भारतकोश
शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished699 पृष्ठ

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कां० १, अ० ३, ब्रा० ३, कं० १-४ शतपथब्राह्मण / ५५ यदि उपभृत् से आहुति देवे तो इसका अर्थ यह होगा कि प्रजा राजा से छूट जाय । न खानेवाला रहे, न खाद्य । यह जो साथ-साथ जुहू से आहुति देता है, यह ऐसा ही है जैसे वैश्य लोग राजा को कर देवें । उपभृत् में जो लेता है उसका अर्थ यह है कि राजा के अधीन प्रजा पशु आदि की प्राप्ति करती है, और जब उपभृत् के आज्य की भी जुहू द्वारा आहुति दी जाय तो इसका तात्पर्य यह है कि राजा जब चाहे वैश्य से कहे 'जो इकट्ठा किया है उसको मुझे दो' । इस प्रकार वह उसको वश में भी रखता है और जो चाहता है उसको इस शक्ति के द्वारा ले लेता है ॥१५॥ वे आज्य छन्दों के लिए लिये जाते हैं। जो जुहू में चार बार लिये जाते हैं वे गायत्री के लिए होते हैं। जो उपभृत् में आठ बार लिये जाते हैं वे त्रिष्टुम् और जगती के लिए। जो ध्रुवा में चार बार लिये जाते हैं वे अनुष्टुभ् के लिए। वाणी अनुष्टुभ् है। वाणी में ही यह सब प्रजा जन्म लेती है। ध्रुवा से ही सब यज्ञ उत्पन्न होता है। अनुष्टुभ् पृथिवी है। पृथिवी से सब जगत् उत्पन्न होता है, अतः ध्रुवा से ही सब यज्ञ उत्पन्न होता है ॥१६॥ स्रुवा में आज्य इस मन्त्रांश (यजु० १।३१) को पढ़कर लेते हैं—"तू देवों का धाम है।" आज्य देवों का प्रियतम धाम है। इसीलिए कहा कि 'तू देवों का प्रियतम धाम है', 'तू देवों के यज्ञ का अजेय स्थान है'। आज्य वज्र है, इसीलिए ऐसा कहता है ॥१७॥ जुहू में एक बार मन्त्र पढ़कर भरता है और तीन बार मौन । उपभृत् में एक बार मन्त्र बोलकर, सात बार मौन । ध्रुवा में एक बार मन्त्र बोलकर, तीन बार मौन । कुछ लोग कहते हैं कि तीन बार मन्त्र बोले क्योंकि यज्ञ त्रिवृत् है । परन्तु यह उद्देश्य तो एक बार मन्त्र बोलकर भी पूरा हो जाता है (क्योंकि जुहू, उपभृत् और ध्रुवा में तीन बार मन्त्र हो जाते हैं) ॥१८॥ अध्याय ३—ब्राह्मण ३ अध्वर्यु प्रोक्षणी को लेकर पहले समिधों पर जल छिड़कता है यह मन्त्र (यजु० २।१) बोलकर—"तू खर में रहनेवाला कृष्ण मृग है । तुझे अग्नि की तृप्ति के लिए पवित्र करता हूँ।" इस प्रकार वह उसको अग्नि के लिए पवित्र करता है ॥१॥ फिर वेदी पर जल छिड़कता है (यजु० २।१) से—"तू वेदी है, बर्हि के लिए तुझे पवित्र करता हूँ।" इस प्रकार उसको बर्हि के लिए पवित्र करता है ॥२॥ अब (अग्नीध्र) बर्हि को (अध्वर्यु को) देता है। वह उसको इस प्रकार वेदी पर रख देता है कि उनकी ग्रन्थियाँ पूर्व की ओर रहें। अब उन पर जल छिड़कता है (यजु० २।१) से— "तू बर्हि है। मैं तुझे स्रुचों के लिए पवित्र करता हूँ।" इस प्रकार वह उस बर्हि को स्रुचों के लिए पवित्र करता है ॥३॥ अब जो पानी बच रहता है उसको ओषधियों की जड़ में डालता है इस मन्त्र (यजु० २।२) से —"तू अदिति के लिए रस है।" यह पृथिवी ही अदिति है। वह पृथिवी पौधों के मूलों