शिव पुराण
Shiva Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
- संक्षिप्त शिवपुराण * ४९४
है। मुने! यह जो दूसरा ज्योतिर्लिंग है, वह दर्शन और पूजन करनेसे महा सुखकारक होता है और अन्तमें मुक्ति भी प्रदान कर देता है—इसमें तनिक भी संशय नहीं है। तात! शंकरजीका महाकाल नामक तीसरा अवतार उज्जयिनी नगरीमें हुआ। वह अपने भक्तोंकी रक्षा करनेवाला है। एक बार रत्नमालनिवासी दूषण नामक असुर, जो वैदिक धर्मका विनाशक, विप्रद्रोही तथा सब कुछ नष्ट करनेवाला था, उज्जयिनीमें जा पहुँचा। तब वेद नामक ब्राह्मणके पुत्रने शिवजीका ध्यान किया। फिर तो शंकरजीने तुरंत ही प्रकट होकर हुंकारद्वारा उस असुरको भस्म कर दिया। तत्पश्चात् अपने भक्तोंका सर्वथा पालन करनेवाले शिव देवताओंके प्रार्थना करनेपर महाकाल नामक ज्योतिर्लिंगस्वरूपसे वहीं प्रतिष्ठित हो गये। इन महाकाल नामक लिंगका प्रयत्नपूर्वक दर्शन और पूजन करनेसे मनुष्यकी सारी कामनाएँ पूर्ण हो जाती हैं और अन्तमें उसे परम गति प्राप्त होती है। परम आत्मबलसे सम्पन्न परमेश्वर शम्भुने भक्तोंको अभीष्ट फल प्रदान करनेवाला ओंकार नामक चौथा अवतार धारण किया। मुने! विन्ध्यगिरिने भक्तिपूर्वक विधिविधानसे शिवजीका पार्थिवलिंग स्थापित किया। उसी लिंगसे विन्ध्यका मनोरथ पूर्ण करनेवाले महादेव प्रकट हुए। तब देवताओंके प्रार्थना करनेपर भुक्ति-मुक्तिके प्रदाता भक्तवत्सल लिंगरूपी शंकर वहाँ दो रूपोंमें विभक्त हो गये। मुनीश्वर! उनमें एक भाग ओंकारमें ओंकारेश्वर नामक उत्तम लिंगके रूपमें प्रतिष्ठित हुआ और दूसरा पार्थिव-लिंग परमेश्वर नामसे प्रसिद्ध हुआ। मुने! इन दोनोंमें जिस किसीका भी दर्शन-पूजन किया जाय, उसे भक्तोंकी अभिलाषा पूर्ण करनेवाला समझना चाहिये। महामुने ! इस प्रकार मैंने तुम्हें इन दोनों महादिव्य ज्योतिर्लिंगोंका वर्णन सुना दिया। परमात्मा शिवके पाँचवें अवतारका नाम है केदारेश। वह केदारमें ज्योतिर्लिंगरूपसे स्थित है। मुने! वहाँ श्रीहरिके जो नर-नारायण नामक अवतार हैं, उनके प्रार्थना करनेपर शिवजी हिमगिरिके केदारशिखरपर स्थित हो गये। वे दोनों उस केदारेश्वर लिंगकी नित्य पूजा करते हैं। वहाँ शम्भु दर्शन और पूजन करनेवाले भक्तोंको अभीष्ट प्रदान करते हैं। तात! सर्वेश्वर होते हुए भी शिव इस खण्डके विशेषरूपसे स्वामी हैं। शिवजीका यह अवतार सम्पूर्ण अभीष्टोंको प्रदान करनेवाला है। महाप्रभु शम्भुके छठे अवतारका नाम भीमशंकर है। इस अवतारमें उन्होंने बड़ी-बड़ी लीलाएँ की हैं और भीमासुरका विनाश किया है। कामरूप देशके अधिपति राजा सुदक्षिण शिवजीके भक्त थे। भीमासुर उन्हें पीड़ित कर रहा था। तब शंकरजीने अपने भक्तको दुःख देनेवाले उस अद्भुत असुरका वध करके उनकी रक्षा की। फिर राजा सुदक्षिणके प्रार्थना करनेपर स्वयं शंकरजी डाकिनीमें भीमशंकर नामक ज्योतिर्लिंगस्वरूपसे स्थित हो गये। मुने! जो समस्त ब्रह्माण्डस्वरूप तथा भोग-मोक्षका प्रदाता है, वह विश्वेश्वर नामक सातवाँ अवतार काशीमें हुआ। मुक्तिदाता सिद्धस्वरूप स्वयं भगवान् शंकर अपनी पुरी काशीमें ज्योतिर्लिंगरूपमें स्थित हैं। विष्णु आदि सभी देवता, कैलासपति शिव और भैरव नित्य उनकी
* शतरुद्रसंहिता * ४९५
पूजा करते हैं। जो काशी-विश्वनाथके भक्त हैं और नित्य उनके नामोंका जप करते रहते हैं, वे कर्मोंसे निर्लिप्त होकर कैवल्यपदके भागी होते हैं। चन्द्रशेखर शिवका जो त्र्यम्बक नामक आठवाँ अवतार है, वह गौतम ऋषिके प्रार्थना करनेपर गौतमी नदीके तटपर प्रकट हुआ था। गौतमकी प्रार्थनासे उन मुनिको प्रसन्न करनेके लिये शंकरजी प्रेमपूर्वक ज्योतिर्लिंगस्वरूपसे वहाँ अचल होकर स्थित हो गये। अहो! उन महेश्वरका दर्शन और स्पर्श करनेसे सारी कामनाएँ सिद्ध हो जाती हैं। तत्पश्चात् मुक्ति भी मिल जाती है। शिवजीके अनुग्रहसे शंकरप्रिया परम पावनी गंगा गौतमके स्नेहवश वहाँ गौतमी नामसे प्रवाहित हुईं। उनमें नवाँ अवतार वैद्यनाथ नामसे प्रसिद्ध है। इस अवतारमें बहुत-सी विचित्र लीलाएँ करनेवाले भगवान् शंकर रावणके लिये आविर्भूत हुए थे। उस समय रावणद्वारा अपने लाये जानेको ही कारण मानकर महेश्वर ज्योतिर्लिंगस्वरूपसे चिताभूमिमें प्रतिष्ठित हो गये। उस समयसे वे त्रिलोकीमें वैद्यनाथेश्वर नामसे विख्यात हुए। वे भक्तिपूर्वक दर्शन और पूजन करनेवालेको भोग-मोक्षके प्रदाता हैं। मुने! जो लोग इन वैद्यनाथेश्वर शिवके माहात्म्यको पढ़ते अथवा सुनते हैं, उन्हें यह भुक्ति-मुक्तिका भागी बना देता है। दसवाँ नागेश्वरावतार कहलाता है। यह अपने भक्तोंकी रक्षाके लिये प्रादुर्भूत हुआ था। यह सदा दुष्टोंको दण्ड देता रहता है। इस अवतारमें शिवजीने दारुक नामक राक्षसको, जो धर्मघाती था, मारकर वैश्योंके स्वामी अपने सुप्रिय नामक भक्तकी रक्षा की थी। तत्पश्चात् बहुत-सी लीलाएँ करनेवाले वे परात्पर प्रभु शम्भु लोकोंका उपकार करनेके लिये अम्बिकासहित ज्योतिर्लिंगस्वरूपसे स्थित हो गये। मुने! नागेश्वर नामक उस शिवलिंगका दर्शन तथा अर्चन करनेसे राशि-के-राशि महान् पातक तुरंत विनष्ट हो जाते हैं। मुने! शिवजीका ग्यारहवाँ अवतार रामेश्वरावतार कहलाता है। वह श्रीरामचन्द्रका प्रिय करनेवाला है। उसे श्रीरामने ही स्थापित किया था। जिन भक्तवत्सल शंकरने परम प्रसन्न होकर श्रीरामको प्रेमपूर्वक विजयका वरदान दिया, वे ही लिंगरूपमें आविर्भूत हुए। मुने! तब श्रीरामके अत्यन्त प्रार्थना करनेपर वे सेतुबन्धपर ज्योतिर्लिंगरूपसे स्थित हो गये! उस समय श्रीरामने उनकी भलीभाँति सेवा-पूजा की। रामेश्वरकी अद्भुत महिमाकी भूतलपर किसीसे तुलना नहीं की जा सकती। यह सर्वदा भुक्ति-मुक्तिकी प्रदायिनी तथा भक्तोंकी कामना पूर्ण करनेवाली है। जो मनुष्य सद्भक्तिपूर्वक रामेश्वरलिंगको गंगाजलसे स्नान करायेगा, वह जीवन्मुक्त ही है। वह इस लोकमें जो देवताओंके लिये भी दुर्लभ हैं, ऐसे सम्पूर्ण भोगोंको भोगनेके पश्चात् परम ज्ञानको प्राप्त होगा। फिर उसे कैवल्य मोक्ष मिल जायगा। घुश्मेश्वरावतार शंकरजीका बारहवाँ अवतार है। वह नाना प्रकारकी लीलाओंका कर्ता, भक्तवत्सल तथा घुश्माको आनन्द देनेवाला है। मुने! घुश्माका प्रिय करनेके लिये भगवान् शंकर दक्षिणदिशामें स्थित
४९६ * संक्षिप्त शिवपुराण *
