शिव पुराण
Shiva Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
* वायवीयसंहिता *
७२७
उनकी वल्लभा शिवादेवी रुद्राणी। विश्वेश्वर देव विष्णु हैं और उनकी प्रिया लक्ष्मी। जब सृष्टिकर्ता शिव ब्रह्मा कहलाते हैं, तब उनकी प्रियाको ब्रह्माणी कहते हैं। भगवान् शिव भास्कर हैं और भगवती शिवा प्रभा। कामनाशन शिव महेन्द्र हैं और गिरिराज-नन्दिनी उमा शची। महादेवजी अग्नि हैं और उनकी अर्द्धाङ्गिनी उमा स्वाहा। भगवान् त्रिलोचन यम हैं और गिरिराजनन्दिनी उमा यमप्रिया। भगवान् शंकर निर्ऋति हैं और पार्वती नैर्ऋती। भगवान् रुद्र वरुण हैं और पार्वती वारुणी। चन्द्रशेखर शिव वायु हैं और पार्वती वायुप्रिया। शिव यक्ष हैं और पार्वती ऋद्धि। चन्द्रार्धशेखर शिव चन्द्रमा हैं और रुद्रवल्लभा उमा रोहिणी। परमेश्वर शिव ईशान हैं और परमेश्वरी शिवा उनकी पत्नी। नागराज अनन्तको वलयरूपमें धारण करनेवाले भगवान् शंकर अनन्त हैं और उनकी वल्लभा शिवा अनन्ता। कालशत्रु शिव कालाग्निरुद्र हैं और काली कालान्तकप्रिया हैं। जिनका दूसरा नाम पुरुष है, ऐसे स्वायम्भुव मनुके रूपमें साक्षात् शम्भु ही हैं और शिवप्रिया उमा शतरूपा हैं। साक्षात् महादेव दक्ष हैं और परमेश्वरी पार्वती प्रसूति। भगवान् भव रुचि हैं और भवानीको ही विद्वान् पुरुष आकूति कहते हैं। महादेवजी भृगु हैं और पार्वती ख्याति। भगवान् रुद्र मरीचि हैं और शिववल्लभा सम्भूति। भगवान् गंगाधर अंगिरा हैं और साक्षात् उमा स्मृति। चन्द्रमौलि पुलस्त्य हैं और पार्वती प्रीति। त्रिपुरनाशक शिव पुलह हैं और पार्वती ही उनकी प्रिया हैं। यज्ञविध्वंसी शिव क्रतु कहे गये हैं और उनकी प्रिया पार्वती संनति। भगवान् शिव अत्रि हैं और साक्षात् उमा अनसूया। कालहन्ता शिव कश्यप हैं और महेश्वरी उमा देवमाता अदिति। कामनाशन शिव वसिष्ठ हैं और साक्षात् देवी पार्वती अरुन्धती। भगवान् शंकर ही संसारके सारे पुरुष हैं और महेश्वरी शिवा ही सम्पूर्ण स्त्रियाँ। अतः सभी स्त्री-पुरुष उन्हींकी विभूतियाँ हैं। ॐ
भगवान् शिव विषयी हैं और परमेश्वरी उमा विषय। जो कुछ सुननेमें आता है वह सब उमाका रूप है और श्रोता साक्षात् भगवान् शंकर हैं। जिसके विषयमें प्रश्न या जिज्ञासा होती है, उस समस्त वस्तु-समुदायका रूप शंकरवल्लभा शिवा स्वयं धारण करती हैं तथा पूछनेवाला जो पुरुष है, वह बाल चन्द्रशेखर विश्वात्मा शिवरूप ही है। भववल्लभा उमा ही द्रष्टव्य वस्तुओंका रूप धारण करती हैं और द्रष्टा पुरुषके रूपमें शशिखण्डमौलि भगवान् विश्वनाथ ही सब कुछ देखते हैं। सम्पूर्ण रसकी राशि महादेवी हैं और उस रसका आस्वादन करनेवाले मंगलमय महादेव हैं। प्रेमसमूह पार्वती हैं और प्रियतम विषभोजी शिव हैं। देवी महेश्वरी सदा मन्तव्य वस्तुओंका स्वरूप धारण करती हैं और विश्वात्मा महेश्वर महादेव उन वस्तुओंके मन्ता (मनन करनेवाले हैं)। भववल्लभा पार्वती बोद्धव्य (जाननेयोग्य) वस्तुओंका स्वरूप धारण करती हैं और शिशु-शशिशेखर भगवान् महादेव ही उन वस्तुओंके ज्ञाता हैं। सामर्थ्यशाली भगवान् पिनाकी सम्पूर्ण प्राणियोंके प्राण हैं और सबके प्राणोंकी स्थिति जलरूपिणी माता पार्वती हैं। त्रिपुरान्तक पशुपतिकी प्राणवल्लभा पार्वती-देवी जब क्षेत्रका स्वरूप धारण करती
७२८ * संक्षिप्त शिवपुराण *
हैं, तब कालके भी काल भगवान् महाकाल क्षेत्रज्ञरूपमें स्थित होते हैं। शूलधारी महादेवजी दिन हैं तो शूलपाणि प्रिया पार्वती रात्रि। कल्याणकारी महादेवजी आकाश हैं और शंकरप्रिया पार्वती पृथिवी। भगवान् महेश्वर समुद्र हैं तो गिरिराज-कन्या शिवा उसकी तटभूमि हैं। वृषभध्वज महादेव वृक्ष हैं, तो विश्वेश्वरप्रिया उमा उसपर फैलनेवाली लता हैं। भगवान् त्रिपुरनाशक महादेव सम्पूर्ण पुँल्लिङ्गरूपको स्वयं धारण करते हैं और महादेवमनोरमा देवी शिवा सारा स्त्रीलिङ्गरूप धारण करती हैं। शिववल्लभा शिवा समस्त शब्दजालका रूप धारण करती हैं और बालेन्दुशेखर शिव सम्पूर्ण अर्थका। जिस-जिस पदार्थकी जो-जो शक्ति कही गयी है, वह-वह शक्ति तो विश्वेश्वरी देवी शिवा हैं और वह-वह सारा पदार्थ साक्षात् महेश्वर हैं। जो सबसे परे है, जो पवित्र है, जो पुण्यमय है तथा जो मंगलरूप है, उस-उस वस्तुको महाभाग महात्माओंने उन्हीं दोनों शिव-पार्वतीके तेजसे विस्तारको प्राप्त हुई बताया है।
जैसे जलते हुए दीपककी शिखा समूचे घरको प्रकाशित करती है, उसी प्रकार शिव-पार्वतीका ही यह तेज व्याप्त होकर सम्पूर्ण जगत्को प्रकाश दे रहा है। ये दोनों शिवा और शिव सर्वरूप हैं, सबका कल्याण करनेवाले हैं; अतः सदा ही इन दोनोंका पूजन, नमन एवं चिन्तन करना चाहिये।
श्रीकृष्ण! आज मैंने तुम्हारे समक्ष अपनी बुद्धिके अनुसार परमेश्वर शिवा और शिवके यथार्थ स्वरूपका वर्णन किया है, परंतु इयत्तापूर्वक नहीं; अर्थात् इस वर्णनसे यह नहीं मान लेना चाहिये कि इन दोनोंके यथार्थरूपका पूर्णतः वर्णन हो गया; क्योंकि इनके स्वरूपकी इयत्ता (सीमा) नहीं है। जो समस्त महापुरुषोंके भी मनकी सीमासे परे है, परमेश्वर शिव और शिवाके उस यथार्थ स्वरूपका वर्णन कैसे किया जा सकता है। जिन्होंने अपने चित्तको महेश्वरके चरणोंमें अर्पित कर दिया है तथा जो उनके अनन्यभक्त हैं, उनके ही मनमें वे आते हैं और उन्हींकी बुद्धिमें आरूढ़ होते हैं। दूसरोंकी बुद्धिमें वे आरूढ़ नहीं होते। यहाँ मैंने जिस विभूतिका वर्णन किया है, वह प्राकृत है, इसलिये अपरा मानी गयी है। इससे भिन्न जो अप्राकृत एवं परा विभूति है, वह गुह्य है। उनके गुह्य रहस्यको जाननेवाले पुरुष ही उन्हें जानते हैं। परमेश्वरकी यह अप्राकृत परा विभूति वह है, जहाँसे मन और इन्द्रियोंसहित वाणी लौट आती है। परमेश्वरकी वही विभूति यहाँ परम धाम है, वही यहाँ परमगति है और वही यहाँ पराकाष्ठा है।* जो अपने श्वास और इन्द्रियोंपर विजय पा चुके हैं, वे योगीजन ही उसे पानेका प्रयत्न करते हैं। शिवा और शिवकी यह विभूति संसाररूपी विषधर सर्पके डसनेसे मृत्युके अधीन हुए मानवोंके लिये संजीवनी ओषधि है। इसे जाननेवाला
* यतो वाचो निवर्तन्ते मनसा चेन्द्रियैः सह। अप्राकृता परा चैषा विभूतिः पारमेश्वरी॥
सैवेह परं धाम सैवेह परमा गतिः। सैवेहं परमा काष्ठा विभूतिः परमेष्ठिनः॥
(शि० पु० वा० सं० उ० खं० ४। ७६-७७)
* वायवीयसंहिता * ७२९
पुरुष किसीसे भी भयभीत नहीं होता। जो इस परा और अपरा विभूतिको ठीक-ठीक जान लेता है, वह अपरा विभूतिको लाँघकर परा विभूतिका अनुभव करने लगता है।
श्रीकृष्ण! यह तुमसे परमात्मा शिव और पार्वतीके यथार्थ स्वरूपका गोपनीय होनेपर भी वर्णन किया गया है; क्योंकि तुम भगवान् शिवकी भक्तिके योग्य हो। जो शिष्य न हों, शिवके उपासक न हों और भक्त भी न हों, ऐसे लोगोंको कभी शिव-पार्वतीकी इस विभूतिका उपदेश नहीं देना चाहिये। यह वेदकी आज्ञा है। अतः अत्यन्त कल्याणमय श्रीकृष्ण! तुम दूसरोंको इसका उपदेश न देना। जो तुम्हारे जैसे योग्य पुरुष हों, उन्हींसे कहना; अन्यथा मौन ही रहना। जो भीतरसे पवित्र, शिवका भक्त और विश्वासी हो, वह यदि इसका कीर्तन करे तो मनोवांछित फलका भागी होता है। यदि पहलेके प्रबल प्रतिबन्धक कर्मोंद्वारा प्रथम बार फलकी प्राप्तिमें बाधा पड़ जाय, तो भी बारंबार साधनका अभ्यास करना चाहिये। ऐसा करनेवाले पुरुषके लिये यहाँ कुछ भी दुर्लभ नहीं है।
(अध्याय ४)
परमेश्वर शिवके यथार्थ स्वरूपका विवेचन तथा उनकी शरणमें जानेसे जीवके कल्याणका कथन
