भारतकोश
शिव पुराण

शिव पुराण

Shiva Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished850 पृष्ठ

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पृष्ठ 508
  • संक्षिप्त शिवपुराण * ४९४

है। मुने! यह जो दूसरा ज्योतिर्लिंग है, वह दर्शन और पूजन करनेसे महा सुखकारक होता है और अन्तमें मुक्ति भी प्रदान कर देता है—इसमें तनिक भी संशय नहीं है। तात! शंकरजीका महाकाल नामक तीसरा अवतार उज्जयिनी नगरीमें हुआ। वह अपने भक्तोंकी रक्षा करनेवाला है। एक बार रत्नमालनिवासी दूषण नामक असुर, जो वैदिक धर्मका विनाशक, विप्रद्रोही तथा सब कुछ नष्ट करनेवाला था, उज्जयिनीमें जा पहुँचा। तब वेद नामक ब्राह्मणके पुत्रने शिवजीका ध्यान किया। फिर तो शंकरजीने तुरंत ही प्रकट होकर हुंकारद्वारा उस असुरको भस्म कर दिया। तत्पश्चात् अपने भक्तोंका सर्वथा पालन करनेवाले शिव देवताओंके प्रार्थना करनेपर महाकाल नामक ज्योतिर्लिंगस्वरूपसे वहीं प्रतिष्ठित हो गये। इन महाकाल नामक लिंगका प्रयत्नपूर्वक दर्शन और पूजन करनेसे मनुष्यकी सारी कामनाएँ पूर्ण हो जाती हैं और अन्तमें उसे परम गति प्राप्त होती है। परम आत्मबलसे सम्पन्न परमेश्वर शम्भुने भक्तोंको अभीष्ट फल प्रदान करनेवाला ओंकार नामक चौथा अवतार धारण किया। मुने! विन्ध्यगिरिने भक्तिपूर्वक विधिविधानसे शिवजीका पार्थिवलिंग स्थापित किया। उसी लिंगसे विन्ध्यका मनोरथ पूर्ण करनेवाले महादेव प्रकट हुए। तब देवताओंके प्रार्थना करनेपर भुक्ति-मुक्तिके प्रदाता भक्तवत्सल लिंगरूपी शंकर वहाँ दो रूपोंमें विभक्त हो गये। मुनीश्वर! उनमें एक भाग ओंकारमें ओंकारेश्वर नामक उत्तम लिंगके रूपमें प्रतिष्ठित हुआ और दूसरा पार्थिव-लिंग परमेश्वर नामसे प्रसिद्ध हुआ। मुने! इन दोनोंमें जिस किसीका भी दर्शन-पूजन किया जाय, उसे भक्तोंकी अभिलाषा पूर्ण करनेवाला समझना चाहिये। महामुने ! इस प्रकार मैंने तुम्हें इन दोनों महादिव्य ज्योतिर्लिंगोंका वर्णन सुना दिया। परमात्मा शिवके पाँचवें अवतारका नाम है केदारेश। वह केदारमें ज्योतिर्लिंगरूपसे स्थित है। मुने! वहाँ श्रीहरिके जो नर-नारायण नामक अवतार हैं, उनके प्रार्थना करनेपर शिवजी हिमगिरिके केदारशिखरपर स्थित हो गये। वे दोनों उस केदारेश्वर लिंगकी नित्य पूजा करते हैं। वहाँ शम्भु दर्शन और पूजन करनेवाले भक्तोंको अभीष्ट प्रदान करते हैं। तात! सर्वेश्वर होते हुए भी शिव इस खण्डके विशेषरूपसे स्वामी हैं। शिवजीका यह अवतार सम्पूर्ण अभीष्टोंको प्रदान करनेवाला है। महाप्रभु शम्भुके छठे अवतारका नाम भीमशंकर है। इस अवतारमें उन्होंने बड़ी-बड़ी लीलाएँ की हैं और भीमासुरका विनाश किया है। कामरूप देशके अधिपति राजा सुदक्षिण शिवजीके भक्त थे। भीमासुर उन्हें पीड़ित कर रहा था। तब शंकरजीने अपने भक्तको दुःख देनेवाले उस अद्भुत असुरका वध करके उनकी रक्षा की। फिर राजा सुदक्षिणके प्रार्थना करनेपर स्वयं शंकरजी डाकिनीमें भीमशंकर नामक ज्योतिर्लिंगस्वरूपसे स्थित हो गये। मुने! जो समस्त ब्रह्माण्डस्वरूप तथा भोग-मोक्षका प्रदाता है, वह विश्वेश्वर नामक सातवाँ अवतार काशीमें हुआ। मुक्तिदाता सिद्धस्वरूप स्वयं भगवान् शंकर अपनी पुरी काशीमें ज्योतिर्लिंगरूपमें स्थित हैं। विष्णु आदि सभी देवता, कैलासपति शिव और भैरव नित्य उनकी