देवशैलके निकटवर्ती एक सरोवरमें प्रकट हुए। मुने! घुश्माके पुत्रको सुदेहने मार डाला था। (उसे जीवित करनेके लिये घुश्माने शिवजीकी आराधना की।) तब उनकी भक्तिसे संतुष्ट होकर भक्तवत्सल शम्भुने उनके पुत्रको बचा लिया। तदनन्तर कामनाओंके पूरक शम्भु घुश्माकी प्रार्थनासे उस तड़ागमें ज्योतिर्लिंगरूपसे स्थित हो गये! उस समय उनका नाम घुश्मेश्वर हुआ। जो मनुष्य उस शिवलिंगका भक्ति-पूर्वक दर्शन तथा पूजन करता है, वह इस लोकमें सम्पूर्ण सुखोंको भोगकर अन्तमें मुक्ति-लाभ करता है। सनत्कुमारजी! इस प्रकार मैंने तुमसे इस बारह दिव्य ज्योतिर्लिंगोंका वर्णन किया। ये सभी भोग और मोक्षके प्रदाता हैं। जो मनुष्य ज्योतिर्लिंगोंकी इस कथाको पढ़ता अथवा सुनता है, वह सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त हो जाता है तथा भोग-मोक्षको प्राप्त करता है। इस प्रकार मैंने इस शतरुद्रनामकी संहिताका वर्णन कर दिया। यह शिवके सौ अवतारोंकी उत्तम कीर्तिसे सम्पन्न तथा सम्पूर्ण अभीष्ट फलोंको देनेवाली है। जो मनुष्य इसे नित्य समाहितचित्तसे पढ़ता अथवा सुनता है, उसकी सारी लालसाएँ पूर्ण हो जाती हैं और अन्तमें उसे निश्चय ही मुक्ति मिल जाती है।
(अध्याय ४२)
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॥ शतरुद्रसंहिता सम्पूर्ण ॥
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कोटिरुद्रसंहिता
कोटिरुद्रसंहिता
द्वादश ज्योतिर्लिंगों तथा उनके उपलिंगोंका वर्णन एवं उनके दर्शन-पूजनकी महिमा
यो धत्ते निजमाययैव भुवनाकारं विकारोज्झितो
यस्याहुः करुणाकटाक्षविभवौ स्वर्गापवर्गाभिधौ।
प्रत्यग्बोधसुखाद्वयं हृदि सदा पश्यन्ति यं योगिन-
स्तस्मै शैलसुताञ्चितार्द्धवपुषे शश्वन्नमस्तेजसे॥ १॥
जो निर्विकार होते हुए भी अपनी मायासे ही विराट् विश्वका आकार धारण कर लेते हैं, स्वर्ग और अपवर्ग (मोक्ष) जिनके कृपा-कटाक्षके ही वैभव बताये जाते हैं तथा योगीजन जिन्हें सदा अपने हृदयके भीतर अद्वितीय आत्मज्ञानानन्द-स्वरूपमें ही देखते हैं, उन तेजोमय भगवान् शंकरको, जिनका आधा शरीर शैलराजकुमारी पार्वतीसे सुशोभित है, निरन्तर मेरा नमस्कार है॥ १॥
कृपाललितवीक्षणं स्मितमनोज्ञवक्राम्बुजं
शशाङ्ककलयोज्ज्वलं शमितघोरतापत्रयम्।
करोतु किमपि स्फुरत्परमसौख्यसच्चिद्वपु-
र्धराधरसुताभुजोद्वलयितं महो मङ्गलम्॥ २॥
जिसकी कृपापूर्ण चितवन बड़ी ही सुन्दर है, जिसका मुखारविन्द मन्द मुसकानकी छटासे अत्यन्त मनोहर दिखायी देता है, जो चन्द्रमाकी कलासे परम उज्ज्वल है, जो आध्यात्मिक आदि तीनों तापोंको शान्त कर देनेमें समर्थ है, जिसका स्वरूप सच्चिन्मय एवं परमानन्दरूपसे प्रकाशित होता है तथा जो गिरिराजनन्दिनी पार्वतीके भुजपाशसे आवेष्टित है, वह शिव नामक कोई अनिर्वचनीय तेजःपुंज सबका मंगल करे॥ २॥
ऋषि बोले—सूतजी! आपने सम्पूर्ण लोकोंके हितकी कामनासे नाना प्रकारके आख्यानोंसे युक्त जो शिवावतारका माहात्म्य बताया है, वह बहुत ही उत्तम है। तात! आप पुनः शिवके परम उत्तम माहात्म्यका तथा शिवलिंगकी महिमाका प्रसन्नतापूर्वक वर्णन कीजिये। आप शिवभक्तोंमें श्रेष्ठ हैं, अतः धन्य हैं। प्रभो! आपके मुखारविन्दसे निकले हुए भगवान् शिवके सुरम्य यशरूपी अमृतका अपने कर्णपुटोंद्वारा पान करके हम तृप्त नहीं हो रहे हैं, अतः फिर उसीका वर्णन कीजिये। व्यासशिष्य! भूमण्डलमें, तीर्थ-तीर्थमें जो-जो शुभ लिंग हैं अथवा अन्य स्थलोंमें भी जो-जो प्रसिद्ध शिवलिंग विराजमान हैं, परमेश्वर शिवके उन सभी दिव्य लिंगोंका समस्त लोकोंके हितकी इच्छासे आप वर्णन कीजिये।
सूतजीने कहा—महर्षियो! सम्पूर्ण तीर्थ लिंगमय हैं। सब कुछ लिंगमें ही प्रतिष्ठित है। उन शिवलिंगोंकी कोई गणना नहीं है, तथापि मैं उनका किंचित् वर्णन करता हूँ। जो कोई भी दृश्य देखा जाता है तथा जिसका वर्णन एवं स्मरण किया जाता है, वह सब भगवान् शिवका ही रूप है; कोई भी वस्तु शिवके स्वरूपसे भिन्न नहीं है। साधुशिरोमणियो! भगवान् शम्भुने सब लोगोंपर अनुग्रह करनेके लिये ही देवता, असुर और मनुष्योंसहित तीनों लोकोंको लिंगरूपसे व्याप्त कर रखा है। समस्त लोकोंपर कृपा करनेके उद्देश्यसे ही भगवान् महेश्वर तीर्थ-तीर्थमें और अन्य स्थलोंमें भी नाना प्रकारके लिंग धारण करते हैं। जहाँ-जहाँ जब-जब भक्तोंंने भक्तिपूर्वक भगवान् शम्भुका स्मरण किया, वहाँ-वहाँ तब-तब अवतार ले कार्य करके वे स्थित हो गये; लोकोंका उपकार करनेके लिये उन्होंने
४९८ * संक्षिप्त शिवपुराण *
स्वयं अपने स्वरूपभूत लिंगकी कल्पना की। उस लिंगकी पूजा करके शिवभक्त पुरुष अवश्य सिद्धि प्राप्त कर लेता है। ब्राह्मणो! भूमण्डलमें जो लिंग हैं, उनकी गणना नहीं हो सकती; तथापि मैं प्रधान-प्रधान शिवलिंगोंका परिचय देता हूँ। मुनिश्रेष्ठ शौनक! इस भूतलपर जो मुख्य-मुख्य ज्योतिर्लिंग हैं, उनका आज मैं वर्णन करता हूँ। उनका नाम सुननेमात्रसे पाप दूर हो जाता है। सौराष्ट्रमें सोमनाथ$^१$, श्रीशैलपर मल्लिकार्जुन$^२$, उज्जैनीमें महाकाल$^३$, ओंकारतीर्थमें परमेश्वर$^४$, हिमालयके शिखरपर केदार$^५$, डाकिनीमें भीमशंकर$^६$, वाराणसीमें विश्वनाथ$^७$, गोदावरीके तटपर त्र्यम्बक$^८$, चिताभूमिमें वैद्यनाथ$^९$, दारुकावनमें नागेश$^{१०}$, सेतुबन्धमें रामेश्वर$^{११}$ तथा शिवालयमें घुश्मेश्वरका$^१$$^२$
१. श्रीसोमनाथका दर्शन करनेके लिये काठियावाड़ प्रदेशके अन्तर्गत प्रभासक्षेत्रमें जाना चाहिये।
२. श्रीमल्लिकार्जुन नामक ज्योतिर्लिंग जिस पर्वतपर विराजमान है, उसका नाम श्रीशैल या श्रीपर्वत है। यह स्थान मद्रास प्रान्तके कृष्णा जिलेमें कृष्णा नदीके तटपर है। इसे दक्षिणका कैलास कहते हैं।
३. महाकाल या महाकालेश्वर मालवा प्रदेशमें क्षिप्रा नदीके तटपर उज्जैन नामक नगरीमें विराजमान है। उज्जैनको अवन्तिकापुरी भी कहते हैं।
४. इस शिवलिंगको ओंकारेश्वर भी कहते हैं। ओंकारेश्वरका स्थान मालवा प्रान्तमें नर्मदा नदीके तटपर है। उज्जैनसे खंडवा जानेवाली रेलवेकी छोटी लाइनपर मोरटक्का नामक स्टेशन है। वहाँसे यह स्थान ७ मील दूर है। यहाँ ओंकारेश्वर और अमलेश्वर नामक दो पृथक्-पृथक् लिंग हैं। परंतु दोनों एक ही ज्योतिर्लिंगके दो स्वरूप माने गये हैं।
५. श्रीकेदारनाथ या केदारेश्वर हिमालयके केदार नामक शिखरपर स्थित हैं। शिखरसे पूर्वकी ओर अलकनन्दाके तटपर श्रीबदरीनाथ अवस्थित हैं और पश्चिममें मन्दाकिनीके किनारे श्रीकेदारनाथ विराजमान हैं। यह स्थान हरिद्वारसे १५० मील और ऋषिकेशसे १३२ मील दूर है।
६. श्रीभीमशंकरका स्थान बम्बईसे पूर्व और पूनासे उत्तर भीमा नदीके किनारे उसके उद्गमस्थान सह्य पर्वतपर है। यह स्थान लारीके रास्तेसे जानेपर नासिकसे लगभग १२० मील दूर है। सह्य पर्वतके उस शिखरका नाम, जहाँ इस ज्योतिर्लिंगका प्राचीन मन्दिर है, डाकिनी है। इससे अनुमान होता है कि कभी यहाँ डाकिनी और भूतोंका निवास था। शिवपुराणकी एक कथाके आधारपर भीम शंकर ज्योतिर्लिंग आसामके कामरूप जिलेमें गोहाटीके पास ब्रह्मपुर पहाड़ीपर स्थित बताया जाता है। कुछ लोग कहते हैं कि नैनीताल जिलेके उज्ज्रनक नामक स्थानमें एक विशाल शिवमन्दिर है, वही भीमशंकरका स्थान है।
७. काशीके श्रीविश्वनाथजी तो प्रसिद्ध ही हैं।
