भारतकोश
संग्रह पर लौटें

शिव पुराण

Shiva Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished850 पृष्ठ

* रुद्रसंहिता * ३९३

हुई थी, जिससे वह अद्भुत-सी लग रही थी। वह स्यमन्तकमणिकी बनी हुई सैकड़ों सीढ़ियोंसे युक्त थी। उसमें चारों ओर इन्द्रनीलमणिके खंभे लगे थे, जिनपर स्वर्णसूत्रसे ग्रथित चन्दनके सुन्दर पल्लव लटक रहे थे, जिससे वह मनको मोहे लेती थी। वह भलीभाँति संस्कृत तथा सुगन्धित वायुसे सुवासित थी। एक सहस्र योजन विस्तारवाली वह सभा बहुत-से किंकरोंसे खचाखच भरी थी। उसके मध्यभागमें अमूल्य रत्नोंद्वारा निर्मित एक विचित्र सिंहासन था, उसीपर उमासहित शंकर विराजमान थे। उन्हें सुरेश्वर विष्णुने देखा। वे तारकाओंसे घिरे हुए चन्द्रमाके समान लग रहे थे। वे किरीट, कुण्डल और रत्नोंकी मालाओंसे विभूषित थे। उनके सारे अंगमें भस्म रमायी हुई थी और वे लीला-कमल धारण किये हुए थे। महान् उल्लाससे भरे हुए उमाकान्तका मन शान्त तथा प्रसन्न था। देवी पार्वतीने उन्हें सुवासित ताम्बूल प्रदान किया था, जिसे वे चबा रहे थे। शिवगण हाथमें श्वेत चँवर लेकर परमभक्तिके साथ उनकी सेवा कर रहे थे और सिद्ध भक्तिवश सिर झुकाकर उनके स्तवनमें लगे थे। वे गुणातीत, परेशान, त्रिदेवोंके जनक, सर्वव्यापी, निर्विकल्प, निराकार, स्वेच्छानुसार साकार, कल्याण-स्वरूप, मायारहित, अजन्मा, आद्य, मायाके अधीश्वर, प्रकृति और पुरुषसे भी परात्पर, सर्वसमर्थ, परिपूर्णतम और समतायुक्त हैं। ऐसे विशिष्ट गुणोंसे युक्त शिवको देखकर ब्रह्मा और विष्णुने हाथ जोड़कर उन्हें प्रणाम किया और फिर वे स्तुति करने लगे। विविध प्रकारसे स्तुति करके अन्तमें वे बोले—'भगवन्! आप दीनों और अनाथोंके सहायक, दीनोंके प्रतिपालक, दीनबन्धु, त्रिलोकीके अधीश्वर और शरणागतवत्सल हैं। गौरीश! हमारा उद्धार कीजिये! परमेश्वर! हमपर कृपा कीजिये। नाथ! हम आपके ही अधीन हैं; अब आपकी जैसी इच्छा हो, वैसा करें।'
(अध्याय २९-३०)

o

देवताओंका रुद्रके पास जाकर अपना दुःख निवेदन करना, रुद्रद्वारा उन्हें आश्वासन और चित्ररथको शंखचूड़के पास भेजना, चित्ररथके लौटनेपर रुद्रका गणों, पुत्रों और भद्रकालीसहित युद्धके लिये प्रस्थान, उधर शंखचूड़का सेनासहित पुष्पभद्राके तटपर पड़ाव डालना तथा दानवराजके दूत और शिवकी बातचीत

सनत्कुमारजी कहते हैं—मुने! तदनन्तर जो अत्यन्त दीनताको प्राप्त हो गये थे, उन ब्रह्मा और विष्णुका वचन सुनकर शिवजी मुसकराये और मेघगर्जनाके समान गम्भीर वाणीमें बोले।

शिवजीने कहा—हे हरे! हे ब्रह्मन्! तुमलोग शंखचूड़द्वारा उत्पन्न हुए भयको सर्वथा त्याग दो। निस्संदेह तुम्हारा कल्याण होगा। मैं शंखचूड़का सारा वृत्तान्त यथार्थ रूपसे जानता हूँ। यह पूर्वजन्ममें एक गोप

३९४ * संक्षिप्त शिवपुराण *

था, जो ऐश्वर्यशाली भगवान् श्रीकृष्णका भक्त था। इसका नाम सुदामा था। वही सुदामा राधाजीके शापसे शंखचूड़ नामक दानवराज होकर उत्पन्न हुआ है। यह परम धर्मज्ञ और देवताओंसे द्रोह करनेवाला है। यह दुर्बुद्धिवश अपने उत्कृष्ट बलके भरोसे सम्पूर्ण देवगणोंको क्लेश दे रहा है। अब तुमलोग प्रेमपूर्वक मेरी बात सुनो और देवोंको आनन्दित करनेके लिये शीघ्र ही कैलासवासी रुद्रके समीप जाओ। वह रुद्ररूप मेरा ही उत्तम पूर्णरूप है। मैं ही देव-कार्यकी सिद्धिके हेतु पृथक् स्वरूप धारण करके वहाँ प्रकट हुआ हूँ। मेरा वह रूप ऐश्वर्यशाली तथा परिपूर्णतम है। हरे! इसीलिये मैं भक्तोंके वशीभूत हो कैलास पर्वतपर सदा निवास करता हूँ।

तदनन्तर कैलास पहुँचकर देवताओंने भगवान् महेशकी स्तुति की और अन्तमें कहा—'महेशान! आप तो कृपाके आकर हैं। दीनोंका उद्धार करना तो आपका बाना ही है। प्रभो! दानवराज शंखचूड़का वध करके इन्द्रको उसके भयसे मुक्त कीजिये और देवोंको इस विपत्तिसे उबारिये।' तब भक्तवत्सल शम्भु देवताओंकी इस प्रार्थनाको सुनकर हँसे और मेघगर्जनकी-सी गम्भीर वाणीमें बोले।

श्रीशंकरने कहा—हे हरे! हे ब्रह्मन्! हे देवगण! तुमलोग अपने-अपने स्थानको लौट जाओ। मैं निश्चय ही सैनिकोंसहित शंखचूड़का वध कर डालूँगा। इसमें तनिक भी संशय नहीं है।

सनत्कुमारजी कहते हैं—व्यासजी! महेश्वरके उस अमृतस्त्रावी वचनको सुनकर सम्पूर्ण देवताओंको परम आनन्द प्राप्त हुआ। उस समय उन्होंने समझ लिया कि अब दानव शंखचूड़ मरा हुआ ही है। तब महेश्वरके चरणोंमें प्रणिपात करके विष्णु वैकुण्ठको और ब्रह्मा सत्यलोकको चले गये तथा सम्पूर्ण देवता भी अपने-अपने स्थानको प्रस्थित हुए। इधर उन महारुद्रने, जो परमेश्वर, दुष्टोंके लिये कालरूप और सत्पुरुषोंकी गति हैं, देवताओंकी इच्छासे अपने मनमें शंखचूड़के वधका निश्चय किया। तब उन्होंने प्रसन्नतापूर्वक अपने प्रेमी गन्धर्वराज चित्ररथको दूत बनाकर शीघ्र ही शंखचूड़के पास भेजा। चित्ररथने वहाँ जाकर शंखचूड़को खूब समझाकर कहा, परंतु उसने बिना युद्ध किये देवताओंको राज्य लौटाना स्वीकार नहीं किया और कहा—'मैंने ऐसा दृढ़ निश्चय कर लिया है कि महेश्वरके साथ युद्ध किये बिना न तो मैं राज्य ही वापस दूँगा और न अधिकारों-को ही लौटाऊँगा। तू कल्याणकर्ता रुद्रके पास लौट जा और मेरी कही हुई बात यथार्थरूपसे उनसे कह दे। वे जैसा उचित समझेंगे, वैसा करेंगे। तू व्यर्थ बकवाद मत कर।'

सनत्कुमारजी कहते हैं—मुनिश्रेष्ठ! यों कहे जानेपर वह शिवदूत पुष्पदन्त (चित्ररथ) अपने स्वामी महेश्वरके पास लौट गया और उसने सारी बातें ठीक-ठीक कह दीं। तब उस दूतके वचनको सुनकर देवताओंके स्वामी भगवान् शंकरको क्रोध आ गया। उन्होंने अपने वीरभद्र आदि गणोंसे कहा।

रुद्र बोले—हे वीरभद्र! हे नन्दिन्! क्षेत्रपाल! आठों भैरव! मैं आज शीघ्र ही शंखचूड़का वध करनेके निमित्त चलता हूँ, अतः मेरी आज्ञासे मेरे सभी बलशाली गण

* रुद्रसंहिता * ३९५

आयुधोंसे लैस होकर तैयार हो जायें और अभी-अभी कुमारों (स्वामिकार्तिक और गणेश)-के साथ रणयात्रा करें। भद्रकाली भी अपनी सेनाके साथ युद्धके लिये प्रस्थान करें।

