भारतकोश
शिव पुराण

शिव पुराण

Shiva Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished850 पृष्ठ

पृष्ठ 406, कुल 850 में से

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पृष्ठ 406

३९२ * संक्षिप्त शिवपुराण *

विष्णु बोले—ब्रह्मन्! यह वैकुण्ठ योगियोंके लिये भी दुर्लभ है। तुम यहाँ किसलिये आये हो ? तुमपर कौन-सा कष्ट आ पड़ा है? वह यथार्थरूपसे मेरे सामने वर्णन करो।

सनत्कुमारजी कहते हैं—मुने! श्रीहरिका वचन सुनकर ब्रह्माजीने विनम्रभावसे सिर झुकाकर उन्हें बारंबार प्रणाम किया और अंजलि बाँधकर परमात्मा विष्णुके समक्ष स्थित हो देवताओंके कष्टसे भरी हुई शंखचूडकी सारी करतूत कह सुनायी। तब समस्त प्राणियोंके भावोंके ज्ञाता भगवान् श्रीहरि उस बातको सुनकर हँस पड़े और ब्रह्मासे उस रहस्यका उद्घाटन करते हुए बोले।

श्रीभगवान्ने कहा—कमलयोनि! मैं शंखचूडका सारा वृत्तान्त जानता हूँ। पूर्वजन्ममें वह महातेजस्वी गोप था, जो मेरा भक्त था। मैं उसके वृत्तान्तसे सम्बन्ध रखनेवाले इस पुरातन इतिहासका वर्णन करता हूँ, सुनो। इसमें किसी प्रकारका संदेह नहीं करना चाहिये। भगवान् शंकर सब कल्याण करेंगे। गोलोकमें मेरे ही रूप श्रीकृष्ण रहते हैं। उनकी स्त्री श्रीराधा नामसे विख्यात है। वह जगज्जननी तथा प्रकृतिकी परमोत्कृष्ट पाँचवीं मूर्ति है। वही वहाँ सुन्दररूपसे विहार करनेवाली है। उनके अंगसे उद्भूत बहुत-से गोप और गोपियाँ भी वहाँ निवास करती हैं। वे नित्य राधा-कृष्णका अनुवर्तन करते हुए उत्तम-उत्तम क्रीड़ाओंमें तत्पर रहते हैं। वही गोप इस समय शम्भुकी इस लीलासे मोहित होकर शापवश अपनेको दुःख देनेवाली दानवी योनिको प्राप्त हो गया है। श्रीकृष्णने पहलेसे ही रुद्रके त्रिशूलसे उसकी मृत्यु निर्धारित कर दी है। इस प्रकार वह दानव-देहका परित्याग करके पुनः कृष्ण-पार्षद हो जायगा। देवेश! ऐसा जानकर तुम्हें भय नहीं करना चाहिये। चलो, हम दोनों शंकरकी शरणमें चलें; वे शीघ्र ही कल्याणका विधान करेंगे। अब हमें, तुम्हें तथा समस्त देवोंको निर्भय हो जाना चाहिये।

सनत्कुमारजी कहते हैं—मुने! यों कहकर ब्रह्मसहित विष्णु शिवलोकको चले। मार्गमें वे मन-ही-मन भक्तवत्सल सर्वेश्वर शम्भुका स्मरण करते जा रहे थे। व्यासजी! इस प्रकार वे रमापति विष्णु ब्रह्माके साथ उसी समय उस शिवलोकमें जा पहुँचे, जो महान् दिव्य, निराधार तथा भौतिकतासे रहित है। वहाँ पहुँचकर उन्होंने शिवजीकी सभाका दर्शन किया। वह ऊँची एवं उत्कृष्ट प्रभाववाली सभा प्रकाशयुक्त शरीरोंवाले शिव-पार्षदोंसे घिरी होनेके कारण विशेष-रूपसे शोभित हो रही थी। उन पार्षदोंका रूप सुन्दर कान्तिसे युक्त महेश्वरके रूपके सदृश था। उनके दस भुजाएँ थीं। पाँच मुख और तीन नेत्र थे। गलेमें नील चिह्न तथा शरीरका वर्ण अत्यन्त गौर था। वे सभी श्रेष्ठ रत्नोंसे युक्त रुद्राक्ष और भस्मके आभरणसे विभूषित थे। वह मनोहर सभा नवीन चन्द्रमण्डलके समान आकारवाली और चौकोर थी। उत्तम-उत्तम मणियों तथा हीरोंके हारोंसे वह सजायी गयी थी। अमूल्य रत्नोंके बने हुए कमलपत्रोंसे सुशोभित थी। उसमें मणियोंकी जालियोंसे युक्त गवाक्ष बने थे, जिससे वह चित्र-विचित्र दीख रही थी। शंकरकी इच्छासे उसमें पद्मरागमणि जड़ी

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