भारतकोश
शिव पुराण

शिव पुराण

Shiva Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 407

* रुद्रसंहिता * ३९३

हुई थी, जिससे वह अद्भुत-सी लग रही थी। वह स्यमन्तकमणिकी बनी हुई सैकड़ों सीढ़ियोंसे युक्त थी। उसमें चारों ओर इन्द्रनीलमणिके खंभे लगे थे, जिनपर स्वर्णसूत्रसे ग्रथित चन्दनके सुन्दर पल्लव लटक रहे थे, जिससे वह मनको मोहे लेती थी। वह भलीभाँति संस्कृत तथा सुगन्धित वायुसे सुवासित थी। एक सहस्र योजन विस्तारवाली वह सभा बहुत-से किंकरोंसे खचाखच भरी थी। उसके मध्यभागमें अमूल्य रत्नोंद्वारा निर्मित एक विचित्र सिंहासन था, उसीपर उमासहित शंकर विराजमान थे। उन्हें सुरेश्वर विष्णुने देखा। वे तारकाओंसे घिरे हुए चन्द्रमाके समान लग रहे थे। वे किरीट, कुण्डल और रत्नोंकी मालाओंसे विभूषित थे। उनके सारे अंगमें भस्म रमायी हुई थी और वे लीला-कमल धारण किये हुए थे। महान् उल्लाससे भरे हुए उमाकान्तका मन शान्त तथा प्रसन्न था। देवी पार्वतीने उन्हें सुवासित ताम्बूल प्रदान किया था, जिसे वे चबा रहे थे। शिवगण हाथमें श्वेत चँवर लेकर परमभक्तिके साथ उनकी सेवा कर रहे थे और सिद्ध भक्तिवश सिर झुकाकर उनके स्तवनमें लगे थे। वे गुणातीत, परेशान, त्रिदेवोंके जनक, सर्वव्यापी, निर्विकल्प, निराकार, स्वेच्छानुसार साकार, कल्याण-स्वरूप, मायारहित, अजन्मा, आद्य, मायाके अधीश्वर, प्रकृति और पुरुषसे भी परात्पर, सर्वसमर्थ, परिपूर्णतम और समतायुक्त हैं। ऐसे विशिष्ट गुणोंसे युक्त शिवको देखकर ब्रह्मा और विष्णुने हाथ जोड़कर उन्हें प्रणाम किया और फिर वे स्तुति करने लगे। विविध प्रकारसे स्तुति करके अन्तमें वे बोले—'भगवन्! आप दीनों और अनाथोंके सहायक, दीनोंके प्रतिपालक, दीनबन्धु, त्रिलोकीके अधीश्वर और शरणागतवत्सल हैं। गौरीश! हमारा उद्धार कीजिये! परमेश्वर! हमपर कृपा कीजिये। नाथ! हम आपके ही अधीन हैं; अब आपकी जैसी इच्छा हो, वैसा करें।'
(अध्याय २९-३०)

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देवताओंका रुद्रके पास जाकर अपना दुःख निवेदन करना, रुद्रद्वारा उन्हें आश्वासन और चित्ररथको शंखचूड़के पास भेजना, चित्ररथके लौटनेपर रुद्रका गणों, पुत्रों और भद्रकालीसहित युद्धके लिये प्रस्थान, उधर शंखचूड़का सेनासहित पुष्पभद्राके तटपर पड़ाव डालना तथा दानवराजके दूत और शिवकी बातचीत

सनत्कुमारजी कहते हैं—मुने! तदनन्तर जो अत्यन्त दीनताको प्राप्त हो गये थे, उन ब्रह्मा और विष्णुका वचन सुनकर शिवजी मुसकराये और मेघगर्जनाके समान गम्भीर वाणीमें बोले।

शिवजीने कहा—हे हरे! हे ब्रह्मन्! तुमलोग शंखचूड़द्वारा उत्पन्न हुए भयको सर्वथा त्याग दो। निस्संदेह तुम्हारा कल्याण होगा। मैं शंखचूड़का सारा वृत्तान्त यथार्थ रूपसे जानता हूँ। यह पूर्वजन्ममें एक गोप