सनत्कुमारजी कहते हैं—मुने! ऐसी आज्ञा देकर शिवजी अपनी सेनाके साथ चल पड़े। फिर तो सभी वीरगण हर्षमग्न होकर उनके पीछे-पीछे चलने लगे। इसी समय सम्पूर्ण सेनाओंके अध्यक्ष स्कन्द और गणेश भी हर्षसे भरे हुए कवच धारण करके सशस्त्र शिवजीके निकट आ पहुँचे। फिर वीरभद्र, नन्दी, महाकाल, सुभद्रक, विशालाक्ष, बाण, पिंगलाक्ष, विकम्पन, विरूप, विकृति, मणिभद्र, बाष्कल, कपिल, दीर्घदंष्ट्र, विकार, ताम्रलोचन, कालंकर, बलीभद्र, कालजिह्व, कुटीचर, बलोन्मत्त, रणश्लाघ्य, दुर्जय तथा दुर्गम आदि गणनायक जो प्रधान-प्रधान सेनापति थे, शिवजीके साथ चले। उनके गणोंकी संख्या करोड़ों करोड़ थी। आठों भैरव, एकादश भयंकर रुद्र, आठों वसु, इन्द्र, बारहों आदित्य, अग्नि, चन्द्रमा, विश्वकर्मा, दोनों अश्विनी-कुमार, कुबेर, यम, निर्ऋति, नलकूबर, वायु, वरुण, बुध, मंगल तथा अन्यान्य ग्रह, पराक्रमी कामदेव, उग्रदंष्ट्र, उग्रदण्ड, कोट तथा कोटभ आदिने भी शीघ्र ही महेश्वरका अनुगमन किया। स्वयं महेश्वरीदेवी भद्रकाली भी सौ भुजा धारण करके शिवजीके साथ चलीं। वे उत्तमोत्तम रत्नोंसे बने हुए विमानपर आरूढ़ थीं। उनके शरीरपर लाल चन्दनका अनुलेप लगा था और लाल वस्त्र शोभा पा रहा था। वे हर्षमग्न होकर हँसती, नाचती और उत्तम स्वरसे गान करती हुई अपने भक्तोंको अभय तथा शत्रुओंको भय प्रदान कर रही थीं। उनकी एक योजन लंबी भीषणाकार जिह्वा लपलपा रही थी। वे अपने हाथोंमें शंख, चक्र, गदा, पद्म, ढाल, तलवार, धनुष, बाण, एक योजन विस्तारवाला गहरा गोलाकार खप्पर, गगनचुम्बी त्रिशूल, एक योजन लंबी शक्ति, मुद्गर, मुसल, वज्र, खड्ग, तीखा फलक, वैष्णवास्त्र, वारुणास्त्र, वायव्यास्त्र, नागपाश, नारायणास्त्र, गन्धर्वास्त्र, ब्रह्मास्त्र, गारुडास्त्र, पर्जन्यास्त्र, पाशुपतास्त्र, जृम्भणास्त्र, पर्वतास्त्र, महान् पराक्रमी सूर्यास्त्र, कालकाल, महानल, महेश्वरास्त्र, यमदण्डास्त्र, सम्मोहनास्त्र तथा समर्थ दिव्य अस्त्र और अन्यान्य सैकड़ों दिव्यास्त्र धारण किये हुए थीं। करोड़ों योगिनियाँ तथा डाकिनियाँ उनके साथ थीं। फिर भूत, प्रेत, पिशाच, कूष्माण्ड, ब्रह्मराक्षस, वेताल, राक्षस, यक्ष और किंनर आदिसे घिरे हुए स्कन्दने पिताके पास आकर उन चन्द्रशेखरको प्रणाम किया और उनकी आज्ञासे पार्श्वभागमें स्थित होकर सहायकका स्थान ग्रहण किया। तदनन्तर रुद्ररूपधारी शम्भु अपनी सारी सेनाको एकत्रित करके शंखचूड़के साथ लोहा लेनेके लिये निर्भयतापूर्वक आगे बढ़े और देवताओंका उद्धार करनेके लिये चन्द्रभागा नदीके तटपर मनोहर वटवृक्षके नीचे खड़े हो गये।

व्यासजी! उधर जब शिवदूत चला गया, तब प्रतापी शंखचूड़ने महलके भीतर जाकर तुलसीसे वह सारी वार्ता कह सुनायी।

शंखचूड़ने कहा—'देवि! शम्भुके दूतके

३९६ * संक्षिप्त शिवपुराण *

मुखसे (रणनिमन्त्रण सुनकर) मैं युद्धके लिये उद्यत हुआ हूँ और उनसे जूझनेके लिये मैं निश्चय ही जाऊँगा। तुम इसके लिये मुझे आज्ञा दो।' यों कहकर उस ज्ञानीने अपनी प्रियाको नाना प्रकारसे समझाया। फिर ब्राह्ममुहूर्तमें उठकर प्रातः-कृत्य समाप्त किया और पहले नित्यकर्म पूरा करके बहुत-सा दान दिया। तत्पश्चात् अपने पुत्रको सम्पूर्ण दानवोंके राज्यपर अभिषिक्त करके उसे अपनी भार्या, राज्य और सारी सम्पत्ति समर्पित कर दी। पुनः जब उसकी प्रिया तुलसी रोती हुई उसकी रणयात्राका निषेध करने लगी, तब राजा शंखचूडने नाना प्रकारकी कथाएँ कहकर उसे ढाढ़स बँधाया। तदनन्तर उस समादृत दानवराजने कवच धारण करके युद्ध करनेके लिये उद्यत हो अपने वीर सेनापतिको बुलाकर उसे आदेश देते हुए कहा।

शंखचूड बोला—सेनापते! मेरे सभी वीर, जो सम्पूर्ण कार्योंमें कुशल और समरमें शोभा पानेवाले हैं, आज कवच धारण करके युद्धके लिये प्रस्थान करें। शूरवीर दानवों और दैत्योंकी छियासी टुकड़ियाँ तथा बलशाली कंकोंकी निर्भीक सेनाएँ अस्त्र-शस्त्रसे सुसज्जित होकर नगरसे बाहर निकलें। करोड़ों प्रकारसे पराक्रम प्रकट करनेवाले जो असुरोंके पचास कुल हैं, वे भी देवोंके पक्षपाती शम्भुसे युद्ध करनेके लिये प्रस्थित हों, मेरी आज्ञासे धौम्रोँके सौ कुल भी कवचसे विभूषित हो शम्भुके साथ लोहा लेनेके लिये शीघ्र ही निकलें। कालकेयों, मौर्यों, दौहृदों तथा कालकोंको भी मेरी यह आज्ञा सुना दो कि वे रुद्रके साथ संग्राम करनेके लिये रण-सामग्रीसे सुसज्जित हो चलें।

सनत्कुमारजी कहते हैं—मुने! सेनापतिको यों आदेश देकर असुरोंका राजा महाबली दानवेन्द्र शंखचूड सहस्रों प्रकारकी बहुत बड़ी सेनाओंसे घिरा हुआ नगरसे बाहर निकला। उसका सेनापति भी युद्धशास्त्रमें निपुण, महारथी, महान् शूरवीर और रणभूमिमें रथियोंमें अग्रगण्य था। इस प्रकार युद्धस्थलमें वीरोंको भयभीत कर देनेवाला वह दानवराज तीन लाख अक्षौहिणी सेनाओंपर शासन करता हुआ शिबिरसे बाहर निकला और उत्तमोत्तम रत्नोंद्वारा निर्मित विमानपर आरूढ़ हो गुरुजनोंको आगे करके युद्धके लिये चल पड़ा। आगे बढ़नेपर वह पुष्पभद्रा नदीके तटपर सिद्धाश्रममें जा पहुँचा। वहाँ एक मनोहर वटवृक्ष विराजमान था। वह सिद्धक्षेत्र सिद्धोंको उत्तम सिद्धि प्रदान करनेवाला था। पुण्यक्षेत्र भारतमें वह कपिलका तपःस्थान कहलाता था। वह भूभाग पश्चिम समुद्रसे पूर्व, मलयपर्वतसे पश्चिम, श्रीशैलसे उत्तर और गन्धमादनसे दक्षिण था। उसकी चौड़ाई पाँच योजन और लंबाई पाँच सौ योजन थी। भारतके उस भागमें उत्तम पुण्य प्रदान करनेवाली तथा शुद्ध स्फटिकके समान स्वच्छ जलसे परिपूर्ण पुष्पभद्रा और सरस्वती नामकी दो रमणीय नदियाँ बहती हैं। सदा सौभाग्यसे संयुक्त रहनेवाली लवणसागरकी प्रिया भार्या पुष्पभद्रा सरस्वतीके साथ हिमालयसे निकली है और गोमन्तपर्वतको बायें करके पश्चिम समुद्रमें जा मिली है। वहाँ पहुँचकर शंखचूडने शिवजीकी सेनाको देखा।

* रुद्रसंहिता * ३१७

मुने! उसने पहले शिवजीके पास एक दानवेश्वरको दूतके रूपमें भेजा। उसने शिवजीसे युद्ध न करनेके लिये कहा और शिवजीने उसे देवताओंका राज्य लौटा देनेकी बात कही। अन्तमें महेश्वरने कहा—'दूत! हम किसीका भी पक्ष नहीं लेते; क्योंकि हम तो कभी स्वतन्त्र रहते ही नहीं, सदा भक्तोंके अधीन रहते हैं और उनकी इच्छासे उन्हींका कार्य करते रहते हैं। देखो, पूर्वकालमें ब्रह्माकी प्रार्थनासे पहले-पहल प्रलय-समुद्रमें श्रीहरि और दैत्यश्रेष्ठ मधु-कैटभका भी युद्ध हुआ था। पुनः भक्तोंके हितकारी उन्हीं श्रीविष्णुने देवताओंके प्रार्थना करनेपर प्रह्लादके कारण हिरण्यकशिपुका वध किया था। तुमने यह भी सुना होगा कि पहले जो मैंने त्रिपुरोंके साथ युद्ध करके उन्हें भस्म कर डाला था, वह भी देवोंकी प्रार्थनापर ही हुआ था। पूर्वकालमें सर्वेश्वरी जगज्जननीका जो शुम्भ आदिके साथ युद्ध हुआ था और जिसमें उन्होंने उन दैत्योंका वध कर डाला था, वह भी देवताओंके प्रार्थना करनेपर हीघटित हुआ था। वे ही सभी देवगण आज भी ब्रह्माके शरणापन्न हुए थे। तब वे उन देवताओं और श्रीहरिके साथ मेरी शरणमें आये थे। दूत! इस प्रकार ब्रह्मा, विष्णु और देवगणोंकी प्रार्थनाके वशीभूत हो देवोंका अधीश्वर होनेके कारण मैं भी युद्धके लिये आया हूँ। तुम भी तो महात्मा श्रीकृष्णके श्रेष्ठ पार्षद हो। अबतक जो-जो दैत्य मारे गये हैं, उनमेंसे कोई भी तुम्हारी समानता नहीं कर सकता। इसलिये राजन्! देवकार्यकी सिद्धिके लिये तुम्हारे साथ युद्ध करनेमें मुझे कौन-सी बड़ी लज्जा होगी। अर्थात् कुछ नहीं; क्योंकि मैं ईश्वर हूँ और देवताओंने मुझे विनयपूर्वक भेजा है। अतः तुम जाओ और शंखचूडसे मेरी बात कह दो। वह जैसा उचित समझेगा, वैसा करेगा। मुझे तो देवताओंका कार्य करना ही है।' यों कहकर कल्याणकर्ता महेश्वर चुप हो गये। तब शंखचूडका वह दूत उठा और उसके पास चल दिया। <br>          (अध्याय ३१—३५)
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देवताओं और दानवोंका युद्ध, शंखचूडके साथ वीरभद्रका संग्राम, पुनः उसके साथ भद्रकालीका भयंकर युद्ध करना और आकाशवाणी सुनकर निवृत्त होना, शिवजीका शंखचूडके साथ युद्ध और आकाशवाणी सुनकर युद्धसे निवृत्त हो विष्णुको प्रेरित करना, विष्णुद्वारा शंखचूडके कवच और तुलसीके शीलका अपहरण, फिर रुद्रके हाथों त्रिशूलद्वारा शंखचूडका वध, शंखकी उत्पत्तिका कथन

