भारतकोश
शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished699 पृष्ठ

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का० १, अ० ३, ब्रा० ३, कं० ४-१२ शतपथब्राह्मण / ५७ को तर करता है। पौधों की जड़ें तर होती हैं। आगे के भाग शुष्क भी हों, तो भी जड़ें तर ही रहती हैं ॥४॥ अब ग्रन्थियों को खोलकर बर्हि के सिरों से प्रस्तरों को लेता है यह मन्त्र पढ़कर (यजु० २।२) - "तू विष्णु की चोटी है।" यज्ञ विष्णु है। यह उसका स्तूप या शिखा है। इस यज्ञ में वह इसको शिखा बनाता है। आगे के सिरे से लेता है क्योंकि शिखा आगे होती है। इसीलिए आगे से लेता है ॥५॥ वह बर्हि के पूले को खोलता है, यह सोचकर कि यजमान की पत्नी बिना कष्ट के बच्चा जने। उसको वेदी की दाहिनी श्रोणि में रखता है, क्योंकि यह यजमान की कमर का प्रतिनिधि है। इसलिए दाहिनी श्रोणि में रखता है। वह उसको बर्हि से छा देता है, क्योंकि कमर भी कपड़ों से ढकी रहती है। उसके छा देने का दूसरा हेतु यह हैं ॥६॥ अब वह बर्हि को वेदी पर बिछाता है। प्रस्तर आगे का सिरा है। यज्ञ के लिए दूसरी घास ऐसी ही है जैसे चोटी से इतर स्थान के लोम। यह उन लोमों का सम्पादन करता है। इस- लिए बर्हि को बिछाता है ॥७॥ वेदी स्त्री है। उसके चारों ओर देवता और वेद के विद्वान् ब्राह्मण बैठते हैं। स्त्री को नग्न नहीं होना चाहिए, इसलिए भी बर्हि को बिछाता है ॥८॥ जितनी वेदी है उतनी ही पृथिवी है। बर्हि ओषधि का रूप हैं। मानो वह पृथिवी में ओषधियां रखता है। इस पृथिवी में ये ओषधियां स्थापित हो जाती हैं। इसलिए वह बर्हि को बिछाता है ॥६॥ कुछ लोग कहते हैं कि बहुत-से कुश बिछाना चाहिए। क्योंकि पृथिवी पर जहां पौधे बहुत होते हैं वहां जीविका भी बहुत होती है, इसलिए बहुत बिछाना चाहिए। तीन बार बिछाना चाहिए क्योंकि यज्ञ त्रिवृत् है। ऐसा बिछावें कि सिरे ऊपर को रहें। ऋषि ने कहा था (यजु० ७।३२) 'जड़ को नीचे की ओर रखना चाहिए।' पृथिवी में पौधों की जड़ें भी नीचे को होती हैं। इसीलिए जड़ों को नीचे की ओर करके ही बिछाना चाहिए ॥१०॥ वह इस मन्त्र को पढ़कर बिछाता है (यजु० २।२)—"ऊन के समान नरम तुझको देवों के लिए प्रिय बिछाता हूँ।" ऊन के समान नरम इसलिए कहा कि देव सुख से बैठ सकें ॥११॥ अब अग्नि को ठीक करता है। आहवनीय अग्नि यज्ञ का सिर है - पूर्वार्ध सिर। इसको यज्ञ का पूर्वार्ध करता है। जब आग को ठीक करता है तो ऊपर प्रस्तर को उठाये रखता है। प्रस्तर स्तूप या चोटी है। मानो वह उसको धारण कराता है। इसीलिए प्रस्तर को इसके ऊपर-ऊपर