उपमन्यु कहते हैं—यदुनन्दन ! यह चराचर जगत् देवाधिदेव महादेवजीका स्वरूप है। परंतु पशु (जीव) भारी पाशसे बँधे होनेके कारण जगत्को इस रूपमें नहीं जानते। महर्षिगण उन परमेश्वर शिवके निर्विकल्प परम भावको न जाननेके कारण उन एकका ही अनेक रूपोंमें वर्णन करते हैं—कोई उस परमतत्त्वको अपर ब्रह्मरूप कहते हैं, कोई परब्रह्मरूप बताते हैं और कोई आदि-अन्तसे रहित उत्कृष्ट महादेवस्वरूप कहते हैं। पंच महाभूत, इन्द्रिय, अन्तःकरण तथा प्राकृत विषयरूप जड तत्त्वको अपर ब्रह्म कहा गया है। इससे भिन्न समष्टि चैतन्यका नाम परब्रह्म है। बृहत् और व्यापक होनेके कारण उसे ब्रह्म कहते हैं। प्रभो! वेदों एवं ब्रह्माजीके अधिपति परब्रह्म परमात्मा शिवके वे पर और अपर दो रूप हैं। कुछ लोग महेश्वर शिवको विद्याविद्यास्वरूपी कहते हैं। इनमें विद्या चेतना है और अविद्या अचेतना। यह विद्याविद्यारूप विश्व जगद्गुरु भगवान् शिवका रूप ही है, इसमें संदेह नहीं है; क्योंकि विश्व उनके वशमें है। भ्रान्ति, विद्या तथा पराविद्या या परम तत्त्व—ये शिवके तीन उत्कृष्ट रूप माने गये हैं। पदार्थोंके विषयमें जो अनेक प्रकारकी असत्य धारणाएँ हैं, उन्हें भ्रान्ति कहते हैं। यथार्थ धारणा या ज्ञानका नाम विद्या है तथा जो विकल्परहित परम ज्ञान है, उसे परम तत्त्व कहते हैं। परम तत्त्व ही सत् है, इससे विपरीत असत् कहा गया है। सत् और असत् दोनोंका पति होनेके कारण शिव सदसत्पति कहलाते हैं। अन्य महर्षियोंने क्षर, अक्षर और उन दोनोंसे परे परम तत्त्वका प्रतिपादन किया है। सम्पूर्ण भूत क्षर हैं और जीवात्मा अक्षर कहलाता है। वे दोनों परमेश्वरके रूप हैं; क्योंकि उन्हींके अधीन
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हैं। शान्तस्वरूप शिव उन दोनोंसे परे हैं, इसलिये क्षराक्षरपर कहे गये हैं। कुछ महर्षि परम कारणरूप शिवको समष्टि-व्यष्टिस्वरूप तथा समष्टि और व्यष्टिका कारण कहते हैं। अव्यक्तको समष्टि कहते हैं और व्यक्तको व्यष्टि। वे दोनों परमेश्वर शिवके रूप हैं, क्योंकि उन्हींकी इच्छासे प्रवृत्त होते हैं। उन दोनोंके कारणरूपसे स्थित भगवान् शिव परम कारण हैं। अतः कारणार्थवेत्ता ज्ञानी पुरुष उन्हें समष्टि-व्यष्टिका कारण बताते हैं। कुछ लोग परमेश्वरको जाति-व्यक्ति-स्वरूप कहते हैं। जिसका शरीरमें भी अनुवर्तन हो, वह जाति कही गयी है। शरीरकी जातिके आश्रित रहनेवाली जो व्यावृत्ति है, जिसके द्वारा जातिभावनाका आच्छादन और वैयक्तिक भावनाका प्रकाशन होता है, उसका नाम व्यक्ति है। जाति और व्यक्ति दोनों ही भगवान् शिवकी आज्ञासे परिपालित हैं, अतः उन महादेवजीको जाति-व्यक्तिस्वरूप कहा गया है।
कोई-कोई शिवको प्रधान, पुरुष, व्यक्त और कालरूप कहते हैं। प्रकृतिका ही नाम प्रधान है। जीवात्माको ही क्षेत्रज्ञ कहते हैं। तेईस तत्त्वोंको मनीषी पुरुषोंने व्यक्त कहा है और जो कार्य-प्रपंचके परिणामका एकमात्र कारण है, उसका नाम काल है। भगवान् शिव इन सबके ईश्वर, पालक, धारणकर्ता, प्रवर्तक, निवर्तक तथा आविर्भाव और तिरोभावके एकमात्र हेतु हैं। वे स्वयंप्रकाश एवं अजन्मा हैं। इसीलिये उन महेश्वरको प्रधान, पुरुष, व्यक्त और कालरूप कहा गया है। कारण, नेता, अधिपति और धाता बताया गया है। कुछ लोग महेश्वरको विराट् और हिरण्यगर्भरूप बताते हैं। जो सम्पूर्ण लोकोंकी सृष्टिके हेतु हैं, उनका नाम हिरण्यगर्भ है और विश्वरूपको विराट् कहते हैं। ज्ञानी पुरुष भगवान् शिवको अन्तर्यामी और परम पुरुष कहते हैं। दूसरे लोग उन्हें प्राज्ञ, तैजस और विश्वरूप बताते हैं। कोई उन्हें तुरीयरूप मानते हैं और कोई सौम्यरूप। कितने ही विद्वानोंका कथन है कि वे ही माता, मान, मेय और मितिरूप हैं। अन्य लोग कर्ता, क्रिया, कार्य, करण और कारणरूप कहते हैं। दूसरे ज्ञानी उन्हें जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्तिरूप बताते हैं। कोई भगवान् शिवको तुरीयरूप कहते हैं तो कोई तुरीयातीत। कोई निर्गुण बताते हैं, कोई सगुण। कोई संसारी कहते हैं, कोई असंसारी। कोई स्वतन्त्र मानते हैं, कोई अस्वतन्त्र। कोई उन्हें घोर समझते हैं, कोई सौम्य। कोई रागवान् कहते हैं, कोई वीतराग; कोई निष्क्रिय बताते हैं, कोई सक्रिय। किन्हींके कथनानुसार वे निरिन्द्रिय हैं तो किन्हींके मतमें सेन्द्रिय हैं। एक उन्हें ध्रुव कहता है तो दूसरा अध्रुव; कोई उन्हें साकार बताते हैं तो कोई निराकार। किन्हींके मतमें वे अदृश्य हैं तो किन्हींके मतमें दृश्य; कोई उन्हें वर्णनीय मानते हैं तो कोई अनिर्वचनीय। किन्हींके मतमें वे शब्दस्वरूप हैं तो किन्हींके मतमें शब्दातीत; कोई उन्हें चिन्तनका विषय मानते हैं तो कोई अचिन्त्य समझते हैं। दूसरे लोगोंका कहना है कि वे ज्ञानस्वरूप हैं, कोई उन्हें विज्ञानकी संज्ञा देते हैं। किन्हींके मतमें वे ज्ञेय हैं और किन्हींके मतमें अज्ञेय। कोई उन्हें पर बताता है तो कोई अपर। इस तरह उनके विषयमें नाना प्रकारकी कल्पनाएँ होती हैं। इन नाना प्रतीतियोंके कारण
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मुनिजन उन परमेश्वरके यथार्थ स्वरूपका निश्चय नहीं कर पाते। जो सर्वभावसे उन परमेश्वरकी शरणमें आ गये हैं, वे ही उन परम कारण शिवको बिना यत्नके ही जान पाते हैं। जबतक पशु (जीव), जिनका दूसरा कोई ईश्वर नहीं है उन सर्वेश्वर, सर्वज्ञ, पुराणपुरुष तथा तीनों लोकोंके शासक शिवको नहीं देखता, तबतक वह पाशोंसे बद्ध हो इस दुःखमय संसार-चक्रमें गाड़ीके पहियेकी नेमिके समान घूमता रहता है। जब यह द्रष्टा जीवात्मा सबके शासक, ब्रह्माके भी आदिकारण, सम्पूर्ण जगत्के रचयिता, सुवर्णोपम, दिव्य प्रकाशस्वरूप परम पुरुषका साक्षात्कार कर लेता है, तब पुण्य और पाप दोनोंको भलीभाँति हटाकर निर्मल हुआ वह ज्ञानी महात्मा सर्वोत्तम समताको प्राप्त कर लेता है।
(अध्याय ५)
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शिवके शुद्ध, बुद्ध, मुक्त, सर्वमय, सर्वव्यापक एवं सर्वातीत स्वरूपका तथा उनकी प्रणवरूपताका प्रतिपादन
उपमन्यु कहते हैं—यदुनन्दन! शिवको न तो आणव मलका ही बन्धन प्राप्त है, न कर्मका और न मायाका ही। प्राकृत, बौद्ध, अहंकार, मन, चित्त, इन्द्रिय, तन्मात्रा और पंचभूतसम्बन्धी भी कोई बन्धन उन्हें नहीं छू सका है। अमिततेजस्वी शम्भुको न काल, न कला, न विद्या, न नियति, न राग और न द्वेषरूप ही बन्धन प्राप्त है। उनमें न तो कर्म हैं, न उन कर्मोंका परिपाक है, न उनके फलस्वरूप सुख और दुःख हैं, न उनका वासनाओंसे सम्बन्ध है, न कर्मोंके संस्कारोंसे। भूत, भविष्य और वर्तमान भोगों तथा उनके संस्कारोंसे भी उनका सम्पर्क नहीं है। न उनका कोई कारण है, न कर्ता। न आदि है, न अन्त और न मध्य है; न कर्म और करण है; न अकर्तव्य है और न कर्तव्य ही है। उनका न कोई बन्धु है और न अबन्धु; न नियन्ता है, न प्रेरक; न पति है, न गुरु है और न त्राता ही है। उनसे अधिककी चर्चा कौन करे, उनके समान भी कोई नहीं है। उनका न जन्म होता है न मरण। उनके लिये कोई वस्तु न तो वांछित है और न अवांछित ही। उनके लिये न विधि है न निषेध। न बन्धन है न मुक्ति। जो-जो अकल्याणकारी दोष हैं वे उनमें कभी नहीं रहते। परंतु सम्पूर्ण कल्याणकारी गुण उनमें सदा ही रहते हैं; क्योंकि शिव साक्षात् परमात्मा हैं। वे शिव अपनी शक्तियोंद्वारा इस सम्पूर्ण जगत्में व्याप्त होकर अपने स्वभावसे च्युत न होते हुए सदा ही स्थित रहते हैं; इसलिये उन्हें स्थाणु कहते हैं। यह सम्पूर्ण चराचर जगत् शिवसे अधिष्ठित है; अतः भगवान् शिव सर्वरूप माने गये हैं। जो ऐसा जानता है, वह कभी मोहमें नहीं पड़ता।
