भारतकोश
संग्रह पर लौटें

शिव पुराण

Shiva Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished850 पृष्ठ

७८० * संक्षिप्त शिवपुराण *

सकती है? श्रीकृष्ण! अन्त्यज, अधम, मूर्ख अथवा पतित मनुष्य भी यदि भगवान् शिवकी शरणमें चला जाय तो वह समस्त देवताओं एवं असुरोंके लिये भी पूजनीय हो जाता है। अतः सर्वथा प्रयत्न करके भक्तिभावसे ही शिवकी पूजा करे; क्योंकि अभक्तोंको कहीं भी फल नहीं मिलता। (अध्याय २५)

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पञ्चाक्षर-मन्त्रके जप तथा भगवान् शिवके भजन-पूजनकी महिमा, अग्निकार्यके लिये कुण्ड और वेदी आदिके संस्कार, शिवाग्निकी स्थापना और उसके संस्कार, होम, पूर्णाहुति, भस्मके संग्रह एवं रक्षणकी विधि तथा हवनान्तमें किये जानेवाले कृत्यका वर्णन

उपमन्यु कहते हैं—यदुनन्दन! कोई बड़ा भारी पाप करके भी भक्तिभावसे पञ्चाक्षर-मन्त्रद्वारा यदि देवेश्वर शिवका पूजन करे तो वह उस पापसे मुक्त हो जाता है। जो भक्तिभावसे पञ्चाक्षर-मन्त्रद्वारा एक ही बार शिवका पूजन कर लेता है, वह भी शिवमन्त्रके गौरववश शिवधामको चला जाता है। जो मूढ़ दुर्लभ मानव-जन्म पाकर भगवान् शिवकी अर्चना नहीं करता, उसका वह जन्म निष्फल है; क्योंकि वह मोक्षका साधक नहीं होता। जो दुर्लभ मानव-जन्म पाकर पिनाकपाणि महादेवजीकी आराधना करते हैं, उन्हींका जन्म सफल है और वे ही कृतार्थ एवं श्रेष्ठ मनुष्य हैं। जो भगवान् शिवकी भक्तिमें तत्पर रहते हैं, जिनका चित्त भगवान् शिवके सामने प्रणत होता है तथा जो सदा ही भगवान् शिवके चिन्तनमें लगे रहते हैं, वे कभी दुःखके भागी नहीं होते।* मनोहर भवन, हाव, भाव, विलाससे विभूषित तरुणी स्त्रियाँ और जिससे पूर्ण तृप्ति हो जाय, इतना धन—ये सब भगवान् शिवकी आराधनाके फल हैं। जो देवलोकमें महान् भोग और राज्य चाहते हैं, वे सदा भगवान् शिवके चरणारविन्दोंका चिन्तन करते हैं। सौभाग्य, कान्तिमान् रूप, बल, त्याग, दयाभाव, शूरता और विश्वमें विख्याति—ये सब बातें भगवान् शिवकी पूजा करनेवाले लोगोंको ही सुलभ होती हैं। इसलिये जो अपना कल्याण चाहता हो, उसे सब कुछ छोड़कर केवल भगवान् शिवमें मन लगा उनकी आराधना करनी चाहिये। जीवन बड़ी तेजीसे जा रहा है, जवानी शीघ्रतासे बीती जा रही है और रोग तीव्रगतिसे निकट आ रहा है, इसलिये सबको पिनाकपाणि महादेवजीकी पूजा करनी चाहिये, जबतक मृत्यु नहीं आती है,


* दुर्लभं प्राप्य मानुष्यं येऽर्चयन्ति पिनाकिनम्॥
तेषां हि सफलं जन्म कृतार्थास्ते नरोत्तमाः। भवभक्तिपरा ये च भवप्रणतचेतसः॥
भवसंस्मरणोद्युक्ता न ते दुःखस्य भागिनः॥
(शि० पु० वा० सं० उ० खं० २६। १५–१७)

* वायवीयसंहिता * ७८१

जबतक वृद्धावस्थाका आक्रमण नहीं होता और जबतक इन्द्रियोंकी शक्ति क्षीण नहीं हो जाती है, तबतक ही भगवान् शंकरकी आराधना कर लो। भगवान् शिवकी आराधनाके समान दूसरा कोई धर्म तीनों लोकोंमें नहीं है।*

अब मैं अग्निकार्यका वर्णन करूँगा। कुण्डमें, स्थण्डिलपर, वेदीमें, लोहेके हवनपात्रमें या नूतन सुन्दर मिट्टीके पात्रमें विधिपूर्वक अग्निकी स्थापना करके उसका संस्कार करे। तत्पश्चात् वहाँ महादेवजीकी आराधना करके होमकर्म आरम्भ करे। कुण्ड दो या एक हाथ लंबा-चौड़ा होना चाहिये। वेदीको गोल या चौकोर बनाना चाहिये। साथ ही मण्डल भी बनाना आवश्यक है। कुण्ड विस्तृत और गहरा होना चाहिये। उसके मध्यभागमें अष्टदल-कमल अंकित करे। वह दो या चार अंगुल ऊँचा हो। कुण्डके भीतर दो बित्तेकी ऊँचाईपर नाभिकी स्थिति बतायी गयी है। मध्यमा अंगुलिके मध्यम और उत्तम पर्वोंके बराबर मध्यभाग या कटिभाग जानना चाहिये। साधु पुरुष चौबीस अंगुलके बराबर एक हाथका परिमाण बताते हैं। कुण्डकी तीन, दो या एक मेखला होनी चाहिये। इन मेखलाओंका इस तरह निर्माण करे, जिससे कुण्डकी शोभा बढ़े। सुन्दर और चिकनी योनि बनाये, जिसकी आकृति पीपलके पत्तेकी भाँति अथवा हाथीके अधरोष्ठके समान हो; कुण्डके दक्षिण या पश्चिम भागमें मेखलाके बीचोबीच सुन्दर योनिका निर्माण करना चाहिये, जो मेखलासे कुछ नीची हो। उसका अग्रभाग कुण्डकी ओर हो तथा वह मेखलाको कुछ छोड़कर बनायी गयी हो। वेदीके लिये ऊँचाईका कोई नियम नहीं है। वह मिट्टी या बालूकी होनी चाहिये। गायके गोबर या जलसे मण्डल बनाना चाहिये। पात्रका परिमाण नहीं बताया गया है। कुण्ड और मिट्टीकी वेदीको गोबर और जलसे लीपना चाहिये। पात्रको धोकर तपाये तथा अन्य वस्तुओंका जलसे प्रोक्षण करे। अपने-अपने गृह्यसूत्रमें बतायी हुई विधिके अनुसार कुण्डमें और वेदीपर उल्लेखन (रेखा) करे। (रेखाओंपरसे मृत्तिका लेकर ईशानकोणमें फेंक दे।) फिर अग्निके उस आसनका कुशों अथवा पुष्पोंद्वारा जलसे प्रोक्षण करे। तत्पश्चात् पूजन और हवनके लिये सब प्रकारके द्रव्योंका संग्रह करे। धोनेयोग्य वस्तुओंको धोकर प्रोक्षणीके जलसे उनका प्रोक्षण करके उन्हें शुद्ध करे। इसके बाद सूर्यकान्तमणिसे प्रकट, काष्ठसे उत्पन्न, श्रोत्रियकी अग्निशालामें संचित अथवा दूसरी किसी उत्तम अग्निको आधार-सहित ले आये। उसे कुण्ड अथवा वेदीके ऊपर तीन बार प्रदक्षिणक्रमसे घुमाकर अग्निबीज (रं)-का उच्चारण करके उस अग्निको उक्त कुण्ड या वेदीके आसनपर


* त्वरितं जीवितं याति त्वरितं याति यौवनम्॥
त्वरितं व्याधिरभ्येति तस्मात्पूज्यः पिनाकधृक्। यावन्नायाति मरणं यावन्नाक्रमते जरा॥
यावन्नेन्द्रियवैकल्यं तावत्पूजय शंकरम्। न शिवार्चनतुल्योऽस्ति धर्मोऽन्यो भुवनत्रये॥
(शि० पु० वा० सं० उ० खं० २६। २१—२३)

