शिव पुराण
Shiva Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें* कोटिरुद्रसंहिता * ५६१
९७९ स्तव्यः—स्तुतिके योग्य, ९८० स्तवप्रियः—स्तुतिके प्रेमी, ९८१ स्तोता—स्तुति करनेवाले, ९८२ व्यासमूर्तिः—व्यासस्वरूप, ९८३ निरङ्कुशः—अंकुशरहित स्वतन्त्र, ९८४ निरवद्यमयोपायः—मोक्ष-प्राप्तिके निर्दोष उपायस्वरूप, ९८५ विद्याराशिः—विद्याओंके सागर, ९८६ रसप्रियः—ब्रह्मानन्दरसके प्रेमी॥ १३०॥
प्रशान्तबुद्धिरक्षुण्णः संग्रही नित्यसुन्दरः।
वैय्याघ्रधुर्यो धात्रीशः शाकल्यः शर्वरीपतिः॥ १३१॥
९८७ प्रशान्तबुद्धिः—शान्त बुद्धिवाले, ९८८ अक्षुण्णः—क्षोभ या नाशसे रहित, ९८९ संग्रही—भक्तोंका संग्रह करनेवाले, ९९० नित्यसुन्दरः—सतत मनोहर, ९९१ वैय्याघ्रधुर्यः—व्याघ्रचर्मधारी, ९९२ धात्रीशः—ब्रह्माजीके स्वामी, ९९३ शाकल्यः—शाकल्य ऋषिरूप, ९९४ शर्वरीपतिः—रात्रिके स्वामी चन्द्रमारूप॥ १३१॥
परमार्थगुरुर्दत्तः सूरिराश्रितवत्सलः।
सोमो रसज्ञो रसदः सर्वसत्त्वावलम्बनः॥ १३२॥
९५५ परमार्थगुरुर्दत्तः सूरिः—परमार्थ-तत्त्वका उपदेश देनेवाले ज्ञानी गुरु दत्तात्रेयरूप, ९९६ आश्रितवत्सलः—शरणागतोंपर दया करनेवाले, ९९७ सोमः—उमासहित, ९९८ रसज्ञः—भक्तिरसके ज्ञाता, ९९९ रसदः—प्रेमरस प्रदान करनेवाले, १००० सर्वसत्त्वावलम्बनः—समस्त प्राणियोंको सहारा देनेवाले॥ १३२॥
इस प्रकार श्रीहरि प्रतिदिन सहस्त्र नामोंद्वारा भगवान् शिवकी स्तुति, सहस्त्र कमलोंद्वारा उनका पूजन एवं प्रार्थना किया करते थे। एक दिन भगवान् शिवकी लीलासे एक कमल कम हो जानेपर भगवान् विष्णुने अपना कमलोपम नेत्र ही चढ़ा दिया। इस तरह उनसे पूजित एवं प्रसन्न हो शिवने उन्हें चक्र दिया और इस प्रकार कहा—'हरे! सब प्रकारके अनर्थोंकी शान्तिके लिये तुम्हें मेरे स्वरूपका ध्यान करना चाहिये। अनेकानेक दुःखोंका नाश करनेके लिये इस सहस्रनामका पाठ करते रहना चाहिये तथा समस्त मनोरथोंकी सिद्धिके लिये सदा मेरे इस चक्रको प्रयत्नपूर्वक धारण करना चाहिये, यह सभी चक्रोंमें उत्तम है। दूसरे भी जो लोग प्रतिदिन इस सहस्रनामका पाठ करेंगे या करायेंगे, उन्हें स्वप्नमें भी कोई दुःख नहीं प्राप्त होगा। राजाओंकी ओरसे संकट प्राप्त होनेपर यदि मनुष्य सांगोपांग विधिपूर्वक इस सहस्रनामस्तोत्रका सौ बार पाठ करे तो निश्चय ही कल्याणका भागी होता है। यह उत्तम स्तोत्र रोगका नाशक, विद्या और धन देनेवाला, सम्पूर्ण अभीष्टकी प्राप्ति करानेवाला, पुण्यजनक तथा सदा ही शिवभक्ति देनेवाला है। जिस फलके उद्देश्यसे मनुष्य यहाँ इस श्रेष्ठ स्तोत्रका पाठ करेंगे, उसे निस्संदेह प्राप्त कर लेंगे। जो प्रतिदिन सबेरे उठकर मेरी पूजाके पश्चात् मेरे सामने इसका पाठ करता है, सिद्धि उससे दूर नहीं रहती। उसे इस लोकमें सम्पूर्ण अभीष्टको देनेवाली सिद्धि पूर्णतया प्राप्त होती है और अन्तमें वह सायुज्य मोक्षका भागी होता है, इसमें संशय नहीं है।'
सूतजी कहते हैं—मुनीश्वरो! ऐसा कहकर सर्वदेवेश्वर भगवान् रुद्र श्रीहरिके अंगका स्पर्श किये और उनके देखते-देखते