भारतकोश
शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished699 पृष्ठ

पृष्ठ 91, कुल 699 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 91

का० २, अ० ४, ब्रा० १, कं० २५-३४ शतपथब्राह्मण / ७३ बहुत उपयुक्त शब्द है। उसी अग्नि को प्रज्वलित करते हैं, और यज्ञ को शक्ति देते हैं ॥२५॥ 'बृहच्छोचा यविष्ठ्य'—'तू सबसे छोटी, बहुत चमकदार है।' समिधा बहुत चमकती है। वह ही सबसे कम आयु की अग्नि है। इसीलिए उसको 'यविष्ठ्य' कहा। यह ऋचा उस लोक अर्थात् अन्तरिक्ष के लिए कही गई। अतः आग्नेयी होते हुए अनिरुक्त है। जो इस रहस्य को समझता है और जिसके लिए यह सामिधेनी पढ़ी जाती है, उसको इस लोक में विजय प्राप्त होती है ॥२६॥ (अब चौथी सामिधेनी) 'स नः पृथु श्रवाय्यम्'—'वह तू हमारे लिए चौड़ा-चकला और प्रकाशयुक्त अवकाश प्राप्त कर।' वह लोक जिसमें देवता रहते हैं चौड़ा-चकला और चमकदार है। 'अच्छा देव विवाससि' अर्थात् 'मैं उस लोक को जाऊं' ॥२७॥ 'बृहदग्ने सुवीर्यम्'—'हे अग्नि, वह बड़ा और शक्तिशाली है।' वह बड़ा लोक है जिसमें देव रहते हैं। वह शक्तिशाली लोक है जिसमें देव निवास करते हैं। इसी लोक के अभिप्राय से यह कहा गया। जो इस रहस्य को समझता है और जिसके लिए सामिधेनी पढ़ी जाती है, उसको इस लोक में विजय प्राप्त होती है ॥२८॥ (पाँचवीं सामिधेनी) 'ईडेन्यो नमस्य'—'स्तुति और नमस्कार के योग्य'। यह स्तुत्य भी है और नमस्य भी। 'तिरस्तमांसि दर्शंत'—अन्धकार में होकर चमकता है'। अग्नि जब जलता है तो अन्धकार में होकर चमकता है। 'समग्निरिध्यते वृषा'—'बलवान अग्नि प्रज्वलित होता है।' बलवान् अग्नि है यह, प्रज्वलित भी होता है (समग्नि—यहाँ से छठी सामिधेनी आरम्भ होती है) ॥२९॥ 'अश्वो न देववाहन'—'वह अग्नि अश्व या घोड़ा होकर देवों को हवि ले जाता है।' यहाँ 'न' का अर्थ है 'ओइम्'। इसका अर्थ है कि वस्तुतः वह अश्व बनकर हवि को ले जाता है ॥३०॥ 'तं हविष्मन्त ईडत'—'उसको हवि वालो, पूजो !' मनुष्य हवि वाले हैं। वे अग्नि को पूजते हैं। इसलिए कहा 'तं हविष्मन्त ईडत' ॥३१॥ (सातवीं सामिधेनी) 'वृषणः त्वा वयं वृषन् वृषणः समिधीमहि...अग्ने दीद्यतं बृहत्'- 'हम शक्तिशाली तुझ शक्तिशाली को प्रज्वलित करते हैं...हे अग्ने, तू बहुत चमकनेवाला है !' क्योंकि जब वह प्रज्वलित किया गया, वह वस्तुतः बहुत चमका ॥३२॥ इस तृच् (तीन ऋचाओं के समूह) को पढ़ता है जिसमें 'वृषण्' (बलवान्) शब्द आया है। ये सब सामिधेनिय अग्नि देवता की होती हैं। परन्तु यज्ञ का देवता 'इन्द्र' है और वह 'वृषण्' (बलवान्) है। अतः वृषण् शब्द आने से यह तृच् इन्द्र देवता का हो जाता है। इसलिए 'वृषण्' वाली तीन ऋचाओं को पढ़ता है ॥३३॥ (अब आठवीं सामिधेनी को) 'अग्निं दूतं वृणीमहे'—'अग्नि दूत का वरण करते हैं।' प्रजापति की सन्तान देव और असुर प्रभुत्व के लिए लड़ पड़े। गायत्री बीच में पड़ गई। जो गायत्री थी वही यह पृथिवी है। यही पृथिवी उन देवों के बीच में थी। वे जानते थे कि जिधर को यह रहेगी, वही पक्ष जीत जायगा, और दूसरा पक्ष पराजित होगा। अतः उन दोनों दलों ने चुपके-चुपके उसको अपनी ओर मिल जाने के लिए निमंत्रण दिया। देवों का दूत बनी अग्नि, और असुर राक्षसों का एक राक्षस जिसका नाम था 'सहरक्ष', वह गायत्री (या पृथिवी) अग्नि के