सनत्कुमारजी कहते हैं—महर्षे! जब उस दूतने शंखचूडके पास जाकर विस्तारपूर्वक शिवजीका वचन कह सुनायातथा तत्त्वतः उनके यथार्थ निश्चयको भी प्रकट किया, तब उसे सुनकर प्रतापी दानवराज शंखचूडने भी परम प्रसन्नतापूर्वक

३९८ * संक्षिप्त शिवपुराण *

युद्धको ही अंगीकार किया। फिर तो वह तुरंत ही मन्त्रियोंसहित रथपर जा बैठा और उसने अपनी सेनाको शंकरके साथ युद्ध करनेके लिये आदेश दिया। इधर अखिलेश्वर शिवजीने भी तत्काल ही अपनी सेनाको तथा देवोंको आगे बढ़नेकी आज्ञा दी और स्वयं भी लीलावश युद्धके लिये संनद्ध हो गये। फिर तो शीघ्र ही युद्ध आरम्भ हो गया। उस समय नाना प्रकारके रणवाद्य बजने लगे। वीरोंके शब्द और कोलाहल चारों ओर गूँज उठे। मुने! इस प्रकार देवताओं और दानवोंका परस्पर युद्ध होने लगा। उस समय वे दोनों सेनाएँ धर्मपूर्वक जूझने लगीं। स्वयं महेन्द्र वृषपर्वाके साथ लड़ने लगे और विप्रचित्तिके साथ सूर्यका धर्मयुद्ध होने लगा। विष्णु दम्भके साथ भीषण संग्राम करने लगे। कालासुरसे काल, गोकर्णसे अग्नि, कालकेयसे कुबेर, मयसे विश्वकर्मा, भयंकरसे मृत्यु, संहारसे यम, कालाम्बिकसे वरुण, चंचलसे वायु, घटपृष्ठसे बुध, रक्ताक्षसे शनैश्चर, रत्नसारसे जयन्त, वर्चागणोंसे वसुगण, दोनों दीप्तिमानोंसे दोनों अश्विनीकुमार, धूम्रसे नलकुबर, धुरंधरसे धर्म, गणकाक्षसे मंगल, शोभाकरसे वैश्वानर, पिपिटसे मन्मथ, गोकामुख, चूर्ण, खड्ग, धूम्र, संहल, प्रतापी विश्व और पलाश नामक असुरोंसे बारहों आदित्य धर्मपूर्वक लोहा लेने लगे। इस प्रकार शिवकी सहायताके लिये आये हुए अमरोंका असुरोंके साथ युद्ध होने लगा। ग्यारहों महारुद्र महान् बल-पराक्रमसे सम्पन्न ग्यारह भयंकर असुर-वीरोंसे भिड़ गये। उग्र और चण्ड आदिके साथ महामणि, राहुके साथ चन्द्रमा और शुक्राचार्यके साथ बृहस्पति धर्मयुद्ध करने लगे। इस प्रकार उस महायुद्धमें नन्दीश्वर आदि सभी शिवगण श्रेष्ठ दानवोंके साथ संग्राम करने लगे। विस्तारभयसे उनका पृथक् वर्णन नहीं किया गया है। मुने! उस समय सारी सेनाएँ निरन्तर युद्धमें व्यस्त थीं और शम्भु काल्यसुतके साथ वटवृक्षके नीचे विराजमान थे। उधर शंखचूड़ भी रत्नाभरणोंसे विभूषित हो करोड़ों दानवोंके साथ रमणीय रत्नसिंहासनपर बैठा हुआ था। फिर देवताओं तथा असुरोंमें चिरकालतक अत्यन्त भयानक युद्ध होता रहा। तदनन्तर शंखचूड़ भी आकर उस भीषण संग्राममें जुट गया। इसी बीच महाबली वीर वीरभद्र समरभूमिमें बलशाली शंखचूड़से जा भिड़े। उस युद्धमें दानवराज जिन-जिन अस्त्रोंकी वर्षा करता था, उन-उनको वीरभद्र खेल-ही-खेलमें अपने बाणोंसे काट डालते थे।

व्यासजी! इसी समय देवी भद्रकालीने समरभूमिमें जाकर बड़ा भयंकर सिंहनाद किया। उनके उस शब्दको सुनकर सभी दानव मूर्च्छित हो गये। उस समय देवीने बारंबार अट्टहास किया और मधुपान करके वे रणके मुहानेपर नृत्य करने लगीं। उनके साथ ही उग्रदंष्ट्रा, उग्रदण्डा और कोटवीने भी मधुपान किया तथा अन्यान्य देवियोंने भी खूब मधु पीकर युद्धस्थलमें नाचना आरम्भ किया। उस समय शिवगणों तथा देवोंके दलोंमें महान् कोलाहल मच गया। सारा सुरसमुदाय बहुत प्रकारसे गर्जना करता हुआ हर्षमग्न हो गया। तदनन्तर कालीने शंखचूड़के ऊपर प्रलयकालीन अग्निकी शिखाके समान उद्दीप्त आग्नेयास्त्र चलाया, परंतु दानवराजने वैष्णवास्त्रसे उसे शीघ्र ही शान्त कर दिया। तब देवी भद्रकालीने उसपर नारायणास्त्रका प्रयोग किया। वह

* रुद्रसंहिता * ३९९

अस्त्र दानव-शत्रुको देखकर बढ़ने लगा। तब प्रलयाग्निकी ज्वालाके समान उद्दीप्त होते हुए नारायणास्त्रको देखकर शंखचूड़ दण्डकी भाँति भूमिपर लेट गया और बारंबार प्रणाम करने लगा। तब उस दानवको नम्र हुआ देखकर वह अस्त्र निवृत्त हो गया। तत्पश्चात् देवीने उसपर मन्त्रपूर्वक ब्रह्मास्त्र छोड़ा। उस अस्त्रको प्रज्वलित होता हुआ देखकर दानवराजने भूमिपर खड़े होकर उसे प्रणाम किया और ब्रह्मास्त्रसे ही उसका निवारण कर दिया। तदनन्तर वह दानवराज कुपित हो उठा और वेगपूर्वक अपने धनुषको खींचकर देवीके ऊपर मन्त्रपाठ करते हुए दिव्यास्त्रोंकी वर्षा करने लगा। भद्रकाली समरभूमिमें अपने विस्तृत मुखको फैलाकर उन अस्त्रोंको निगल गयीं और अट्टहासपूर्वक गर्जना करने लगीं, जिससे दानव भयभीत हो गये। तब शंखचूड़ने कालीके ऊपर एक सौ योजन लंबी शक्तिसे वार किया; परंतु देवीने अपने दिव्यास्त्रसमूहसे उसके सौ टुकड़े कर दिये। यों उन दोनोंमें चिरकालतक युद्ध होता रहा और सभी देवता तथा दानव दर्शक बनकर उसे देखते रहे। अन्तमें देवीने महान् कोपावेशसे उसपर वेगपूर्वक मुष्टि-प्रहार किया। उसकी चोटसे वह दानवराज चक्कर काटने लगा और उसी क्षण मूर्च्छित हो गया। फिर क्षणभरमें ही उसकी चेतना लौट आयी और वह उठ खड़ा हुआ; परंतु उस प्रतापीने मातृबुद्धि होनेके कारण देवीके साथ बाहुयुद्ध नहीं किया। तब देवीने उस दानवको पकड़कर उसे बारंबार घुमाया और बड़े क्रोधसे वेगपूर्वक ऊपरको उछाल दिया। प्रतापी शंखचूड़ वेगसे ऊपरको उछला और पृथ्वीपर गिरकर पुनः उठ खड़ा हुआ। उस महायुद्धमें वह तनिक भी भ्रान्त नहीं हुआ था; बल्कि उसका मन प्रसन्न था। तत्पश्चात् वह भद्रकालीको प्रणाम करके बहुमूल्य रत्नोंद्वारा निर्मित अपने परम मनोहर विमानपर जा बैठा। इधर कालिका भूखसे विह्वल होकर दानवोंका रक्तपान करने लगीं। इसी अवसरपर वहाँ यों आकाशवाणी हुई— 'ईश्वरि! अभी रणभूमिमें सिंहनाद करनेवाले डेढ़ लाख दानवेन्द्र और बचे हैं। ये बड़े उद्धत हैं, अतः तुम इन्हें अपना आहार बना लो। परंतु देवि! संग्राममें दानवराज शंखचूड़को मारनेके लिये मन मत दौड़ाओ; क्योंकि यह तुम्हारे लिये अवध्य है—ऐसा निश्चय समझो।' आकाशवाणीद्वारा कहे हुए वचनको सुनकर देवी भद्रकालीने बहुत-से दानवोंका मांस भक्षण करके उनका रक्तपान किया और फिर वे शिवजीके निकट चली गयीं। वहाँ उन्होंने पूर्वापरके क्रमसे सारा युद्ध-वृत्तान्त कह सुनाया।

व्यासजीने पूछा—महाबुद्धिमान् सनत्कुमारजी! कालीका वह कथन सुनकर महेश्वरने उस समय क्या कहा और कौन-सा कार्य किया। उसे आप वर्णन करनेकी कृपा करें; क्योंकि मेरे मनमें उसे सुननेकी प्रबल उत्कण्ठा जाग उठी है।

सनत्कुमारजी बोले—मुने! शम्भु तो जीवोंके कल्याणकर्ता, परमेश्वर और बड़े लीलाविहारी हैं। वे कालीद्वारा कहे हुए वचनको सुनकर उन्हें आश्वासन देते हुए हँसने लगे। तदनन्तर आकाशवाणीको सुनकर तत्त्वज्ञान-विशारद स्वयं शंकर अपने गणोंके साथ समरभूमिकी ओर चले। उस