८. यह ज्योतिर्लिंग त्र्यम्बक या त्र्यम्बकेश्वरके नामसे प्रसिद्ध है। बम्बई प्रान्तके नासिक जिलेमें नासिक पंचवटीसे १८ मील दूर गोदावरीके उद्गमस्थान ब्रह्मगिरिके निकट गोदावरीके तटपर ही इसकी स्थिति है।
९. यह स्थान संथाल परगनेमें ई० आई० रेलवेके जसीडीह स्टेशनके पास वैद्यनाथधामके नामसे प्रसिद्ध है। पुराणोंके अनुसार यही चिताभूमि है। कहीं-कहीं 'परल्यां वैद्यनाथं च' ऐसा पाठ मिलता है। इसके अनुसार परलीमें वैद्यनाथकी स्थिति है। दक्षिण हैदराबाद नगरसे इधर परभनी नामक एक जंक्शन है। वहाँसे परलीतक एक ब्रांच लाइन गयी है। इस परली स्टेशनसे थोड़ी दूरपर परली गाँवके निकट श्रीवैद्यनाथ नामक ज्योतिर्लिंग है।
१०. नागेश नामक ज्योतिर्लिंगका स्थान बड़ौदा राज्यके अन्तर्गत गोमतीद्वारकासे ईशानकोणमें बारह-तेरह मीलकी दूरीपर है। दारुकावन इसीका नाम है। कोई-कोई दारुकावनके स्थानमें 'द्वारकावन' पाठ मानते हैं। इस पाठके अनुसार भी यही स्थान सिद्ध होता है; क्योंकि वह द्वारकाके निकट और उस क्षेत्रके अन्तर्गत है। कोई-कोई दक्षिण हैदराबादके अन्तर्गत औढ़ा ग्राममें स्थित शिवलिंगको ही नागेश्वर ज्योतिर्लिंग मानते हैं। कुछ लोगोंके मतसे अल्मोड़ासे १७ मील उत्तर-पूर्वमें स्थित यागेश (जागेश्वर) शिवलिंग ही नागेश ज्योतिर्लिंग है।
११. श्रीरामेश्वर तीर्थको ही सेतुबन्ध तीर्थ भी कहते हैं। यह स्थान मद्रास प्रान्तके रामनाथम् या रामनद जिलेमें है। यहाँ समुद्रके तटपर रामेश्वरका विशाल मन्दिर शोभा पाता है।
१२. श्रीघुश्मेश्वरको घुसुणेश्वर या घृष्णेश्वर भी कहते हैं। इनका स्थान हैदराबाद राज्यके अन्तर्गत दौलताबाद स्टेशनसे १२ मील दूर बेरूल गाँवके पास है। इस स्थानको ही शिवालय कहते हैं।
* कोटिरुद्रसंहिता * ४९९
स्मरण करे। जो प्रतिदिन प्रातःकाल उठकर इन बारह नामोंका पाठ करता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो सम्पूर्ण सिद्धियोंका फल प्राप्त कर लेता है।$^१$
मुनीश्वरो! जिस-जिस मनोरथको पानेकी इच्छा रखकर श्रेष्ठ मनुष्य इन बारह नामोंका पाठ करेंगे, वे इस लोक और परलोकमें उस मनोरथको अवश्य प्राप्त करेंगे। जो शुद्ध अन्तःकरणवाले पुरुष निष्कामभावसे इन नामोंका पाठ करेंगे, उन्हें कभी माताके गर्भमें निवास नहीं करना पड़ेगा। इन सबके पूजनमात्रसे ही इहलोकमें समस्त वर्णोंके लोगोंके दुःखोंका नाश हो जाता है और परलोकमें उन्हें अवश्य मोक्ष प्राप्त होता है। इन बारह ज्योतिर्लिंगोंका नैवेद्य यत्नपूर्वक ग्रहण करना (खाना) चाहिये। ऐसा करनेवाले पुरुषके सारे पाप उसी क्षण जलकर भस्म हो जाते हैं।$^२$
यह मैंने ज्योतिर्लिंगोंके दर्शन और पूजनका फल बताया। अब ज्योतिर्लिंगोंके उपलिंग बताये जाते हैं। मुनीश्वरो! ध्यान देकर सुनो। सोमनाथका जो उपलिंग है, उसका नाम अन्तकेश्वर है। वह उपलिंग मही नदी और समुद्रके संगमपर स्थित है। मल्लिकार्जुनसे प्रकट उपलिंग रुद्रेश्वरके नामसे प्रसिद्ध है। वह भृगुकक्षमें स्थित है और उपासकोंको सुख देनेवाला है। महाकालसम्बन्धी उपलिंग दुग्धेश्वर या दूधनाथके नामसे प्रसिद्ध है। वह नर्मदाके तटपर है तथा समस्त पापोंका निवारण करनेवाला कहा गया है। ओंकारेश्वर-सम्बन्धी उपलिंग कर्दमेश्वरके नामसे प्रसिद्ध है। वह बिन्दु सरोवरके तटपर है और उपासकको सम्पूर्ण मनोवांछित फल प्रदान करता है। केदारेश्वरसम्बन्धी उपलिंग भूतेश्वरके नामसे प्रसिद्ध है और यमुनातीरपर स्थित है। जो लोग उसका दर्शन और पूजन करते हैं, उनके बड़े-से-बड़े पापोंका वह निवारण करनेवाला बताया गया है। भीमशंकरसम्बन्धी उपलिंग भीमेश्वरके नामसे प्रसिद्ध है। वह भी सह्य पर्वतपर ही स्थित है और महान् बलकी वृद्धि करनेवाला है। नागेश्वरसम्बन्धी उपलिंगका नाम भी भूतेश्वर ही है, वह मल्लिका सरस्वतीके तटपर स्थित है और दर्शन करनेमात्रसे सब पापोंको हर लेता है। रामेश्वरसे प्रकट हुए उपलिंगको गुप्तेश्वर और घुश्मेश्वरसे प्रकट हुए उपलिंगको व्याघ्रेश्वर कहा गया है। ब्राह्मणो! इस प्रकार यहाँ मैंने ज्योतिर्लिंगोंके उपलिंगोंका परिचय दिया।
१- सौराष्ट्रे सोमनाथं च श्रीशैले मल्लिकार्जुनम्। उज्जयिन्यां महाकालमोंकारे परमेश्वरम्॥
केदारं हिमवत्पृष्ठे डाकिन्यां भीमशङ्करम्। वाराणस्यां च विश्वेशं त्र्यम्बकं गौतमीतटे॥
वैद्यनाथं चिताभूमौ नागेशं दारुकावने। सेतुबन्धे च रामेशं घुश्मेशं तु शिवालये॥
द्वादशैतानि नामानि प्रातरुत्थाय यः पठेत्। सर्वपापैर्विनिर्मुक्तः सर्वसिद्धिफलं लभेत्॥
(शि० पु० कोटिरु० सं० १। २१-२४)
२- ग्राह्यमेषां च नैवेद्यं भोजनीयं प्रयत्नतः। तत्कर्तुः सर्वपापानि भस्मसाद्यान्ति वै क्षणात्॥
(शि० पु० को० रु० सं० १। २८)
५०० * संक्षिप्त शिवपुराण *
ये दर्शनमात्रसे पापहारी तथा सम्पूर्ण अभीष्टके दाता होते हैं। मुनिवरो! ये मुख्यताको प्राप्त हुए प्रधान-प्रधान शिवलिंग बताये गये। अब अन्य प्रमुख शिवलिंगोंका वर्णन सुनो।
(अध्याय १)
### काशी आदिके विभिन्न लिंगोंका वर्णन तथा अत्रीश्वरकी उत्पत्तिके प्रसंगमें गंगा और शिवके अत्रिके तपोवनमें नित्य निवास करनेकी कथा
सूतजी कहते हैं—मुनीश्वरो! गंगाजीके तटपर मुक्तिदायिनी काशीपुरी सुप्रसिद्ध है। वह भगवान् शिवकी निवासस्थली मानी गयी है। उसे शिवलिंगमयी ही समझना चाहिये। इतना कहकर सूतजीने काशीके अविमुक्त कृत्तिवासेश्वर, तिलभाण्डेश्वर, दशाश्वमेध आदि और गंगासागर आदिके संगमेश्वर, भूतेश्वर, नारीश्वर, वटुकेश्वर, पूरेश्वर, सिद्धनाथेश्वर, दूरेश्वर, शृंगेश्वर, वैद्यनाथ, जप्येश्वर, गोपेश्वर, रंगेश्वर, वामेश्वर, नागेश, कामेश, विमलेश्वर, प्रयागके ब्रह्मेश्वर, सोमेश्वर, भारद्वाजेश्वर, शूलटंकेश्वर, माधवेश तथा अयोध्याके नागेश आदि अनेक प्रसिद्ध शिवलिंगोंका वर्णन करके अत्रीश्वरकी कथाके प्रसंगमें यह बतलाया कि अत्रिपत्नी अनसूयापर कृपा करके गंगाजी वहाँ पधारीं। अनसूयाने गंगाजीसे सदा वहाँ निवास करनेके लिये प्रार्थना की।
तब गंगाजीने कहा—अनसूये! यदि तुम एक वर्षतक की हुई शंकरजीकी पूजा और पतिसेवाका फल मुझे दे दो तो मैं देवताओंका उपकार करनेके लिये यहाँ सदा ही स्थित रहूँगी। पतिव्रताका दर्शन करके मेरे मनको जैसी प्रसन्नता होती है, वैसी दूसरे उपायोंसे नहीं होती। सती अनसूये! यह मैंने तुमसे सच्ची बात कही है। पतिव्रता स्त्रीका दर्शन करनेसे मेरे पापोंका नाश हो जाता है और मैं विशेष शुद्ध हो जाती हूँ; क्योंकि पतिव्रता नारी पार्वतीके समान पवित्र होती है। अतः यदि तुम जगत्का कल्याण करना चाहती हो और लोकहितके लिये मेरी माँगी हुई वस्तु मुझे देती हो तो मैं अवश्य यहाँ स्थिररूपसे निवास करूँगी।
