भारतकोश
शिव पुराण

शिव पुराण

Shiva Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished850 पृष्ठ

पृष्ठ 573, कुल 850 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 573
  • कोटिरुद्रसंहिता * ५५९

हाथवाले, ८९४ दक्षिणानिलः—मलयानिलके समान सुखद, ८९५ नन्दिस्कन्धधरः—नन्दीकी पीठपर सवार होनेवाले, ८९६ धुर्यः—उत्तरदायित्वका भार वहन करनेमें समर्थ, ८९७ प्रकटः—भक्तोंके सामने प्रकट होनेवाले अथवा ज्ञानियोंके सामने नित्य प्रकट, ८९८ प्रीतिवर्धनः—प्रेम बढ़ानेवाले ॥ ११७॥

अपराजितः सर्वसत्त्वो गोविन्दः सत्त्ववाहनः।
अधृतः स्वधृतः सिद्धः पूतमूर्तिर्यशोधनः ॥ ११८ ॥

८९९ अपराजितः—किसीसे परास्त न होनेवाले, ९०० सर्वसत्त्वः—सम्पूर्ण सत्त्वगुणके आश्रय अथवा समस्त प्राणियोंकी उत्पत्तिके हेतु, ९०१ गोविन्दः—गोलोककी प्राप्ति करानेवाले, ९०२ सत्त्ववाहनः—सत्त्वस्वरूप धर्ममय वृषभसे वाहनका काम लेनेवाले, ९०३ अधृतः—आधाररहित, ९०४ स्वधृतः—अपने-आपमें ही स्थित, ९०५ सिद्धः—नित्यसिद्ध, ९०६ पूतमूर्तिः—पवित्र शरीरवाले, ९०७ यशोधनः—सुयशके धनी ॥ ११८ ॥

वाराहशृङ्गधृक्छृङ्गी बलवानेकनायकः।
श्रुतिप्रकाशः श्रुतिमानेकबन्धुरनेककृत् ॥ ११९॥

९०८ वाराहशृङ्गधृक्छृङ्गी—वाराहको मारकर उसके दाढ़रूपी शृंगोंको धारण करनेके कारण शृंगी नामसे प्रसिद्ध, ९०९ बलवान्—शक्तिशाली, ९१० एकनायकः—अद्वितीय नेता, ९११ श्रुतिप्रकाशः—वेदोंको प्रकाशित करनेवाले, ९१२ श्रुतिमान्—वेदज्ञानसे सम्पन्न, ९१३ एकबन्धुः—सबके एकमात्र सहायक, ९१४ अनेककृत्—अनेक प्रकारके पदार्थोंकी सृष्टि करनेवाले ॥ ११९॥

श्रीवत्सलेशिवारम्भः शान्तभद्रः समो यशः।
भूशयो भूषणो भूतिर्भूतकृद् भूतभावनः ॥ १२० ॥

९१५ श्रीवत्सलशिवारम्भः—श्रीवत्सधारी विष्णुके लिये मंगलकारी, ९१६ शान्तभद्रः—शान्त एवं मंगलरूप, ९१७ समः—सर्वत्र समभाव रखनेवाले, ९१८ यशः—यशस्वरूप, ९१९ भूशयः—पृथ्वीपर शयन करनेवाले, ९२० भूषणः—सबको विभूषित करनेवाले, ९२१ भूतिः—कल्याणस्वरूप, ९२२ भूतकृत्—प्राणियोंकी सृष्टि करनेवाले, ९२३ भूतभावनः—भूतोंके उत्पादक ॥ १२० ॥

अकम्पो भक्तिकायस्तु कालहा नीललोहितः।
सत्यव्रतमहात्यागी नित्यशान्तिपरायणः ॥ १२१ ॥

९२४ अकम्पः—कम्पित न होनेवाले, ९२५ भक्तिकायः—भक्तिस्वरूप, ९२६ कालहा—कालनाशक, ९२७ नीललोहितः—नील और लोहितवर्णवाले, ९२८ सत्यव्रतमहात्यागी—सत्यव्रतधारी एवं महान् त्यागी, ९२९ नित्यशान्तिपरायणः—निरन्तर शान्त ॥ १२१ ॥

परार्थवृत्तिर्वरदो विरक्तस्तु विशारदः।
शुभदः शुभकर्ता च शुभनामा शुभः स्वयंम् ॥ १२२ ॥

९३० परार्थवृत्तिर्वरदः—परोपकारव्रती एवं अभीष्ट वरदाता, ९३१ विरक्तः—वैराग्यवान्, ९३२ विशारदः—विज्ञानवान्, ९३३ शुभदः शुभकर्ता—शुभ देने और करनेवाले, ९३४ शुभनामा शुभः स्वयंम्—स्वयं शुभस्वरूप होनेके कारण शुभ नामधारी ॥ १२२ ॥

अनर्थितोऽगुणः साक्षी ह्यकर्ता कनकप्रभः।
स्वभावभद्रो मध्यस्थः शत्रुघ्नो विघ्ननाशनः ॥ १२३॥

९३५ अनर्थितः—याचनारहित, ९३६ अगुणः—निर्गुण, ९३७ साक्षी ह्यकर्ता—द्रष्टा एवं कर्तृत्वरहित, ९३८ कनकप्रभः—सुवर्णके समान कान्तिमान्, ९३९ स्वभावभद्रः—