७८२ * संक्षिप्त शिवपुराण *

स्थापित कर दे। कुण्डमें स्थापित करना हो तो योनिमार्गसे अग्निका आधान करे और वेदीपर अपने सामनेकी ओर अग्निकी स्थापना करे। योनिप्रदेशके पास स्थित विद्वान् पुरुष समस्त कुण्डको अग्निसे संयुक्त करे। साथ ही यह भावना करे कि अपनी नाभिके भीतर जो अग्निदेव विराजमान हैं, वे ही नाभिरन्ध्रसे चिनगारीके रूपमें निकलकर बाह्य अग्निमें मण्डलाकार होकर लीन हुए हैं। अग्निपर समिधा रखनेसे लेकर घीके संस्कारपर्यन्त सारा कार्य मन्त्रज्ञ पुरुष अपने गृह्यसूत्रमें बताये हुए क्रमसे मूलमन्त्रद्वारा सम्पन्न करे। तदनन्तर शिवमूर्तिकी पूजा करके दक्षिण पार्श्वमें मन्त्र-न्यास करे और घृतमें धेनुमुद्राका प्रदर्शन करे। स्रुक् और स्रुवा—ये दोनों धातुके बने हुए हों तो ग्रहण करनेयोग्य हैं। परंतु काँसी, लोहे और शीशेके बने हुए स्रुक्, स्रुवाको नहीं ग्रहण करना चाहिये अथवा यज्ञसम्बन्धी काष्ठके बने हुए स्रुक्, स्रुवा ग्राह्य हैं। स्मृति या शिवशास्त्रमें जो विहित हों, वे भी ग्राह्य हैं अथवा ब्रह्मवृक्ष (पलास या गूलर) आदिके छिद्ररहित बिचले दो पत्ते लेकर उन्हें कुशसे पोंछे और अग्निमें तपाकर फिर उनका प्रोक्षण करे। उन्हीं पत्तोंको स्रुक् और स्रुवाका रूप दे उनमें घी उठाये और अपने गृह्यसूत्रमें बताये हुए क्रमसे शिवबीज (ॐ)-सहित आठ बीजाक्षरोंद्वारा अग्निमें आहुति दे। इससे अग्निका संस्कार सम्पन्न होता है। वे बीज इस प्रकार हैं—श्रुं स्तुं बुं श्रूं पुं डुं हूं। ये सात हैं, इनमें शिवबीज (ॐ)-को सम्मिलित कर लेनेपर आठ बीजाक्षर होते हैं। उपर्युक्त सात बीज क्रमशः अग्निकी सात जिह्वाओंके हैं। उनकी मध्यमा जिह्वाका नाम बहुरूपा है। उसकी तीन शिखाएँ हैं। उनमेंसे एक शिखा दक्षिणमें और दूसरी वाम दिशा (उत्तर)-में प्रज्वलित होती है और बीचवाली शिखा बीचमें ही प्रकाशित होती है। ईशानकोणमें जो जिह्वा है, उसका नाम हिरण्या है। पूर्वदिशामें विद्यमान जिह्वा कनका नामसे प्रसिद्ध है। अग्निकोणमें रक्ता, नैर्ऋत्यकोणमें कृष्णा और वायव्यकोणमें सुप्रभा नामकी जिह्वा प्रकाशित होती है। इनके अतिरिक्त पश्चिममें जो जिह्वा प्रज्वलित होती है, उसका नाम मरुत् है। इन सबकी प्रभा अपने-अपने नामके अनुरूप है। अपने-अपने बीजके अनन्तर क्रमशः इनका नाम लेना चाहिये और नामके अन्तमें स्वाहाका प्रयोग करना चाहिये। इस तरह जो जिह्वामन्त्र* बनते हैं, उनके द्वारा क्रमशः प्रत्येक जिह्वाके लिये एक-एक घीकी आहुति दे, परंतु मध्यमाकी तीन जिह्वाओंके लिये तीन आहुतियाँ दे। कुण्डके मध्यभागमें 'रं वह्नये स्वाहा' बोलकर तीन आहुतियाँ दे। ये आहुतियाँ घी अथवा समिधासे देनी चाहिये। आहुति देनेके पश्चात् अग्निमें जलका सेचन करे। ऐसा करनेपर वह अग्नि भगवान् शिवकी हो जाती है। फिर उसमें शिवके आसनका चिन्तन करे और वहाँ अर्धनारीश्वर भगवान् शिवका


* ओं श्रुं त्रिशिखायै बहुरूपायै स्वाहा (दक्षिणे मध्ये उत्तरे च) ३। ओं स्तुं हिरण्यायै स्वाहा (ऐशान्यै) १। ओं बुं कनकायै स्वाहा (पूर्वस्याम्) १। ओं श्रूं रक्तायै स्वाहा (आग्नेय्याम्) १। ओं पुं कृष्णायै स्वाहा (नैर्ऋत्याम्) १। ओं डुं सुप्रभायै स्वाहा (पश्चिमायाम्) १। ओं हूं मरुज्जिह्वायै स्वाहा (वायव्ये) १।

  • वायवीयसंहिता * ७८३

आवाहन करके पूजन करे। पाद्य-अर्घ्य आदिसे लेकर दीपदानपर्यन्त पूजन करके अग्निका जलसे प्रोक्षण करे। तत्पश्चात् समिधाओंकी आहुति दे। वे समिधाएँ पलासकी या गूलर आदि दूसरे यज्ञिय वृक्षकी होनी चाहिये। उनकी लंबाई बारह अंगुलकी हो। समिधाएँ टेढ़ी न हों। स्वतः सूखी हुई भी न हों। उनके छिलके न उतरे हों तथा उनपर किसी प्रकारकी चोट न हो। सब समिधाएँ एक-सी होनी चाहिये। दस अंगुल लंबी समिधाएँ भी हवनके लिये विहित हैं। उनकी मोटाई कनिष्ठिका अंगुलिके समान होनी चाहिये अथवा प्रादेशमात्र (अँगूठेसे लेकर तर्जनीपर्यन्त) लंबी समिधाएँ उपयोगमें लानी चाहिये। यदि उपयुक्त समिधाएँ न मिलें तो जो मिल सकें, उन सबका ही हवन करना चाहिये। समिधा-हवनके बाद घीकी आहुति दे। घीकी धारा दूर्वादलके समान पतली और चार अंगुल लंबी हो। उसके बाद अन्नकी आहुति देनी चाहिये, जिसका प्रत्येक ग्रास सोलह-सोलह माशेके बराबर हो। लावा, सरसों, जौ और तिल—इन सबमें घी मिलाकर यथासम्भव भक्ष्य, लेह्य और चोष्यका भी मिश्रण करे तथा इन सबकी यथाशक्ति दस, पाँच या तीन आहुतियाँ दे अथवा एक ही आहुति दे। स्रुवासे, समिधासे, स्रुक्‌से अथवा हाथसे आहुति देनी चाहिये। उसमें भी दिव्य तीर्थसे अथवा ऋषितीर्थसे आहुति देनेका विधान है; यदि उपर्युक्त सभी द्रव्य न मिलें तो किसी एक ही द्रव्यसे श्रद्धापूर्वक आहुति देनी चाहिये। प्रायश्चित्तके लिये मन्त्रसे अभिमन्त्रित करके तीन आहुतियाँ दे। फिर होमावशिष्ट घृतसे स्रुक्‌को भरकर उसके अग्रभागमें फूल रखकर उसे दर्भसहित अधोमुख स्रुवासे ढक दे। इसके बाद खड़ा हो उसे अंजलिमें लेकर 'ओं नमः शिवाय वौषट्' का उच्चारण करके जौके तुल्य घीकी धाराकी आहुति दे। इस प्रकार पूर्णाहुति करके अग्निमें पूर्ववत् जलका छींटा दे। तत्पश्चात् देवेश्वर शिवका विसर्जन करके अग्निकी रक्षा करे। फिर अग्निका भी विसर्जन करके भावनाद्वारा नाभिमें स्थापित करके नित्य यजन करे।