सूतजी कहते हैं—मुनियो! गंगाजीकी यह बात सुनकर पतिव्रता अनसूयाने वर्षभरका वह सारा पुण्य उन्हें दे दिया। अनसूयाके पतिव्रतसम्बन्धी उस महान् कर्मको देखकर भगवान् महादेवजी प्रसन्न हो गये और पार्थिवलिंगसे तत्काल प्रकट हो उन्होंने साक्षात् दर्शन दिया।
* कोटिरुद्रसंहिता * ५०१
शम्भु बोले—साध्वि अनसूये! तुम्हारा यह कर्म देखकर मैं बहुत प्रसन्न हूँ। प्रिय पतिव्रते! वर माँगो; क्योंकि तुम मुझे बहुत ही प्रिय हो।
उस समय वे दोनों पति-पत्नी अद्भुत सुन्दर आकृति एवं पंचमुख आदिसे युक्त भगवान् शिवको वहाँ प्रकट हुआ देख बड़े विस्मित हुए; उन्होंने हाथ जोड़ नमस्कार और स्तुति करके बड़े भक्तिभावसे भगवान् शंकरका पूजन किया। फिर उन लोककल्याणकारी शिवसे कहा।
ब्राह्मणदम्पति बोले—देवेश्वर! यदि आप प्रसन्न हैं और जगदम्बा गंगा भी प्रसन्न हैं तो आप इस तपोवनमें निवास कीजिये और समस्त लोकोंके लिये सुखदायक हो जाइये।
तब गंगा और शिव दोनों ही प्रसन्न हो उस स्थानपर, जहाँ वे ऋषिशिरोमणि रहते थे, प्रतिष्ठित हो गये। इन्हीं शिवका नाम वहाँ अत्रीश्वर हुआ। (अध्याय २–४)
ऋषिकापर भगवान् शिवकी कृपा, एक असुरसे उसके धर्मकी रक्षा करके उसके आश्रममें ‘नन्दिकेश’ नामसे निवास करना और वर्षमें एक दिन गंगाका भी वहाँ आना
तदनन्तर श्रीसूतजीने जब बहुत-से शिवलिंगोंके कथाप्रसंग सुना दिये, तब ऋषियोंने पूछा—'महामते सूतजी! वैशाख शुक्ला सप्तमीके दिन गंगाजी नर्मदामें कैसे आयीं? इसका विशेषरूपसे वर्णन कीजिये। वहाँ महादेवजीका नाम नन्दिकेश्वर कैसे हुआ? इस बातको भी प्रसन्नतापूर्वक बताइये।'
सूतजीने कहा—महर्षियो! एक ब्राह्मणी थी, जिसका नाम ऋषिका था। वह किसी ब्राह्मणकी पुत्री थी और एक ब्राह्मणको ही विधिपूर्वक ब्याही गयी थी। विप्रवरो! यद्यपि वह द्विजपत्नी उत्तम व्रतका पालन करनेवाली थी, तथापि अपने पूर्वजन्मके किसी अशुभ कर्मके प्रभावसे 'बालवैधव्य'-को प्राप्त हो गयी। तब वह ब्राह्मणपत्नी ब्रह्मचर्यव्रतके पालनमें तत्पर हो पार्थिवपूजनपूर्वक अत्यन्त कठोर तपस्या करने लगी। उस समय अवसर पाकर मूढ़ नामसे प्रसिद्ध एक दुष्ट और बलवान् असुर, जो बड़ा मायावी था, कामबाणसे पीड़ित होकर वहाँ गया। उस अत्यन्त सुन्दरी कामिनीको तपस्या करती देख वह असुर उसे नाना प्रकारके लोभ दिखाता हुआ उसके साथ सम्भोगकी याचना करने लगा। मुनीश्वरो! परंतु उत्तम व्रतका पालन करने तथा शिवके ध्यानमें तत्पर रहनेवाली वह साध्वी नारी कामभावसे उसपर दृष्टि न डाल सकी। तपस्यामें लगी हुई उस ब्राह्मणीने उस असुरका सम्मान नहीं किया; क्योंकि वह अत्यन्त तपोनिष्ठ और शिवध्यानपरायणा थी। उस कृशांगी युवतीसे तिरस्कृत हो उस दैत्यराज मूढ़ने उसके ऊपर क्रोध प्रकट किया और फिर अपना विकट रूप उसे दिखाया। इसके बाद उस दुष्टात्माने भयदायक दुर्वचन कहा और उस ब्राह्मणपत्नीको बारंबार त्रास
५०२ * संक्षिप्त शिवपुराण *
देना आरम्भ किया। उस समय वह उसके भयसे थर्रा उठी और अनेक बार स्नेहपूर्वक शिव-शिवकी पुकार करने लगी। उस तन्वंगी द्विजपत्नीने भगवान् शिवका पूर्णतया आश्रय ले रखा था। शिवका नाम जपनेवाली वह नारी अत्यन्त विह्वल हो अपने धर्मकी रक्षाके लिये भगवान् शम्भुकी ही शरणमें गयी।
तब शरणागतकी रक्षा, सदाचारकी प्रतिष्ठा तथा उस ब्राह्मणीको आनन्द प्रदान करनेके लिये भगवान् शिव वहाँ प्रकट हो गये। भक्तवत्सल परमेश्वर शंकरने उस कामविह्वल दैत्यराज मूढ़को तत्काल भस्म कर दिया और ब्राह्मणीकी ओर कृपादृष्टिसे देखकर भक्तकी रक्षाके लिये दत्तचित्त हो कहा—'वर माँगो।' महेश्वरका यह वचन सुनकर उस साध्वी ब्राह्मणपत्नीने उनके उस आनन्दजनक मंगलमय स्वरूपका दर्शन किया। फिर सबको सुख देनेवाले परमेश्वर शम्भुको प्रणाम करके शुद्ध अन्तःकरणवाली उस साध्वीने हाथ जोड़ मस्तक झुकाकर उनकी स्तुति की।
ऋषिका बोली—देवदेव महादेव! शरणागतवत्सल ! आप दीनबन्धु हैं। भक्तोंकी सदा रक्षा करनेवाले ईश्वर हैं। आपने मूढ़ नामक असुरसे मेरे धर्मकी रक्षा की है; क्योंकि आपके द्वारा यह दुष्ट असुर मारा गया। ऐसा करके आपने सम्पूर्ण जगत्की रक्षा की है। अब आप मुझे अपने चरणोंकी परम उत्तम एवं अनन्य भक्ति प्रदान कीजिये। नाथ! यही मेरे लिये वर है। इससे अधिक और क्या हो सकता है? प्रभो! महेश्वर! मेरी दूसरी प्रार्थना भी सुनिये। आप लोगोंके उपकारके लिये यहाँ सदा स्थित रहिये।
महादेवजीने कहा—ऋषिके! तुम सदाचारिणी और विशेषतः मुझमें भक्ति रखनेवाली हो। तुमने मुझसे जो-जो वर माँगे हैं, वे सब मैंने तुम्हें दे दिये।
ब्राह्मणो! इसी बीचमें श्रीविष्णु और ब्रह्मा आदि देवता वहाँ भगवान् शिवका आविर्भाव हुआ जान हर्षसे भरे हुए आये और अत्यन्त प्रेमपूर्वक शिवको प्रणाम करके उन सबने उनका भलीभाँति पूजन किया। फिर शुद्ध हृदयसे हाथ जोड़ मस्तक झुकाकर उनकी स्तुति भी की। इसी समय साध्वी देवनदी गंगा उस ऋषिकासे उसके भाग्यकी सराहना करती हुई प्रसन्नचित्त हो बोलीं।
गंगाने कहा—ऋषिके! वैशाखमासमें एक दिन यहाँ रहनेके लिये मुझे भी तुम्हें वचन देना चाहिये। उस दिन मैं भी इस तीर्थमें निवास करना चाहती हूँ।
सूतजी कहते हैं—महर्षियो! गंगाजीकी यह बात सुनकर उत्तम व्रतका
* कोटिरुद्रसंहिता * ५०३
पालन करनेवाली सती साध्वी ऋषिकाने लोकहितके लिये प्रसन्नतापूर्वक कहा—'बहुत अच्छा, ऐसा हो।' भगवान् शिव ऋषिकाको आनन्द प्रदान करनेके लिये अत्यन्त प्रसन्न हो उस पार्थिवलिंगमें अपने पूर्ण अंशसे विलीन हो गये। यह देख सब देवता आनन्दित हो शिव तथा ऋषिकाकी प्रशंसा करने लगे और अपने-अपने धामको चले गये। उस दिनसे नर्मदाका वह तीर्थ ऐसा उत्तम और पावन हो गया तथा सम्पूर्ण पापोंका नाश करनेवाले शिव वहाँ नन्दिकेशके नामसे विख्यात हुए। गंगा भी प्रतिवर्ष वैशाखमासकी सप्तमीके दिन शुभकी इच्छासे अपने उस पापको धोनेके लिये वहाँ जाती हैं, जो मनुष्योंसे वे ग्रहण किया करती हैं। (अध्याय ५–७)
प्रथम ज्योतिर्लिंग सोमनाथके प्रादुर्भावकी कथा और उसकी महिमा
तदनन्तर कपिला नगरीके कालेश्वर, रामेश्वर आदिकी महिमा बताते हुए सूतजीने समुद्रके तटपर स्थित गोकर्णक्षेत्रके शिवलिंगोंकी महिमाका वर्णन किया। फिर महाबल नामक शिवलिंगका अद्भुत माहात्म्य सुनाकर अन्य बहुत-से शिवलिंगोंकी विचित्र माहात्म्य-कथाका वर्णन करनेके पश्चात् ऋषियोंके पूछनेपर वे ज्योतिर्लिंगोंका वर्णन करने लगे।
