शिव पुराण
Shiva Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें* रुद्रसंहिता * ३९१
भी पालन कराने लगा। उस समय महान् बल-पराक्रमसे सम्पन्न महावीर शंखचूड समस्त देवताओं, असुरों, दानवों, राक्षसों, गन्धर्वों, नागों, किंनरों, मनुष्यों तथा त्रिलोकीके अन्यान्य प्राणियोंका एकच्छत्र सम्राट् था। इस प्रकार महान् राजराजेश्वर शंखचूड बहुत वर्षोंतक सम्पूर्ण भुवनोंके राज्यका उपभोग करता रहा। उसके राज्यमें न अकाल पड़ता था न महामारी और न अशुभ ग्रहोंका ही प्रकोप होता था; आधि-व्याधियाँ भी अपना प्रभाव नहीं डाल पाती थीं। यों सारी प्रजा सदा सुखी रहती थी। पृथ्वी बिना जोते ही अनेक प्रकारके धान्य उत्पन्न करती थी। नाना प्रकारकी ओषधियाँ उत्तम-उत्तम फलों और रसोंसे युक्त थीं। उत्तम-उत्तम मणियोंकी खदानें थीं। समुद्र अपने तटोंपर निरन्तर ढेर-के-ढेर रत्न बिखेरते रहते थे। वृक्षोंमें सदा पुष्प-फल लगे रहते थे। सरिताओंमें सुस्वादु नीर बहता रहता था। देवताओंके अतिरिक्त सभी जीव सुखी थे। उनमें किसी प्रकारका विकार नहीं उत्पन्न होता था। चारों वर्णों और आश्रमोंके सभी लोग अपने-अपने धर्ममें स्थित रहते थे। इस प्रकार जब वह त्रिलोकीका शासन कर रहा था, उस समय कोई भी दुःखी नहीं था; केवल देवता भ्रातृ-द्रोहवश दुःख उठा रहे थे। मुने! महाबली शंखचूड गोलोकनिवासी श्रीकृष्णका परम मित्र था। साधुस्वभाववाला वह सदा श्रीकृष्णकी भक्तिमें निरत रहता था। पूर्वशापवश उसे दानवकी योनिमें जन्म लेना पड़ा था, परंतु दानव होनेपर भी उसकी बुद्धि दानवकी-सी नहीं थी।
प्रिय व्यासजी! तदनन्तर जो पराजित होकर राज्यसे हाथ धो बैठे थे, वे सभी सुरगण तथा ऋषि परस्पर मन्त्रणा करके ब्रह्माजीकी सभाको चले। वहाँ पहुँचकर उन्होंने ब्रह्माजीका दर्शन किया और उनके चरणोंमें अभिवादन करके विशेषरूपसे उनकी स्तुति की। फिर आकुलतापूर्वक अपना सारा वृत्तान्त उन्हें कह सुनाया। तब ब्रह्मा उन सभी देवताओं तथा मुनियोंको ढाढ़स बँधाकर उन्हें साथ ले सत्पुरुषोंको सुख प्रदान करनेवाले वैकुण्ठलोकको चल पड़े। वहाँ पहुँचकर देवगणोंसहित ब्रह्माने रमापतिका दर्शन किया। उनके मस्तकपर किरीट सुशोभित था, कानोंमें कुण्डल झलमला रहे थे और कण्ठ वनमालासे विभूषित था। वे चतुर्भुज देव अपनी चारों भुजाओंमें शंख, चक्र, गदा और पद्म धारण किये हुए थे। श्रीविग्रहपर पीताम्बर शोभा दे रहा था और सनन्दनादि सिद्ध उनकी सेवामें नियुक्त थे। ऐसे सर्वव्यापी विष्णुकी झाँकी करके ब्रह्मा आदि देवताओं तथा मुनीश्वरोंने उन्हें प्रणाम किया और फिर भक्तिपूर्वक हाथ जोड़कर वे उनकी स्तुति करने लगे।
देवता बोले—सामर्थ्यशाली वैकुण्ठाधिपते! आप देवोंके भी देव और लोकोंके स्वामी हैं। आप त्रिलोकीके गुरु हैं। श्रीहरे! हम सब आपके शरणापन्न हुए हैं, आप हमारी रक्षा कीजिये। अपनी महिमासे कभी च्युत न होनेवाले ऐश्वर्यशाली त्रिलोकेश! आप ही लोकोंके पालक हैं। गोविन्द! लक्ष्मी आपमें ही निवास करती हैं और आप अपने भक्तोंके प्राणस्वरूप हैं, आपको हमारा नमस्कार है। इस प्रकार स्तुति करके सभी देवता श्रीहरिके आगे रो पड़े। उनकी बात सुनकर भगवान् विष्णुने ब्रह्मासे कहा।