रुद्र सर्वरूप हैं। उन्हें नमस्कार है। वे सत्स्वरूप, परम महान् पुरुष, हिरण्यबाहु भगवान्, हिरण्यपति, ईश्वर, अम्बिकापति, ईशान, पिनाकपाणि तथा वृषभवाहन हैं। एकमात्र रुद्र ही परब्रह्म परमात्मा हैं। वे ही कृष्ण-पिंगलवर्णवाले पुरुष हैं। वे हृदयके भीतर कमलके मध्यभागमें केशके अग्रभागकी भाँति सूक्ष्मरूपसे चिन्तन करने-
७३२ * संक्षिप्त शिवपुराण *
योग्य हैं। उनके केश सुनहरे रंगके हैं। नेत्र कमलके समान सुन्दर हैं। अंगकान्ति अरुण और ताम्रवर्णकी है। वे सुवर्णमय नीलकण्ठ देव सदा विचरते रहते हैं। उन्हें सौम्य, घोर, मिश्र, अक्षर, अमृत और अव्यय कहा गया है। वे पुरुषविशेष परमेश्वर भगवान् शिव कालके भी काल हैं। चेतन और अचेतनसे परे हैं। इस प्रपंचसे भी परात्पर हैं। शिवमें ऐसे ज्ञान और ऐश्वर्य देखे गये हैं, जिनसे बढ़कर ज्ञान और ऐश्वर्य अन्यत्र नहीं हैं। मनीषी पुरुषोंने भगवान् शिवको लोकमें सबसे अधिक ऐश्वर्यशाली पदपर प्रतिष्ठित बताया है। प्रत्येक कल्पमें उत्पन्न होकर एक सीमित कालतक रहनेवाले ब्रह्माओंको आदिकालमें विस्तारपूर्वक शास्त्रका उपदेश देनेवाले भगवान् शिव ही हैं। एक सीमित कालतक रहनेवाले गुरुओंके भी वे गुरु हैं। वे सर्वेश्वर सदा सभीके गुरु हैं। कालकी सीमा उन्हें छू नहीं सकती। उनकी शुद्ध स्वाभाविक शक्ति सबसे बढ़कर है। उन्हें अनुपम ज्ञान और नित्य अक्षय शरीर प्राप्त है। उनके ऐश्वर्यकी कहीं तुलना नहीं है। उनका सुख अक्षय और बल अनन्त है। उनमें असीम तेज, प्रभाव, पराक्रम, क्षमा और करुणा भरी है। वे नित्य परिपूर्ण हैं। उन्हें सृष्टि आदिसे अपने लिये कोई प्रयोजन नहीं है। दूसरोंपर परम अनुग्रह ही उनके समस्त कर्मोंका फल है। प्रणव उन परमात्मा शिवका वाचक है। शिव, रुद्र आदि नामोंमें प्रणव ही सबसे उत्कृष्ट माना गया है। प्रणववाच्य शम्भुके चिन्तन और जपसे जो सिद्धि प्राप्त होती है, वही परा सिद्धि है, इसमें संशय नहीं है।
इसीलिये शास्त्रोंके पारंगत मनस्वी विद्वान् वाच्य और वाचककी एकता स्वीकार करते हुए महादेवजीको प्रणवरूप कहते हैं। माण्डूक्य-उपनिषद्में प्रणवकी चार मात्राएँ बतायी गयी हैं—अकार, उकार, मकार और नाद। अकारको ऋग्वेद कहते हैं। उकार यजुर्वेदरूप कहा गया है। मकार सामवेद है और नाद अथर्ववेदकी श्रुति है। अकार महाबीज है, वह रजोगुण तथा सृष्टिकर्ता ब्रह्मा है। उकार प्रकृतिरूपा योनि है, वह सत्त्वगुण तथा पालनकर्ता श्रीहरि है। मकार जीवात्मा एवं बीज है, वह तमोगुण तथा संहारकर्ता रुद्र है। नाद परम पुरुष परमेश्वर है, वह निर्गुण एवं निष्क्रिय शिव है। इस प्रकार प्रणव अपनी तीन मात्राओंके द्वारा ही तीन रूपोंमें इस जगत्का प्रतिपादन करके अपनी अर्द्धमात्रा (नाद)-के द्वारा शिवस्वरूपका बोध कराता है। जिनसे श्रेष्ठ दूसरा कुछ भी नहीं है, जिनसे बढ़कर कोई न तो अधिक सूक्ष्म है और न महान् ही है तथा जो अकेले ही वृक्षकी भाँति निश्चलभावसे प्रकाशमय आकाशमें स्थित हैं, उन परम पुरुष परमेश्वर शिवसे यह सम्पूर्ण जगत् परिपूर्ण है।*
(अध्याय ६)
\* यस्मात्परं नापरमस्ति किंचिद् यस्मानाणीयो न ज्यायोऽस्ति कश्चित्॥
वृक्ष इव स्तब्धो दिवि तिष्ठत्येकस्तेनेदं पूर्णं पुरुषेण सर्वम्॥
(शि० पु० वा० सं० उ० ख० ६।३१, यह मन्त्र अक्षरशः (३।९) श्वेताश्वतरोपनिषद्में है।)
- वायवीयसंहिता * ७३३
परमेश्वरकी शक्तिका ऋषियोंद्वारा साक्षात्कार, शिवके प्रसादसे प्राणियोंकी मुक्ति, शिवकी सेवा-भक्ति तथा पाँच प्रकारके शिवधर्मका वर्णन
उपमन्यु कहते हैं—परमेश्वर शिवकी स्वाभाविक शक्ति विद्या है, जो सबसे विलक्षण है। वह एक होकर भी अनेक रूपसे भासित होती है। जैसे सूर्यकी प्रभा एक होकर भी अनेक रूपमें प्रकाशित होती है। उस विद्याशक्तिसे इच्छा, ज्ञान, क्रिया और माया आदि अनेक शक्तियाँ उत्पन्न हुई हैं, ठीक उसी तरह जैसे अग्निसे बहुत-सी चिनगारियाँ प्रकट होती हैं। उसीसे सदाशिव और ईश्वर आदि तथा विद्या और विद्येश्वर आदि पुरुष भी प्रकट हुए हैं। परात्पर प्रकृति भी उसीसे उत्पन्न हुई है। महत्तत्त्वसे लेकर विशेषपर्यन्त सारे विकार तथा अज (ब्रह्मा) आदि मूर्तियाँ भी उसीसे प्रकट हुई हैं। इनके सिवा जो अन्य वस्तुएँ हैं, वे सब भी उसी शक्तिके कार्य हैं, इसमें संशय नहीं है। वह शक्ति सर्वव्यापिनी, सूक्ष्मा तथा ज्ञानानन्दरूपिणी है। उसीसे शीतांशुभूषण भगवान् शिव शक्तिमान् कहलाते हैं। शक्तिमान्—शिव वेद्य हैं और शक्तिरूपिणी—शिवा विद्या हैं। वे शक्तिरूपा शिवा ही प्रज्ञा, श्रुति, स्मृति, धृति, स्थिति, निष्ठा, ज्ञानशक्ति, इच्छाशक्ति, कर्मशक्ति, आज्ञाशक्ति, परब्रह्म, परा और अपरा नामकी दो विद्याएँ, शुद्ध विद्या और शुद्ध कला हैं; क्योंकि सब कुछ शक्तिका ही कार्य है। माया, प्रकृति, जीव, विकार, विकृति, असत् और सत् आदि जो कुछ भी उपलब्ध होता है, वह सब उस शक्तिसे ही व्याप्त है।
वे शक्तिरूपिणी शिवादेवी मायाद्वारा समस्त चराचर ब्रह्माण्डको अनायास ही मोहमें डाल देती और लीलापूर्वक उसे मोहके बन्धनसे मुक्त भी कर देती हैं। इस शक्तिके सत्ताईस प्रकार हैं, सत्ताईस प्रकारवाली इस शक्तिके साथ सर्वेश्वर शिव सम्पूर्ण विश्वको व्याप्त करके स्थित हैं। इन्हींके चरणोंमें मुक्ति विराजती है। पूर्वकालकी बात है, संसारबन्धनसे छूटनेकी इच्छावाले कुछ ब्रह्मवादी मुनियोंके मनमें यह संशय हुआ। वे परस्पर मिलकर यथार्थरूपसे विचार करने लगे—इस जगत्का कारण क्या है? हम किससे उत्पन्न हुए हैं और किससे जीवन धारण करते हैं? हमारी प्रतिष्ठा कहाँ है? हमारा अधिष्ठाता कौन है? हम किसके सहयोगसे सदा सुखमें और दुःखमें रहते हैं? किसने इस विश्वकी अलंघनीय व्यवस्था की है? यदि कहें काल, स्वभाव, नियति (निश्चित फल देनेवाला कर्म) और यदृच्छा (आकस्मिक घटना) इसमें कारण हों तो यह कथन युक्तिसंगत नहीं जान पड़ता। पाँचों महाभूत तथा जीवात्मा भी कारण नहीं हैं। इन सबका संयोग तथा अन्य कोई भी कारण नहीं है; क्योंकि ये काल आदि अचेतन हैं। जीवात्माके चेतन होनेपर भी वह सुख-दुःखसे अभिभूत तथा असमर्थ होनेसे इस जगत्का कारण नहीं हो सकता। अतः कौन कारण है, इसका विचार करना चाहिये। इस प्रकार आपसमें विचार करनेपर जब वे युक्तियोंद्वारा किसी निर्णयतक न पहुँच
७३४ * संक्षिप्त शिवपुराण *
सके, तब उन्होंने ध्यानयोगमें स्थित होकर परमेश्वरकी स्वरूपभूता अचिन्त्य शक्तिका साक्षात्कार किया, जो अपने ही गुणोंसे—सत्त्व, रज और तमसे ढकी है तथा उन तीनों गुणोंसे परे है। परमेश्वरकी वह साक्षात् शक्ति समस्त पाशोंका विच्छेद करनेवाली है। उसके द्वारा बन्धन काट दिये जानेपर जीव अपनी दिव्य दृष्टिसे उन सर्वकारण-कारण शक्तिमान् महादेवजीका दर्शन करने लगते हैं, जो कालसे लेकर जीवात्मातक पूर्वोक्त समस्त कारणोंपर तथा सम्पूर्ण विश्वपर अपनी इस शक्तिके द्वारा ही शासन करते हैं। वे परमात्मा अप्रमेय हैं। तदनन्तर परमेश्वरके प्रसादयोग, परम-योग तथा सुदृढ़ भक्तियोगके द्वारा उन मुनियोंने दिव्य गति प्राप्त कर ली।