सूतजी बोले—ब्राह्मणो! मैंने सद्गुरुसे जो कुछ सुना है, वह ज्योतिर्लिंगोंका माहात्म्य तथा उनके प्राकट्यका प्रसंग अपनी बुद्धिके अनुसार संक्षेपसे ही सुनाऊँगा। तुम सब लोग सुनो। मुने! ज्योतिर्लिंगोंमें सबसे पहले सोमनाथका नाम आता है; अतः पहले उन्हींके माहात्म्यको सावधान होकर सुनो। मुनीश्वरो! महामना प्रजापति दक्षने अपनी अश्विनी आदि सत्ताईस कन्याओंका विवाह चन्द्रमाके साथ किया था। चन्द्रमाको स्वामीके रूपमें पाकर वे दक्षकन्याएँ विशेष शोभा पाने लगीं तथा चन्द्रमा भी उन्हें पत्नीके रूपमें पाकर निरन्तर सुशोभित होने लगे। उन सब पत्नियोंमें भी जो रोहिणी नामकी पत्नी थी, एकमात्र वही चन्द्रमाको जितनी प्रिय थी, उतनी दूसरी कोई पत्नी कदापि प्रिय नहीं हुई। इससे दूसरी स्त्रियोंको बड़ा दुःख हुआ। वे सब अपने पिताकी शरणमें गयीं। वहाँ जाकर उन्होंने जो भी दुःख था, उसे पिताको निवेदन किया। द्विजो! वह सब सुनकर दक्ष भी दुःखी हो गये और चन्द्रमाके पास आकर शान्तिपूर्वक बोले।
दक्षने कहा—कलानिधे! तुम निर्मल कुलमें उत्पन्न हुए हो। तुम्हारे आश्रयमें रहनेवाली जितनी स्त्रियाँ हैं, उन सबके प्रति तुम्हारे मनमें न्यूनाधिकभाव क्यों है? तुम किसीको अधिक और किसीको कम प्यार क्यों करते हो? अबतक जो किया, सो किया, अब आगे फिर कभी ऐसा विषमतापूर्ण बर्ताव तुम्हें नहीं करना चाहिये; क्योंकि उसे नरक देनेवाला बताया गया है।
सूतजी कहते हैं—महर्षियो! अपने दामाद चन्द्रमासे स्वयं ऐसी प्रार्थना करके प्रजापति दक्ष घरको चले गये। उन्हें पूर्ण निश्चय हो गया था कि अब फिर आगे ऐसा नहीं होगा। पर चन्द्रमाने प्रबल भावीसे
५०४ * संक्षिप्त शिवपुराण *
विवश होकर उनकी बात नहीं मानी। वे रोहिणीमें इतने आसक्त हो गये थे कि दूसरी किसी पत्नीका कभी आदर नहीं करते थे। इस बातको सुनकर दक्ष दुःखी हो फिर स्वयं आकर चन्द्रमाको उत्तम नीतिसे समझाने तथा न्यायोचित बर्तावके लिये प्रार्थना करने लगे।
दक्ष बोले—चन्द्रमा! सुनो, मैं पहले अनेक बार तुमसे प्रार्थना कर चुका हूँ। फिर भी तुमने मेरी बात नहीं मानी। इसलिये आज शाप देता हूँ कि तुम्हें क्षयका रोग हो जाय।
सूतजी कहते हैं—दक्षके इतना कहते ही क्षणभरमें चन्द्रमा क्षयरोगसे ग्रस्त हो गये। उनके क्षीण होते ही उस समय सब ओर महान् हाहाकार मच गया। सब देवता और ऋषि कहने लगे कि 'हाय! हाय! अब क्या करना चाहिये, चन्द्रमा कैसे ठीक होंगे?' मुने! इस प्रकार दुःखमें पड़कर वे सब लोग विह्वल हो गये। चन्द्रमाने इन्द्र आदि सब देवताओं तथा ऋषियोंको अपनी अवस्था सूचित की। तब इन्द्र आदि देवता तथा वसिष्ठ आदि ऋषि ब्रह्माजीकी शरणमें गये।
उनकी बात सुनकर ब्रह्माजीने कहा—देवताओ! जो हुआ, सो हुआ। अब वह निश्चय ही पलट नहीं सकता। अतः उसके निवारणके लिये मैं तुम्हें एक उत्तम उपाय बताता हूँ। आदरपूर्वक सुनो। चन्द्रमा देवताओंके साथ प्रभास नामक शुभ क्षेत्रमें जायें और वहाँ मृत्युंजयमन्त्रका विधिपूर्वक अनुष्ठान करते हुए भगवान् शिवकी आराधना करें। अपने सामने शिवलिंगकी स्थापना करके वहाँ चन्द्रदेव नित्य तपस्या करें। इससे प्रसन्न होकर शिव उन्हें क्षयरहित कर देंगे।
तब देवताओं तथा ऋषियोंके कहनेसे ब्रह्माजीकी आज्ञाके अनुसार चन्द्रमाने वहाँ छः महीनेतक निरन्तर तपस्या की, मृत्युंजय-मन्त्रसे भगवान् वृषभध्वजका पूजन किया। दस करोड़ मन्त्रका जप और मृत्युंजयका ध्यान करते हुए चन्द्रमा वहाँ स्थिरचित्त होकर लगातार खड़े रहे। उन्हें तपस्या करते देख भक्तवत्सल भगवान् शंकर प्रसन्न हो उनके सामने प्रकट हो गये और अपने भक्त चन्द्रमासे बोले।
शंकरजीने कहा—चन्द्रदेव! तुम्हारा कल्याण हो; तुम्हारे मनमें जो अभीष्ट हो, वह वर माँगो! मैं प्रसन्न हूँ। तुम्हें सम्पूर्ण उत्तम वर प्रदान करूँगा।
चन्द्रमा बोले—देवेश्वर! यदि आप प्रसन्न हैं तो मेरे लिये क्या असाध्य हो सकता है; तथापि प्रभो! शंकर! आप मेरे शरीरके इस क्षयरोगका निवारण कीजिये। मुझसे जो अपराध बन गया हो, उसे क्षमा कीजिये।
शिवजीने कहा—चन्द्रदेव! एक पक्षमें
- कोटिरुद्रसंहिता * ५०५
प्रतिदिन तुम्हारी कला क्षीण हो और दूसरे पक्षमें फिर वह निरन्तर बढ़ती रहे।
तदनन्तर चन्द्रमाने भक्तिभावसे भगवान् शंकरकी स्तुति की। इससे पहले निराकार होते हुए भी वे भगवान् शिव फिर साकार हो गये। देवताओंपर प्रसन्न हो उस क्षेत्रके माहात्म्यको बढ़ाने तथा चन्द्रमाके यशका विस्तार करनेके लिये भगवान् शंकर उन्हींके नामपर वहाँ सोमेश्वर कहलाये और सोमनाथके नामसे तीनों लोकोंमें विख्यात हुए। ब्राह्मणो! सोमनाथका पूजन करनेसे वे उपासकके क्षय तथा कोढ़ आदि रोगोंका नाश कर देते हैं। ये चन्द्रमा धन्य हैं, कृतकृत्य हैं, जिनके नामसे तीनों लोकोंके स्वामी साक्षात् भगवान् शंकर भूतलको पवित्र करते हुए प्रभासक्षेत्रमें विद्यमान हैं। वहीं सम्पूर्ण देवताओंने सोमकुण्डकी भी स्थापना की है, जिसमें शिव और ब्रह्माका सदा निवास माना जाता है। चन्द्रकुण्ड इस भूतलपर पापनाशन तीर्थके रूपमें प्रसिद्ध है। जो मनुष्य उसमें स्नान करता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। क्षय आदि जो असाध्य रोग होते हैं, वे सब उस कुण्डमें छः मासतक स्नान करनेमात्रसे नष्ट हो जाते हैं। मनुष्य जिस फलके उद्देश्यसे इस उत्तम तीर्थका सेवन करता है, उस फलको सर्वथा प्राप्त कर लेता है—इसमें संशय नहीं है।
चन्द्रमा नीरोग होकर अपना पुराना कार्य सँभालने लगे। इस प्रकार मैंने सोमनाथकी उत्पत्तिका सारा प्रसंग सुना दिया। मुनीश्वरो ! इस तरह सोमेश्वरलिंगका प्रादुर्भाव हुआ है। जो मनुष्य सोमनाथके प्रादुर्भावकी इस कथाको सुनता अथवा दूसरोंको सुनाता है, वह सम्पूर्ण अभीष्टको पाता और सब पापोंसे मुक्त हो जाता है।
(अध्याय ८-१४) ~~ ० ~~
मल्लिकार्जुन और महाकाल नामक ज्योतिर्लिंगोंके आविर्भावकी कथा तथा उनकी महिमा
सूतजी कहते हैं- महर्षियो! अब मैं मल्लिकार्जुनके प्रादुर्भावका प्रसंग सुनाता हूँ, जिसे सुनकर बुद्धिमान् पुरुष सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। जब महाबली तारकशत्रु शिवापुत्र कुमार कार्तिकेय सारी पृथ्वीकी परिक्रमा करके फिर कैलास पर्वतपर आये और गणेशके विवाह आदिकी बात सुनकर क्रौंच पर्वतपर चले गये, पार्वती और शिवजीके वहाँ जाकर अनुरोध करनेपर भी नहीं लौटे तथा वहाँसे भी बारह कोस दूर चले गये, तब शिव और पार्वती ज्योतिर्मय स्वरूप धारण करके वहाँ प्रतिष्ठित हो गये। वे दोनों पुत्रस्नेहसे आतुर हो पर्वके दिन अपने पुत्र कुमारको देखनेके लिये उनके पास जाया करते हैं। अमावस्याके दिन भगवान् शंकर स्वयं वहाँ जाते हैं और पौर्णमासीके दिन पार्वतीजी निश्चय ही वहाँ पदार्पण करती हैं। उसी दिनसे लेकर भगवान् शिवका मल्लिकार्जुन नामक एक लिंग तीनों लोकोंमें प्रसिद्ध हुआ। (उसमें पार्वती और शिव दोनोंकी ज्योतियाँ प्रतिष्ठित हैं। 'मल्लिका' का अर्थ पार्वती है और 'अर्जुन' शब्द शिवका वाचक है।) उस लिंगका जो दर्शन करता है, वह समस्त पापोंसे मुक्त हो
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जाता है और सम्पूर्ण अभीष्टको प्राप्त कर लेता है। इसमें संशय नहीं है। इस प्रकार मल्लिकार्जुन नामक द्वितीय ज्योतिर्लिंगका वर्णन किया गया, जो दर्शनमात्रसे लोगोंके लिये सब प्रकारका सुख देनेवाला बताया गया है।
