शिवमहिम्नः स्तोत्रम् (गन्धर्वराज पुष्पदन्त - सानुवाद सटीक)
Shiva Mahimna Stotram with Hindi Commentary
गन्धर्वराज पुष्पदन्त / आचार्य राजेश दीक्षित द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२ शिवमहिम्नस्तोत्रम् स कस्य स्तोतव्यः कतिविधगुणः कस्य विषयः । पदे त्वर्वाचीने पतति न मनः कस्य न वचः ॥२॥ हे हर ! आपकी निर्गुण और सगुण महिमा मन तथा वाणी के विषय से परे है, जिसे वेद भी संकुचित होकर कहते हैं। अतः आपकी उस महिमा को स्तुति करने में कौन समर्थ हो सकता है ? फिर भी भक्तों के अनुग्रहार्थ धारण किया हुआ आपका नवीन रूप भक्तों के मन और वाणी का विषय हो सकता है ॥ २ ॥ मधुस्फीता वाचः परमममृतं निर्मितवत- स्तवब्रह्मन्किंवागपि सुरगुरोर्विस्मय पदम् ॥ मम त्वेतां वाणीं गुणकथनपुण्येन भवतः । पुनामीत्यर्थेऽस्मिन् पुरमथनबुद्धिर्व्यवसिता ॥३॥ हे ब्रह्मन् ! जब कि आपने मधु के सदृश मधुर और अमृत के सदृश जीवनदायिनी वेदरूपी वाणी को प्रकाशित किया है, तब ब्रह्मादि द्वारा की गई स्तुति आपको कैसे प्रसन्न कर सकती है ? हे त्रिपुरमथन ! जब ब्रह्मादि भी आपके स्तुति-गान करने में असमर्थ हैं, तब मुझ तुच्छ की क्या सामर्थ्य है ? मैं तो केवल आपके गुण- गान से ही अपनी वाणी को पवित्र करने की इच्छा रखता हूँ ॥३॥ तवैश्वर्यं तत्तज्जगदुदयरक्षा प्रलयकृत् । त्रयीवस्तुव्यस्तं तिसृषु गुणभिन्नासुतनुषु ॥