श्रीकृष्ण! जो अपने हृदयमें शक्ति-सहित भगवान् शिवका दर्शन करते हैं, उन्हींको सनातन शान्ति प्राप्त होती है, दूसरोंको नहीं, यह श्रुतिका कथन है। शक्तिमान्का शक्तिसे कभी वियोग नहीं होता। अतः शक्ति और शक्तिमान् दोनोंके तादात्म्यसे परमानन्दकी प्राप्ति होती है। मुक्तिकी प्राप्तिमें निश्चय ही ज्ञान और कर्मका कोई क्रम विवक्षित नहीं है, जब शिव और शक्तिकी कृपा हो जाती है, तब वह मुक्ति हाथमें आ जाती है। देवता, दानव, पशु, पक्षी तथा कीड़े-मकोड़े भी उनकी कृपासे मुक्त हो जाते हैं। गर्भका बच्चा, जन्मता हुआ बालक, शिशु, तरुण, वृद्ध, मुमूर्षु, स्वर्गवासी, नारकी, पतित, धर्मात्मा, पण्डित अथवा मूर्ख साम्बशिवकी कृपा होनेपर तत्काल मुक्त हो जाते हैं, इसमें संशय नहीं है। परमेश्वर अपनी स्वाभाविक करुणासे अयोग्य भक्तोंके भी विविध मलोंको दूर करके उनपर कृपा करते हैं, इसमें सन्देह नहीं है। भगवान्की कृपासे ही भक्ति होती है और भक्तिसे ही उनकी कृपा होती है। अवस्थाभेदका विचार करके विद्वान् पुरुष इस विषयमें मोहित नहीं होता है। कृपाप्रसादपूर्वक जो यह भक्ति होती है, वह भोग और मोक्ष दोनोंकी प्राप्ति करानेवाली है। उसे मनुष्य एक जन्ममें नहीं प्राप्त कर सकता। अनेक जन्मोंतक श्रौत-स्मार्त कर्मोंका अनुष्ठान करके सिद्ध हुए विरक्त एवं ज्ञानसम्पन्न पुरुषोंपर महेश्वर प्रसन्न होते और कृपा करते हैं। देवेश्वर शिवके प्रसन्न होनेपर उस पशु (जीव)-में बुद्धिपूर्वक थोड़ी-सी भक्तिका उदय होता है। तब वह यह अनुभव करने लगता है कि भगवान् शिव मेरे स्वामी हैं। फिर तपस्यापूर्वक वह नाना प्रकारके शैवधर्मोंके पालनमें संलग्न होता है। उन धर्मोंके पालनमें बारंबार लगे रहनेसे उसके हृदयमें पराभक्तिका प्रादुर्भाव होता है। उस पराभक्तिसे परमेश्वरका परम प्रसाद उपलब्ध होता है। प्रसादसे सम्पूर्ण पापोंसे छुटकारा मिलता है और छुटकारा मिल जानेपर परमानन्दकी प्राप्ति होती है, जिस मनुष्यका भगवान् शिवमें थोड़ा-सा भी भक्तिभाव है, वह तीन जन्मोंके बाद अवश्य मुक्त हो जाता है। उसे इस संसारमें योनियन्त्रकी पीड़ा नहीं सहनी पड़ती। सांगा (अंगसहित) और अनंगा (अंगरहित) जो सेवा है, उसीको भक्ति कहते हैं। उसके फिर तीन भेद होते हैं—मानसिक, वाचिक और शारीरिक। शिवके रूप आदिका जो चिन्तन है, उसे मानसिक सेवा कहते हैं। जप आदि वाचिक सेवा है और पूजन आदि कर्म
- वायवीयसंहिता * ७३५
शारीरिक सेवा है। इन त्रिविध साधनोंसे सम्पन्न होनेवाली जो यह सेवा है, इसे 'शिवधर्म' भी कहते हैं। परमात्मा शिवने पाँच प्रकारका शिव-धर्म बताया है—तप, कर्म, जप, ध्यान और ज्ञान। लिंगपूजन आदिको 'कर्म' कहते हैं। चान्द्रायण आदि व्रतका नाम 'तप' है। वाचिक, उपांशु और मानस—तीन प्रकारका जो शिव-मन्त्रका अभ्यास (आवृत्ति) है, उसीको 'जप' कहते हैं। शिवका चिन्तन ही 'ध्यान' कहलाता है तथा शिवसम्बन्धी आगमोंमें जिस ज्ञानका वर्णन है, उसीको यहाँ 'ज्ञान' शब्दसे कहा गया है। श्रीकण्ठ शिवने शिवाके प्रति जिस ज्ञानका उपदेश किया है, वही शिवागम है। शिवके आश्रित जो भक्तजन हैं, उनपर कृपा करके कल्याणके एकमात्र साधक इस ज्ञानका उपदेश किया गया है। अतः कल्याणकामी बुद्धिमान् पुरुषको चाहिये कि वह परम कारण शिवमें भक्तिको बढ़ाये तथा विषयासक्तिका त्याग करे। (अध्याय ७)
शिव-ज्ञान, शिवकी उपासनासे देवताओंको उनका दर्शन, सूर्यदेवमें शिवकी पूजा करके अर्घ्यदानकी विधि तथा व्यासावतारोंका वर्णन
श्रीकृष्ण बोले—भगवन्! अब मैं उस शिव-ज्ञानको सुनना चाहता हूँ, जो वेदोंका सारतत्त्व है तथा जिसे भगवान् शिवने अपने शरणागत भक्तोंकी मुक्तिके लिये कहा है। प्रभु शिवकी पूजा कैसे की जाती है? पूजा आदिमें किसका अधिकार है तथा ज्ञानयोग आदि कैसे सिद्ध होते हैं? उत्तम व्रतका पालन करनेवाले मुनीश्वर! ये सब बातें विस्तारपूर्वक बताइये।
उपमन्युने कहा—भगवान् शिवने जिस वेदोक्त ज्ञानको संक्षिप्त करके कहा है, वही शैव-ज्ञान है। वह निन्दा-स्तुति आदिसे रहित तथा श्रवणमात्रसे ही अपने प्रति विश्वास उत्पन्न करनेवाला है। यह दिव्य ज्ञान गुरुकी कृपासे प्राप्त होता है और अनायास ही मोक्ष देनेवाला है। मैं उसे संक्षेपमें ही बताऊँगा; क्योंकि उसका विस्तारपूर्वक वर्णन कोई कर ही नहीं सकता है। पूर्वकालमें महेश्वर शिव सृष्टिकी इच्छा करके सत्कार्य-कारणोंसे नियुक्त हो स्वयं ही अव्यक्तसे व्यक्तरूपमें प्रकट हुए। उस समय ज्ञानस्वरूप भगवान् विश्वनाथने देवताओंमें सबसे प्रथम देवता वेदपति ब्रह्माजीको उत्पन्न किया। ब्रह्माने उत्पन्न होकर अपने पिता महादेवको देखा तथा ब्रह्माजीके जनक महादेवजीने भी उत्पन्न हुए ब्रह्माकी ओर स्नेहपूर्ण दृष्टिसे देखा और उन्हें सृष्टि रचनेकी आज्ञा दी। रुद्रदेवकी कृपादृष्टिसे देखे जानेपर सृष्टिके सामर्थ्यसे युक्त हो उन ब्रह्मदेवने समस्त संसारकी रचना की और पृथक्-पृथक् वर्णों तथा आश्रमोंकी व्यवस्था की। उन्होंने यज्ञके लिये सोमकी सृष्टि की। सोमसे द्युलोकका प्रादुर्भाव हुआ। फिर पृथ्वी, अग्नि, सूर्य, यज्ञमय विष्णु और शचीपति इन्द्र प्रकट हुए। वे सब तथा अन्य देवता रुद्राध्याय पढ़कर रुद्रदेवकी स्तुति करने लगे। तब भगवान् महेश्वर अपनी लीला प्रकट करनेके लिये उन सबका ज्ञान हरकर प्रसन्नमुखसे उन देवताओंके आगे खड़े हो गये।
तब देवताओंने मोहित होकर उनसे
७३६ * संक्षिप्त शिवपुराण *
पूछा—'आप कौन हैं?' भगवान् रुद्र बोले—'श्रेष्ठ देवताओ! सबसे पहले मैं ही था। इस समय भी सर्वत्र मैं ही हूँ और भविष्यमें भी मैं ही रहूँगा। मेरे सिवा दूसरा कोई नहीं है। मैं भी अपने तेजसे सम्पूर्ण जगत्को तृप्त करता हूँ। मुझसे अधिक और मेरे समान कोई नहीं है। जो मुझे जानता है, वह मुक्त हो जाता है।'* ऐसा कहकर भगवान् रुद्र वहीं अन्तर्धान हो गये। जब देवताओंने उन महेश्वरको नहीं देखा, तब वे सामवेदके मन्त्रोंद्वारा उनकी स्तुति करने लगे। अथर्वशीर्षमें वर्णित पाशुपत-व्रतको ग्रहण करके उन अमरगणोंने अपने सम्पूर्ण अंगोंमें भस्म लगा लिया। यह देख उनपर कृपा करनेके लिये पशुपति महादेव अपने गणों और उमाके साथ उनके निकट आये। प्राणायामके द्वारा श्वासको जीतकर निद्रा-रहित एवं निष्पाप हुए योगीजन अपने हृदयमें जिनका दर्शन करते हैं, उन्हीं महादेवको उन देवेश्वरोंने वहाँ देखा। जिन्हें ईश्वरकी इच्छाका अनुसरण करनेवाली पराशक्ति कहते हैं, उन वामलोचना भवानीको भी उन्होंने वामदेव महेश्वरके वामभागमें विराजमान देखा। जो संसारको त्यागकर शिवके परमपदको प्राप्त हो चुके हैं तथा जो नित्य सिद्ध हैं, उन गणेश्वरोंका भी देवताओंने दर्शन किया। तत्पश्चात् देवता महेश्वरसम्बन्धी वैदिक और पौराणिक दिव्य स्तोत्रोंद्वारा देवीसहित महेश्वरकी स्तुति करने लगे। तब वृषभध्वज महादेवजी भी उन देवताओंकी ओर कृपापूर्वक देखकर अत्यन्त प्रसन्न हो स्वभावतः मधुर वाणीमें बोले—'मैं तुमलोगोंपर बहुत संतुष्ट हूँ।' उन प्रार्थनीय एवं पूज्यतम भगवान् वृषभध्वजको अत्यन्त प्रसन्नचित्त जान देवताओंने प्रणाम करके आदरपूर्वक उनसे पूछा।
देवता बोले—भगवन्! इस भूतलपर किस मार्गसे आपकी पूजा होनी चाहिये और उस पूजामें किसका अधिकार है? यह ठीक-ठीक बतानेकी कृपा करें।
तब देवेश्वर शिवने देवीकी ओर मुसकराते हुए देखा और अपने परम घोर सूर्यमय स्वरूपको दिखाया। उनका वह स्वरूप सम्पूर्ण ऐश्वर्य-गुणोंसे सम्पन्न, सर्वतेजोमय, सर्वोत्कृष्ट तथा शक्तियों, मूर्तियों, अंगों, ग्रहों और देवताओंसे घिरा हुआ था। उसके आठ भुजाएँ और चार मुख थे। उसका आधा भाग नारीके रूपमें था। उस अद्भुत आकृतिवाले आश्चर्यजनक स्वरूपको देखते ही सब देवता यह जान गये कि सूर्यदेव, पार्वतीदेवी, चन्द्रमा, आकाश, वायु, तेज, जल, पृथ्वी तथा शेष पदार्थ भी शिवके ही स्वरूप हैं। सम्पूर्ण चराचर जगत् शिवमय ही है। परस्पर ऐसा कहकर उन्होंने भगवान् सूर्यको अर्घ्य दिया और नमस्कार किया। अर्घ्य देते समय वे इस प्रकार बोले—'जिनका वर्ण सिन्दूरके समान है
* सोऽब्रवीद् भगवान् रुद्रो ह्यहमेकः पुरातनः। आसं प्रथममेवाहं वर्तामि च सुरोत्तमाः॥
भविष्यामि च मत्तोऽन्यो व्यतिरिक्तो न कश्चन।