ऋषियोंने कहा—प्रभो! अब आप विशेष कृपा करके तीसरे ज्योतिर्लिंगका वर्णन कीजिये।
सूतजीने कहा—ब्राह्मणो! मैं धन्य हूँ, कृतकृत्य हूँ, जो आप श्रीमानोंका संग मुझे प्राप्त हुआ। साधु पुरुषोंका संग निश्चय ही धन्य है। अतः मैं अपना सौभाग्य समझकर पापनाशिनी परम पावनी दिव्य कथाका वर्णन करता हूँ। तुमलोग आदरपूर्वक सुनो। अवन्ति नामसे प्रसिद्ध एक रमणीय नगरी है, जो समस्त देहधारियोंको मोक्ष प्रदान करनेवाली है। वह भगवान् शिवको बहुत ही प्रिय, परम पुण्यमयी और लोकपावनी है। उस पुरीमें एक श्रेष्ठ ब्राह्मण रहते थे, जो शुभकर्मपरायण, वेदोंके स्वाध्यायमें संलग्न तथा वैदिक कर्मोंके अनुष्ठानमें सदा तत्पर रहनेवाले थे। वे घरमें अग्निकी स्थापना करके प्रतिदिन अग्निहोत्र करते और शिवकी पूजामें सदा तत्पर रहते थे। वे ब्राह्मण देवता प्रतिदिन पार्थिव शिवलिंग बनाकर उसकी पूजा किया करते थे। वेदप्रिय नामक वे ब्राह्मण देवता सम्यक् ज्ञानार्जनमें लगे रहते थे; इसलिये उन्होंने सम्पूर्ण कर्मोंका फल पाकर वह सद्गति प्राप्त कर ली, जो संतोंको ही सुलभ होती है। उनके शिवपूजापरायण चार तेजस्वी पुत्र थे, जो पिता-मातासे सद्गुणोंमें कम नहीं थे। उनके नाम थे— देवप्रिय, प्रियमेधा, सुकृत और सुव्रत। उनके सुखदायक गुण वहाँ सदा बढ़ने लगे। उनके कारण अवन्ति-नगरी ब्रह्मतेजसे परिपूर्ण हो गयी थी।
उसी समय रत्नमाल पर्वतपर दूषण नामक एक धर्मद्वेषी असुरने ब्रह्माजीसे वर पाकर वेद, धर्म तथा धर्मात्माओंपर आक्रमण किया। अन्तमें उसने सेना लेकर अवन्ति (उज्जैन)-के ब्राह्मणोंपर भी चढ़ाई कर दी। उसकी आज्ञासे चार भयानक दैत्य चारों दिशाओंमें प्रलयाग्निके समान प्रकट हो गये, परंतु वे शिवविश्वासी ब्राह्मण-बन्धु उनसे डरे नहीं। जब नगरके ब्राह्मण बहुत घबरा गये, तब उन्होंने उनको आश्वासन देते हुए कहा—'आपलोग भक्तवत्सल भगवान् शंकरपर भरोसा रखें।' यों कह शिवलिंगका पूजन करके वे भगवान् शिवका ध्यान करने लगे।
इतनेमें ही सेनासहित दूषणने आकर उन ब्राह्मणोंको देखा और कहा—'इन्हें मार डालो, बाँध लो।' वेदप्रियके पुत्र उन ब्राह्मणोंने उस समय उस दैत्यकी कही हुई वह बात नहीं सुनी; क्योंकि वे भगवान् शम्भुके ध्यानमार्गमें स्थित थे। उस दुष्टात्मा दैत्यने ज्यों ही उन ब्राह्मणोंको मारनेकी इच्छा की, त्यों ही उनके द्वारा पूजित पार्थिव शिवलिंगके स्थानमें बड़ी भारी आवाजके साथ एक गड्ढा प्रकट हो गया। उस गड्ढेसे तत्काल विकटरूपधारी भगवान् शिव प्रकट हो गये, जो महाकाल नामसे विख्यात हुए। वे दुष्टोंके विनाशक तथा सत्पुरुषोंके आश्रयदाता हैं। उन्होंने उन दैत्योंसे कहा—'अरे खल! मैं तुझ-जैसे दुष्टोंके लिये महाकाल प्रकट हुआ हूँ। तुम इन ब्राह्मणोंके निकटसे दूर भाग जाओ।'
- कोटिरुद्रसंहिता * ५०७
ऐसा कहकर महाकाल शंकरने सेनासहित दूषणको अपने हुंकारमात्रसे तत्काल भस्म कर दिया। कुछ सेना उनके द्वारा मारी गयी और कुछ भाग खड़ी हुई। परमात्मा शिवने दूषणका वध कर डाला। जैसे सूर्यको देखकर सम्पूर्ण अन्धकार नष्ट हो जाता है, उसी प्रकार भगवान् शिवको देखकर उसकी सारी सेना अदृश्य हो गयी। देवताओंकी दुन्दुभियाँ बज उठीं और आकाशसे फूलोंकी वर्षा होने लगी। उन ब्राह्मणोंको आश्वासन दे सुप्रसन्न हुए स्वयं महाकाल महेश्वर शिवने उनसे कहा— 'तुमलोग वर माँगो।' उनकी वह बात सुनकर वे सब ब्राह्मण हाथ जोड़ भक्ति-भावसे भलीभाँति प्रणाम करके नतमस्तक हो बोले।
द्विजोंने कहा—महाकाल ! महादेव ! दुष्टोंको दण्ड देनेवाले प्रभो ! शम्भो ! आप हमें संसारसागरसे मोक्ष प्रदान करें। शिव ! आप जनसाधारणकी रक्षाके लिये सदा यहीं रहें। प्रभो ! शम्भो ! अपना दर्शन करनेवाले मनुष्योंका आप सदा ही उद्धार करें।
सूतजी कहते हैं—महर्षियो! उनके ऐसा कहनेपर उन्हें सद्गति दे भगवान् शिव अपने भक्तोंकी रक्षाके लिये उस परम सुन्दर गड्ढेमें स्थित हो गये। वे ब्राह्मण मोक्ष पा गये और वहाँ चारों ओरकी एक-एक कोस भूमि लिंगरूपी भगवान् शिवका स्थल बन गयी। वे शिव भूतलपर महाकालेश्वरके नामसे विख्यात हुए। ब्राह्मणो! उनका दर्शन करनेसे स्वप्नमें भी कोई दुःख नहीं होता। जिस-जिस कामनाको लेकर कोई उस लिंगकी उपासना करता है, उसे वह अपना मनोरथ प्राप्त हो जाता है तथा परलोकमें मोक्ष भी मिल जाता है।
(अध्याय १५-१६)
महाकालके माहात्म्यके प्रसंगमें शिवभक्त राजा चन्द्रसेन तथा गोप-बालक श्रीकरकी कथा
सूतजी कहते हैं—ब्राह्मणो! भक्तोंकी रक्षा करनेवाले महाकाल नामक ज्योतिर्लिंगका माहात्म्य भक्तिभावको बढ़ानेवाला है। उसे आदरपूर्वक सुनो। उज्जयिनीमें चन्द्रसेन नामक एक महान् राजा थे, जो सम्पूर्ण शास्त्रोंके तत्त्वज्ञ, शिवभक्त और जितेन्द्रिय थे। शिवके पार्षदोंमें प्रधान तथा सर्वलोकवन्दित मणिभद्रजी राजा चन्द्रसेनके सखा हो गये थे। एक समय उन्होंने राजापर प्रसन्न होकर उन्हें चिन्तामणि नामक महामणि प्रदान की, जो कौस्तुभमणि तथा सूर्यके समान देदीप्यमान थी। वह
५०८ * संक्षिप्त शिवपुराण *
देखने, सुनने अथवा ध्यान करनेपर भी मनुष्योंको निश्चय ही मंगल प्रदान करती थी। भगवान् शिवके आश्रित रहनेवाले राजा चन्द्रसेन उस चिन्तामणिको कण्ठमें धारण करके जब सिंहासनपर बैठते, तब देवताओंमें सूर्यनारायणकी भाँति उनकी शोभा होती थी। नृपश्रेष्ठ चन्द्रसेनके कण्ठमें चिन्तामणि शोभा देती है, यह सुनकर समस्त राजाओंके मनमें उस मणिके प्रति लोभकी मात्रा बढ़ गयी और वे क्षुब्ध रहने लगे। तदनन्तर वे सब राजा चतुरंगिणी सेनाके साथ आकर युद्धमें चन्द्रसेनको जीतनेके लिये उद्यत हो गये। वे सब परस्पर मिल गये थे और उसके साथ बहुत-से सैनिक थे। उन्होंने आपसमें संकेत और सलाह करके आक्रमण किया और उज्जयिनीके चारों द्वारोंको घेर लिया। अपनी पुरीको सम्पूर्ण राजाओंद्वारा घिरी हुई देख राजा चन्द्रसेन उन्हीं भगवान् महाकालेश्वरकी शरणमें गये और मनको संदेहरहित करके दृढ़ निश्चयके साथ उपवासपूर्वक दिन-रात अनन्यभावसे महाकालकी आराधना करने लगे।
