भारतकोश
शिव पुराण

शिव पुराण

Shiva Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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५६० * संक्षिप्त शिवपुराण *


स्वभावतः कल्याणकारी, ९४० मध्यस्थः—उदासीन, ९४१ शत्रुघ्नः—शत्रुनाशक, ९४२ विघ्ननाशनः—विघ्नोंका निवारण करनेवाले॥ १२३॥

शिखण्डी कवची शूली जटी मुण्डी च कुण्डली।
अमृत्युः सर्वदृक्सिंहस्तेजोराशिर्महामणिः ॥ १२४॥

९४३ शिखण्डी कवची शूली—मोरपंख, कवच और त्रिशूल धारण करनेवाले, ९४४ जटी मुण्डी च कुण्डली—जटा, मुण्डमाला और कवच धारण करनेवाले, ९४५ अमृत्युः—मृत्युरहित, ९४६ सर्वदृक्सिंहः—सर्वज्ञोंमें श्रेष्ठ, ९४७ तेजोराशिर्महामणिः—तेजःपुंज महामणि कौस्तुभादिरूप॥ १२४॥

असंख्येयोऽप्रमेयात्मा वीर्यवान् वीर्यकोविदः।
वेद्यश्चैव वियोगात्मा परावरमुनीश्वरः ॥ १२५॥

९४८ असंख्येयोऽप्रमेयात्मा—असंख्य नाम, रूप और गुणोंसे युक्त होनेके कारण किसीके द्वारा मापे न जा सकनेवाले, ९४९ वीर्यवान् वीर्यकोविदः—पराक्रमी एवं पराक्रमके ज्ञाता, ९५० वेद्यः—जाननेयोग्य, ९५१ वियोगात्मा—दीर्घकालतक सतीके वियोगमें अथवा विशिष्ट योगकी साधनामें संलग्न हुए मनवाले, ९५२ परावरमुनीश्वरः—भूत और भविष्यके ज्ञाता मुनीश्वररूप॥ १२५॥

अनुत्तमो दुराधर्षो मधुरप्रियदर्शनः।
सुरेशः शरणं सर्वः शब्दब्रह्म सतां गतिः ॥ १२६॥

९५३ अनुत्तमो दुराधर्षः—सर्वोत्तम एवं दुर्जय, ९५४ मधुरप्रियदर्शनः—जिनका दर्शन मनोहर एवं प्रिय लगता है, ऐसे, ९५५ सुरेशः—देवताओंके ईश्वर, ९५६ शरणम्—आश्रयदाता, ९५७ सर्वः—सर्वस्वरूप, ९५८ शब्दब्रह्म सतां गतिः—प्रणवरूप तथा सत्पुरुषोंके आश्रय॥ १२६॥


कालपक्षः कालकालः कङ्कणीकृतवासुकिः।
महेष्वासो महीभर्ता निष्कलङ्को विशृङ्खलः ॥ १२७॥

९५९ कालपक्षः—काल जिनका सहायक है, ऐसे, ९६० कालकालः—कालके भी काल, ९६१ कङ्कणीकृतवासुकिः—वासुकि नागको अपने हाथमें कंगनके समान धारण करनेवाले, ९६२ महेष्वासः—महाधनुर्धर, ९६३ महीभर्ता—पृथ्वीपालक, ९६४ निष्कलङ्कः—कलंकशून्य, ९६५ विशृङ्खलः—बन्धनरहित॥ १२७॥

द्युमणिस्तरणिर्धन्यः सिद्धिदः सिद्धिसाधनः।
विश्वतः संवृतः स्तुत्यो व्यूढोरस्को महाभुजः ॥ १२८॥

९६६ द्युमणिस्तरणिः—आकाशमें मणिके समान प्रकाशमान तथा भक्तोंको भवसागरसे तारनेके लिये नौकारूप सूर्य, ९६७ धन्यः—कृतकृत्य, ९६८ सिद्धिदः सिद्धिसाधनः—सिद्धिदाता और सिद्धिके साधक, ९६९ विश्वतः संवृतः—सब ओरसे मायाद्वारा आवृत, ९७० स्तुत्यः—स्तुतिके योग्य, ९७१ व्यूढोरस्कः—चौड़ी छातीवाले, ९७२ महाभुजः—बड़ी बाँहवाले॥ १२८॥

सर्वयोनिर्निरातङ्को नरनारायणप्रियः।
निर्लेपो निष्प्रपञ्चात्मा निर्व्यङ्गो व्यङ्गनाशनः ॥ १२९॥

९७३ सर्वयोनिः—सबकी उत्पत्तिके स्थान, ९७४ निरातङ्कः—निर्भय, ९७५ नरनारायणप्रियः—नर-नारायणके प्रेमी अथवा प्रियतम, ९७६ निर्लेपो निष्प्रपञ्चात्मा—दोषसम्पर्कसे रहित तथा जगत्प्रपंचसे अतीत स्वरूपवाले, ९७७ निर्व्यङ्गः—विशिष्ट अंगवाले प्राणियोंके प्राकट्यमें हेतु, ९७८ व्यङ्गनाशनः—यज्ञादि कर्मोंमें होनेवाले अंग-वैगुण्यका नाश करनेवाले॥ १२९॥

स्तव्यः स्तवप्रियः स्तोता व्यासमूर्तिर्निरङ्कुशः।
निरवद्यमयोपायो विद्याराशी रसप्रियः॥ १३०॥