अहमेव जगत्सर्वं तर्पयामि स्वतेजसा। मत्तोऽधिकः समो नास्ति मां यो वेद स मुच्यते॥
(शि० पु० वा० सं० उ० ख० ८। १५–१७)
* वायवीयसंहिता *
७३७
और मण्डल सुन्दर है, जो सुवर्णके समान कान्तिमान् आभूषणोंसे विभूषित हैं, जिनके नेत्र कमलके समान हैं, जिनके हाथमें भी कमल हैं, जो ब्रह्मा, इन्द्र और नारायणके भी कारण हैं, उन भगवान्को नमस्कार है।$^{१}$' यों कह उत्तम रत्नोंसे पूर्ण सुवर्ण, कुंकुम, कुश और पुष्पसे युक्त जल सोनेके पात्रमें लेकर उन देवेश्वरको अर्घ्य दे और कहे—‘भगवन्! आप प्रसन्न हों। आप सबके आदिकारण हैं। आप ही रुद्र, विष्णु, ब्रह्मा और सूर्यरूप हैं। गणोंसहित आप शान्त शिवको नमस्कार है।’$^{२}$
जो एकाग्रचित्त हो सूर्यमण्डलमें शिवका पूजन करके प्रातःकाल, मध्याह्नकाल और सायंकालमें उनके लिये उत्तम अर्घ्य देता है, प्रणाम करता है और इन श्रवणसुखद श्लोकोंको पढ़ता है, उसके लिये कुछ भी दुर्लभ नहीं है। यदि वह भक्त है तो अवश्य ही मुक्त हो जाता है। इसलिये प्रतिदिन शिवरूपी सूर्यका पूजन करना चाहिये। धर्म, अर्थ, काम और मोक्षके लिये मन, वाणी तथा क्रियाद्वारा उनकी आराधना करनी चाहिये।
तत्पश्चात् मण्डलमें विराजमान महेश्वर देवताओंकी ओर देखकर और उन्हें सम्पूर्ण शास्त्रोंमें श्रेष्ठ शिवशास्त्र देकर वहीं अन्तर्धान हो गये। उस शास्त्रमें शिवपूजाका अधिकार ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्योंको दिया गया है। यह जानकर देवेश्वर शिवको प्रणाम करके देवता जैसे आये थे, वैसे चले गये। तदनन्तर दीर्घकालके पश्चात् जब वह शास्त्र लुप्त हो गया, तब भगवान् शंकरके अंकमें बैठी हुई महेश्वरी शिवाने पतिदेवसे उसके विषयमें पूछा। तब देवीसे प्रेरित हो चन्द्रभूषण महादेवने वेदोंका सार निकालकर सम्पूर्ण आगमोंमें श्रेष्ठ शास्त्रका उपदेश किया, फिर उन परमेश्वरकी आज्ञासे मैंने, गुरुदेव अगस्त्यने और महर्षि दधीचिने भी लोकमें उस शास्त्रका प्रचार किया। शूलपाणि महादेव स्वयं भी युग-युगमें भूतलपर अवतार ले अपने आश्रित जनोंकी मुक्तिके लिये ज्ञानका प्रसार करते हैं। ऋभु, सत्य, भार्गव, अंगिरा, सविता, मृत्यु, इन्द्र, मुनिवर वसिष्ठ, सारस्वत, त्रिधामा, मुनिश्रेष्ठ त्रिवृत्, शततेजा, साक्षात् धर्म-स्वरूप नारायण, स्वरक्ष, बुद्धिमान् आरुणि, कृतंजय, भरद्वाज, श्रेष्ठ विद्वान् गौतम, वाचःश्रवा मुनि, पवित्र सूक्ष्मायणि, तृणविन्दु मुनि, कृष्ण, शक्ति, शाक्तेय (पाराशर), उत्तर, जातूकर्ण्य और साक्षात् नारायण-स्वरूप कृष्णद्वैपायन मुनि—ये सब व्यासावतार हैं। अब क्रमशः कल्प-योगेश्वरोंका वर्णन सुनो। लिंगपुराणमें द्वापरके अन्तमें होनेवाले उत्तम व्रतधारी व्यासावतार तथा योगाचार्यावतारोंका वर्णन है। भगवान् शिवके शिष्योंमें भी जो प्रसिद्ध
१-सिन्दूरवर्णाय सुमण्डलाय सुवर्णवर्णाभरणाय तुभ्यम्। पद्माभनेत्राय सपङ्कजाय ब्रह्मेन्द्रनारायणकारणाय॥
(शि० पु० वा० सं० उ० ख० ८।३२)
२-प्रदत्तमादाय सहेमपात्रं प्रशस्तमर्घ्यं भगवन् प्रसीद।...................................................॥
नमः शिवाय शान्ताय सगणायादिहेतवे। रुद्राय विष्णवे तुभ्यं ब्रह्मणे सूर्यमूर्तये॥
(शि० पु० वा० सं० उ० ख० ८।३३-३४)
७३८ * संक्षिप्त शिवपुराण *
हैं, उनका वर्णन है। उन अवतारोंमें भगवान्के मुख्यरूपसे चार महातेजस्वी शिष्य होते हैं। फिर उनके सैकड़ों, हजारों शिष्य-प्रशिष्य हो जाते हैं। लोकमें उनके उपदेशके अनुसार भगवान् शिवकी आज्ञा पालन करने आदिके द्वारा भक्तिसे अत्यन्त भावित हो भाग्यवान् पुरुष मुक्त हो जाते हैं।
(अध्याय ८)
शिवके अवतार, योगाचार्यों तथा उनके शिष्योंकी नामावली
श्रीकृष्ण बोले—भगवन्! समस्त युगावर्तोमें योगाचार्यके व्याजसे भगवान् शंकरके जो अवतार होते हैं और उन अवतारोंके जो शिष्य होते हैं, उन सबका वर्णन कीजिये।
उपमन्युने कहा—श्वेत, सुतार, मदन, सुहोत्र, कंकलौगाक्षि, महामायावी जैगीषव्य, दधिवाह, ऋषभ मुनि, उग्र, अत्रि, सुपालक, गौतम, वेदशिरा मुनि, गोकर्ण, गुहावासी, शिखण्डी, जटामाली, अट्टहास, दारुक, लांगुली, महाकाल, शूली, दण्डी, मुण्डीश, सहिष्णु, सोमशर्मा और नकुलीश्वर—ये वाराह कल्पके इस सातवें मन्वन्तरमें युगक्रमसे अट्ठाईस योगाचार्य प्रकट हुए हैं। इनमेंसे प्रत्येकके शान्तचित्तवाले चार-चार शिष्य हुए हैं, जो श्वेतसे लेकर रुष्यपर्यन्त बताये गये हैं। मैं उनका क्रमशः वर्णन करता हूँ, सुनो। श्वेत, श्वेतशिख, श्वेताश्व, श्वेतलोहित, दुन्दुभि, शतरूप, ऋचीक, केतुमान, विकोश, विकेश, विपाश, पाशनाशन, सुमुख, दुर्मुख, दुर्गम, दुरतिक्रम, सनत्कुमार, सनक, सनन्दन, सनातन, सुधामा, विरजा, शंख, अण्डज, सारस्वत, मेघ, मेघवाह, सुवाहक, कपिल, आसुरि, पंचशिख, वाष्कल, पराशर, गर्ग, भार्गव, अंगिरा, बलबन्धु, निरामित्र, केतुशृंग, तपोधन, लम्बोदर, लम्ब, लम्बात्मा, लम्बकेशक, सर्वज्ञ, समबुद्धि, साध्य, सिद्धि, सुधामा, कश्यप, वसिष्ठ, विरजा, अत्रि, उग्र, गुरुश्रेष्ठ, श्रवण, श्रविष्ठक, कुणि, कुणबाहु, कुशरीर, कुनेत्रक, काश्यप, उशना, च्यवन, बृहस्पति, उतथ्य, वामदेव, महाकाल, महानिल, वाचःश्रवा, सुवीर, श्यावक, यतीश्वर, हिरण्यनाभ, कौशल्य, लोकाक्षि, कुथुमि, सुमन्तु, जैमिनी, कुबन्ध, कुशकन्धर, प्लक्ष, दार्भायणि, केतुमान, गौतम, भल्लवी, मधुपिंग, श्वेतकेतु, उशिज, बृहदश्व, देवल, कवि, शालिहोत्र, सुवेष, युवनाश्व, शरद्वसु, छगल, कुम्भकर्ण, कुम्भ, प्रबाहुक, उलूक, विद्युत्, शम्बूक, आश्वलायन, अक्षपाद, कणाद, उलूक, वत्स, कुशिक, गर्ग, मित्रक और रुष्य—ये योगाचार्यरूपी महेश्वरके शिष्य हैं। इनकी संख्या एक सौ बारह है। ये सब-के-सब सिद्ध पाशुपत हैं। इनका शरीर भस्मसे विभूषित रहता है। ये सम्पूर्ण शास्त्रोंके तत्त्वज्ञ, वेद और वेदांगोंके पारंगत विद्वान्, शिवाश्रममें अनुरक्त, शिवज्ञानपरायण, सब प्रकारकी आसक्तियोंसे मुक्त, एकमात्र भगवान् शिवमें ही मनको लगाये रखनेवाले, सम्पूर्ण द्वन्द्वोंको सहनेवाले, धीर, सर्वभूतहितकारी, सरल, कोमल, स्वस्थ, क्रोधशून्य और जितेन्द्रिय होते हैं, रुद्राक्षकी
789 संक्षिप्त शिवपुराण—24 B
* वायवीयसंहिता *
७३९
माला ही इनका आभूषण है। उनके मस्तक त्रिपुण्ड्रसे अंकित होते हैं। उनमेंसे कोई तो शिखाके रूपमें ही जटा धारण करते हैं। किन्हींके सारे केश ही जटारूप होते हैं। कोई-कोई ऐसे हैं, जो जटा नहीं रखते हैं और कितने ही सदा माथा मुड़ाये रहते हैं। वे प्रायः फल-मूलका आहार करते हैं। प्राणायाम-साधनमें तत्पर होते हैं। 'मैं शिवका हूँ' इस अभिमानसे युक्त होते हैं। सदा शिवके ही चिन्तनमें लगे रहते हैं। उन्होंने संसाररूपी विषवृक्षके अंकुरको मथ डाला है। वे सदा परमधाममें जानेके लिये ही कटिबद्ध होते हैं। जो योगाचार्योंसहित इन शिष्योंको जान-मानकर सदा शिवकी आराधना करता है, वह शिवका सायुज्य प्राप्त कर लेता है, इसमें कोई अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये।
(अध्याय ९)
भगवान् शिवके प्रति श्रद्धा-भक्तिकी आवश्यकताका प्रतिपादन, शिवधर्मके चार पादोंका वर्णन एवं ज्ञानयोगके साधनों तथा शिवधर्मके अधिकारियोंका निरूपण, शिवपूजनके अनेक प्रकार एवं अनन्यचित्तसे भजनकी महिमा
तदनन्तर श्रीकृष्णके प्रश्न करनेपर उपमन्यु मन्दराचलपर घटित हुए शिव-पार्वती-संवादको प्रस्तुत करते हुए बोले— श्रीकृष्ण ! एक समय देवी पार्वतीने भगवान् शिवसे पूछा—'महादेव! जो आत्मतत्त्व आदिके साधनमें नहीं लगे हैं तथा जिनका अन्तःकरण पवित्र एवं वशीभूत नहीं है, ऐसे मन्दमति, मर्त्यलोकवासी जीवात्माओंके वशमें आप किस उपायसे हो सकते हैं?'