उन्हीं दिनों उस श्रेष्ठ नगरमें कोई ग्वालिन रहती थी, जिसके एकमात्र पुत्र था। वह विधवा थी और उज्जयिनीमें बहुत दिनोंसे रहती थी। वह अपने पाँच वर्षके बालकको लिये हुए महाकालके मन्दिरमें गयी और उसने राजा चन्द्रसेनद्वारा की हुई महाकालकी पूजाका आदरपूर्वक दर्शन किया। राजाके शिवपूजनका वह आश्चर्यमय उत्सव देखकर उसने भगवान्को प्रणाम किया और फिर वह अपने निवासस्थानपर लौट आयी। ग्वालिनके उस बालकने भी वह सारी पूजा देखी थी। अतः घर आनेपर उसने कौतूहलवश शिवजीकी पूजा करनेका विचार किया। एक सुन्दर पत्थर लाकर उसे अपने शिविरसे थोड़ी ही दूरपर दूसरे शिविरके एकान्त स्थानमें रख दिया और उसीको शिवलिंग माना। फिर उसने भक्तिपूर्वक कृत्रिम गन्ध, अलंकार, वस्त्र, धूप, दीप और अक्षत आदि द्रव्य जुटाकर उनके द्वारा पूजन करके मनःकल्पित दिव्य नैवेद्य भी अर्पित किया। सुन्दर-सुन्दर पत्तों और फूलोंसे बारंबार पूजन करके भाँति-भाँतिसे नृत्य किया और बारंबार भगवान्के चरणोंमें मस्तक झुकाया। इसी समय ग्वालिनने भगवान् शिवमें आसक्तचित्त हुए अपने पुत्रको बड़े प्यारसे भोजनके लिये बुलाया। परंतु उसका मन तो भगवान् शिवकी पूजामें लगा हुआ था। अतः जब बारंबार बुलानेपर भी उस बालकको भोजन करनेकी इच्छा नहीं हुई, तब उसकी माँ स्वयं उसके पास गयी और उसे शिवके आगे आँख बंद करके ध्यान लगाये बैठा देख उसका हाथ पकड़कर खींचने लगी। इतनेपर भी जब वह न उठा, तब उसने क्रोधमें आकर उसे खूब पीटा। खींचने और मारने-पीटनेपर भी जब उसका पुत्र नहीं आया, तब उसने वह शिवलिंग उठाकर दूर फेंक दिया और उसपर चढ़ायी हुई सारी पूजा-सामग्री नष्ट कर दी। यह देख बालक ‘हाय-हाय’ करके रो उठा। रोषसे भरी हुई ग्वालिन अपने बेटेको डाँट-फटकारकर पुनः घरमें चली गयी। भगवान् शिवकी पूजाको माताके द्वारा नष्ट की गयी देख वह बालक ‘देव! देव! महादेव!’ की पुकार करते हुए सहसा मूर्च्छित होकर गिर पड़ा। उसके नेत्रोंसे आँसुओंकी धारा प्रवाहित होने
* कोटिरुद्रसंहिता *
५०९
लगी। दो घड़ी बाद जब उसे चेत हुआ, तब उसने आँखें खोलीं।
आँख खुलनेपर उस शिशुने देखा, उसका वही शिविर भगवान् शिवके अनुग्रहसे तत्काल महाकालका सुन्दर मन्दिर बन गया, मणियोंके चमकीले खंभे उसकी शोभा बढ़ा रहे थे। वहाँकी भूमि स्फटिकमणिसे जड़ दी गयी थी। तपाये हुए सोनेके बहुत-से विचित्र कलश उस शिवालयको सुशोभित करते थे। उसके विशाल द्वार, कपाट और प्रधान द्वार सुवर्णमय दिखायी देते थे। वहाँ बहुमूल्य नीलमणि तथा हीरेके बने हुए चबूतरे शोभा दे रहे थे। उस शिवालयके मध्यभागमें दयानिधान शंकरका रत्नमय लिंग प्रतिष्ठित था। ग्वालिनके उस पुत्रने देखा, उस शिवलिंगपर उसकी अपनी ही चढ़ायी हुई पूजन-सामग्री सुसज्जित है। यह सब देख वह बालक सहसा उठकर खड़ा हो गया। उसे मन-ही-मन बड़ा आश्चर्य हुआ और वह परमानन्दके समुद्रमें निमग्न-सा हो गया। तदनन्तर भगवान् शिवकी स्तुति करके उसने बारंबार उनके चरणोंमें मस्तक झुकाया और सूर्यास्त होनेके पश्चात् वह गोपबालक शिवालयसे बाहर निकला। बाहर आकर उसने अपने शिविरको देखा। वह इन्द्रभवनके समान शोभा पा रहा था। वहाँ सब कुछ तत्काल सुवर्णमय होकर विचित्र एवं परम उज्ज्वल वैभवसे प्रकाशित होने लगा। फिर वह उस भवनके भीतर गया, जो सब प्रकारकी शोभाओंसे सम्पन्न था। उस भवनमें सर्वत्र मणि, रत्न और सुवर्ण ही जड़े गये थे। प्रदोषकालमें सानन्द भीतर प्रवेश करके बालकने देखा, उसकी माँ दिव्य लक्षणोंसे लक्षित हो एक सुन्दर पलंगपर सो रही है। रत्नमय अलंकारोंसे उसके सभी अंग उद्दीप्त हो रहे हैं और वह साक्षात् देवांगनाके समान दिखायी देती है। हर्षसे विह्वल हुए उस बालकने अपनी माताको बड़े वेगसे उठाया। वह भगवान् शिवकी कृपापात्र हो चुकी थी। ग्वालिनने उठकर देखा, सब कुछ अपूर्व-सा हो गया था। उसने महान् आनन्दमें निमग्न हो अपने बेटेको छातीसे लगा लिया। पुत्रके मुखसे गिरिजापतिके कृपाप्रसादका वह सारा वृत्तान्त सुनकर ग्वालिनने राजाको सूचना दी, जो निरन्तर भगवान् शिवके भजनमें लगे रहते थे। राजा अपना नियम पूरा करके रातमें सहसा वहाँ आये और ग्वालिनके पुत्रका वह प्रभाव, जो शंकरजीको संतुष्ट करनेवाला था, देखा। मन्त्रियों और पुरोहितोंसहित राजा चन्द्रसेन वह सब कुछ देख परमानन्दके समुद्रमें डूब गये और नेत्रोंसे प्रेमके आँसू बहाते तथा प्रसन्नतापूर्वक शिवके नामका कीर्तन करते हुए उन्होंने उस बालकको हृदयसे लगा लिया। ब्राह्मणो! उस समय वहाँ बड़ा भारी उत्सव होने लगा। सब लोग आनन्दविभोर होकर महेश्वरके नाम और यशका कीर्तन करने लगे। इस प्रकार शिवका यह अद्भुत माहात्म्य देखनेसे पुरवासियोंको बड़ा हर्ष हुआ और इसीकी चर्चामें वह सारी रात एक क्षणके समान व्यतीत हो गयी।
युद्धके लिये नगरको चारों ओरसे घेरकर खड़े हुए राजाओंने भी प्रातःकाल अपने गुप्तचरोंके मुखसे वह सारा अद्भुत चरित्र सुना। उसे सुनकर सब आश्चर्यसे चकित हो गये और वहाँ आये हुए सब नरेश
५१० * संक्षिप्त शिवपुराण *
एकत्र हो आपसमें इस प्रकार बोले—'ये राजा चन्द्रसेन बड़े भारी शिवभक्त हैं; अतएव इनपर विजय पाना कठिन है। ये सर्वथा निर्भय होकर महाकालकी नगरी उज्जयिनीका पालन करते हैं। जिसकी पुरीके बालक भी ऐसे शिवभक्त हैं, वे राजा चन्द्रसेन तो महान् शिवभक्त हैं ही। इनके साथ विरोध करनेसे निश्चय ही भगवान् शिव क्रोध करेंगे और उनके क्रोधसे हम सब लोग नष्ट हो जायँगे। अतः इन नरेशके साथ हमें मेल-मिलाप ही कर लेना चाहिये। ऐसा होनेपर महेश्वर हमपर बड़ी कृपा करेंगे।'
सूतजी कहते हैं—ब्राह्मणो ! ऐसा निश्चय करके शुद्ध हृदयवाले उन सब भूपालोंने हथियार डाल दिये। उनके मनसे वैरभाव निकल गया। वे सभी राजा अत्यन्त प्रसन्न हो चन्द्रसेनकी अनुमति ले महाकालकी उस रमणीय नगरीके भीतर गये। वहाँ उन्होंने महाकालका पूजन किया। फिर वे सब-के-सब उस ग्वालिनके महान् अभ्युदयपूर्ण दिव्य सौभाग्यकी भूरि-भूरि प्रशंसा करते हुए उनके घरपर गये। वहाँ राजा चन्द्रसेनने आगे बढ़कर उनका स्वागत-सत्कार किया। वे बहुमूल्य आसनोंपर बैठे और आश्चर्यचकित एवं आनन्दित हुए। गोपबालकके ऊपर कृपा करनेके लिये स्वतः प्रकट हुए शिवालय और शिवलिंगका दर्शन करके उन सब राजाओंने अपनी उत्तम बुद्धि भगवान् शिवके चिन्तनमें लगायी। तदनन्तर उन सारे नरेशोंने भगवान् शिवकी कृपा प्राप्त करनेके लिये उस गोपशिशुको बहुत-सी वस्तुएँ प्रसन्नतापूर्वक भेंट कीं। सम्पूर्ण जनपदोंमें जो बहुसंख्यक गोप रहते थे, उन सबका राजा उन्होंने उसी बालकको बना दिया।
इसी समय समस्त देवताओंसे पूजित परम तेजस्वी वानरराज हनुमान्जी वहाँ प्रकट हुए। उनके आते ही सब राजा बड़े वेगसे उठकर खड़े हो गये। उन सबने भक्तिभावसे विनम्र होकर उन्हें मस्तक झुकाया। राजाओंसे पूजित हो वानरराज हनुमान्जी उन सबके बीचमें बैठे और उस गोपबालकको हृदयसे लगाकर उन नरेशोंकी ओर देखते हुए बोले—'राजाओ ! तुम सब लोग तथा दूसरे देहधारी भी मेरी बात सुनें। इससे तुम लोगोंका भला होगा। भगवान् शिवके सिवा देहधारियोंके लिये दूसरी कोई गति नहीं है। यह बड़े सौभाग्यकी बात है कि इस गोपबालकने शिवकी पूजाका दर्शन करके उससे प्रेरणा ली और बिना मन्त्रके भी शिवका पूजन करके उन्हें पा लिया। गोपवंशकी कीर्ति बढ़ानेवाला यह बालक भगवान् शंकरका श्रेष्ठ भक्त है। इस लोकमें सम्पूर्ण भोगोंका उपभोग करके अन्तमें यह मोक्ष प्राप्त कर लेगा। इसकी वंशपरम्पराके