अथवा शिवशास्त्रमें बतायी हुई पद्धतिके अनुसार वागीश्वरीके गर्भसे प्रकट हुए अग्निदेवको लाकर विधिवत् संस्कार करके उनका पूजन करे। फिर समिधाका आधान करके सब ओरसे परिधियोंका निर्माण करे। इसके बाद वहाँ दो-दो पात्र रखकर शिवका यजन करके प्रोक्षणीपात्रका शोधन करे। उस पात्रके जलसे पूर्वोक्त वस्तुओंका प्रोक्षण करके जलसे भरे हुए प्रणीतापात्रको ईशानकोणमें रखे। घीके संस्कारतकका सारा कार्य करके स्रुक् और स्रुवाका संशोधन करे। तदनन्तर पिता शिवद्वारा माता वागीश्वरीका गर्भाधान, पुंसवन और सीमन्तोन्नयन-संस्कार करके प्रत्येक संस्कारके निमित्त पृथक्-पृथक् आहुति दे और गर्भसे अग्निके उत्पन्न होनेकी भावना करे। उनके तीन पैर, सात हाथ, चार सींग और दो मस्तक हैं। मधुके समान पिंगल-वर्णवाले तीन नेत्र हैं। सिरपर जटाजूट और चन्द्रमाका मुकुट है। उनकी अंगकान्ति लाल है। लाल रंगके ही वस्त्र, चन्दन, माला और आभूषण उनकी शोभा बढ़ाते हैं। सब लक्षणोंसे सम्पन्न, यज्ञोपवीतधारी तथा त्रिगुण मेखलासे युक्त हैं। उनके दायें हाथोंमें

७८४* संक्षिप्त शिवपुराण *

शक्ति है, स्रुक् और स्रुवा है तथा बायें हाथोंमें तोमर, ताड़का पंखा और घीसे भरा हुआ पात्र है। इस आकृतिमें उत्पन्न हुए अग्निदेवका ध्यान करके उनका 'जातकर्म'-संस्कार करे। तत्पश्चात् नालच्छेदन करके सूतककी शुद्धि करे। फिर आहुति देकर उस शिवसम्बन्धी अग्निका रुचि नाम रखे। इसके बाद माता-पिताका विसर्जन करके चूड़ाकर्म और उपनयन आदिसे लेकर आप्तोर्यामपर्यन्त संस्कार करे।* तत्पश्चात् घृतधारा आदिका होम करके स्विष्टकृत् होम करे। इसके बाद 'रं' बीजका उच्चारण करके अग्निपर जलका छींटा डाले। फिर ब्रह्मा, विष्णु, शिव, ईश, लोकेश्वरगण और उनके अस्त्रोंका सब ओर क्रमशः पूजन करके धूप, दीप आदिकी सिद्धिके लिये अग्निको अलग निकालकर कर्मविधिका ज्ञाता पुरुष पुनः घृतयुक्त पूर्वोक्त होम-द्रव्य तैयार करके अग्निमें आसनकी कल्पना (भावना) करे और उसपर पूर्ववत् महादेव और महादेवीका आवाहन, पूजन करके पूर्णाहुतिपर्यन्त सब कार्य सम्पन्न करे।

अथवा अपने आश्रमके लिये शास्त्र-विहित अग्निहोत्रकर्म करके उसे भगवान् शिवको समर्पित करे। शिवाश्रमी पुरुष इन सब बातोंको समझकर होमकर्म करे। इसके लिये दूसरी कोई विधि नहीं है। शिवाग्निका भस्म संग्रहणीय है। अग्निहोत्रकर्मका भस्म भी संग्रह करनेके योग्य है। वैवाहिक अग्निका भस्म भी जो परिपक्व, पवित्र एवं सुगन्धित हो, संग्रह करके रखना चाहिये। कपिला गायका वह गोबर, जो गिरते समय आकाशमें ही दोनों हाथोंपर रोक लिया गया हो, उत्तम माना गया है। वह यदि अधिक गीला वा अधिक कड़ा न हो, दुर्गन्धयुक्त और सूखा हुआ न हो तो अच्छा माना गया है। यदि वह पृथ्वीपर गिर गया हो तो उसमेंसे ऊपर और नीचेके हिस्सेको त्यागकर बीचका भाग ले ले। उस गोबरका पिण्ड बनाकर उसे शिवाग्नि आदिमें मूल-मन्त्रके उच्चारणपूर्वक छोड़ दे। जब वह पक जाय, तब उसे निकाल ले। उसमें जितना अधपका हो, उसको और जो भाग बहुत अधिक पक गया हो, उसको भी त्यागकर श्वेत भस्म ले ले और उसे घोटकर चूर्ण बना दे। इसके बाद उसे भस्म रखनेके पात्रमें रख दे। भस्मपात्र धातुका, लकड़ीका, मिट्टीका, पत्थरका अथवा और किसी वस्तुका बनवा ले। वह देखनेमें सुन्दर होना चाहिये। उसमें रखे हुए भस्मको धनकी भाँति किसी शुभ, शुद्ध एवं समतल स्थानमें रखे। किसी अयोग्य या अपवित्रके हाथमें भस्म न दे। नीचे अपवित्र स्थानमें भी न डाले। नीचेके अंगोंसे उसका स्पर्श न करे। भस्मकी न तो उपेक्षा करे और न उसे लाँघे ही। शास्त्रोक्त समयपर उस पात्रसे भस्म लेकर मन्त्रोच्चारणपूर्वक अपने ललाट आदिमें लगाये। दूसरे समयमें उसका उपयोग न करे और न अयोग्य व्यक्तियोंके हाथमें उसे दे। भगवान् शिवका विसर्जन न हुआ हो, तभी भस्म-संग्रह कर ले; क्योंकि


* उपनयनसे आप्तोर्यामपर्यन्त संस्कारोंकी नामावली इस प्रकार है—उपनयन, व्रतबन्ध, समावर्तन, विवाह, उपाकर्म, उत्सर्जन, (सात पाक-यज्ञ—) हुत, प्रहुत, आहुत, शूलगव, बलिहरण, प्रत्यवरोहण, अष्टकाहोम, (सात हविर्यज्ञ-संस्था—) अग्न्याधान, अग्निहोत्र, दर्शपूर्णमास, चातुर्मास्य, आग्रयणेष्टि, निरूढपशुबन्ध, सौत्रामणि, (सात सोमयज्ञ-संस्था—) अग्निष्टोम, अत्यग्निष्टोम, उक्थ्य, षोडशी, वाजपेय, अतिरात्र, आप्तोर्याम।

* वायवीयसंहिता *७८५

विसर्जनके बाद उसपर चण्डका अधिकार हो जाता है।

जब अग्निकार्य सम्पन्न कर लिया जाय, तब शिवशास्त्रोक्त मार्गसे अथवा अपने गृह्यसूत्रमें बतायी हुई विधिसे बलिकर्म करे। तदनन्तर अच्छी तरह लिपे-पुते मण्डलमें विद्यासनको बिछाकर विद्याकोशकी स्थापना करके क्रमशः पुष्प आदिके द्वारा यजन करे। विद्याके सामने गुरुका भी मण्डल बनाकर वहाँ श्रेष्ठ आसन रखे और उसपर पुष्प आदिके द्वारा गुरुकी पूजा करे। तदनन्तर पूजनीय पुरुषोंकी पूजा करे और भूखोंको भोजन कराये। इसके बाद स्वयं सुखपूर्वक शुद्ध अन्न भोजन करे। वह अन्न तत्काल भगवान् शिवको निवेदित किया गया हो अथवा उनका प्रसाद हो। उसे आत्मशुद्धिके लिये श्रद्धापूर्वक भोजन करे। जो अन्न चण्डको समर्पित हो, उसे लोभवश ग्रहण न करे। गन्ध और पुष्पमाला आदि जो अन्य वस्तुएँ हैं, उनके लिये भी यह विधि समान ही है अर्थात् चण्डका भाग होनेपर उन्हें ग्रहण नहीं करना चाहिये। वहाँ विद्वान् पुरुष 'मैं ही शिव हूँ' ऐसी बुद्धि न करे। भोजन और आचमन करके शिवका मन-ही-मन चिन्तन करते हुए मूलमन्त्रका उच्चारण करे। शेष समय शिवशास्त्रकी कथाके श्रवण आदि योग्य कार्योंमें बिताये। रातका प्रथम प्रहर बीत जानेपर मनोहर पूजा करके शिव और शिवाके लिये एक परम सुन्दर शय्या प्रस्तुत करे। उसके साथ ही भक्ष्य, भोज्य, वस्त्र, चन्दन और पुष्पमाला आदि भी रख दे। मनसे और क्रियाद्वारा भी सब सुन्दर व्यवस्था करके पवित्र हो महादेवजी और महादेवीके चरणोंके निकट शयन करे। यदि उपासक गृहस्थ हो तो वह वहाँ अपनी पत्नीके साथ शयन करे। जो गृहस्थ न हों, वे अकेले ही सोयें। उषःकाल आया जान मन-ही-मन पार्वतीदेवी तथा पार्षदोंसहित अविनाशी भगवान् शिवको प्रणाम करके देशकालोचित कार्य तथा शौच आदि कृत्य पूर्ण करे। फिर यथाशक्ति शंख आदि वाद्योंकी दिव्य ध्वनियोंसे महादेव और महादेवीको जगाये। इसके बाद उस समय खिले हुए परम सुगन्धित पुष्पोंद्वारा शिवा और शिवकी पूजा करके पूर्वोक्त कार्य आरम्भ करे। (अध्याय २७)

