भारतकोश
शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished699 पृष्ठ

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कां० १, अ० ३, ब्रा० ३, क० १२-२० शतपथब्राह्मण / ५६ उठाये रखकर अग्नि को ठीक करता है ॥१२॥ अब आग के चारों ओर तीन परिधियाँ (लकड़ियाँ) रखता है। परिधियां इसीलिए रखी जाती हैं। जब देवों ने अग्नि को होता के रूप में वरण किया तो अग्नि बोला-“मुझे उत्साह नहीं कि होता बनूँ और हव्य को ले जाऊँ । तुमने पहले तीन होता बनाये थे, वे लुप्त हो गये। उनको मुझे दिला दो, तब मैं तुम्हारा होता बनूँगा और हव्य को ले जाऊँगा।" तब उन्होंने इन तीन परिधियों की कल्पना की ॥१३॥ उसने अब कहा-“वषट्कार रूपी वज्र ने उन तीनों (होताओं) को मार डाला था। मुझे डर है कि वषट्कार मुझे भी मार डाले। इसीलिए इन तीन परिधियों की स्थापना कर दो। तब वषट्कार मुझे मार नहीं सकेगा।" उन्होंने इसीलिए इन तीन परिधियों की स्थापना कर दी और वषट्कार उसको मार न सका। ये तीन परिधियाँ मानो उस अग्नि के लिए वर्म हैं ॥१४॥ तब (दूसरी अग्नियों ने) कहा- "यदि तुम हमारे साथ इस प्रकार यज्ञ में शामिल हो तो हमको भी यज्ञ में भाग दो" ॥१५॥ देवों ने उत्तर दिया- "अच्छा, जो परिधियों के बाहर गिर जाय वह तुम्हारा, और जो आहुति तुममें ही दी जाय वह तुम्हारी, जो आहुति अग्नि में दी जाय वह तुम्हारी।" इस प्रकार जो आहुति अग्नि में दी जाती है वह इन अग्नियों की तृप्ति के लिए होती है। जो आहुतियां उन्हीं परिधियों पर दी जाती हैं वे भी उनकी तृप्ति के लिए होती हैं, और जो परिधियों के बाहर गिर जाता है वह भी उन्हीं की आहुति है। इस प्रकार जो आज्य गिर पड़ता है उसका पाप नहीं लगता, क्योंकि जब अग्नियां जाने लगीं तो पृथिवी में प्रविष्ट हो गईं। जो गिरा वह पृथिवी में ही तो रहेगा ॥१६॥ जो गिर जाता है उसको वह इस मन्त्रांश (यजु० २।२) को पढ़कर स्पर्श करता है— 'भुवपतये स्वाहा, भुवनपतये स्वाहा, भूतानां पतये स्वाहा।' भुवपति, भुवनपति और भूतपति अग्नियों के नाम हैं। वषट्कार कहकर जो आहुति दी जाती है वह उसी देवता की होती है जिसका नाम लिया जाता है। यहाँ ये आहुतियां इन्हीं अग्नियों की हैं जिनका नाम लिया जाता है ॥१७॥ कुछ लोग समिधाओं में से ही लेकर परिधियाँ बना देते हैं। उनको ऐसा नहीं करना चाहिए। समिधाएँ अग्नि पर रखने के लिए बनाई जाती हैं, अतः वे परिधियों के योग्य नहीं होतीं। अतः अलग से ही परिधियाँ बनानी चाहिएँ ॥१८॥ ये पलाश वृक्ष की होनी चाहिएँ। पलाश ब्राह्मण है। अग्नि भी ब्राह्मण है। इसलिए अग्नियां पलाश की होनी चाहिएँ ॥१९॥ यदि पलाश न मिले तो विकंकत की हों। विकंकत की न हों तो कार्ष्मर्य की हों। कार्ष्- मर्य की न हों तो बेल की हों, या खदिर की, या उदुम्बर की। यही वृक्ष यज्ञ के योग्य हैं। इन्हीं