महादेवजी बोले—देवि! यदि साधकके मनमें श्रद्धा-भक्ति न हो तो पूजनकर्म, तपस्या, जप, आसन आदि, ज्ञान तथा अन्य साधनसे भी मैं उसके वशीभूत नहीं होता हूँ। यदि मनुष्योंकी मुझमें श्रद्धा हो तो जिस किसी भी हेतुसे मैं उसके वशमें हो जाता हूँ। फिर तो वह मेरा दर्शन, स्पर्श, पूजन एवं मेरे साथ सम्भाषण भी कर सकता है। अतः जो मुझे वशमें करना चाहे, उसे पहले मेरे प्रति श्रद्धा करनी चाहिये। श्रद्धा ही स्वधर्मका हेतु है और वही इस लोकमें वर्णाश्रमी पुरुषोंकी रक्षा करनेवाली है। जो मानव अपने वर्णाश्रम-धर्मके पालनमें लगा रहता है, उसीकी मुझमें श्रद्धा होती है, दूसरेकी नहीं। वर्णाश्रमी पुरुषोंके सम्पूर्ण धर्म वेदोंसे सिद्ध हैं। पूर्वकालमें ब्रह्माजीने मेरी ही आज्ञा लेकर उनका वर्णन किया था। ब्रह्माजीका बताया हुआ वह धर्म अधिक धनके द्वारा साध्य है तथा अनेक प्रकारके क्रियाकलापसे युक्त होता है। उससे मिलनेवाला अधिकांश फल अक्षय नहीं है तथा उस धनके अनुष्ठानमें अनेक प्रकारके क्लेश और आयास उठाने पड़ते हैं। उस महान् धर्मसे परम दुर्लभ श्रद्धाको पाकर जो वर्णाश्रमी मनुष्य अनन्यभावसे मेरी शरणमें आ जाते हैं, उन्हें सुखद मार्गसे धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष प्राप्त होते हैं। वर्णाश्रम-सम्बन्धी आचारकी सृष्टि मैंने ही बारंबार
789 संक्षिप्त शिवपुराण—24 C
७४० * संक्षिप्त शिवपुराण *
की है। उसमें भक्तिभाव रखकर जो मेरे हो गये हैं, उन्हीं वर्णाश्रमियोंका मेरी उपासनामें अधिकार है, दूसरोंका नहीं, यह मेरी निश्चित आज्ञा है। मेरी आज्ञाके अनुसार धर्ममार्गसे चलनेवाले वर्णाश्रमी पुरुष मेरी शरणमें आ मेरे कृपाप्रसादसे मल और माया आदि पाशोंसे मुक्त हो जाते हैं तथा मेरे पुनरावृत्ति-रहित धाममें पहुँचकर मेरा उत्तम साधर्म्य प्राप्त करके परमानन्दमें निमग्न हो जाते हैं। इसलिये मेरे बताये हुए वर्णधर्मको पाकर अथवा न पाकर भी जो मेरी शरण ले मेरा भक्त बन जाता है, वह स्वयं ही अपनी आत्माका उद्धार कर लेता है। यह कोटि-कोटि गुना अधिक अलब्ध-लाभ है। अतः मेरे मुखसे प्रतिपादित वर्णधर्मका पालन अवश्य करना चाहिये।
जो मोक्षमार्गसे विलग होकर दूसरी किसी वस्तुके लिये श्रम करता है, उसके लिये वही सबसे बड़ी हानि है, वही बड़ी भारी त्रुटि है, वही मोह है और वही अन्धता एवं मूकता है*। देवेश्वरि! मेरा जो सनातनधर्म है, वह चार चरणोंसे युक्त बताया गया है। उन चरणोंके नाम हैं—ज्ञान, क्रिया, चर्या और योग। पशु, पाश और पतिका ज्ञान ही ज्ञान कहलाता है। गुरुके अधीन जो विधिपूर्वक षडध्वशोधनका कार्य होता है, उसे क्रिया कहते हैं। मेरे द्वारा विहित वर्णाश्रमप्रयुक्त जो मेरे पूजन आदि धर्म हैं, उनके आचरणका नाम चर्या है। मेरे बताये हुए मार्गसे ही मुझमें सुस्थिरभावसे चित्त लगानेवाले साधकके द्वारा जो अन्तःकरणकी अन्य वृत्तियोंका निरोध किया जाता है उसीको योग कहते हैं। देवि! चित्तको निर्मल एवं प्रसन्न बनाना अश्वमेध यज्ञोंके समूहसे भी श्रेष्ठ है; क्योंकि वह मुक्ति देनेवाला है। विषयभोगकी इच्छा रखनेवाले लोगोंके लिये यह 'मनःप्रसाद' दुर्लभ है। जिसने यम और नियमके द्वारा इन्द्रियसमुदायपर विजय प्राप्त कर लिया है, उस विरक्त पुरुषके लिये ही योगको सुलभ बताया गया है। योग पूर्वपापोंको हर लेनेवाला है। वैराग्यसे ज्ञान होता है और ज्ञानसे योग। योगज्ञ पुरुष पतित हो तो भी मुक्त हो जाता है, इसमें संशय नहीं है।
सब प्राणियोंपर दया करनी चाहिये। सदा अहिंसाधर्मका पालन सबके लिये उचित है। ज्ञानका संग्रह भी आवश्यक है। सत्य बोलना, चोरीसे दूर रहना, ईश्वर और परलोकपर विश्वास रखना, मुझमें श्रद्धा करना, इन्द्रियोंको संयममें रखना, वेद-शास्त्रोंका पढ़ना-पढ़ाना, यज्ञ करना-कराना, मेरा चिन्तन करना, ईश्वरके प्रति अनुराग रखना और सदा ज्ञानशील होना ब्राह्मणके लिये नितान्त आवश्यक है। जो ब्राह्मण ज्ञानयोगकी सिद्धिके लिये सदा इस प्रकार उपर्युक्त धर्मोंका पालन करता है, वह शीघ्र ही विज्ञान पाकर योगको भी सिद्ध कर लेता है। प्रिये! ज्ञानी पुरुष ज्ञानाग्निके द्वारा इस कर्ममय शरीरको क्षणभरमें दग्ध करके मेरे प्रसादसे योगका ज्ञाता होकर कर्म-बन्धनसे छुटकारा पा जाता है। पुण्य-पापमय जो कर्म है, उसे मोक्षका प्रतिबन्धक
* सा हानिस्तन्महच्छिद्रं स मोहः सान्धमूकता। यदन्यत्र श्रमं कुर्यान्मोक्षमार्गबहिष्कृतः॥
(शि० पु० वा० सं० उ० ख० १०।२९)
789 संक्षिप्त शिवपुराण—24 D
* वायवीयसंहिता * ७४१
बताया गया है; इसलिये योगी पुरुष योगके द्वारा पुण्यापुण्यका परित्याग कर दे। फलकी कामनासे प्रेरित होकर कर्म करनेसे ही मनुष्य बन्धनमें पड़ता है, केवल कर्म करनेमात्रसे नहीं; अतः कर्मके फलको त्याग देना चाहिये। प्रिये! पहले कर्ममय यज्ञद्वारा बाहर मेरी पूजा करके फिर ज्ञानयोगमें तत्पर हो साधक योगका अभ्यास करे। कर्मयज्ञसे मेरे यथार्थ स्वरूपका बोध प्राप्त हो जानेपर जीव योगयुक्त हो मेरे यजनसे विरत हो जाते हैं। उस समय वे मिट्टी, पत्थर और सुवर्णमें भी समभाव रखते हैं। जो मेरा भक्त नित्ययुक्त एवं एकाग्रचित्त हो ज्ञानयोगमें तत्पर रहता है, वह मुनियोंमें श्रेष्ठ एवं योगी होकर मेरा सायुज्य प्राप्त कर लेता है। जो वर्णाश्रमी पुरुष मनसे विरक्त नहीं हैं, वे मेरा आश्रय ले ज्ञान, चर्या और क्रिया—इन तीनोंमें ही प्रवृत्त होनेके अधिकारी हैं, उन्हींके अनुष्ठानकी योग्यता रखते हैं। मेरा पूजन दो प्रकारका है—बाह्य और आभ्यन्तर। इसी तरह मन, वाणी और शरीर—इन त्रिविध साधनोंके भेदसे मेरा भजन तीन प्रकारका माना गया है। तप, कर्म, जप, ध्यान और ज्ञान—ये मेरे भजनके पाँच स्वरूप हैं; अतः साधुपुरुष उसे पाँच प्रकारका भी कहते हैं। मूर्ति आदिमें जो मेरा पूजन आदि होता है, जिसे दूसरे लोग जान लेते हैं, वह 'बाह्य' पूजन या भजन कहा गया है तथा वही भजन-पूजन जब मनके द्वारा होनेसे केवल अपने ही अनुभवका विषय होता है, तब 'आभ्यन्तर' कहलाता है। मुझमें लगा हुआ चित्त ही 'मन' कहलाता है। सामान्यतः मनमात्रको यहाँ मन नहीं कहा गया है। इसी तरह जो वाणी मेरे नामके जप और कीर्तनमें लगी हुई है, वही 'वाणी' कहलाने योग्य है, दूसरी नहीं तथा जो मेरे शास्त्रमें बताये हुए त्रिपुण्ड्र आदि चिह्नोंसे अंकित है और निरन्तर मेरी सेवा-पूजामें लगा हुआ है, वही शरीर 'शरीर' है, दूसरा नहीं। मेरी पूजाको ही 'कर्म' जानना चाहिये। बाहर जो यज्ञ आदि किये जाते हैं, उन्हें 'कर्म' नहीं कहा गया है। मेरे लिये शरीरको सुखाना ही 'तप' है, कृच्छ्र-चान्द्रायण आदिका अनुष्ठान नहीं। पंचाक्षर-मन्त्रकी आवृत्ति, प्रणवका अभ्यास तथा रुद्राध्याय आदिका बारंबार पाठ ही यहाँ 'जप' कहा गया है, वेदाध्ययन आदि नहीं। मेरे स्वरूपका चिन्तन-स्मरण ही 'ध्यान' है। आत्मा आदिके लिये की हुई समाधि नहीं। मेरे आगमोंके अर्थको भलीभाँति जानना ही 'ज्ञान' है, दूसरी किसी वस्तुके अर्थको समझना नहीं।
देवि! पूर्ववासनावश बाह्य अथवा आभ्यन्तर जिस पूजनमें मनका अनुराग हो, उसीमें दृढ़ निष्ठा रखनी चाहिये। बाह्य पूजनसे आभ्यन्तर पूजन सौ गुना अधिक श्रेष्ठ है; क्योंकि उसमें दोषोंका मिश्रण नहीं होगा तथा प्रत्यक्ष दीखनेवाले दोषोंकी भी वहाँ सम्भावना नहीं रहती है। भीतरकी शुद्धिको ही शुद्धि समझनी चाहिये। बाहरी शुद्धिको शुद्धि नहीं कहते हैं। जो आन्तरिक शुद्धिसे रहित है, वह बाहरसे शुद्ध होनेपर भी अशुद्ध ही है। देवि! बाह्य और आभ्यन्तर दोनों ही प्रकारका भजन भाव (अनुराग)-पूर्वक ही होना चाहिये, बिना भावके नहीं। भावरहित भजन तो एकमात्र विप्रलम्भ (छलना)-का ही कारण होता है। मैं तो सदा ही कृतकृत्य एवं पवित्र हूँ, मनुष्य मेरा क्या करेंगे? उनके द्वारा किये गये बाह्य
७४२ * संक्षिप्त शिवपुराण *