४०० * संक्षिप्त शिवपुराण *

समय वे महावृषभ नन्दीश्वरपर सवार थे और उन्हींके समान पराक्रमी वीरभद्र, भैरव और क्षेत्रपाल आदि उनके साथ थे। रणभूमिमें पहुँचकर महेश्वरने वीररूप धारण किया। उस समय उन रुद्रकी बड़ी शोभा हो रही थी और वे मूर्तिमान् काल-से दीख रहे थे। जब शंखचूड़की दृष्टि शिवजीपर पड़ी, तब वह विमानसे उतर पड़ा और परम भक्तिके साथ दण्डकी भाँति पृथ्वीपर लोटकर उसने सिरके बल उन्हें प्रणाम किया। इस प्रकार नमस्कार करनेके पश्चात् वह तुरंत ही अपने विमानपर जा बैठा और कवच धारण करके उसने धनुष-बाण उठाया। फिर तो दोनों ओरसे बाणोंकी झड़ी लग गयी। यों व्यर्थ ही बाण-वर्षा करनेवाले शिव और शंखचूड़का वह उग्र युद्ध सैकड़ों वर्षोंतक चलता रहा। अन्तमें युद्धस्थलमें शंखचूड़का वध करनेके लिये महाबली महेश्वरने सहसा अपना वह त्रिशूल उठाया, जिसका निवारण करना बड़े-बड़े तेजस्वियोंके लिये भी अशक्य है। तब तत्काल ही उसका निषेध करनेके लिये यों आकाशवाणी हुई—‘‘शंकर! मेरी प्रार्थना सुनिये और इस समय इस त्रिशूलको मत चलाइये। ईश! यद्यपि आप क्षणमात्रमें पूरे ब्रह्माण्डका विनाश करनेमें सर्वथा समर्थ हैं, फिर इस अकेले दानव शंखचूड़की तो बात ही क्या है, तथापि आप स्वामीके द्वारा देवमर्यादाका विनाश नहीं होना चाहिये। महादेव! आप उस (देवमर्यादा)-को सुनिये और उसे सत्य एवं सफल बनाइये।'(वह देवमर्यादा यह है कि) जबतक इस शंखचूड़के हाथमें श्रीहरिका परम उग्र कवच वर्तमान रहेगा और इसकी पतिव्रता पत्नी (तुलसी)-का सतीत्व अखण्डित रहेगा, तबतक इसपर जरा और मृत्यु अपना प्रभाव नहीं डाल सकेंगे।' अतः जगदीश्वर शंकर! ब्रह्माके इस वचनको सत्य कीजिये।''

तब सत्पुरुषोंके आश्रयस्वरूप शिवजीने उस आकाशवाणीको सुनकर ‘तथास्तु’ कहकर उसे स्वीकार कर लिया और विष्णुको उस कार्यके लिये प्रेरित किया। फिर तो शिवजीकी इच्छासे विष्णु वहाँसे चल पड़े। वे तो मायावियोंमें भी श्रेष्ठ मायावी ठहरे। अतः उन्होंने एक वृद्ध ब्राह्मणका वेष धारण किया और शंखचूड़के निकट जाकर उससे यों कहा।

वृद्ध ब्राह्मण बोले—‘दानवेन्द्र! इस समय मैं याचक होकर तुम्हारे पास आया हूँ, तुम मुझे भिक्षा दो। दीनवत्सल! अभी मैं अपने मनोरथको प्रकट नहीं करूँगा। (जब तुम देना स्वीकार कर लोगे, तब) पीछे मैं उसे बताऊँगा और तब तुम उसे पूर्ण करना।' ब्राह्मणकी बात सुनकर राजेन्द्र शंखचूड़का मुख और नेत्र प्रसन्नतासे खिल उठे। जब उसने ‘ओम्’ कहकर उसे स्वीकार कर लिया, तब ब्राह्मणने छलपूर्वक कहा—

* रुद्रसंहिता * ४०१

'मैं तुम्हारा कवच चाहता हूँ।' यह सुनकर ऐश्वर्यशाली दानवराज शंखचूडने, जो ब्राह्मण-भक्त और सत्यवादी था, वह दिव्य कवच जो उसे प्राणके समान था, ब्राह्मणको दे दिया। इस प्रकार श्रीहरिने मायाद्वारा उससे वह कवच ले लिया और फिर शंखचूडका रूप धारण करके वे तुलसीके पास पहुँचे। वहाँ जाकर सबके आत्मा एवं तुलसीके नित्य स्वामी श्रीहरिने शंखचूड़रूपसे उसके शीलका हरण कर लिया।

इसी समय विष्णुभगवान्ने शम्भुसे अपनी सारी बात कह सुनायी। तब शिवजीने शंखचूडके वधके निमित्त अपना उद्दीप्त त्रिशूल हाथमें लिया। परमात्मा शंकरका वह विजय नामक त्रिशूल अपनी उत्कृष्ट प्रभा बिखेर रहा था। उससे सारी दिशाएँ, पृथ्वी और आकाश प्रकाशित हो उठे। वह मध्याह्नकालीन करोड़ों सूर्यों तथा प्रलयाग्नि-की शिखाके समान चमकीला था। उसका निवारण करना असम्भव था। वह दुर्धर्ष, कभी व्यर्थ न होनेवाला और शत्रुओंका संहारक था। वह तेजोंका अत्यन्त उग्र समूह, सम्पूर्ण शस्त्रास्त्रोंका सहायक, भयंकर और सारे देवताओं तथा असुरोंके लिये दुस्सह था। वह एक ही स्थानपर ऐसा दमक रहा था, मानो लीलाका आश्रय लेकर सम्पूर्ण ब्रह्माण्डका संहार करनेके लिये उद्यत हो। उसकी लंबाई एक हजार धनुष और चौड़ाई सौ हाथ थी। उस जीव-ब्रह्मस्वरूप शूलका किसीके द्वारा निर्माण नहीं हुआ था। उसका रूप नित्य था। आकाशमें चक्कर काटता हुआ वह त्रिशूल शिवजीकी आज्ञासे शंखचूडके ऊपर गिरा और उसने उसी क्षण उसे राखकी ढेरी बना दिया। विप्र! महेश्वरका वह शूल मनके समान वेगशाली था। वह शीघ्र ही अपना कार्य पूर्ण करके शंकरके पास आ पहुँचा और फिर आकाशमार्गसे चला गया। उस समय स्वर्गमें दुन्दुभियाँ बजने लगीं। गन्धर्व और किन्नर गान करने लगे। देवों तथा मुनियोंने स्तुति करना आरम्भ किया और अप्सराएँ नृत्य करने लगीं। शिवजीके ऊपर लगातार पुष्पोंकी वर्षा होने लगी और ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र आदि देवता तथा मुनिगण उनकी प्रशंसा करने लगे। दानवराज शंखचूड भी शिवजीकी कृपासे शापमुक्त हो गया और उसे उसके पूर्व (श्रीकृष्ण-पार्षद-) रूपकी प्राप्ति हो गयी। शंखचूडकी हड्डियोंसे शंख-जातिका प्रादुर्भाव हुआ, जिस शंखका जल शंकरके अतिरिक्त समस्त देवताओंके लिये प्रशस्त माना जाता है। महामुने! श्रीहरि और लक्ष्मीको तथा उनके सम्बन्धियोंको भी शंखका जल विशेषरूपसे अत्यन्त प्रिय है; किंतु शिवके लिये नहीं। इस प्रकार शंखचूडको मारकर शंकर उमा, स्कन्द और गणोंके साथ प्रसन्नतापूर्वक नन्दीश्वरपर सवार हो शिवलोकको चले गये। भगवान् विष्णुने वैकुण्ठके लिये प्रस्थान किया और देवगण परमानन्दमग्न हो अपने-अपने लोकको चले गये। उस समय जगत्में चारों ओर परम शान्ति छा गयी। सबको निर्विघ्नरूपसे सुख मिलने लगा। आकाश निर्मल हो गया और सारी पृथ्‍वीपर उत्तम-उत्तम मंगलकार्य होने लगे। मुने! इस प्रकार मैंने तुमसे महेशके जिस चरित्रका वर्णन किया है, वह आनन्ददायक, सर्वदुःखहारी, लक्ष्मीप्रद और सम्पूर्ण कामनाओंको पूर्ण करनेवाला है।

(अध्याय ३६—४०) $\approx\approx\text{o}\approx\approx$

४०२* संक्षिप्त शिवपुराण *

विष्णुद्वारा तुलसीके शील-हरणका वर्णन, कुपित हुई तुलसीद्वारा विष्णुको शाप, शम्भुद्वारा तुलसी और शालग्राम-शिलाके माहात्म्यका वर्णन

फिर व्यासजीके पूछनेपर सनत्कुमारजीने कहा—महर्षे! रणभूमिमें आकाशवाणीको सुनकर जब देवेश्वर शम्भुने श्रीहरिको प्रेरित किया, तब वे तुरंत ही अपनी मायासे ब्राह्मणका वेष धारण करके शंखचूडके पास जा पहुँचे और उन्होंने उससे परमोत्कृष्ट कवच माँग लिया। फिर शंखचूडका रूप बनाकर वे तुलसीके घरकी ओर चले। वहाँ पहुँचकर उन्होंने तुलसीके महलके द्वारके निकट नगारा बजाया और जय-जयकारसे सुन्दरी तुलसीको अपने आगमनकी सूचना दी। उसे सुनकर सती-साध्वी तुलसीने बड़े आदरके साथ झरोखेके रास्ते राजमार्गकी ओर झाँका और अपने पतिको आया हुआ जानकर वह परमानन्दमें निमग्न हो गयी। उसने तत्काल ही ब्राह्मणोंको धन-दान करके उनसे मंगलाचार कराया और फिर अपना शृंगार किया। इधर देवताओंका कार्य सिद्ध करनेके लिये मायासे शंखचूडका स्वरूप धारण करनेवाले भगवान् विष्णु रथसे उतरकर देवी तुलसीके भवनमें गये। तुलसीने पतिरूपमें आये हुए भगवान्‌का पूजन किया, बहुत-सी बातें कीं, तदनन्तर उनके साथ रमण किया। तब उस साध्वीने सुख, सामर्थ्य और आकर्षणमें व्यतिक्रम देखकर सबपर विचार किया और (संदेह उत्पन्न होनेपर) वह 'तू कौन है?' यों डाँटती हुई बोली।

तुलसीने कहा—दुष्ट! मुझे शीघ्र बतला कि मायाद्वारा मेरा उपभोग करनेवाला तू कौन है? तूने मेरा सतीत्व नष्ट कर दिया है, अतः मैं अभी तुझे शाप देती हूँ।

सनत्कुमारजी कहते हैं—ब्रह्मन्! तुलसीका वचन सुनकर श्रीहरिने लीलापूर्वक अपनी परम मनोहर मूर्ति धारण कर ली। तब उस रूपको देखकर तुलसीने लक्षणोंसे पहचान लिया कि ये साक्षात् विष्णु हैं। परंतु उसका पातिव्रत्य नष्ट हो चुका था, इसलिये वह कुपित होकर विष्णुसे कहने लगी।