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काम्य कर्मके प्रसंगमें शक्तिसहित पंचमुख महादेवकी पूजाके विधानका वर्णन

तदनन्तर शिवाश्रमसेवियोंके लिये नैमित्तिक कर्मकी विधि बताकर उपमन्युजीने कहा— यदुनन्दन! अब मैं काम्य कर्मका वर्णन करूँगा, जो इहलोक और परलोकमें भी फल देनेवाला है। शैवों तथा माहेश्वरोंको क्रमशः भीतर और बाहर इसे करना चाहिये। जैसे शिव और महेश्वरमें यहाँ अत्यन्त भेद नहीं है, उसी प्रकार शैवों और माहेश्वरोंमें भी अधिक भेद नहीं है। जो मनुष्य शिवके आश्रित रहकर ज्ञानयज्ञमें तत्पर होते हैं, वे शैव कहलाते हैं और जो शिवाश्रित भक्त भूतलपर कर्मयज्ञमें संलग्न रहते हैं, वे महान् ईश्वरका यजन करनेके कारण माहेश्वर कहे गये हैं। इसलिये ज्ञानयोगी शैवोंको अपने

७८६ * संक्षिप्त शिवपुराण *

भीतर भगवान्‌द्वारा कर्मका अनुष्ठान करना चाहिये और कर्मपरायण माहेश्वरोंको बाहर विहित द्रव्यों तथा उपकरणोंद्वारा उसका सम्पादन करना चाहिये। आगे बताये जानेवाले कर्मके प्रयोगमें उनके लिये कोई भेद नहीं है।

गन्ध, वर्ण और रस आदिके द्वारा विधिपूर्वक भूमिकी परीक्षा करके मनोऽभिलषित स्थानपर आकाशमें चँदोवा तान दे और उस स्थानको भलीभाँति लीप-पोतकर दर्पणके समान स्वच्छ बना दे। तत्पश्चात् शास्त्रोक्त मार्गसे वहाँ पहले पूर्वदिशाकी कल्पना करे। उस दिशामें एक या दो हाथका मण्डल बनाये। उस मण्डलमें सुन्दर अष्टदल कमल अंकित करे। कमलमें कर्णिका भी होनी चाहिये। यथासम्भव संचित रत्न और सुवर्ण आदिके चूर्णसे उसका निर्माण करे। वह अत्यन्त शोभायमान और पाँच आवरणोंसे युक्त हो! कमलके आठ दलोंमें पूर्वादिक्रमसे अणिमा आदि आठ सिद्धियोंकी कल्पना करे तथा उनके केसरोंमें शक्तिसहित वामदेव आदि आठ रुद्रोंको पूर्वादि दलके क्रमसे स्थापित करे। कमलकी कर्णिकामें वैराग्यको स्थान दे और बीजोंमें नवशक्तियोंकी स्थापना करे। कमलके कन्दमें शिवसम्बन्धी धर्म और नालमें शिवसम्बन्धी ज्ञानकी भावना करे। कर्णिकाके ऊपर अग्निमण्डल, सूर्यमण्डल और चन्द्रमण्डलकी भावना करे। इन मण्डलोंके ऊपर शिवतत्त्व, विद्यातत्त्व और आत्मतत्त्वका चिन्तन करे। सम्पूर्ण कमलासनके ऊपर सुखपूर्वक विराजमान और नाना प्रकारके विचित्र पुष्पोंसे अलंकृत, पाँच आवरणोंसहित भगवान् शिवका माता पार्वतीके साथ पूजन करे। उनकी अंगकान्ति शुद्ध स्फटिकमणिके समान उज्ज्वल है। वे सतत प्रसन्न रहते हैं। उनकी प्रभा शीतल है। मस्तकपर विद्युन्मण्डलके समान चमकीली जटारूप मुकुट उनकी शोभा बढ़ाता है। वे व्याघ्रचर्म धारण किये हुए हैं। उनके मुखारविन्दपर कुछ-कुछ मन्द मुसकानकी छटा छा रही है। उनके हाथकी हथेलियाँ और पैरोंके तलवे लाल कमलके समान अरुण प्रभासे उद्भासित हैं। वे भगवान् शिव समस्त शुभलक्षणोंसे सम्पन्न और सब प्रकारके आभूषणोंसे विभूषित हैं। उनके हाथोंमें उत्तमोत्तम दिव्य आयुध शोभा पा रहे हैं और अंगोंमें दिव्य चन्दनका लेप लगा हुआ है। उनके पाँच मुख और दस भुजाएँ हैं। अर्धचन्द्र उनकी शिखाके मणि हैं। उनका पूर्ववर्ती मुख प्रातःकालके सूर्यकी भाँति अरुण प्रभासे उद्भासित एवं सौम्य है। उसमें तीन नेत्ररूपी कमल खिले हुए हैं तथा सिरपर बालचन्द्रमाका मुकुट शोभा पाता है। दक्षिणमुख नील जलधरके समान श्याम प्रभासे भासित होता है। उसकी भौंहें टेढ़ी हैं। वह देखनेमें भयानक है। उसमें गोलाकार लाल-लाल आँखें दृष्टिगोचर होती हैं। दाढ़ोंके कारण वह मुख विकराल जान पड़ता है। उसका पराभव करना किसीके लिये भी कठिन है। उसके अधरपल्लव फड़कते रहते हैं। उत्तरवर्ती मुख मूँगेकी भाँति लाल है। काले-काले केशपाश उसकी शोभा बढ़ाते हैं। उसमें विभ्रमविलाससे युक्त तीन नेत्र हैं और उसका मस्तक अर्द्धचन्द्रमय मुकुटसे विभूषित है। भगवान् शिवका पश्चिम मुख पूर्ण चन्द्रमाके समान उज्ज्वल तथा तीन नेत्रोंसे प्रकाशमान है। उसका मस्तक चन्द्रलेखाकी शोभा धारण करता है।

* वायवीयसंहिता *
७८७

वह मुख देखनेमें सौम्य है और मन्द मुसकानकी शोभासे उपासकोंके मनको मोहे लेता है। उनका पाँचवाँ मुख स्फटिकमणिके समान निर्मल, चन्द्रलेखासे समुज्ज्वल, अत्यन्त सौम्य तथा तीन प्रफुल्ल नेत्रकमलोंसे प्रकाशमान है।