अथवा आभ्यन्तर पूजनमें उनका जो भाव (प्रेम) है, उसीको मैं ग्रहण करता हूँ। देवि! क्रियाका एकमात्र आत्मा भाव ही है। वही मेरा सनातनधर्म है। मन, वाणी और कर्मद्वारा कहीं भी किंचिन्मात्र फलकी इच्छा न रखकर ही क्रिया करनी चाहिये। देवेश्वरि ! फलका उद्देश्य रखनेसे मेरा आश्रय लघु हो जाता है; क्योंकि फलार्थीको यदि फल न मिला तो वह मुझे छोड़ सकता है। सती साध्वी देवि! फलार्थी होनेपर भी जिस साधकका चित्त मुझमें ही प्रतिष्ठित है, उसे उसके भावके अनुसार फल मैं अवश्य देता हूँ। जिनका मन फलकी इच्छा न रखकर ही मुझमें लगा हो, परंतु पीछे वे फल चाहने लगे हों, वे भक्त भी मुझे प्रिय हैं। जो पूर्वसंस्कारवश ही फलाफलकी चिन्ता न करके विवश हो मेरी शरण लेते हैं, वे भक्त मुझे अधिक प्रिय हैं। परमेश्वरि ! उन भक्तोंके लिये मेरी प्राप्तिसे बढ़कर दूसरा कोई वास्तविक लाभ नहीं है तथा मेरे लिये भी वैसे भक्तोंकी प्राप्तिसे बढ़कर और कोई लाभ नहीं है। मुझमें समर्पित हुआ उनका भाव मेरे अनुग्रहसे ही उनको मानो बलपूर्वक परम निर्वाणरूप फल प्रदान करता है। जिन्होंने अपने चित्तको मुझे समर्पित कर दिया है, अतएव जो मेरे अनन्यभक्त हैं, वे महात्मा पुरुष ही मेरे धर्मके अधिकारी हैं। उनके आठ लक्षण बताये गये हैं। मेरे भक्तजनोंके प्रति स्नेह, मेरी पूजाका अनुमोदन, स्वयंकी भी मेरे पूजनमें प्रवृत्ति, मेरे लिये ही शारीरिक चेष्टाओंका होना, मेरी कथा सुननेमें भक्तिभाव, कथा सुनते समय स्वर, नेत्र और अंगोंमें विकारका होना, बारंबार मेरी स्मृति और सदा मेरे आश्रित रहकर ही जीवन-निर्वाह करना—ये आठ प्रकारके चिह्न यदि किसी म्लेच्छमें भी हों तो वह विप्रशिरोमणि श्रीमान् मुनि है। वह संन्यासी है और वही पण्डित है। जो मेरा भक्त नहीं है, वह चारों वेदोंका विद्वान् हो तो भी मुझे प्रिय नहीं है। परंतु जो मेरा भक्त है, वह चाण्डाल हो तो भी प्रिय है। उसे उपहार देना चाहिये, उससे प्रसाद ग्रहण करना चाहिये तथा वह मेरे समान ही पूजनीय है। जो भक्ति-भावसे मुझे पत्र, पुष्प, फल अथवा जल समर्पित करता है, उसके लिये मैं अदृश्य नहीं होता हूँ और वह मेरी भी दृष्टिसे कभी ओझल नहीं होता है।*
(अध्याय १०)
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वर्णाश्रम-धर्म तथा नारी-धर्मका वर्णन; शिवके भजन, चिन्तन एवं ज्ञानकी महत्ताका प्रतिपादन
महादेवजी कहते हैं—देवेश्वरि ! अब मैं अधिकारी, विद्वान् एवं श्रेष्ठ ब्राह्मण-भक्तोंके लिये संक्षेपसे वर्ण-धर्मका वर्णन करता हूँ। तीनों काल स्नान, अग्निहोत्र, विधिवत्
* न मे प्रियश्चतुर्वेदी मद्भक्तः श्वपचोऽपि यः । तस्मै देयं ततो ग्राह्यं स च पूज्यो यथा ह्यहम् ॥
पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति । तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति ॥
(शि० पु० वा० सं० उ० खं० १०।७१-७२)
* वायवीयसंहिता * ७४३
शिवलिंग-पूजन, दान, ईश्वर-प्रेम, सदा और सर्वत्र दया, सत्य-भाषण, सन्तोष, आस्तिकता, किसी भी जीवकी हिंसा न करना, लज्जा, श्रद्धा, अध्ययन, योग, निरन्तर अध्यापन, व्याख्यान, ब्रह्मचर्य, उपदेश-श्रवण, तपस्या, क्षमा, शौच, शिखा-धारण, यज्ञोपवीत-धारण, पगड़ी धारण करना, दुपट्टा लगाना, निषिद्ध वस्तुका सेवन न करना, रुद्राक्षकी माला पहनना, प्रत्येक पर्वमें विशेषतः चतुर्दशीको शिवकी पूजा करना, ब्रह्मकूर्चका* पान, प्रत्येक मासमें ब्रह्मकूर्चसे विधिपूर्वक मुझे नहलाकर मेरा विशेषरूपसे पूजन करना, सम्पूर्ण क्रियान्नका त्याग, श्राद्धान्नका परित्याग, बासी अन्न तथा विशेषतः यावक (कुलथी या बोरो धान)-का त्याग, मद्य और मद्यकी गन्धका त्याग, शिवको निवेदित (चण्डेश्वरके भाग) नैवेद्यका त्याग— ये सभी वर्णोंके सामान्य धर्म हैं। ब्राह्मणोंके लिये विशेष धर्म ये हैं—क्षमा, शान्ति,
* पाराशरस्मृतिके ग्यारहवें अध्यायमें ब्रह्मकूर्चका वर्णन इस प्रकार है—
गोमूत्रं गोमयं क्षीरं दधि सर्पिः कुशोदकम्। निर्दिष्टं पञ्चगव्यं च पवित्रं पापशोधनम्॥ २९॥
गोमूत्रं कृष्णवर्णायाः श्वेतायाश्चैव गोमयम्। पयश्च ताम्रवर्णाया रक्ताया गृह्यते दधि॥ ३०॥
कपिलाया घृतं ग्राह्यं सर्वं कापिलमेव वा। मूत्रमेकपलं दद्यादङ्गुष्ठार्द्धं तु गोमयम्॥ ३१॥
क्षीरं सप्तपलं दद्याद्दधि त्रिपलमुच्यते। घृतमेकपलं दद्यात् पलमेकं कुशोदकम्॥ ३२॥
गायत्र्याऽऽदाय गोमूत्रं गन्धद्वारेति गोमयम्। आप्यायस्वेति च क्षीरं दधिक्राव्णस्तथा दधि॥ ३३॥
तेजोऽसि शुक्रमित्याज्यं देवस्य त्वा कुशोदकम्। पञ्चगव्यमृचापूतं स्थापयेदग्निसंनिधौ॥ ३४॥
आपो हि ष्ठेति चालोढ्य मा नस्तोकेति मन्त्रयेत्। सप्तावरास्तु ये दर्भा अच्छिन्नाग्राः शुकत्विषः॥ ३५॥
एतैरुद्धृत्य होतव्यं पञ्चगव्यं यथाविधि। इरावती इदं विष्णुर्मा नस्तोकेति शंवती॥ ३६॥
एताभिश्चैव होतव्यं हुतशेषं पिबेद् द्विजः। आलोढ्य प्रणवेनैव निर्मथ्य प्रणवेन तु॥ ३७॥
उद्धृत्य प्रणवेनैव पिबेच्च प्रणवेन तु। यत्त्वगस्थिगतं पापं देहे तिष्ठति देहिनाम्॥ ३८॥
ब्रह्मकूर्चं दहेत्सर्वं यथैवाग्निरिवेन्धनम्। पवित्रं त्रिषु लोकेषु देवताभिरधिष्ठितम्॥ ३९॥
‘गोमूत्र, गोबर, दूध, दही, घी और कुशाका जल—ये पवित्र और पापनाशक ‘पंचगव्य’ कहे जाते हैं। (कुशोदकमिश्रित पंचगव्य ही ब्रह्मकूर्च कहलाता है।) ब्रह्मकूर्चका विधान करनेवालेको उचित है कि काली गौका गोमूत्र, सफेद गौका गोबर, ताँबेके रंगकी गौका दूध, लाल गौका दही और कपिला गौका घी अथवा कपिला गौका ही गोमूत्र आदि पाँचों वस्तु लाये; १ पल गोमूत्र, आधे अँगूठे भर गोबर, ७ पल दूध, ३ पल दही, १ पल घी और १ पल कुशाका जल ग्रहण करे। ‘गायत्री’ मन्त्रसे गोमूत्र, ‘गन्धद्वारा’ मन्त्रसे गोबर, ‘आप्यायस्व’ मन्त्रसे दूध, ‘दधिक्राव्ण’ मन्त्रसे दही, ‘तेजोऽसि शुक्र’ मन्त्रसे घी और ‘देवस्य त्वा’ मन्त्रसे कुशाका जल ग्रहण करे; इस प्रकार ऋचाओंसे पवित्र किये हुए पंचगव्यको अग्निके पास रखे। ‘आपो हि ष्ठा’ मन्त्रसे गोमूत्र आदिको चलाये, ‘मा नस्तोके’ मन्त्रसे अभिमन्त्रित करे (मथे) ‘इरावती’, ‘इदं विष्णुः’, ‘मा नस्तोके’ और ‘शंवती’ इन ऋचाओंन्द्वारा अग्रभागसे युक्त ७ हरित कुशाओंसे पंचगव्यका होम करे; होमसे बचे हुए पंचगव्यको ओंकार पढ़कर मिलाये, ओंकार उच्चारण करके मथे, ओंकार पढ़कर उठाये और ओंकार उच्चारण करके द्विज पीवे। जैसे अग्नि काठको जलाता है, वैसे ही ब्रह्मकूर्च मनुष्योंके त्वचों और हड्डियोंमें टिके हुए पापोंको जला देता है। देवताओंसे अधिष्ठित होनेके कारण ब्रह्मकूर्च तीनों लोकोंमें पवित्र हुआ है॥ २९—३९॥
७४४ * संक्षिप्त शिवपुराण *
संतोष, सत्य, अस्तेय (चोरी न करना), ब्रह्मचर्य, शिवज्ञान, वैराग्य, भस्म-सेवन और सब प्रकारकी आसक्तियोंसे निवृत्ति—इन दस धर्मोंको ब्राह्मणोंका विशेष धर्म कहा गया है।
अब योगियों (यतियों)-के लक्षण बताये जाते हैं। दिनमें भिक्षान्न भोजन उनका विशेष धर्म है। यह वानप्रस्थ आश्रमवालोंके लिये भी उनके समान ही अभीष्ट है। इन सबको और ब्रह्मचारियोंको भी रातमें भोजन नहीं करना चाहिये। पढ़ाना, यज्ञ कराना और दान लेना—इनका विधान मैंने विशेषतः क्षत्रिय और वैश्यके लिये नहीं किया है। मेरे आश्रयमें रहनेवाले राजाओं या क्षत्रियोंके लिये थोड़ेमें धर्मका संग्रह इस प्रकार है। सब वर्णोंकी रक्षा, युद्धमें शत्रुओंका वध, दुष्ट पक्षियों, मृगों तथा दुराचारी मनुष्योंका दमन करना, सब लोगोंपर विश्वास न करना, केवल शिव-योगियोंपर ही विश्वास रखना, ऋतुकालमें ही स्त्रीसंसर्ग करना, सेनाका संरक्षण, गुप्तचर भेजकर लोकमें घटित होनेवाले समाचारोंको जानना, सदा अस्त्र धारण करना तथा भस्ममय कंचुक धारण करना। गोरक्षा, वाणिज्य और कृषि—ये वैश्यके धर्म बताये गये हैं। शूद्रेतर वर्णों—ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्योंकी सेवा शूद्रका धर्म कहा गया है। बाग लगाना, मेरे तीर्थोंकी यात्रा करना तथा अपनी धर्मपत्नीके साथ ही समागम करना गृहस्थके लिये विहित धर्म है। वनवासियों, यतियों और ब्रह्मचारियोंके लिये ब्रह्मचर्यका पालन मुख्य धर्म है। स्त्रियोंके लिये पतिकी सेवा ही सनातनधर्म है, दूसरा नहीं। कल्याणि! यदि पतिकी आज्ञा हो तो नारी मेरा पूजन भी कर सकती है। जो स्त्री पतिकी सेवा छोड़कर व्रतमें तत्पर होती है, वह नरकमें जाती है। इस विषयमें विचार करनेकी आवश्यकता नहीं है।