तुलसीने कहा—हे विष्णो! तुम्हारा मन पत्थरके सदृश कठोर है। तुममें दयाका लेशमात्र भी नहीं है। मेरे पतिधर्मके भंग हो जानेसे निश्चय ही मेरे स्वामी मारे गये। चूँकि तुम पाषाण-सदृश कठोर, दयारहित और दुष्ट हो, इसलिये अब तुम मेरे शापसे पाषाणस्वरूप ही हो जाओ।

सनत्कुमारजी कहते हैं—मुने! यों कहकर शंखचूडकी वह सती-साध्वी पत्नी तुलसी फूट-फूटकर रोने लगी और शोकार्त होकर बहुत तरहसे विलाप करने लगी। इतनेमें वहाँ भक्तवत्सल भगवान् शंकर प्रकट हो गये और उन्होंने समझाकर कहा—'देवि! अब तुम दुःखको दूर करनेवाली मेरी बात सुनो और श्रीहरि भी स्वस्थ मनसे उसे श्रवण करें; क्योंकि तुम दोनोंके लिये जो सुखकारक होगा, वही मैं कहूँगा। भद्रे! तुमने (जिस मनोरथको लेकर) तप किया था, यह उसी तपस्याका फल है। भला, वह अन्यथा कैसे हो सकता है? इसीलिये तुम्हें उसके अनुरूप ही फल प्राप्त हुआ है। अब तुम इस शरीरको

* रुद्रसंहिता * ४०३

त्यागकर दिव्य देह धारण कर लो और लक्ष्मीके समान होकर नित्य श्रीहरिके साथ (वैकुण्ठमें) विहार करती रहो। तुम्हारा यह शरीर, जिसे तुम छोड़ दोगी, नदीके रूपमें परिवर्तित हो जायगा। वह नदी भारतवर्षमें पुण्यरूपा गण्डकीके नामसे प्रसिद्ध होगी। महादेवि! कुछ कालके पश्चात् मेरे वरके प्रभावसे देवपूजन-सामग्रीमें तुलसीका प्रधान स्थान हो जायगा। सुन्दरी! तुम स्वर्गलोकमें, मृत्युलोकमें तथा पातालमें सदा श्रीहरिके निकट ही निवास करोगी और पुष्पोंमें श्रेष्ठ तुलसीका वृक्ष हो जाओगी। तुम वैकुण्ठमें दिव्यरूपधारिणी वृक्षाधिष्ठात्री देवी बनकर सदा एकान्तमें श्रीहरिके साथ क्रीडा करोगी। उधर भारतवर्षमें जो नदियोंकी अधिष्ठात्री देवी होगी, वह परम पुण्य प्रदान करनेवाली होगी और श्रीहरिके अंशभूत लवणसागरकी पत्नी बनेगी। तथा श्रीहरि भी तुम्हारे शापवश पत्थरका रूप धारण करके भारतमें गण्डकी नदीके जलके निकट निवास करेंगे। वहाँ तीखी दाढ़ोंवाले करोड़ों भयंकर कीड़े उस पत्थरको काटकर उसके मध्यमें चक्रका आकार बनायेंगे। उसके भेदसे वह अत्यन्त पुण्य प्रदान करनेवाली शालग्रामशिला कहलायेगी और चक्रके भेदसे उसका लक्ष्मीनारायण आदि भी नाम होगा। विष्णुकी शालग्रामशिला और वृक्षस्वरूपिणी तुलसीका समागम सदा अनुकूल तथा बहुत प्रकारके पुण्योंकी वृद्धि करनेवाला होगा। भद्रे! जो शालग्रामशिलाके ऊपरसे तुलसीपत्रको दूर करेगा, उसे जन्मान्तरमें स्त्रीवियोगकी प्राप्ति होगी तथा जो शंखको दूर करके तुलसीपत्रको हटायेगा, वह भी भार्याहीन होगा और सात जन्मोंतक रोगी बना रहेगा। जो महाज्ञानी पुरुष शालग्रामशिला, तुलसी और शंखको एकत्र रखकर उनकी रक्षा करता है, वह श्रीहरिका प्यारा होता है।

सनत्कुमारजी कहते हैं—व्यासजी ! इस प्रकार कहकर शंकरजीने उस समय शालग्रामशिला और तुलसीके परम पुण्य-दायक माहात्म्यका वर्णन किया। तत्पश्चात् वे श्रीहरिको तथा तुलसीको आनन्दित करके अन्तर्धान हो गये। इस प्रकार सदा सत्पुरुषोंका कल्याण करनेवाले शम्भु अपने स्थानको चले गये। इधर शम्भुका कथन सुनकर तुलसीको बड़ी प्रसन्नता हुई। उसने अपने उस शरीरका परित्याग करके दिव्य रूप धारण कर लिया। तब कमलापति विष्णु उसे साथ लेकर वैकुण्ठको चले गये। उसके छोड़े हुए शरीरसे गण्डकी नदी प्रकट हो गयी और भगवान् अच्युत भी उसके तटपर मनुष्योंको पुण्यप्रदान करनेवाली शिलाके रूपमें परिणत हो गये। मुने! उसमें कीड़े अनेक प्रकारके छिद्र बनाते रहते हैं। उनमें जो शिलाएँ गण्डकीके जलमें गिरती हैं, वे परम पुण्यप्रद होती हैं और जो स्थलपर ही रह जाती हैं, उन्हें पिंगला कहा जाता है और वे प्राणियोंके लिये संतापकारक होती हैं। व्यासजी! इस प्रकार तुम्हारे प्रश्नके अनुसार मैंने शम्भुका सारा चरित, जो पुण्यप्रदान तथा मनुष्योंकी सारी कामनाओंको पूर्ण करनेवाला है, तुम्हें सुना दिया। यह पुण्य आख्यान, जो विष्णुके माहात्म्यसे संयुक्त तथा भोग और मोक्षका प्रदाता है, तुमसे वर्णन कर दिया; अब और क्या सुनना चाहते हो ?

(अध्याय ४१)

४०४ * संक्षिप्त शिवपुराण *

उमाद्वारा शम्भुके नेत्र मूँद लिये जानेपर अन्धकारमें शम्भुके पसीनेसे अन्धकासुरकी उत्पत्ति, हिरण्याक्षकी पुत्रार्थ तपस्या और शिवका उसे पुत्ररूपमें अन्धकको देना, हिरण्याक्षका त्रिलोकीको जीतकर पृथ्वीको रसातलमें ले जाना और वराहरूपधारी विष्णुद्वारा उसका वध

सनत्कुमारजी कहते हैं—व्यासजी! अब जिस प्रकार अन्धकासुरने परमात्मा शम्भुके गणाध्यक्ष-पदको प्राप्त किया था, महेश्वरके उस मंगलमय चरितको श्रवण करो। मुनीश्वर! अन्धकासुरने पहले शिवजीके साथ बड़ा घोर संग्राम किया था, परंतु पीछे बारंबार सात्त्विकभावके उद्रेकसे उसने शम्भुको प्रसन्न कर लिया; क्योंकि नाना प्रकारकी लीलाएँ करनेवाले शम्भु शरणागतरक्षक तथा परम भक्तवत्सल हैं। उनका माहात्म्य परम अद्भुत है।

व्यासजीने पूछा—ऐश्वर्यशाली मुनिवर! वह अन्धक कौन था और भूतलपर किस वीर्यवान्के कुलमें उत्पन्न हुआ था? दैत्योंमें प्रधान तथा महामनस्वी उस बलवान् अन्धकका स्वरूप कैसा था और वह किसका पुत्र था? उसने परम तेजस्वी शम्भुकी गणाध्यक्षताको कैसे प्राप्त किया? यदि अन्धक गणेश्वर हो गया तब तो वह परम धन्यवादका पात्र है।

सनत्कुमारजीने कहा—मुने! पूर्वकालकी बात है, एक समय भक्तोंपर कृपा करनेवाले तथा देवताओंके चक्रवर्ती सम्राट् भगवान् शंकरको विहार करनेकी इच्छा हुई। तब वे पार्वती और गणोंको साथ ले अपने निवासभूत कैलास पर्वतसे चलकर काशीपुरीमें आये। वहाँ उन्होंने उस पुरीको अपनी राजधानी बनाया और भैरव नामक वीरको उसका रक्षक नियुक्त किया। फिर पार्वतीजीके साथ रहते हुए वे भक्तजनोंको सुख देनेवाली अनेक प्रकारकी लीलाएँ करने लगे। एक समय वे उसके वरदानके प्रभाववश अनेकों वीराग्रगण्य गणेश्वरों और शिवाके साथ मन्दराचलपर गये और वहाँ भी तरह-तरहकी क्रीडाएँ करने लगे। एक दिन जब प्रचण्ड पराक्रमी कपर्दी शिव मन्दराचलकी पूर्व दिशामें बैठे थे, उसी समय गिरिजाने नर्मक्रीडावश उनके नेत्र बंद कर दिये। इस प्रकार जब पार्वतीने मूँगे, सुवर्ण और कमलकी प्रभावाले अपने करकमलोंसे हरके नेत्र बंद कर दिये, तब उनके नेत्रोंके मुँद जानेके कारण वहाँ क्षणभरमें ही घोर अन्धकार फैल गया। पार्वतीके हाथोंका महेश्वरके शरीरसे स्पर्श होनेके कारण शम्भुके ललाटमें स्थित अग्निसे संतप्त होकर मदजल प्रकट हो गया और जलकी बहुत-सी बूँदें टपक पड़ीं। तदनन्तर उन बूँदोंने एक गर्भका रूप धारण कर लिया। उससे एक ऐसा जीव प्रकट हुआ, जिसका मुख विकराल था। वह अत्यन्त भयंकर, क्रोधी, कृतघ्न, अंधा, कुरूप, जटाधारी, काले रंगका, मनुष्यसे भिन्न, बेडौल और सुन्दर बालोंवाला था। उसके कण्ठसे घोर घर-घर शब्द निकल रहा था। वह कभी गाता, कभी हँसता और कभी रोने लगता था तथा जबड़ोंको चाटते हुए नाच रहा था। उस अद्भुत दृश्यवाले

* रुद्रसंहिता *४०५

जीवके प्रकट होनेपर शिवजी मुसकराकर पार्वतीजीसे बोले।

श्रीमहेश्वरने कहा—'प्रिये! मेरे नेत्रोंको मूँदकर तुमने ही तो यह कर्म किया है, फिर तुम उससे भय क्यों कर रही हो?' शंकरजीके उस वचनको सुनकर गौरी हँस पड़ीं और उनके नेत्रोंपरसे उन्होंने अपने हाथ हटा लिये। फिर तो वहाँ प्रकाश छा गया, परंतु उस प्राणीका रूप भयंकर ही बना रहा और अन्धकारसे उत्पन्न होनेके कारण उसके नेत्र भी अंधे थे। तब वैसे प्राणीको प्रकट हुआ देखकर गौरीने महेश्वरसे पूछा।

गौरीने कहा—भगवन्! मुझे सच-सच बताइये कि हमलोगोंके सामने प्रकट हुआ यह बेडौल प्राणी कौन है। यह तो अत्यन्त भयंकर है। किस निमित्तको लेकर किसने इसकी सृष्टि की है और यह किसका पुत्र है?