भगवान् शिव अपने दाहिने हाथोंमें शूल, परशु, वज्र, खड्ग और अग्नि धारण करके उन सबकी प्रभासे प्रकाशित होते हैं तथा बायें हाथोंमें नाग, बाण, घण्टा, पाश तथा अंकुश उनकी शोभा बढ़ाते हैं। पैरोंसे लेकर घुटनोंतकका भाग निवृत्तिकलासे सम्बद्ध है। उससे ऊपर नाभितकका भाग प्रतिष्ठाकलासे, कण्ठतकका भाग विद्याकलासे, ललाटतकका भाग शान्ति-कलासे और उसके ऊपरका भाग शान्त्यतीताकलासे संयुक्त है। इस प्रकार वे पंचाध्वव्यापी तथा साक्षात् पंचकलामय शरीरधारी हैं। ईशानमन्त्र उनका मुकुट है। तत्पुरुषमन्त्र उन पुरातनदेवका मुख है। अघोरमन्त्र हृदय है। वामदेवमन्त्र उन महेश्वरका गुह्यभाग है और सद्योजातमन्त्र उनका युगल चरण है। उनकी मूर्ति अड़तीस कलामयी* है। परमेश्वर शिवका विग्रह मातृका-(वर्णमाला-) मय, पंचब्रह्म ('ईशानः सर्व-विद्यानाम्' इत्यादि पाँच मन्त्र) मय, प्रणवमय तथा हंसशक्तिसे सम्पन्न है। इच्छाशक्ति उनके अंकमें आरूढ़ है, ज्ञानशक्ति दक्षिण-भागमें है तथा क्रियाशक्ति वामभागमें विराजमान है। वे त्रितत्त्वमय हैं। अर्थात् आत्मतत्त्व, विद्यातत्त्व और शिवतत्त्व उनके स्वरूप हैं। वे सदाशिव साक्षात् विद्यामूर्ति हैं। इस प्रकार उनका ध्यान करना चाहिये।

मूलमन्त्रसे मूर्तिकी कल्पना और सकलीकरणकी क्रिया करके मूलमन्त्रसे ही यथोचित रीतिसे क्रमशः पाद्य आदि विशेषार्घ्यपर्यन्त पूजन करे। फिर पराशक्तिके साथ साक्षात् मूर्तिमान् शिवका पूर्वोक्त मूर्तिमें आवाहन करके सदसद्व्यक्तिरहित परमेश्वर महादेवका गन्धादि पंचोपचारोंसे पूजन करे। पाँच ब्रह्ममन्त्रोंसे, छः अंगमन्त्रोंसे, मातृकामन्त्रसे, प्रणवसे, शक्तियुक्त शिव-मन्त्रसे, शान्त तथा अन्य वेदमन्त्रोंसे अथवा केवल शिवमन्त्रसे उन परम देवका पूजन करे। पाद्यसे लेकर मुखशुद्धिपर्यन्त पूजन सम्पन्न करके इष्टदेवका विसर्जन किये बिना ही क्रमशः पाँच आवरणोंकी पूजा आरम्भ करे। (अध्याय २८-२९)


आवरणपूजाकी विस्तृत विधि तथा उक्त विधिसे पूजनकी महिमाका वर्णन

उपमन्यु कहते हैं—यदुनन्दन! पहले <u>शिवा और शिवके दायें और बायें भागमें</u> <u>क्रमशः गणेश और कार्तिकेयका गन्ध आदि पाँच उपचारोंद्वारा पूजन करे। फिर इन सबके</u>


* कला, काल, नियति, विद्या, राग, प्रकृति और गुण—ये सात तत्त्व, पंचभूत, पंचतन्मात्रा, दस इन्द्रियाँ, चार अन्तःकरण और पाँच शब्द आदि विषय—ये छत्तीस तत्त्व हैं। ये सब तत्त्व जीवके शरीरमें होते हैं। परमेश्वरके शरीरको शाक्त (शक्तिस्वरूप एवं चिन्मय) तथा मन्त्रमय बताया गया है। इन दो तत्त्वोंको जोड़ लेनेसे अड़तीस कलाएँ होती हैं। समस्त जड-चेतन परमेश्वरका स्वरूप होनेसे उनकी मूर्तिको अड़तीस कलामयी बताया गया है। अथवा पाँच स्वर और तैंतीस व्यंजनरूप होनेसे उनके शरीरको अड़तीस कलामय कहा गया है।

७८८ * संक्षिप्त शिवपुराण *

चारों ओर ईशानसे लेकर सद्योजातपर्यन्त पाँच ब्रह्ममूर्तियोंका शक्तिसहित क्रमशः पूजन करे। यह प्रथम आवरणमें किया जानेवाला पूजन है। उसी आवरणमें हृदय आदि छः अंगों तथा शिव और शिवाका अग्निकोणसे लेकर पूर्वदिशापर्यन्त आठ दिशाओंमें क्रमशः पूजन करे। वहीं वामा आदि शक्तियोंके साथ वाम आदि आठ रुद्रोंकी पूर्वादि दिशाओंमें क्रमशः पूजा करे। यह पूजन वैकल्पिक है। यदुनन्दन! यह मैंने तुमसे प्रथम आवरणका वर्णन किया है।

अब प्रेमपूर्वक दूसरे आवरणका वर्णन किया जाता है, श्रद्धापूर्वक सुनो। पूर्वदिशावाले दलमें अनन्तका और उनके वामभागमें उनकी शक्तिका पूजन करे। दक्षिणदिशावाले दलमें शक्तिसहित सूक्ष्मदेवकी पूजा करे। पश्चिमदिशाके दलमें शक्तिसहित शिवोत्तमका, उत्तरदिशावाले दलमें शक्तियुक्त एकनेत्रका, ईशानकोणवाले दलमें एकरुद्र और उनकी शक्तिका, अग्निकोणवाले दलमें त्रिमूर्ति और उनकी शक्तिका, नैर्ऋत्यकोणके दलमें श्रीकण्ठ और उनकी शक्तिका तथा वायव्यकोणवाले दलमें शक्तिसहित शिखण्डीशका पूजन करे। समस्त चक्रवर्तियोंकी भी द्वितीय आवरणमें ही पूजा करनी चाहिये। तृतीय आवरणमें शक्तियोंसहित अष्टमूर्तियोंका पूर्वादि आठों दिशाओंमें क्रमशः पूजन करे। भव, शर्व, ईशान, रुद्र, पशुपति, उग्र, भीम और महादेव—ये क्रमशः आठ मूर्तियाँ हैं। इसके बाद उसी आवरणमें शक्तियोंसहित महादेव आदि ग्यारह मूर्तियोंकी पूजा करनी चाहिये। महादेव, शिव, रुद्र, शंकर, नीललोहित, ईशान, विजय, भीम, देवदेव, भवोद्भव तथा कपर्दीश (या कपालीश)—ये ग्यारह मूर्तियाँ हैं। इनमेंसे जो प्रथम आठ मूर्तियाँ हैं, उनका अग्निकोणवाले दलसे लेकर पूर्वदिशापर्यन्त आठ दिशाओंमें पूजन करना चाहिये। देवदेवको पूर्वदिशाके दलमें स्थापित एवं पूजित करे और ईशानका पुनः अग्निकोणमें स्थापन-पूजन करे। फिर इन दोनोंके बीचमें भवोद्भवकी पूजा करे और उन्हींके बाद कपालीश या कपर्दीशका स्थापन-पूजन करना चाहिये। उस तृतीय आवरणमें फिर वृषभराजका पूर्वमें, नन्दीका दक्षिणमें, महाकालका उत्तरमें, शास्ताका अग्निकोणके दलमें, मातृकाओंका दक्षिणदिशाके दलमें, गणेशजीका नैर्ऋत्यकोणके दलमें, कार्तिकेयका पश्चिमदलमें, ज्येष्ठाका वायव्यकोणके दलमें, गौरीका उत्तरदलमें, चण्डका ईशानकोणमें तथा शास्ता एवं नन्दीश्वरके बीचमें मुनीन्द्र वृषभका यजन करे। महाकालके उत्तरभागमें पिंगलका, शास्ता और मातृकाओंके बीचमें भृंगीश्वरका, मातृकाओं तथा गणेशजीके बीचमें वीरभद्रका, स्कन्द और गणेशजीके बीचमें सरस्वतीदेवीका, ज्येष्ठा और कार्तिकेयके बीचमें शिवचरणोंकी अर्चना करनेवाली श्रीदेवीका, ज्येष्ठा और गणाम्बा (गौरी)-के बीचमें महामोटीकी पूजा करे। गणाम्बा और चण्डके बीचमें दुर्गादेवीकी पूजा करे। इसी आवरणमें पुनः शिवके अनुचरवर्गकी पूजा करे। इस अनुचरवर्गमें रुद्रगण, प्रमथगण और भूतगण आते हैं। इन सबके विविध रूप हैं और ये सब-के-सब अपनी शक्तियोंके साथ हैं। इनके बाद एकाग्रचित्त हो शिवाके सखीवर्गका भी ध्यान एवं पूजन करना चाहिये।