अब मैं विधवा स्त्रियोंके सनातन-धर्मका वर्णन करूँगा। व्रत, दान, तप, शौच, भूमि-शयन, केवल रातमें ही भोजन, सदा ब्रह्मचर्यका पालन, भस्म अथवा जलसे स्नान, शान्ति, मौन, क्षमा, विधिपूर्वक सब जीवोंको अन्नका वितरण, अष्टमी, चतुर्दशी, पूर्णिमा तथा विशेषतः एकादशीको विधिवत् उपवास और मेरा पूजन—ये विधवा स्त्रियोंके धर्म हैं। देवि ! इस प्रकार मैंने संक्षेपसे अपने आश्रमका सेवन करनेवाले ब्राह्मणों, क्षत्रियों, वैश्यों, संन्यासियों, ब्रह्मचारियों तथा वानप्रस्थों और गृहस्थोंके धर्मका वर्णन किया। साथ ही शूद्रों और नारियोंके लिये भी इस सनातनधर्मका उपदेश दिया। देवेश्वरि! तुम्हें सदा मेरा ध्यान और मेरे षडक्षर-मन्त्रका जप करना चाहिये। यही सम्पूर्ण वेदोक्त धर्म है और यही धर्म तथा अर्थका संग्रह है।
लोकमें जो मनुष्य अपनी इच्छासे मेरे विग्रहकी सेवाका व्रत धारण किये हुए हैं, पूर्वजन्मकी सेवाके संस्कारसे युक्त होनेके कारण भावातिरेकसे सम्पन्न हैं, वे स्त्री आदि विषयोंमें अनुरक्त हों या विरक्त, पापोंसे उसी प्रकार लिप्त नहीं होते, जैसे जलसे कमलका पत्ता। मेरे प्रसादसे विशुद्ध हुए उन विवेकी पुरुषोंको मेरे स्वरूपका ज्ञान हो जाता है। फिर उनके लिये कर्तव्याकर्तव्यका विधि-निषेध नहीं रह जाता। समाधि तथा शरणागति भी आवश्यक नहीं रहती। जैसे
* वायवीयसंहिता * ७४५
मेरे लिये कोई विधि-निषेध नहीं है, वैसे ही उनके लिये भी नहीं है। परिपूर्ण होनेके कारण जैसे मेरे लिये कुछ साध्य नहीं है, उसी प्रकार उन कृतकृत्य ज्ञानयोगियोंके लिये भी कोई कर्तव्य नहीं रह जाता है। वे मेरे भक्तोंके हितके लिये मानवभावका आश्रय लेकर भूतलपर स्थित हैं। उन्हें रुद्रलोकसे परिभ्रष्ट रुद्र ही समझना चाहिये; इसमें संशय नहीं है। जैसे मेरी आज्ञा ब्रह्मा आदि देवताओंको कार्यमें प्रवृत्त करनेवाली है, उसी प्रकार उन शिवयोगियोंकी आज्ञा भी अन्य मनुष्योंको कर्तव्यकर्ममें लगानेवाली है। वे मेरी आज्ञाके आधार हैं। उनमें अतिशय सद्भाव भी है। इसलिये उनका दर्शन करनेमात्रसे सब पापोंका नाश हो जाता है तथा प्रशस्त फलकी प्राप्तिको सूचित करनेवाले विश्वासकी भी वृद्धि होती है। जिन पुरुषोंका मुझमें अनुराग है, उन्हें उन बातोंका भी ज्ञान हो जाता है, जो पहले कभी उनके देखने, सुनने या अनुभवमें नहीं आयी होती है। उनमें अकस्मात् कम्प, स्वेद, अश्रुपात, कण्ठमें स्वरविकार तथा आनन्द आदि भावोंका बारंबार उदय होने लगता है। ये सब लक्षण उनमें कभी एक-एक करके अलग-अलग प्रकट होते हैं और कभी सम्पूर्ण भावोंका एक साथ उदय होने लगता है। कभी विलग न होनेवाले इन मन्द, मध्यम और उत्तम भावोंद्वारा उन श्रेष्ठ सत्पुरुषोंकी पहचान करनी चाहिये।
जैसे जब लोहा आगमें तपकर लाल हो जाता है, तब केवल लोहा नहीं रह जाता, उसी तरह मेरा सांनिध्य प्राप्त होनेसे वे केवल मनुष्य नहीं रह जाते—मेरा स्वरूप हो जाते हैं। हाथ, पैर आदिके साधर्म्यसे मानव-शरीर धारण करनेपर भी वे वास्तवमें रुद्र हैं। उन्हें प्राकृत मनुष्य समझकर विद्वान् पुरुष उनकी अवहेलना न करे। जो मूढ़चित्त मानव उनके प्रति अवहेलना करते हैं, वे अपनी आयु, लक्ष्मी, कुल और शीलको त्यागकर नरकमें गिरते हैं, अथवा बहुत कहनेसे क्या लाभ? जिस किसी भी उपायसे मुझमें चित्त लगाना कल्याणकी प्राप्तिका एकमात्र साधन है।
उपमन्यु कहते हैं—इस प्रकार परमात्मा श्रीकण्ठनाथ शिवने तीनों लोकोंके हितके लिये ज्ञानके सारभूत अर्थका संग्रह प्रकट किया है। सम्पूर्ण वेदशास्त्र, इतिहास, पुराण और विद्याएँ इस विज्ञान-संग्रहकी ही विस्तृत व्याख्याएँ हैं। ज्ञान, ज्ञेय, अनुष्ठेय, अधिकार, साधन और साध्य—इन छः अर्थोंका ही यह संक्षिप्त संग्रह बताया गया है। श्रीकृष्ण! जो शिव और शिवासम्बन्धी ज्ञानामृतसे तृप्त है और उनकी भक्तिसे सम्पन्न है, उसके लिये बाहर-भीतर कुछ भी कर्तव्य शेष नहीं है। इसलिये क्रमशः बाह्य और आभ्यन्तर कर्मको त्यागकर ज्ञानसे ज्ञेयका साक्षात्कार करके फिर उस साधनभूत ज्ञानको भी त्याग दे। यदि चित्त शिवमें एकाग्र नहीं है तो कर्म करनेसे भी क्या लाभ? और यदि चित्त एकाग्र ही है तो कर्म करनेकी भी क्या आवश्यकता है? अतः बाहर और भीतरके कर्म करके या न करके जिस-किसी भी उपायसे भगवान् शिवमें चित्त लगाये। जिनका चित्त भगवान् शिवमें
७४६ * संक्षिप्त शिवपुराण *
लगा है और जिनकी बुद्धि सुस्थिर है, ऐसे सत्पुरुषोंको इहलोक और परलोकमें भी सर्वत्र परमानन्दकी प्राप्ति होती है। यहाँ 'ॐ नमः शिवाय' इस मन्त्रसे सब सिद्धियाँ सुलभ होती हैं; अतः परावर विभूति (उत्तम-मध्यम ऐश्वर्य)-की प्राप्तिके लिये इस मन्त्रका ज्ञान प्राप्त करना चाहिये।
(अध्याय ११)
पंचाक्षर-मन्त्रके माहात्म्यका वर्णन
श्रीकृष्ण बोले—सर्वज्ञ महर्षिप्रवर! आप सम्पूर्ण ज्ञानके महासागर हैं। अब मैं आपके मुखसे पंचाक्षर-मन्त्रके माहात्म्यका तत्त्वतः वर्णन सुनना चाहता हूँ।
उपमन्युने कहा—देवकीनन्दन! पंचाक्षर-मन्त्रके माहात्म्यका विस्तारपूर्वक वर्णन तो सौ करोड़ वर्षोंमें भी नहीं किया जा सकता; अतः संक्षेपसे इसकी महिमा सुनो—वेदमें तथा शैवागममें दोनों जगह यह षडक्षर (प्रणवसहित पंचाक्षर)-मन्त्र समस्त शिवभक्तोंके सम्पूर्ण अर्थका साधक कहा गया है। इस मन्त्रमें अक्षर तो थोड़े ही हैं, परंतु यह महान् अर्थसे सम्पन्न है। यह वेदका सारतत्त्व है। मोक्ष देनेवाला है, शिवकी आज्ञासे सिद्ध है, संदेहशून्य है तथा शिवस्वरूप वाक्य है। यह नाना प्रकारकी सिद्धियोंसे युक्त, दिव्य, लोगोंके मनको प्रसन्न एवं निर्मल करनेवाला, सुनिश्चित अर्थवाला (अथवा निश्चय ही मनोरथको पूर्ण करनेवाला) तथा परमेश्वरका गम्भीर वचन है। इस मन्त्रका मुखसे सुखपूर्वक उच्चारण होता है। सर्वज्ञ शिवने सम्पूर्ण देहधारियोंके सारे मनोरथोंकी सिद्धिके लिये इस 'ॐ नमः शिवाय' मन्त्रका प्रतिपादन किया है। यह आदि षडक्षर-मन्त्र सम्पूर्ण विद्याओं (मन्त्रों)-का बीज (मूल) है। जैसे वटके बीजमें महान् वृक्ष छिपा हुआ है, उसी प्रकार अत्यन्त सूक्ष्म होनेपर भी इस मन्त्रको महान् अर्थसे परिपूर्ण समझना चाहिये।
'ॐ' इस एकाक्षर-मन्त्रमें तीनों गुणोंसे अतीत, सर्वज्ञ, सर्वकर्ता, द्युतिमान्, सर्वव्यापी प्रभु शिव प्रतिष्ठित हैं। ईशान आदि जो सूक्ष्म एकाक्षररूप ब्रह्म हैं, वे सब 'नमः शिवाय' इस मन्त्रमें क्रमशः स्थित हैं। सूक्ष्म षडक्षर-मन्त्रमें पंचब्रह्मरूपधारी साक्षात् भगवान् शिव स्वभावतः वाच्यवाचकभावसे विराजमान हैं। अप्रमेय होनेके कारण शिव वाच्य हैं और मन्त्र उनका वाचक माना गया है। शिव और मन्त्रका यह वाच्य-वाचकभाव अनादिकालसे चला आ रहा है। जैसे यह घोर संसारसागर अनादिकालसे प्रवृत्त है, उसी प्रकार संसारसे छुड़ानेवाले भगवान् शिव भी अनादिकालसे ही नित्य विराजमान हैं। जैसे औषध रोगोंका स्वभावतः शत्रु है, उसी प्रकार भगवान् शिव संसार-दोषोंके स्वाभाविक शत्रु माने गये हैं। यदि ये भगवान् विश्वनाथ न होते तो यह जगत् अन्धकारमय हो जाता; क्योंकि प्रकृति जड़ है और जीवात्मा अज्ञानी। अतः इन्हें प्रकाश देनेवाले परमात्मा ही हैं। प्रकृतिसे लेकर परमाणुपर्यन्त जो कुछ भी जडरूप तत्त्व है, वह किसी बुद्धिमान् (चेतन) कारणके बिना स्वयं 'कर्ता' नहीं देखा गया है।