सनत्कुमारजी कहते हैं—महर्षे! जब लीला रचनेवाली तथा तीनों लोकोंकी जननी गौरीने सृष्टिकर्ताकी उस अंधी-सृष्टिके विषयमें यों प्रश्न किया, तब लीलाविहारी भगवान् शंकर अपनी प्रियाके उस वचनको सुनकर कुछ मुसकराये और इस प्रकार बोले।

महेश्वरने कहा—अद्भुत चरित्र रचनेवाली अम्बिके! सुनो। जब तुमने मेरे नेत्र मूँद लिये थे, उसी समय यह अद्भुत एवं प्रचण्ड पराक्रमी प्राणी मेरे पसीनेसे प्रकट हुआ। इसका नाम अन्धक है। तुम्हीं इसको उत्पन्न करनेवाली हो, अतः सखियोंसहित तुम्हें करुणापूर्वक इसकी गणोंसे यथायोग्य रक्षा करते रहना चाहिये। आर्ये! इस प्रकार बुद्धिपूर्वक विचार करके ही तुम्हें सब कार्य करना चाहिये।

सनत्कुमारजी कहते हैं—मुने! अपने स्वामीके ऐसे वचन सुनकर गौरीका हृदय करुणार्द्र हो गया। वे अपनी सखियोंसहित अन्धककी अपने पुत्रकी भाँति नाना प्रकारके उपायोंद्वारा रक्षा करने लगीं। तदनन्तर शिशिर-ऋतु आनेपर दैत्य हिरण्याक्ष पुत्रकी कामनासे उसी वनमें आया; क्योंकि उसकी पत्नीने उसके ज्येष्ठ बन्धुकी सन्तान-परम्पराको देखकर उसे सन्तानार्थ तपश्चर्याके लिये प्रेरित किया था। वहाँ वह कश्यपनन्दन हिरण्याक्ष वनका आश्रय ले पुत्र-प्राप्तिके लिये घोर तप करने लगा। उसके मनमें महेश्वरके दर्शनकी इच्छा थी, अतः वह क्रोध आदि दोषोंको अपने काबूमें करके ठूंठकी भाँति निश्चल होकर समाधिस्थ हो गया। द्विजेन्द्र! तब जिसकी ध्वजामें वृषका चिह्न वर्तमान है तथा जो पिनाक धारण करनेवाले हैं, वे महेश उसकी तपस्यासे पूर्णतया प्रसन्न होकर उसे वर प्रदान करनेके लिये चले और उस स्थानपर पहुँचकर दैत्यप्रवर हिरण्याक्षसे बोले।

महेशने कहा—दैत्यनाथ! अब तू अपनी इन्द्रियोंका विनाश मत कर। किसलिये तूने इस व्रतका आश्रय लिया है? तू अपना मनोरथ तो प्रकट कर। मैं वरदाता शंकर हूँ; अतः तेरी जो अभिलाषा होगी, वह सब मैं तुझे प्रदान करूँगा।

सनत्कुमारजी कहते हैं—महर्षे! महेश्वरके उस सरस वचनको सुनकर दैत्यराज हिरण्याक्ष परम प्रसन्न हुआ। उसने गिरीशके चरणोंमें नमस्कार करके अनेक प्रकारसे उनकी स्तुति की; फिर वह अंजलि बाँधे सिर झुकाकर कहने लगा।

हिरण्याक्षने कहा—चन्द्रभाल! मेरे

४०६* संक्षिप्त शिवपुराण *

उत्तम पराक्रमसम्पन्न तथा दैत्यकुलके अनुरूप कोई पुत्र नहीं है, इसीलिये मैंने इस व्रतका अनुष्ठान किया है। देवेश! मुझे परम बलशाली पुत्र दीजिये।

सनत्कुमारजी कहते हैं—मुने! दैत्यराजके उस वचनको सुनकर कृपालु शंकर प्रसन्न हो गये और उससे बोले—'दैत्याधिप! तेरे भाग्यमें तेरे वीर्यसे उत्पन्न होनेवाला पुत्र तो नहीं लिखा है, किंतु मैं तुझे एक पुत्र देता हूँ। मेरा एक पुत्र है, जिसका नाम अन्धक है। वह तेरे ही समान पराक्रमी और अजेय है। तू सम्पूर्ण दुःखोंको त्यागकर उसीको पुत्ररूपसे वरण कर ले और इस प्रकार पुत्र प्राप्त कर ले।'

सनत्कुमारजी कहते हैं—महर्षे! उससे यों कहकर गौरीके साथ विराजमान उन महात्मा भूतनाथ त्रिपुरारि शंकरने प्रसन्न होकर हिरण्याक्षको वह पुत्र दे दिया। इस प्रकार शिवजीसे पुत्र प्राप्त करके वह महामनस्वी दैत्य परम प्रसन्न हुआ। उसने अनेकों स्तोत्रोंद्वारा रुद्रकी पूजा करके प्रदक्षिणा की और फिर वह अपने राज्यको चला गया। गिरीशसे पुत्र प्राप्त कर लेनेके बाद वह प्रचण्ड पराक्रमी दैत्य सम्पूर्ण देवताओंको जीतकर इस पृथ्वीको अपने देश रसातलमें उठा ले गया। तब देवताओं, मुनियों और सिद्धोंने अनन्त पराक्रमी विष्णुकी आराधना की। फिर तो भगवान् विष्णु सर्वात्मक यज्ञमय विकराल वाराह-शरीर धारणकर थूथुनके अनेकों प्रहारोंसे पृथ्वीको विदीर्ण करके पाताललोकमें जा घुसे। वहाँ उन्होंने कभी न टूटनेवाले अपनी अगली दाढ़ोंसे तथा थूथुनसे सैकड़ों दैत्योंका कचूमर निकालकर अपने वज्र-सदृश कठोर पाद-प्रहारोंसे निशाचरोंकी सेनाको मथ डाला। तत्पश्चात् अद्भुत एवं प्रचण्ड तेजस्वी विष्णुने करोड़ों सूर्योंके समान प्रकाशमान सुदर्शन-चक्रसे हिरण्याक्षके प्रज्वलित सिरको काट लिया और दुष्ट दैत्योंको जलाकर भस्म कर दिया। यह देखकर देवराज इन्द्रको बड़ी प्रसन्नता हुई। उन्होंने उस असुर-राज्यपर अन्धकको अभिषिक्त कर दिया। फिर महात्मा इन्द्र विष्णुको अपनी दाढ़ोंद्वारा पाताललोकसे पृथ्वीको लाते हुए देखकर परम प्रसन्न हुए और अपने स्थानपर आकर पूर्ववत् स्वर्ग और भूतलकी रक्षा करने लगे। इधर वाराहरूप धारण करके उत्तम कार्य करनेवाले उग्ररूपधारी श्रीहरि प्रसन्नचित्त हुए समस्त देवों, मुनियों और पद्मयोनि ब्रह्माद्वारा प्रशंसित होकर अपने लोकको

  • रुद्रसंहिता * ४०७

चले गये। इस प्रकार वाराहरूपधारी विष्णु-द्वारा असुरराज हिरण्याक्षके मारे जानेपर समस्त देव, मुनि तथा अन्यान्य सभी जीव सुखी हो गये। (अध्याय ४२)


हिरण्यकशिपुकी तपस्या और ब्रह्मासे वरदान पाकर उसका अत्याचार, नृसिंहद्वारा उसका वध और प्रह्लादको राज्यप्राप्ति

सनत्कुमारजी कहते हैं—व्यासजी! इधर वराहरूपधारी श्रीहरिके द्वारा इस प्रकार भाईके मारे जानेपर हिरण्यकशिपु शोक और क्रोधसे संतप्त हो उठा। श्रीहरिके साथ वैर करना तो उसे रुचता ही था, अतः उसने संहारप्रेमी वीर असुरोंको प्रजाका विनाश करनेके लिये आज्ञा दे दी। तब वे संहारप्रिय असुर स्वामीकी आज्ञाको सिर चढ़ाकर देवताओं और प्रजाओंका विनाश करने लगे। इस प्रकार जब उन दुष्ट-चित्तवाले असुरोंद्वारा सारा देवलोक तहस-नहस कर दिया गया, तब देवता स्वर्गको छोड़कर गुप्तरूपसे भूतलपर विचरने लगे। उधर भाईकी मृत्युसे दुःखी हुए हिरण्यकशिपुने भाईको जलांजलि देकर उसकी स्त्री आदिको ढाढ़स बँधाया। तत्पश्चात् उस दैत्यराजने अपने लिये विचार किया कि ‘मैं अजेय, अजर और अमर हो जाऊँ। मेरा ही एकच्छत्र साम्राज्य रहे और मेरा प्रतिद्वन्द्वी कोई न रह जाय।’ यों धारणा बनाकर वह मन्दराचलपर गया और वहाँ एक गुफामें अत्यन्त घोर तपस्या करने लगा। उस समय वह पैरके अँगूठेके बल खड़ा था। उसकी भुजाएँ ऊपरको उठी थीं और दृष्टि आकाशकी ओर लगी थी। उसकी तपस्यासे संतप्त होकर देवताओंका मुख विकृत हो उठा। वे स्वर्गको छोड़कर ब्रह्मलोकमें जा पहुँचे और उन्होंने ब्रह्मासे अपना दुखड़ा कह सुनाया। व्यासजी! उन देवताओंके इस प्रकार कहनेपर स्वयम्भू ब्रह्मा भृगु, दक्ष आदिके साथ उस दैत्येश्वरके आश्रमपर गये। तब जिसने अपने तपसे सम्पूर्ण लोकोंको संतप्त कर दिया था, उस हिरण्यकशिपुने वर देनेके लिये आये हुए पद्मयोनि ब्रह्माको अपने सामने उपस्थित देखा। उधर पितामहने भी उससे कहा—‘वर माँग।’ तब जिसकी बुद्धि मोहित नहीं हुई थी, उस असुरने विधाताकी उस मधुर वाणीको सुनकर इस प्रकार कहा।