* वायवीयसंहिता *

७८९

इस प्रकार तृतीय आवरणके देवताओंका विस्तारपूर्वक पूजन हो जानेपर उसके बाह्यभागमें चतुर्थ आवरणका चिन्तन एवं पूजन करे। पूर्वदलमें सूर्यका, दक्षिणदलमें चतुर्मुख ब्रह्माका, पश्चिमदलमें रुद्रका और उत्तरदिशाके दलमें भगवान् विष्णुका पूजन करे। इन चारों देवताओंके भी पृथक्-पृथक् आवरण हैं। इनके प्रथम आवरणमें छहों अंगों तथा दीप्ता आदि शक्तियोंकी पूजा करनी चाहिये। दीप्ता, सूक्ष्मा, जया, भद्रा, विभूति, विमला, अमोघा और विद्युता—इनकी क्रमशः पूर्व आदि आठ दिशाओंमें स्थिति है। द्वितीय आवरणमें पूर्वसे लेकर उत्तरतक क्रमशः चार मूर्तियोंकी और उनके बाद उनकी शक्तियोंकी पूजा करे। आदित्य, भास्कर, भानु और रवि—ये चार मूर्तियाँ क्रमशः पूर्वादि चारों दिशाओंमें पूजनीय हैं। तत्पश्चात् अर्क, ब्रह्मा, रुद्र तथा विष्णु—ये चार मूर्तियाँ भी पूर्वादि दिशाओंमें पूजनीय हैं। पूर्वदिशामें विस्तरा, दक्षिणदिशामें सुतरा, पश्चिमदिशामें बोधिनी और उत्तरदिशामें आप्यायिनीकी पूजा करे। ईशानकोणमें उषाकी, अग्निकोणमें प्रभाकी, नैर्ऋत्यकोणमें प्राज्ञाकी और वायव्यकोणमें संध्याकी पूजा करे। इस तरह द्वितीय आवरणमें इन सबकी स्थापना करके विधिवत् पूजा करनी चाहिये।

तृतीय आवरणमें सोम, मंगल, बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ बुध, विशालबुद्धि बृहस्पति, तेजोनिधि शुक्र, शनैश्चर तथा धूम्रवर्णवाले भयंकर राहु-केतुका पूर्वादि दिशाओंमें पूजन करे अथवा द्वितीय आवरणमें द्वादश आदित्योंकी पूजा करनी चाहिये और तृतीय आवरणमें द्वादश राशियोंकी। उसके बाह्य भागमें सात-सात गणोंकी सब ओर पूजा करनी चाहिये। ऋषियों, देवताओं, गन्धर्वों, नागों, अप्सराओं, ग्रामणियों, यक्षों, यातुधानों, सात छन्दोमय अश्वों तथा वालखिल्योंका पूजन करे। इस तरह तृतीय आवरणमें सूर्यदेवका पूजन करनेके पश्चात् तीन आवरणोंसहित ब्रह्माजीका पूजन करे।

पूर्वदिशामें हिरण्यगर्भका, दक्षिणमें विराट्का, पश्चिमदिशामें कालका और उत्तरदिशामें पुरुषका पूजन करे। हिरण्यगर्भ नामक जो पहले ब्रह्मा हैं, उनकी अंगकान्ति कमलके समान है। काल जन्मसे ही अंजनके समान काले हैं और पुरुष स्फटिकमणिके समान निर्मल हैं। त्रिगुण, राजस, तामस तथा सात्त्विक—ये चारों भी पूर्वादि दिशाके क्रमसे प्रथम आवरणमें ही स्थित हैं।

द्वितीय आवरणमें पूर्वादि दिशाओंके दलोंमें क्रमशः सनत्कुमार, सनक, सनन्दन और सनातनका पूजन करना चाहिये। तत्पश्चात् तीसरे आवरणमें ग्यारह प्रजापतियोंकी पूजा करे। उनमेंसे प्रथम आठका तो पूर्व आदि आठ दिशाओंमें पूजन करे, फिर शेष तीनका पूर्व आदिके क्रमसे अर्थात् पूर्व, दक्षिण एवं पश्चिममें स्थापन-पूजन करे। दक्ष, रुचि, भृगु, मरीचि, अंगिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, अत्रि, कश्यप और वसिष्ठ—ये ग्यारह विख्यात प्रजापति हैं। इनके साथ इनकी पत्नियोंका भी क्रमशः पूजन करना चाहिये। प्रसूति, आकूति, ख्याति, सम्भूति, धृति, स्मृति, क्षमा, संनति, अनसूया, देवमाता अदिति तथा अरुन्धती—ये सभी ऋषिपत्नियां पतिव्रता, सदा शिव-पूजनपरायणा, कान्तिमती और प्रिय-दर्शना (परम सुन्दरी) हैं। अथवा प्रथम आवरणमें चारों वेदोंका पूजन करे, फिर

७९० * संक्षिप्त शिवपुराण *

द्वितीय आवरणमें इतिहास-पुराणोंकी अर्चना करे तथा तृतीय आवरणमें धर्मशास्त्र- सहित सम्पूर्ण वैदिक विद्याओंका सब ओर पूजन करना चाहिये। चार वेदोंको पूर्वादि चार दिशाओंमें पूजना चाहिये, अन्य ग्रन्थोंको अपनी रुचिके अनुसार आठ या चार भागोंमें बाँटकर सब ओर उनकी पूजा करनी चाहिये। इस प्रकार दक्षिणमें तीन आवरणोंसे युक्त ब्रह्माजीकी पूजा करके पश्चिममें आवरणसहित रुद्रका पूजन करे। ईशान आदि पाँच ब्रह्म और हृदय आदि छः अंगोंको रुद्रदेवका प्रथम आवरण कहा गया है। द्वितीय आवरण विद्येश्वरमय$^१$ है। तृतीय आवरणमें भेद है। अतः उसका वर्णन किया जाता है। उस आवरणमें पूर्वादि दिशाओंके क्रमसे त्रिगुणादि चार मूर्तियोंकी पूजा करनी चाहिये। पूर्वदिशामें पूर्णरूप शिव नामक महादेव पूजित होते हैं, इनकी 'त्रिगुण' संज्ञा है (क्योंकि ये त्रिगुणात्मक जगत्‌के आश्रय हैं)। दक्षिणदिशामें 'राजस' पुरुषके नामसे प्रसिद्ध सृष्टिकर्ता ब्रह्माका पूजन किया जाता है, ये 'भव' कहलाते हैं। पश्चिम- दिशामें 'तामस' पुरुष अग्निकी पूजा की जाती है, इन्हींको संहारकारी हर कहा गया है। उत्तरदिशामें 'सात्त्विक' पुरुष सुख- दायक विष्णुका पूजन किया जाता है। ये ही विश्वपालक 'मृड' हैं। इस प्रकार पश्चिमभागमें शम्भुके शिवरूपका, जो पचीस तत्त्वोंका साक्षी छब्बीसवाँ$^२$ तत्त्व- रूप है, पूजन करके उत्तरदिशामें भगवान् विष्णुका पूजन करना चाहिये। इनके प्रथम आवरणमें वासुदेवको पूर्वमें, अनिरुद्धको दक्षिणमें, प्रद्युम्नको पश्चिममें और संकर्षणको उत्तरमें स्थापित करके इनकी पूजा करनी चाहिये। यह प्रथम आवरण बताया गया। अब द्वितीय शुभ आवरण बताया जाता है। मत्स्य, कूर्म, वराह, नरसिंह, वामन, तीनोंमेंसे एक राम, आप श्रीकृष्ण और हयग्रीव—ये द्वितीय आवरणमें पूजित होते हैं। तृतीय आवरणमें पूर्वभागमें चक्रकी पूजा करे, दक्षिणभागमें कहीं भी प्रतिहत न होनेवाले नारायणास्त्रका यजन करे, पश्चिममें पांचजन्यका और उत्तरमें शार्ङ्गधनुषकी पूजा करे। इस प्रकार तीन आवरणोंसे युक्त साक्षात् विश्व नामक परम हरि महाविष्णुकी, जो सदा सर्वत्र व्यापक हैं, मूर्तिमें भावना करके पूजा करे। इस तरह विष्णुके चतुर्व्यूहक्रमसे चार मूर्तियोंका पूजन करके क्रमशः उनकी चार शक्तियोंका पूजन करे। प्रभाका अग्निकोणमें, सरस्वतीका नैर्ऋत्यकोणमें, गणाम्बिकाका वायव्यकोणमें तथा लक्ष्मीका ईशानकोणमें पूजन करे। इसी प्रकार भानु आदि मूर्तियों और उनकी शक्तियोंका पूजन करके उसी आवरणमें लोकेश्वरोंकी पूजा करे। उनके नाम इस प्रकार हैं—इन्द्र, अग्नि, यम, निर्ऋति, वरुण,