* कोटिरुद्रसंहिता * ५११
अन्तर्गत आठवीं पीढ़ीमें महायशस्वी नन्द उत्पन्न होंगे, जिनके यहाँ साक्षात् भगवान् नारायण उनके पुत्ररूपसे प्रकट हो श्रीकृष्ण नामसे प्रसिद्ध होंगे। आजसे यह गोपकुमार इस जगत्में श्रीकरके नामसे विशेष ख्याति प्राप्त करेगा।'
सूतजी कहते हैं—ब्राह्मणो! ऐसा कहकर अंजनीनन्दन शिवस्वरूप वानरराज हनुमान्जीने समस्त राजाओं तथा महाराज चन्द्रसेनको भी कृपादृष्टिसे देखा। तदनन्तर उन्होंने उस बुद्धिमान् गोपबालक श्रीकरको बड़ी प्रसन्नताके साथ शिवोपासनाके उस आचार-व्यवहारका उपदेश दिया, जो भगवान् शिवको बहुत प्रिय है। इसके बाद परम प्रसन्न हुए हनुमान्जी चन्द्रसेन और श्रीकरसे बिदा ले उन सब राजाओंके देखते-देखते वहीं अन्तर्धान हो गये। वे सब राजा हर्षमें भरकर सम्मानित हो महाराज चन्द्रसेनकी आज्ञा ले जैसे आये थे, वैसे ही लौट गये। महातेजस्वी श्रीकर भी हनुमान्जीका उपदेश पाकर धर्मज्ञ ब्राह्मणोंके साथ शंकरजीकी उपासना करने लगा। महाराज चन्द्रसेन और गोपबालक श्रीकर दोनों ही बड़ी प्रसन्नताके साथ महाकालकी सेवा करते थे। उन्हींकी आराधना करके उन दोनोंने परम पद प्राप्त कर लिया। इस प्रकार महाकाल नामक शिवलिंग सत्पुरुषोंका आश्रय है। भक्तवत्सल शंकर दुष्ट पुरुषोंका सर्वथा हनन करनेवाले हैं। यह परम पवित्र रहस्यमय आख्यान कहा गया है, जो सब प्रकारका सुख देनेवाला है। यह शिवभक्तिको बढ़ाने तथा स्वर्गकी प्राप्ति करानेवाला है। (अध्याय १७)
विन्ध्यकी तपस्या, ओंकारमें परमेश्वरलिंगके प्रादुर्भाव और उसकी महिमाका वर्णन
ऋषियोंने कहा—महाभाग सूतजी! आपने अपने भक्तकी रक्षा करनेवाले महाकाल नामक शिवलिंगकी बड़ी अद्भुत कथा सुनायी है। अब कृपा करके चौथे ज्योतिर्लिंगका परिचय दीजिये—ओंकार-तीर्थमें सर्वपातकहारी परमेश्वरका जो ज्योतिर्लिंग है, उसके आविर्भावकी कथा सुनाइये।
सूतजी बोले—महर्षियो! ओंकारतीर्थमें परमेशसंज्ञक ज्योतिर्लिंग जिस प्रकार प्रकट हुआ, वह बताता हूँ; प्रेमसे सुनो। एक समयकी बात है, भगवान् नारद मुनि गोकर्ण नामक शिवके समीप जा बड़ी भक्तिके साथ उनकी सेवा करने लगे। कुछ कालके बाद वे मुनिश्रेष्ठ वहाँसे गिरिराज विन्ध्यपर आये और विन्ध्यने वहाँ बड़े आदरके साथ उनका पूजन किया। मेरे यहाँ सब कुछ है, कभी किसी बातकी कमी नहीं होती है, इस भावको मनमें लेकर विन्ध्याचल नारदजीके सामने खड़ा हो गया। उसकी वह अभिमानभरी बात सुनकर अहंकारनाशक नारद मुनि लंबी साँस खींचकर चुपचाप खड़े रह गये। यह देख विन्ध्य पर्वतने पूछा—'आपने मेरे यहाँ कौन-सी कमी देखी है? आपके इस तरह लंबी साँस खींचनेका क्या कारण है?'
५१२ * संक्षिप्त शिवपुराण *
नारदजीने कहा—भैया! तुम्हारे यहाँ सब कुछ है। फिर भी मेरु पर्वत तुमसे बहुत ऊँचा है। उसके शिखरोंका विभाग देवताओंके लोकोंमें भी पहुँचा हुआ है। किंतु तुम्हारे शिखरका भाग वहाँ कभी नहीं पहुँच सका है।
सूतजी कहते हैं—ऐसा कहकर नारदजी वहाँसे जिस तरह आये थे, उसी तरह चल दिये। परंतु विन्ध्य पर्वत 'मेरे जीवन आदिको धिक्कार है' ऐसा सोचता हुआ मन-ही-मन संतप्त हो उठा। अच्छा, 'अब मैं विश्वनाथ भगवान् शम्भुकी आराधनापूर्वक तपस्या करूँगा' ऐसा हार्दिक निश्चय करके वह भगवान् शंकरकी शरणमें गया। तदनन्तर जहाँ साक्षात् ओंकारकी स्थिति है, वहाँ प्रसन्नतापूर्वक जाकर उसने शिवकी पार्थिवमूर्ति बनायी और छः मासतक निरन्तर शम्भुकी आराधना करके शिवके ध्यानमें तत्पर हो वह अपनी तपस्याके स्थानसे हिलातक नहीं। विन्ध्याचलकी ऐसी तपस्या देखकर पार्वतीपति प्रसन्न हो गये। उन्होंने विन्ध्याचलको अपना वह स्वरूप दिखाया, जो योगियोंके लिये भी दुर्लभ है। वे प्रसन्न हो उस समय उससे बोले—'विन्ध्य! तुम मनोवांछित वर मागो। मैं भक्तोंको अभीष्ट वर देनेवाला हूँ और तुम्हारी तपस्यासे प्रसन्न हूँ।'
विन्ध्य बोला—देवेश्वर शम्भो! आप सदा ही भक्तवत्सल हैं। यदि आप मुझपर प्रसन्न हैं तो मुझे वह अभीष्ट बुद्धि प्रदान कीजिये, जो अपने कार्यको सिद्ध करनेवाली हो।
भगवान् शम्भुने उसे वह उत्तम वर दे दिया और कहा—'पर्वतराज विन्ध्य! तुम जैसा चाहो, वैसा करो।' इसी समय देवता तथा निर्मल अन्तःकरणवाले ऋषि वहाँ आये और शंकरजीकी पूजा करके बोले—'प्रभो! आप यहाँ स्थिररूपसे निवास करें।'
देवताओंकी यह बात सुनकर परमेश्वर शिव प्रसन्न हो गये और लोकोंको सुख देनेके लिये उन्होंने सहर्ष वैसा ही किया। वहाँ जो एक ही ओंकारलिंग था, वह दो स्वरूपोंमें विभक्त हो गया। प्रणवमें जो सदाशिव थे, वे ओंकार नामसे विख्यात हुए और पार्थिवमूर्तिमें जो शिवज्योति प्रतिष्ठित हुई, उसकी परमेश्वर संज्ञा हुई (परमेश्वरको ही अमलेश्वर भी कहते हैं)। इस प्रकार ओंकार और परमेश्वर—ये दोनों शिवलिंग भक्तोंको अभीष्ट फल प्रदान करनेवाले हैं। उस समय देवताओं और ऋषियोंने उन दोनों लिंगोंकी पूजा की और भगवान् वृषभध्वजको संतुष्ट करके अनेक वर प्राप्त किये। तत्पश्चात् देवता अपने-अपने स्थानको गये और विन्ध्याचल भी अधिक प्रसन्नताका अनुभव करने लगा। उसने अपने अभीष्ट कार्यको सिद्ध किया और मानसिक परितापको त्याग दिया। जो पुरुष
* कोटिरुद्रसंहिता * ५१३
इस प्रकार भगवान् शंकरका पूजन करता है, वह माताके गर्भमें फिर नहीं आता और अपने अभीष्ट फलको प्राप्त कर लेता है—इसमें संशय नहीं।
सूतजी कहते हैं—महर्षियो ! ओंकारमें जो ज्योतिर्लिंग प्रकट हुआ और उसकी आराधनासे जो फल मिलता है, वह सब यहाँ तुम्हें बता दिया। इसके बाद मैं उत्तम केदार नामक ज्योतिर्लिंगका वर्णन करूँगा।
(अध्याय १८)
केदारेश्वर तथा भीमशंकर नामक ज्योतिर्लिंगोंके आविर्भावकी कथा तथा उनके माहात्म्यका वर्णन
सूतजी कहते हैं—ब्राह्मणो ! भगवान् विष्णुके जो नर-नारायण नामक दो अवतार हैं और भारतवर्षके बदरिकाश्रमतीर्थमें तपस्या करते हैं, उन दोनोंने पार्थिव शिवलिंग बनाकर उसमें स्थित हो पूजा ग्रहण करनेके लिये भगवान् शम्भुसे प्रार्थना की। शिवजी भक्तोंके अधीन होनेके कारण प्रतिदिन उनके बनाये हुए पार्थिवलिंगमें पूजित होनेके लिये आया करते थे। जब उन दोनोंके पार्थिव-पूजन करते बहुत दिन बीत गये, तब एक समय परमेश्वर शिवने प्रसन्न होकर कहा—‘मैं तुम्हारी आराधनासे बहुत संतुष्ट हूँ। तुम दोनों मुझसे वर माँगो।’ उस समय उनके ऐसा कहनेपर नर और नारायणने लोगोंके हितकी कामनासे कहा—‘देवेश्वर ! यदि आप प्रसन्न हैं और यदि मुझे वर देना चाहते हैं तो अपने स्वरूपसे पूजा ग्रहण करनेके लिये यहीं स्थित हो जाइये।’
उन दोनों बन्धुओंके इस प्रकार अनुरोध करनेपर कल्याणकारी महेश्वर हिमालयके उस केदारतीर्थमें स्वयं ज्योतिर्लिंगके रूपमें स्थित हो गये। उन दोनोंसे पूजित होकर
789 संक्षिप्त शिवपुराण—17 A