हिरण्यकशिपु बोला—ऐश्वर्यशाली प्रजापति! पितामह! मैं चाहता हूँ कि स्वर्गमें, भूतलपर, दिनमें, रातमें, ऊपर अथवा नीचे—कहीं भी शस्त्र, अस्त्र, पाश, वज्र, शुष्क वृक्ष, पर्वत, जल, अग्निके रूपमें शत्रुके प्रहारसे, देवता, दैत्य, मुनि, सिद्ध किंबहुना आपद्वारा रचे हुए जीवोंके हाथों मुझे कभी भी मृत्युका भय न हो।

सनत्कुमारजी कहते हैं—मुने! हिरण्यकशिपुके वैसे वचन सुनकर पद्मयोनि ब्रह्माके मनमें दयाका भाव जाग्रत् हो उठा। उन्होंने मन-ही-मन विष्णुको प्रणाम करके उससे कहा—‘दैत्येन्द्र! मैं तुझपर प्रसन्न हूँ,

४०८ * संक्षिप्त शिवपुराण *

अतः तुझे सारी वस्तुएँ प्राप्त होंगी। तूने छियानबे हजार वर्षोंतक तप किया है, अब तेरी कामना पूर्ण हो चुकी है; अतः तपसे विरत होकर उठ और दानवोंके राज्यका उपभोग कर।' ब्रह्माकी वाणी सुनकर हिरण्यकशिपुका मुख प्रसन्नतासे खिल उठा। इस प्रकार जब पितामहने उसे दानव-राज्यपर अभिषिक्त कर दिया, तब वह उन्मत्त हो उठा और त्रिलोकीको नष्ट करनेका विचार करने लगा। फिर तो उसने सम्पूर्ण धर्मोंका उच्छेद करके संग्राममें समस्त देवताओंको भी जीत लिया। तब देवता भागकर विष्णुके पास पहुँचे। वहाँ श्रीहरिने देवताओं और मुनियोंकी दुःखगाथा सुनकर उन्हें आश्वासन दिया और शीघ्र ही उस दैत्यके वध करनेका वचन दिया। तब देवता अपने स्थानको लौट गये। तदनन्तर महात्मा विष्णुने ऐसा रूप धारण किया, जो आधा सिंह और आधा मनुष्यका था। वह अत्यन्त भयंकर तथा विकराल दीख रहा था। उसका मुख खूब फैला हुआ था, नासिका बड़ी सुन्दर थी और नख तीखे थे। गर्दनपर जटाएँ लहरा रही थीं। दाढ़ें ही आयुध थे। उससे करोड़ों सूर्योंके समान प्रभा छिटक रही थी और उसका प्रभाव प्रलयकालीन अग्निके सदृश था। अधिक कहाँतक कहा जाय, वह रूप जगन्मय था। इसी रूपसे वे भगवान् भास्करके अस्ताचलकी शरण लेनेपर असुरोंकी नगरीमें प्रविष्ट हुए। उन अतुल प्रभावशाली नृसिंहको देखकर सभी दैत्य एक साथ उनपर टूट पड़े। तब उन अद्भुत पराक्रमी नृसिंहने महाबली दैत्योंके साथ युद्ध करके बहुतोंको मार डाला और बहुतोंको पकड़कर तोड़-मरोड़ दिया। फिर वे उस नगरमें घूमने लगे। तब उन सर्वमय सिंहको देखकर दैत्यराजके पुत्र प्रह्लादने राजासे कहा—'यह मृगेन्द्र तो जगन्मय दीख रहा है। यह यहाँ किसलिये आया है।'

प्रह्लादने पुनः कहा—पिताजी! मुझे तो ऐसा प्रतीत हो रहा है कि ये भगवान् अनन्त हैं और नृसिंहका रूप धारण करके आपके नगरमें प्रविष्ट हुए हैं; क्योंकि मुझे इनकी मूर्ति बड़ी विकराल दीख रही है। अतः आप युद्धसे हटकर इनकी शरणमें जाइये। इनसे बढ़कर त्रिलोकीमें दूसरा कोई योद्धा नहीं है, इसलिये आप इन मृगेन्द्रके सामने झुककर अपने राज्यका उपभोग कीजिये। अपने पुत्रकी बात सुनकर उस दुरात्माने उससे कहा—'बेटा! क्या तू भयभीत हो गया?' अपने पुत्रसे यों कहकर दैत्योंके अधिपति राजा हिरण्यकशिपुने महाबली दैत्योंको आज्ञा देते हुए कहा—'वीरो! तुमलोग इस बेडौल भ्रुकुटि और नेत्रवाले सिंहको पकड़ लो।' तब स्वामीकी आज्ञासे उन मृगेन्द्रको पकड़नेकी इच्छासे वे सभी बड़े-बड़े दैत्य रणभूमिमें घुसे; परंतु जैसे रूपकी अभिलाषासे अग्निमें प्रवेश करनेवाले पतंगे जल-भुन जाते हैं, उसी तरह वे सब-के-सब क्षणभरमें ही जलकर भस्म हो गये। दैत्योंके दग्ध हो जानेपर भी वह दैत्यराज सम्पूर्ण

* रुद्रसंहिता * ४०९

शस्त्र, अस्त्र, शक्ति, ऋष्टि, पाश, अंकुश और पावक आदिसे उन मृगेन्द्रके साथ लोहा लेता ही रहा। इस प्रकार बहुत कालतक भयानक युद्ध हुआ। अन्तमें उन नृसिंहने वज्रके समान कठोर अपनी अनेकों भुजाओंसे उस दैत्यको पकड़ लिया और उसे अपने जानुओंपर लिटाकर दानवोंके मर्मको विदीर्ण करनेवाले नखांकुरोंसे उसकी छाती चीर डाली तथा खूनसे लथपथ हुए उसके हृदयकमलको निकाल लिया। फिर तो उसी क्षण उसके प्राणपखेरू उड़ गये। तब भगवान् नृसिंहने बारंबारके आघातसे जिसके सारे अंग चूर-चूर हो गये थे, उस काष्ठभूत दैत्यको छोड़ दिया। उस समय उस देवशत्रुके मारे जानेपर उन्हें बड़ी प्रसन्नता हुई। उसी अवसरपर प्रह्लादने आकर उनके चरणोंमें सिर झुकाया। तब अद्भुत पराक्रमी विष्णुने प्रह्लादको बुलाकर उन्हें दैत्योंके राज्यपर अभिषिक्त कर दिया और स्वयं अतर्कित गतिको प्राप्त हो गये अर्थात् अन्तर्धान हो गये। तदनन्तर पितामह आदि समस्त सुरेश्वर परम प्रसन्न हो अपना कार्य सिद्ध करनेवाले पूजनीय भगवान् विष्णुको उसी दिशामें प्रणाम करके अपने-अपने धामको चले गये। विप्रवर! प्रसंगवश मैंने रुद्रसे अन्धककी उत्पत्ति, वराहसे हिरण्याक्षकी मृत्यु, नृसिंहके हाथों उसके भाईका विनाश और प्रह्लादकी राज्य-प्राप्तिका वर्णन कर दिया। द्विजश्रेष्ठ! अब मैं शिवकी कृपासे प्राप्त हुए अन्धकके प्रभावका, शंकरजीके साथ उसके युद्धका और पीछे जिस प्रकार उसे महेशके गणाध्यक्षपदकी प्राप्ति हुई, उस कथाका वर्णन करता हूँ, सुनो।

(अध्याय ४३)


भाइयोंके उपालम्भसे अन्धकका तप करना और वर पाकर त्रिलोकीको जीतकर स्वेच्छाचारमें प्रवृत्त होना, उसके मन्त्रियोंद्वारा शिव-परिवारका वर्णन, पार्वतीके सौन्दर्यपर मोहित होकर अन्धकका वहाँ जाना और नन्दीश्वरके साथ युद्ध, अन्धकके प्रहारसे नन्दीश्वरकी मूर्च्छा, पार्वतीके आवाहनसे देवियोंका प्रकट होकर युद्ध करना, शिवका आगमन और युद्ध, शिवद्वारा शुक्राचार्यका निगला जाना, शिवकी प्रेरणासे विष्णुका कालीरूप धारण करके दानवोंके रक्तका पान करना, शिवका अन्धकको अपने त्रिशूलमें पिरोना और युद्धकी समाप्ति

सनत्कुमारजी कहते हैं—मुनिवर! एक समय हिरण्याक्षका पुत्र अन्धक अपने भाइयोंके साथ विहारमें संलग्न था। उसी समय उसके कामासक्त मदान्ध भाइयोंनें

४१० * संक्षिप्त शिवपुराण *

उससे कहा—'अरे अन्धे! तुम्हें तो अब राज्यसे क्या प्रयोजन है? हिरण्याक्ष तो मूर्ख था, जो उसने घोर तपद्वारा शंकरजीको प्रसन्न करके भी तुम-जैसे कुरूप, बेडौल, कलिप्रिय और नेत्रहीनको प्राप्त किया! ऐसे तुम राज्यके भागी तो हो नहीं सकते; क्योंकि भला, तुम्हीं विचार करो कि कहीं दूसरेसे उत्पन्न हुआ पुत्र भी राज्य पाता है? सच पूछो तो निश्चय ही इस राज्यके भागी हमींलोग हैं।'

सनत्कुमारजी कहते हैं—मुने! उन लोगोंकी वह बात सुनकर अन्धक दीन हो गया। फिर उसने स्वयं ही बुद्धिपूर्वक विचार करके तरह-तरहकी बातोंसे उन्हें शान्त किया और रातके समय वह निर्जन वनमें चला गया। वहाँ उसने हजारों वर्षोंतक घोर तप करके अपने शरीरको सुखा डाला और अन्तमें उस शरीरको अग्निमें होम देना चाहा। तब ब्रह्माजीने उसे वैसा करनेसे रोककर कहा—'दानव! अब तू वर माँग ले। सारे संसारमें जिस दुर्लभ वस्तुको प्राप्त करनेकी तेरी अभिलाषा हो, उसे तू मुझसे ले ले।' पद्मयोनि ब्रह्माके वचनको सुनकर वह दैत्य दीनता एवं नम्रतापूर्वक कहने लगा—'भगवन्! जिन निष्ठुरोंने मेरा राज्य छीन लिया है, वे सब दैत्य आदि मेरे भृत्य हो जायँ, मुझ अंधेको दिव्य चक्षु प्राप्त हो जाय, इन्द्र आदि देवता मुझे कर दिया करें और देवता, दैत्य, गन्धर्व, यक्ष, नाग, मनुष्य, दैत्योंके शत्रु नारायण, सर्वमय शंकर तथा अन्यान्य किन्हीं भी प्राणियोंसे मेरी मृत्यु न हो।' उसके उस अत्यन्त दारुण वचनको सुनकर ब्रह्माजी सशंकित हो उठे और उससे बोले।