१-पाशुपत-दर्शनमें विद्येश्वरोंकी संख्या आठ बतायी गयी है। उनके नाम इस प्रकार हैं—अनन्त, सूक्ष्म, शिवोत्तम, एकनेत्र, एकरुद्र, त्रिमूर्ति, श्रीकण्ठ और शिखण्डी। इनको क्रमशः पूर्व आदि दिशाओंमें स्थापित करके इनकी पूजा करे। द्वितीय आवरणमें इन्हींकी पूजा बतायी गयी है।

२-सांख्यरोक्त २४ प्राकृत तत्त्वोंके साक्षी जीवको पचीसवाँ तत्त्व कहा गया है; जो इससे भी परे हैं, वे सर्वसाक्षी परमात्मा शिव छब्बीसवें तत्त्वरूप हैं।

* वायवीयसंहिता * ७९१

वायु, सोम, कुबेर तथा ईशान। इस प्रकार चौथे आवरणकी विधिपूर्वक पूजा सम्पन्न करके बाह्यभागमें महेश्वरके आयुधोंकी अर्चना करे। ईशानकोणमें तेजस्वी त्रिशूलकी, पूर्वदिशामें वज्रकी, अग्निकोणमें परशुकी, दक्षिणमें बाणकी, नैर्ऋत्यकोणमें खड्गकी, पश्चिममें पाशकी, वायव्यकोणमें अंकुशकी और उत्तरदिशामें पिनाककी पूजा करे। तत्पश्चात् पश्चिमाभिमुख रौद्ररूपधारी क्षेत्रपालका अर्चन करे।

इस तरह पंचम आवरणकी पूजाका सम्पादन करके समस्त आवरण देवताओंके बाह्यभागमें अथवा पाँचवें आवरणमें ही मातृकाओंसहित महावृषभ नन्दिकेश्वरका पूर्वदिशामें पूजन करे। तदनन्तर समस्त देवयोनियोंकी चारों ओर अर्चना करे। इसके सिवा जो आकाशमें विचरनेवाले ऋषि, सिद्ध, दैत्य, यक्ष, राक्षस, अनन्त आदि नागराज, उन-उन नागेश्वरोंके कुलमें उत्पन्न हुए अन्य नाग, डाकिनी, भूत, वेताल, प्रेत और भैरवोंके नायक, नाना योनियोंमें उत्पन्न हुए अन्य पातालवासी जीव, नदी, समुद्र, पर्वत, वन, सरोवर, पशु, पक्षी, वृक्ष, कीट आदि क्षुद्र योनिके जीव, मनुष्य, नाना प्रकारके आकारवाले मृग, क्षुद्र जन्तु, ब्रह्माण्डके भीतरके लोक, कोटि-कोटि ब्रह्माण्ड, ब्रह्माण्डके बाहरके असंख्य भुवन और उनके अधीश्वर तथा दसों दिशाओंमें स्थित ब्रह्माण्डके आधारभूत रुद्र हैं और गुणजनित, मायाजनित, शक्तिजनित तथा उससे भी परे जो कुछ भी शब्दवाच्य जड-चेतनात्मक प्रपंच है, उन सबको शिवा और शिवके पार्श्वभागमें स्थित जानकर उनका सामान्यरूपसे यजन करे। वे सब लोग हाथ जोड़कर मन्द मुसकानयुक्त मुखसे सुशोभित होते हुए प्रेमपूर्वक महादेव और महादेवीका दर्शन कर रहे हैं, ऐसा चिन्तन करना चाहिये। इस तरह आवरण-पूजा सम्पन्न करके विक्षेपकी शान्तिके लिये पुनः देवेश्वर शिवकी अर्चना करनेके पश्चात् पंचाक्षर-मन्त्रका जप करे। तदनन्तर शिव और पार्वतीके सम्मुख उत्तम व्यंजनोंसे युक्त तथा अमृतके समान मधुर, शुद्ध एवं मनोहर महाचरुका नैवेद्य निवेदन करे। यह महाचरु बत्तीस आढक (लगभग तीन मन आठ सेर)-का हो तो उत्तम है और कम-से-कम एक आढक (चार सेर)-का हो तो निम्न श्रेणीका माना गया है। अपने वैभवके अनुसार जितना हो सके, महाचरु तैयार करके उसे श्रद्धापूर्वक निवेदन करे। तदनन्तर जल और ताम्बूल-इलायची आदि निवेदन करके आरती उतारकर शेष पूजा समाप्त करे। यागके उपयोगमें आनेवाले द्रव्य, भोजन, वस्त्र आदिको उत्तम श्रेणीका ही तैयार कराकर दे। शक्तिमान् पुरुष वैभव होते हुए धनव्यय करनेमें कंजूसी न करे। जो शठ या कंजूस है और पूजाके प्रति उपेक्षाकी भावना रखता है, वह यदि कृपणतावश कर्मको किसी अंगसे हीन कर दे तो उसके वे काम्य कर्म सफल नहीं होते, ऐसा सत्पुरुषोंका कथन है।

इसलिये मनुष्य यदि फलसिद्धिका इच्छुक हो तो उपेक्षाभावको त्यागकर सम्पूर्ण अंगोंके योगसे काम्य कर्मोंका सम्पादन करे। इस तरह पूजा समाप्त करके महादेव और महादेवीको प्रणाम करे। फिर भक्तिभावसे मनको एकाग्र करके स्तुतिपाठ करे। स्तुतिके पश्चात् साधक उत्सुकतापूर्वक

७९२* संक्षिप्त शिवपुराण *

कम-से-कम एक सौ आठ बार और सम्भव हो तो एक हजारसे अधिक बार पंचाक्षरी विद्याका जप करे। तत्पश्चात् क्रमशः विद्या और गुरुकी पूजा करके अपने अभ्युदय और श्रद्धाके अनुसार यज्ञमण्डपके सदस्योंका भी पूजन करे। फिर आवरणोंसहित देवेश्वर शिवका विसर्जन करके यज्ञके उपकरणोंसहित वह सारा मण्डल गुरुको अथवा शिवचरणाश्रित भक्तोंको दे दे। अथवा उसे शिवके ही उद्देश्यसे शिवके क्षेत्रमें समर्पित कर दे। अथवा समस्त आवरण-देवताओंका यथोचित रीतिसे पूजन करके सात प्रकारके होमद्रव्योंद्वारा शिवाग्निमें इष्ट-देवताका यजन करे।

यह तीनों लोकोंमें विख्यात योगेश्वर नामक योग है। इससे बढ़कर कोई योग त्रिभुवनमें कहीं नहीं है। संसारमें कोई ऐसी वस्तु नहीं, जो इससे साध्य न हो। इस लोकमें मिलनेवाला कोई फल हो या परलोकमें, इसके द्वारा सब सुलभ हैं। यह इसका फल नहीं है, ऐसा कोई नियन्त्रण नहीं किया जा सकता; क्योंकि सम्पूर्ण श्रेयोरूप साध्यका यह श्रेष्ठ साधन है। यह निश्चितरूपसे कहा जा सकता है कि पुरुष जो कुछ फल चाहता है, वह सब चिन्तामणिके समान इससे प्राप्त हो सकता है। तथापि किसी क्षुद्र फलके उद्देश्यसे इसका प्रयोग नहीं करना चाहिये; क्योंकि किसी महान्‌से लघु फलकी इच्छा रखनेवाला पुरुष स्वयं लघुतर हो जाता है।

