भारतकोश
शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished699 पृष्ठ

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कां० ४, अ० ५, ब्रा० ५-६, कं० १२-१३ व १-५ शतपथब्राह्मण / ६४५ एक हुआ, शुक्र पात्र, ऋतु पात्र, आग्रयण पात्र, उक्थ्य पात्र । साल की पाँच ऋतुएं होती हैं । वर्ष प्रजापति है, प्रजापति यज्ञ है। अगर कहें कि संवत्सर में छः ऋतुएं होती हैं तो छठा आदित्य ग्रह भी तो है ।।१२।। वस्तुतः एक ही पात्र है जिसके पीछे प्रजाएँ लाई जाती हैं, अर्थात् उपांशु पात्र । उपांशु प्राण है, प्रजापति प्राण है, और इस संसार में प्रत्येक वस्तु प्रजापति के पीछे है ।।१३।। ग्रहावेक्षणम् अध्याय ५-ब्राह्मण ६ यह जो यज्ञ किया जाता है यही प्रजापति है, इसी से प्रजाएँ उत्पन्न हुई हैं और इसी से आज तक उत्पन्न होती हैं। आश्विन ग्रह को लेने के पश्चात् वह अवकाश कृत्य को करता है (अर्थात् ग्रहों को देखना) ॥१॥ पहले उपांशु ग्रह का अवकाशन करता है, इस मन्त्र से—"प्राणाय मे वर्चोदा वर्चसे पवस्व" (यजु० ७।२७) - "हे वर्चस् के दाता, मेरे प्राण के लिए, वर्चस् के लिए पवित्र हो।" उपांशु सवन को इस मन्त्र से—"व्यानाय मे वर्चोदा वर्चसे पवस्व" (यजु० ७।२७) - "व्यान के लिए, हे वर्चस् के लिए दाता, वर्चस् के लिए पवित्र हो।" फिर अन्तर्याम को इस मन्त्र से— "उदानाय मे वर्चोदा वर्चसे पवस्व" (यजु० ७।२७) – “हे वर्चस् के देनेवाले, उदान के लिए, वर्चस् के लिए पवित्र हो।" फिर ऐन्द्रवायव को इस मन्त्र से-"वाचे मे वर्चोदा वर्चसे पवस्व" (यजु० ७।२७) - "हे वर्चस् के देनेवाले, वाणी के लिए, वर्चस् के लिए पवित्र हो।" अब मैत्रा- वरुण को इस मन्त्र से - "ऋतुदक्षाभ्यां मे वर्चोदा वर्चसे पवस्व" (यजु० ७।२७) - "हे वर्चस् के देनेवाले, विचार और क्रिया दोनों के लिए, वर्चस् के लिए पवित्र हो।" अब आश्विन को- "श्रोत्राय मे वर्चोदा वर्चसे पवस्व" (यजु० ७।२८) - "हे वर्चस् के देनेवाले, श्रोत्र के लिए, वर्चस् के लिए पवित्र हो।" अब शुक्र और मन्थिन् ग्रहों को इस मन्त्र से - "चक्षुर्भ्यां मे वर्चोदसौ वर्चसे पवेथाम्” (यजु० ७।२७) - "हे वर्चस् के देनेवाले, तुम दोनों आँखों के लिए, वर्चस् के लिए पवित्र हो" ॥२॥ अब आग्रयण को इस मन्त्र से - "आत्मने मे वर्चोदा वर्चसे पवस्व" (यजु० ७।२८) – "हे वर्चस् के दाता, मेरे आत्मा के लिए, वर्चस् के लिए पवित्र हो।" अब उक्थ्य को इस मन्त्र से- "ओजसे मे वर्चोदा वर्चसे पवस्व" (यजु० ७।२८) - "मेरे ओज के लिए, हे वर्चस् के दाता, वर्चस् के लिए पवित्र हो।" अब ध्रुव को- "आयुषे मे वर्चोदा वर्चसे पवस्व" (यजु० ७।२८) - "हे वर्चस् के दाता, मेरी आयु के लिए, वर्चस् के लिए पवित्र हो।" अब आम्भृण अर्थात् पूतभृत् और आध- वनीय को- "विश्वाभ्यो मे प्रजाभ्यो वर्चोदसौ वर्चसे पवेथाम्" (यजु० ७।२८) - "मेरी सब प्रजाओं के लिए, हे वर्चस् के देनेवालो, वर्चस् के लिए पवित्र हो।" ये दो पात्र विश्वेदेवों के हैं। क्योंकि इन्हीं में से सोम निकाला गया है— मनुष्य के लिए भी और पितरों के लिए भी, इसलिए ये दो पात्र विश्वेदेवों के हैं ॥३॥ अब द्रोण कलश को - "कोऽसि कतमोऽसि" (यजु० ७।२६) – 'कः' प्रजापति है। "कस्यासि को नामासि" (यजु० ७।२६) - 'को' नाम प्रजापति का है। "यस्य ते नामामन्महि" (यजु० ७।२६) - "जिस तेरे नाम का हम चिन्तन करते हैं।" वस्तुतः वह उसके नाम का चिन्तन करता है। "यं त्वा सोमेनातीतृपाम" (यजु० ७।२६) - "जिस तुझको मैंने सोम से तृप्त किया।" वह इनको सोम से तृप्त करता है। आश्विन ग्रह को लेकर एक-एक अंग को आशीर्वाद कहता है— "सुप्रजाः प्रजाभिः स्याम" (यजु० ७।२६) – 'सन्तानों से युक्त होऊँ।" इस प्रकार वह सन्तान के लिए प्रार्थना करता है। "सुवीरो वीरैः" (यजु० ७।२६) – "वीरों के द्वारा सुवीर होऊँ।" इस प्रकार वीरोंके लिए प्रार्थना करता है। "सुपोषः पोषैः" (यजु० ७।२६) - "सम्पुष्टि- दायक पदार्थों द्वारा सुपोष होऊँ।" इस प्रकार पुष्टि के लिए प्रार्थना करता हूँ ॥४॥ सबसे अवकाशन न कराये। केवल उसी से जो ज्ञात हो, या जो अपना प्रिय हो, या जिसने वेद-पाठ द्वारा अपने को ऋचाओं से युक्त किया हो। आश्विन ग्रह को लेकर वह सब यज्ञ