ब्रह्माजीने कहा—दैत्येन्द्र! ये सारी बातें तो हो जायँगी, किन्तु तू अपने विनाशका कोई कारण भी तो स्वीकार कर ले; क्योंकि जगत्में कोई ऐसा प्राणी न हुआ है और न आगे होगा ही, जो कालके गालमें न गया हो। फिर तुझ-जैसे सत्पुरुषोंको तो अत्यन्त लंबे जीवनका विचार त्याग ही देना चाहिये। ब्रह्माके इस अनुनयभरे वचनको सुनकर वह दैत्य पुनः बोला।

अन्धकने कहा—प्रभो! तीनों कालोंमें जो उत्तम, मध्यम और नीच नारियाँ होती हैं, उन्हीं नारियोंमें कोई रत्नभूता नारी मेरी भी जननी होगी। वह मनुष्यलोकके लिये दुर्लभ तथा शरीर, मन और वचनसे भी अगम्य है। उसमें राक्षस-भावके कारण जब मेरी काम-भावना उत्पन्न हो जाय, तभी मेरा नाश हो। उसकी बात सुनकर स्वयम्भू भगवान् ब्रह्माको महान् आश्चर्य हुआ। वे शंकरजीके चरणकमलोंका स्मरण करने लगे। तब शम्भुकी आज्ञा पाकर वे उस अन्धकसे बोले।

ब्रह्माजीने कहा—दैत्यवर! तू जो कुछ चाहता है, तेरे वे सभी सकाम वचन पूर्ण होंगे। दैत्येन्द्र! अब तू उठ, अपना अभीष्ट

* रुद्रसंहिता * ४११

प्राप्त कर और सदा वीरोंके साथ युद्ध करता रह। मुनीश! हिरण्याक्षपुत्र अन्धकके शरीरमें नसें और हड्डियाँ ही शेष रह गयी थीं। वह ब्रह्माके ऐसे वचनको सुनकर शीघ्र ही भक्तिपूर्वक उन लोकेश्वरके चरणोंमें लोट गया और इस प्रकार बोला।

अन्धकने कहा—विभो! जब मेरे शरीरमें नसें और हड्डियाँमात्र ही शेष रह गयी हैं, तब भला इस देहसे शत्रुसेनामें प्रवेश करके मैं कैसे युद्ध कर सकूँगा; अतः अब आप अपने पवित्र हाथसे मेरा स्पर्श करके इस शरीरको मांसल बना दीजिये।

सनत्कुमारजी कहते हैं—महर्षे! अन्धककी प्रार्थना सुनकर ब्रह्माजीने अपने हाथसे उसके शरीरका स्पर्श किया और फिर वे मुनिगणों तथा सिद्धसमूहोंसे भलीभाँति पूजित हो देवताओंके साथ अपने धामको चले गये। ब्रह्माके स्पर्श करते ही उस दैत्यराजका शरीर भरा-पूरा हो गया, जिससे उसमें बलका संचार हो आया तथा नेत्रोंके प्राप्त हो जानेसे वह सुन्दर दीखने लगा। तब उसने प्रसन्नतापूर्वक अपने नगरमें प्रवेश किया। उस समय प्रह्लाद आदि श्रेष्ठ दानवोंने जब उसे वरदान प्राप्त करके आया हुआ जाना, तब वे सारा राज्य उसे समर्पित करके उसके वशवर्ती भृत्य हो गये। तदनन्तर अन्धक सेना और भृत्य-वर्गको साथ ले स्वर्गको जीतनेके लिये गया। वहाँ संग्राममें समस्त देवताओंको पराजित करके उसने वज्रधारी इन्द्रको अपना करद बना लिया। उसने यत्र-तत्र बहुत-सी लड़ाइयाँ लड़कर नागों, सुपर्णों, श्रेष्ठ राक्षसों, गन्धर्वों, यक्षों, मनुष्यों, बड़े-बड़े पर्वतों, वृक्षों और सिंह आदि समस्त चौपायोंको भी जीत लिया। यहाँतक कि उसने चराचर त्रिलोकीको अपने वशमें कर लिया। तदनन्तर वह रसातलमें, भूतलपर तथा स्वर्गमें जितनी सुन्दर रूपवाली नारियाँ थीं, उनमेंसे हजारोंको, जो अत्यन्त दर्शनीय तथा अपने अनुकूल थीं, साथ लेकर विभिन्न पर्वतोंपर तथा नदियोंके रमणीय तटोंपर विहार करने लगा। दैत्यराज अन्धक सदा दुष्टोंका ही संग करता था। उसकी बुद्धि मदसे अन्धी हो गयी थी, जिससे उस मूढ़को इसका कुछ भी ज्ञान नहीं रह गया कि परलोकमें आत्माको सुख देनेवाला भी कोई कर्म करना चाहिये। इस प्रकार वह महामनस्वी दैत्य उन्मत्त हो और अपने सारे प्रधान-प्रधान पुत्रोंको कुतर्कवादसे पराजित करके दैत्योंसहित सम्पूर्ण वैदिक धर्मोंका विनाश करता हुआ विचरण करने लगा। वह धनके मदसे अभिभूत हो वेद, देवता, ब्राह्मण और गुरु आदि किसीको भी नहीं मानता था। प्रारब्धवश उसकी आयु समाप्त हो चुकी थी, इसीसे वह स्वेच्छाचारमें प्रवृत्त हो व्यर्थमें ही अपनी आयुके शेष दिन गँवाता हुआ रमण कर रहा था। उस दानवश्रेष्ठके तीन मन्त्री थे, जिनका नाम था—दुर्योधन, वैधस और हस्ती। एक समय उन तीनोंने उस पर्वतके किसी रमणीय

४१२ * संक्षिप्त शिवपुराण *

स्थानपर एक परम रूपवती नारीको देखा। उसे देखकर वे शीघ्रगामी श्रेष्ठ दैत्य हर्षमग्न हो तुरंत ही महादैत्यपति वीरवर अन्धकके पास पहुँचे और बड़े प्रेमसे उस देखी हुई घटनाका वर्णन करने लगे।

मन्त्रियोंने कहा—दैत्येन्द्र! यहाँ एक गुफाके भीतर हमने एक मुनिको देखा है। ध्यानस्थ होनेके कारण उसके नेत्र बंद हैं। वह बड़ा रूपवान् है। उसके मस्तकपर अर्धचन्द्रकी कला अपनी छटा बिखेर रही है और कमरमें गजेन्द्रकी खाल बँधी हुई है। बड़े-बड़े नाग उसके सारे शरीरमें लिपटे हुए हैं। खोपड़ियोंकी माला ही उस जटाधारीका आभूषण है। उसके हाथमें त्रिशूल है तथा एक विशाल धनुष, बाण और तूणीर भी वह धारण किये हुए है। उसका अक्षसूत्र स्पष्ट दीख रहा है। उसके चार भुजाएँ तथा लंबी-लंबी जटाएँ हैं। वह खड्ग, त्रिशूल और लकुट धारण किये हुए है। उसकी आकृति अत्यन्त गौर है और उसपर भस्मका अनुलेप लगा हुआ है। वह अपने उत्कृष्ट तेजसे सुशोभित हो रहा है। इस प्रकार उस श्रेष्ठ तपस्वीका सारा वेष ही अद्भुत है। उससे थोड़ी ही दूरपर हमने एक और पुरुषको देखा है, जो विकराल वानर-सा है। उसका मुख बड़ा भयंकर है। वह सभी आयुध धारण किये हुए है, परंतु उसका हाथ रूक्ष है। वह उस तपस्वीकी रक्षामें तत्पर है। उसके पास ही एक बूढ़ा सफेद रंगका बैल भी बैठा है। उस बैठे हुए तपस्वीके पार्श्वभागमें हमने एक शुभलक्षणसम्पन्ना नारीको भी देखा है। वह भूतलपर रत्नस्वरूपा है। उसका रूप बड़ा मनोरम है और तरुणी होनेके नाते वह मनको मोहे लेती है। मूँगे, मोती, मणि, सुवर्ण, रत्न और उत्तम वस्त्रोंसे वह सुसज्जित है। उसके गलेमें सुन्दर मालाएँ लटक रही हैं। (कहाँतक कहें, वह इतनी सुन्दरी है कि) जिसने उसे एक बार देख लिया, उसीका नेत्र धारण करना सफल है। उसे फिर इस लोकमें अन्य वस्तुओंके देखनेसे क्या प्रयोजन। वह दिव्य नारी पुण्यात्मा मुनिवर महेशकी मान्या एवं प्रियतमा भार्या है। दैत्येन्द्र! आप तो उत्तमोत्तम रत्नोंका उपभोग करने-वाले हैं। अतः उसे यहाँ बुलवाकर देखिये। वह आपके भी देखनेयोग्य है।

सनत्कुमारजी कहते हैं—मुनिश्रेष्ठ! मन्त्रियोंके उन वचनोंको सुनकर दैत्यराज अन्धक कामातुर हो उठा। उसके सारे शरीरमें कम्प छा गया। फिर तो उसने तुरंत ही दुर्योधन आदिको उस मुनिके पास भेजा। मन्त्रियोंने वहाँ जाकर मुनीश्वरको प्रणाम करके उनसे अन्धकासुरका संदेश कहा तथा बदलेमें शिवजीका उत्तर सुनकर वे लौटकर अन्धकसे बोले।

मन्त्रियोंने कहा—राजन्! आप तो सम्पूर्ण दैत्योंके स्वामी हैं, फिर भी उस महान् पराक्रमी वीरवर तपस्वी मुनिने अपनी बुद्धिसे त्रिलोकीको तृणके समान समझकर हँसते हुए आपके लिये ऐसी बातें कही हैं—'उस निशाचरका शौर्य और धैर्य अस्थिर हैं। वह दानव कृपण, सत्त्वहीन,