥१॥ वे पूजा और श्रम करते रहे। उन्होंने इन अतिग्राह्य (ग्रहों) को देखा और उनको (अति + ग्रह) अधिक निकाल लिया। इसलिए इनका नाम 'अतिग्राह्य' पड़ा। वे बढ़ गये जैसे कि अब तक बढ़े हैं। जो कोई इस रहस्य को समझकर इन 'अतिग्राह्य' ग्रहों को निकालता है वह बढ़ जाता है ॥२॥ अग्नि में पहले वह तेज नहीं था जो अब है। उसने चाहा कि मुझमें तेज हो जाय । उसने इस ग्रह को देखा और अपने लिए निकाल लिया। तब से उसमें यह तेज आ गया ॥३॥ इन्द्र में पहले वह ओज नहीं था जो अब है। उसने चाहा कि मुझमें यह चमक आ जाय । उसने इस ग्रह को देखा और अपने लिए निकाल लिया। तब से उसमें ओज है ॥४॥ सूर्य में पहले वह चमक न थी जो अब है। उसने चाहा कि मुझमें यह चमक आ जाय। उसने इस ग्रह को देखा और अपने लिए निकाल लिया। तब से उसमें चमक है। वस्तुतः इस