भारतकोश
शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished699 पृष्ठ

पृष्ठ 81, कुल 699 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 81

कां० १, अ० ३, ब्रा० ५, कं० १-३ शतपथब्राह्मण / ६३ और दूसरे बर्हि वैश्य। क्षत्रिय और वैश्य को अलग-अलग करने के लिए इनको रखता है। इनको 'विधृति' कहते हैं। 'विधृति' का अर्थ है अलग-अलग करनेवाला ॥१०॥ अब वह प्रस्तर को (यजु० २।५) पढ़कर बिछाता है--“तू ऊन के समान नरम और देवों के योग्य आसन है।” 'ऊन के समान नरम' कहने का तात्पर्य है कि बहुत अच्छा है। 'देवों के योग्य आसन' कहने का तात्पर्य है कि वह देवों को सुख पहुँचानेवाला है ॥११॥ वह (बायें हाथ से) उसको यह पढ़कर दबाता है (यजु० २।५)--“वसु, रुद्र और आदित्य तुझ पर बैठें।” वसु, रुद्र और आदित्य तीन देवता हैं। यही बैठते हैं। जब उसको बायें हाथ से दबाये होता है उस समय—॥१२॥ दाहिने हाथ से जुहू को पकड़ता है कि कहीं दुष्ट राक्षस न घुस आवें। ब्राह्मण राक्षसों को रोकनेवाला है। इसीलिए जब वह प्रस्तर को बायें हाथ से दबाये होता है उस समय-॥१३॥ वह दाहिने हाथ से जुहू को यह पढ़कर पकड़ता है (यजु० २।६)—“तू जुहू नाम वाली घृताची (घी को प्यार करनेवाली) है। यह घृताची भी है और जुहू भी—“प्रिय धाम वाली, इस पर सुख से बैठ !” अब उपभृत् को लेता है यह पढ़कर— “तू उपभृत् घृताची है, प्रिय धाम वाली, सुख से बैठ।” वह उपभृत् भी है और घृताची भी। अब ध्रुवा को लेता है यह पढ़कर — “ध्रुवा है घृताची, प्रिय धाम वाली, सुख से बैठ ।” वह ध्रुवा भी है, घृताची भी। जो कुछ शेष रहे उसको यह कहकर आहुति देता है— “प्रिय धाम से, प्रिय स्थान में बैठ” ॥१४॥ वह जुहू को प्रस्तर पर रखता है और अन्य स्रुचों को नीचे । जुहू क्षत्रिय है और अन्य स्रुचे वैश्य । इस प्रकार क्षत्रिय को वैश्य से महान् करता है। इसीलिए वैश्य नीचे स्थान से काम करतें हैं और क्षत्रिय ऊपर के स्थान से । इसीलिए जुहू को ऊपर रखता है और अन्य स्रुचों को नीचे ॥१५॥ वह अब हवियों का स्पर्श करता है इस मंत्रांश (यजु० २।६) को पढ़कर— “ठीक बैठ गये।” वे ठीक बैठ गये—“ऋत के घर में ।” यज्ञ ऋत की योनि है। यज्ञ में ही वे बैठ गये--“हे विष्णु ! इनकी रक्षा करो, यज्ञ की रक्षा करो, यज्ञपति की रक्षा करो !” यज्ञपति का अर्थ है 'यजमान'— “यज्ञ के मुझ नेता की रक्षा करो।” इस प्रकार यज्ञ में अपने को भी सम्मिलित करता है। यज्ञ विष्णु है। इस प्रकार यज्ञ से ही यज्ञ की रक्षा चाहता है। इसलिये कहता है- “हे विष्णु, रक्षा कर” ॥१६॥ अध्याय ३-ब्राह्मण ५ अध्वर्यु अग्नि को इध्म (लकड़ी से) इन्धे अर्थात् जलाता है। इसलिये इसको इध्म (ईंधन) कहते हैं। और होता सामिधेनियों को बोलकर अग्नि को अधिक प्रज्वलित करता है, अतः उन मंत्रों को सामिधेनी कहते हैं (लकड़ी इध्म है और मंत्र सामिधेनी) ॥१॥ अध्वर्यु होता से कहता है- "जलनेवाली अग्नि के लिए मंत्र बोलो।" होता जलनेवाली अग्नि के लिए ही मंत्र बोलता है ॥२॥ कुछ लोग कहते हैं 'हे होता, जलनेवाली अग्नि के लिए मंत्र बोलो', परन्तु ऐसा नहीं