शिव पुराण
Shiva Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें- कोटिरुद्रसंहिता * ५५७
कालके भी काल होनेसे महाकाल, ७९८ सत्यपरायणः—सत्यनिष्ठ॥ १०३॥
लोकलावण्यकर्ता च लोकोत्तरसुखालयः।
चन्द्रसंजीवनः शास्ता लोकगूढो महाधिपः॥ १०४॥
७९९ लोकलावण्यकर्ता—सब लोगोंको सौन्दर्य प्रदान करनेवाले, ८०० लोकोत्तर-सुखालयः—लोकोत्तर सुखके आश्रय, ८०१ चन्द्रसंजीवनः शास्ता—सोमनाथरूपसे चन्द्रमाको जीवन प्रदान करनेवाले सर्वशासक शिव, ८०२ लोकगूढः—समस्त संसारमें अव्यक्तरूपसे व्यापक, ८०३ महाधिपः—महेश्वर॥ १०४॥
लोकबन्धुर्लोकनाथः कृतज्ञः कीर्तिभूषणः।
अनपायोऽक्षरः कान्तः सर्वशस्त्रभृतां वरः॥ १०५॥
८०४ लोकबन्धुर्लोकनाथः—सम्पूर्ण लोकोंके बन्धु एवं रक्षक, ८०५ कृतज्ञः—उपकारको माननेवाले, ८०६ कीर्तिभूषणः—उत्तम यशसे विभूषित, ८०७ अनपायोऽक्षरः—विनाशरहित—अविनाशी, ८०८ कान्तः—प्रजापति दक्षका अन्त करनेवाले, ८०९ सर्वशस्त्रभृतां वरः—सम्पूर्ण शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ॥ १०५॥
तेजोमयो द्युतिधरो लोकानामग्रणीरणुः।
शुचिस्मितः प्रसन्नात्मा दुर्जेयो दुरतिक्रमः॥ १०६॥
८१० तेजोमयो द्युतिधरः—तेजस्वी और कान्तिमान्, ८११ लोकानामग्रणीः—सम्पूर्ण जगत्के लिये अग्रगण्य देवता अथवा जगत्को आगे बढ़ानेवाले, ८१२ अणुः—अत्यन्त सूक्ष्म, ८१३ शुचिस्मितः—पवित्र मुसकानवाले, ८१४ प्रसन्नात्मा—हर्षभरे हृदयवाले, ८१५ दुर्जेयः—जिनपर विजय पाना अत्यन्त कठिन है, ऐसे, ८१६ दुरतिक्रमः—दुर्लङ्घ्य॥ १०६॥
ज्योतिर्मयो जगन्नाथो निराकारो जलेश्वरः।
तुम्बवीणो महाकोपो विशोकः शोकनाशनः॥ १०७॥
८१७ ज्योतिर्मयः—तेजोमय, ८१८ जगन्नाथः—विश्वनाथ, ८१९ निराकारः—आकाररहित परमात्मा, ८२० जलेश्वरः—जलके स्वामी, ८२१ तुम्बवीणः—तूँबीकी वीणा बजानेवाले, ८२२ महाकोपः—संहारके समय महान् क्रोध करनेवाले, ८२३ विशोकः—शोकरहित, ८२४ शोकनाशनः—शोकका नाश करनेवाले॥ १०७॥
त्रिलोकपस्त्रिलोकेशः सर्वशुद्धिरधोक्षजः।
अव्यक्तलक्षणो देवो व्यक्ताव्यक्तो विशाम्पतिः॥ १०८॥
८२५ त्रिलोकपः—तीनों लोकोंका पालन करनेवाले, ८२६ त्रिलोकेशः—त्रिभुवनके स्वामी, ८२७ सर्वशुद्धिः—सबकी शुद्धि करनेवाले, ८२८ अधोक्षजः—इन्द्रियों और उनके विषयोंसे अतीत, ८२९ अव्यक्तलक्षणो देवः—अव्यक्त लक्षणवाले देवता, ८३० व्यक्ताव्यक्तः—स्थूलसूक्ष्मरूप, ८३१ विशाम्पतिः—प्रजाओंके पालक॥ १०८॥
वरशीलो वरगुणः सारो मानधनो मयः।
ब्रह्मा विष्णुः प्रजापालो हंसो हंसगतिर्वयः॥ १०९॥
८३२ वरशीलः—श्रेष्ठ स्वभाववाले, ८३३ वरगुणः—उत्तम गुणोंवाले, ८३४ सारः—सारतत्त्व, ८३५ मानधनः—स्वाभिमानके धनी, ८३६ मयः—सुखस्वरूप, ८३७ ब्रह्मा—सृष्टिकर्ता ब्रह्मा, ८३८ विष्णुः प्रजापालः—प्रजापालक विष्णु, ८३९ हंसः—सूर्यस्वरूप, ८४० हंसगतिः—हंसके समान चालवाले, ८४१ वयः—गरुड़ पक्षी॥ १०९॥
वेधा विधाता धाता च स्रष्टा हर्ता चतुर्मुखः।
कैलासशिखरावासी सर्वावासी सदागतिः॥ ११०॥
८४२ वेधा विधाता धाता—ब्रह्मा, धाता और विधाता नामक देवतास्वरूप, ८४३ स्रष्टा—सृष्टिकर्ता, ८४४ हर्ता—संहार-कारी, ८४५ चतुर्मुखः—चार मुखवाले ब्रह्मा,