शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)
Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda
महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 67, कुल 699 में से
संदर्भ में पढ़ेंकां० १, अ० ३, ब्रा० १, कं० १५-२३ शतपथब्राह्मण / ४६ रस्सी को रस्सी न मानकर केवल यजमान की पत्नी की रास्ना बना देता है (रास्ना का अर्थ है सीमा)। रज्जू पत्नी की रास्ना होती है ॥१५॥ रस्सी में गांठ नहीं बाँधनी चाहिए। गाँठ वरुण की होती है। गाँठ बाँधने से तो वरुण पत्नी को पकड़ लेगा। इसलिए गांठ नहीं बाँधता ॥१६॥ (यजु० १।३०) के निम्न मन्त्रांश को पढ़कर वह उसे ऊपर की ओर मोड़ देता है—"तू विष्णु से व्याप्य है।" पत्नी को चाहिए कि वह वेदी के पश्चिम को पूर्वाभिमुख न बैठे। यह पृथिवी अदिति है, वह देवों की पत्नी है, देवों की पत्नी वेदी के पश्चिम को पूर्वाभिमुख बैठती है। यदि यह स्त्री भी ऐसा ही करेगी तो अदिति हो जायगी और शीघ्र ही परलोक सिधारेगी। अपने नियत स्थान पर बैठकर बहुत दिनों जीती है। अदिति को प्रसन्न रखती है और अदिति उसको हानि नहीं पहुँचाती। इसलिए उसको दक्षिण की ओर हटकर बैठना चाहिए ॥१७॥ अब वह (पत्नी) आज्य को देखती है। पत्नी स्त्री है और आज्य वीर्य है। इस प्रकार दोनों में सम्पर्क स्थापित करके सन्तति-प्रजनन कर देता है। इसीलिए पत्नी आज्य को देखती है ॥१८॥ वह यजु० १।३० को पढ़कर आज्य को देखती है—"मैं तुझको दोषरहित आँख से देखती हूँ।" अर्थात् शुभ दृष्टि से।—"तू अग्नि की जीभ है।" अग्नि में उसकी आहुति देते हैं तो अग्नि की जीभ उसे ले लेती है, अतः आज्य अग्नि की जीभ है।—"तू देवों के लिए 'सुहू' है।" अर्थात् भलीभाँति निमन्त्रित।—"मेरे कल्याण के लिए यह कृत्य हो।" इसका तात्पर्य यह है कि यह आज्य समस्त यज्ञ के लिए सुहू हो ॥१९॥ अग्नीध्र आज्य को लेकर कुछ पूर्व की ओर ले जाता है। जो अपनी हवियों को आहवनीय अग्नि पर पकाते हैं उनके यहाँ यह आज्य आहवनीय अग्नि पर पकाते हैं, यह मानकर कि हमारी समस्त हवियाँ आहवनीय पर पकें। गार्हपत्य पर वह आज्य को इसलिए रखता है कि पत्नी को देखने का अवकाश मिल सके। यह तो ठीक न होगा कि यज्ञ करते समय आहवनीय अग्नि पर से उठाकर आज्य को केवल इसलिए पश्चिम को लाया जाय कि पत्नी को देखने का अवकाश मिल सके। यदि पत्नी को आज्य न दिखाया जाय तो इसका अर्थ यह होगा कि पत्नी को यज्ञ में कोई अधिकार नहीं दिया गया। ऐसा करने से वह पत्नी को यज्ञ के अधिकार से बहिष्कृत नहीं समझता और (गार्हपत्य पर) पत्नी के निकट पकाकर और पत्नी को दिखाकर ही पूर्व की ओर ले जाता है। यदि पत्नी न हो (मर गई हो या अन्य कारण हो) तो पहले से ही आहवनीय पर रखा देता है। फिर वहाँ से उठाकर वेदी के भीतर रख देता है ॥२०॥ कुछ लोग कहते हैं कि वेदी के भीतर न रखना चाहिए। इससे देव-पत्नियों के लिए आहुति दी जाती है। देव-पत्नियों को सभा से बहिष्कृत कर देता है। और यजमान की पत्नी भी यजमान से रुष्ट हो जाती है। इस पर याज्ञवल्क्य का कहना है कि 'पत्नी के लिए जो नियत है वही होना चाहिए। किसको चिन्ता है कि उसकी पत्नी दूसरों से सम्बन्ध रखती है!' 'वेदी यज्ञ है, और आज्य भी यज्ञ है, मैं यज्ञ में से यज्ञ बनाऊँगा।' इसलिए आज्य को वेदी में ही रखना चाहिए ॥२१॥ दोनों पवित्रे प्रोक्षणी पात्रों में होते हैं। वह उनको वहाँ से निकालकर आज्य को पवित्र करता है। उनमें से एक तो पवन का है। इस प्रकार वह आज्य को यज्ञ के योग्य बनाता है ॥२२॥ वह यह मन्त्र (यजु० १।३१) पढ़कर पवित्र करता है—"सविता की प्रेरणा से, छिद्ररहित