महादेवजीके उद्देश्यसे महान् या अल्प जो भी कर्म किया जाय, वह सब सिद्ध होता है। अतः उन्हींके उद्देश्यसे कर्मका प्रयोग करना चाहिये। शत्रु तथा मृत्युपर विजय पाना आदि जो फल दूसरोंसे सिद्ध होनेवाले नहीं हैं, उन्हीं लौकिक या पारलौकिक फलोंके लिये विद्वान् पुरुष इसका प्रयोग करे। महापातकोंमें, महान् रोगसे भय आदिमें तथा दुर्भिक्ष आदिमें यदि शान्ति करनेकी आवश्यकता हो तो इसीसे शान्ति करे। अधिक बढ़-बढ़कर बातें बनानेसे क्या लाभ? इस योगको महेश्वर शिवने शैवोंके लिये बड़ी भारी आपत्तिका निवारण करनेवाला अपना निजी अस्त्र बताया है। अतः इससे बढ़कर यहाँ अपना कोई रक्षक नहीं है, ऐसा समझकर इस कर्मका प्रयोग करनेवाला पुरुष शुभ फलका भागी होता है।

जो प्रतिदिन पवित्र एवं एकाग्रचित्त होकर स्तोत्रमात्रका पाठ करता है, वह भी अभीष्ट प्रयोजनका अष्टमांश फल पा लेता है। जो अर्थका अनुसंधान करते हुए पूर्णिमा, अष्टमी अथवा चतुर्दशीको उपवासपूर्वक स्तोत्रका पाठ करता है, उसे आधा अभीष्ट फल प्राप्त हो जाता है। जो अर्थका अनुसंधान करते हुए लगातार एक मासतक स्तोत्रका पाठ करता है और पूर्णिमा, अष्टमी एवं चतुर्दशीको व्रत रखता है, वह सम्पूर्ण अभीष्ट फलका भागी होता है।

\hfill (अध्याय ३०)

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* वायवीयसंहिता *७९३

शिवके पाँच आवरणोंमें स्थित सभी देवताओंकी स्तुति तथा उनसे अभीष्टपूर्ति एवं मंगलकी कामना

उपमन्युरुवाच
स्तोत्रं वक्ष्यामि ते कृष्ण पञ्चावरणमार्गतः।
योगेश्वरमिदं पुण्यं कर्म येन समाप्यते॥ १॥
उपमन्यु कहते हैं— श्रीकृष्ण! अब मैं तुम्हारे समक्ष पंचावरण-मार्गसे किये जानेवाले स्तोत्रका वर्णन करूँगा, जिससे यह योगेश्वर नामक पुण्यकर्म पूर्णरूपसे सम्पन्न होता है॥ १॥

जय जय जगदेकनाथ शम्भो प्रकृतिमनोहर नित्यचित्स्वभाव।
अतिगतकलुषप्रपञ्चवाचामपि मनसां पदवीमतीततत्त्वम्॥ २॥
जगत्‌के एकमात्र रक्षक! नित्य चिन्मयस्वभाव! प्रकृतिमनोहर शम्भो! आपका तत्त्व कलुषराशिसे रहित, निर्मल वाणी तथा मनकी पहुँचसे भी परे है। आपकी जय हो, जय हो॥ २॥

स्वभावनिर्मलाभोग जय सुन्दरचेष्टित।
स्वात्मतुल्यमहाशक्ते जय शुद्धगुणार्णव॥ ३॥
आपका श्रीविग्रह स्वभावसे ही निर्मल है, आपकी चेष्टा परम सुन्दर है, आपकी जय हो। आपकी महाशक्ति आपके ही तुल्य है। आप विशुद्ध कल्याणमय गुणोंके महासागर हैं, आपकी जय हो॥ ३॥

अनन्तकान्तिसम्पन्न जयासदृशविग्रह।
अतर्क्यमहिमाधार जयानाकुलमङ्गल॥ ४॥
आप अनन्त कान्तिसे सम्पन्न हैं। आपके श्रीविग्रहकी कहीं तुलना नहीं है, आपकी जय हो। आप अतर्क्य महिमाके आधार हैं तथा शान्तिमय मंगलके निकेतन हैं। आपकी जय हो॥ ४॥

निरञ्जन निराधार जय निष्कारणोदय।
निरन्तरपरानन्द जय निर्वृतिकारण॥ ५॥
निरंजन (निर्मल), आधाररहित तथा बिना कारणके प्रकट होनेवाले शिव! आपकी जय हो। निरन्तर परमानन्दमय! शान्ति और सुखके कारण! आपकी जय हो॥ ५॥

जयातिपरमैश्वर्य जयातिकरुणास्पद।
जय स्वतन्त्रसर्वस्व जयासदृशवैभव॥ ६॥
अतिशय उत्कृष्ट ऐश्वर्यसे सुशोभित तथा अत्यन्त करुणाके आधार! आपकी जय हो। प्रभो! आपका सब कुछ स्वतन्त्र है तथा आपके वैभवकी कहीं समता नहीं है; आपकी जय हो, जय हो॥ ६॥

जयावृतमहाविश्व जयानावृत केनचित्।
जयोत्तर समस्तस्य जयात्यन्तानिरुत्तर॥ ७॥
आपने विराट् विश्वको व्याप्त कर रखा है, किंतु आप किसीसे भी व्याप्त नहीं हैं। आपकी जय हो, जय हो। आप सबसे उत्कृष्ट हैं, किंतु आपसे श्रेष्ठ कोई नहीं है। आपकी जय हो, जय हो॥ ७॥

जयाद्भुत जयाक्षुद्र जयाक्षत जयाव्यय।
जयामेय जयामाय जयाभव जयामल॥ ८॥
आप अद्भुत हैं, आपकी जय हो। आप अक्षुद्र (महान्) हैं, आपकी जय हो। आप अक्षत (निर्विकार) हैं, आपकी जय हो। आप अविनाशी हैं, आपकी जय हो। अप्रमेय परमात्मन्! आपकी जय हो। मायारहित महेश्वर! आपकी जय हो। अजन्मा शिव! आपकी जय हो। निर्मल शंकर! आपकी जय हो॥ ८॥

७९४
* संक्षिप्त शिवपुराण *

महाभुज महासार महागुण महाकथ।
महाबल महामाय महारस महारथ॥ ९॥
महाबाहो! महासार! महागुण! महती कीर्तिकथासे युक्त! महाबली! महामायावी! महान् रसिक तथा महारथ! आपकी जय हो॥ ९॥

नमः परमदेवाय नमः परमहेतवे।
नमः शिवाय शान्ताय नमः शिवतराय ते॥ १०॥
आप परम आराध्यको नमस्कार है। आप परम कारणको नमस्कार है। शान्त शिवको नमस्कार है और आप परम कल्याणमय प्रभुको नमस्कार है॥ १०॥

त्वदधीनमिदं कृत्स्नं जगद्धि ससुरासुरम्॥ ११॥
अतस्त्वद्विहितामाज्ञां क्षमते कोऽतिवर्तितुम्॥ १२॥
देवताओं और असुरोंसहित यह सम्पूर्ण जगत् आपके अधीन है। अतः आपकी आज्ञाका उल्लंघन करनेमें कौन समर्थ हो सकता है॥ ११-१२॥

अयं पुनर्जनो नित्य भवदेकसमाश्रयः।
भवन्तोऽनुगृह्णास्मै प्रार्थितं सम्प्रयच्छतु॥ १३॥
हे सनातनदेव! यह सेवक एकमात्र आपके ही आश्रित है; अतः आप इसपर अनुग्रह करके इसे इसकी प्रार्थित वस्तु प्रदान करें॥ १३॥

जयाम्बिके जगन्मातर्जय सर्वजगन्मयि।
जयानवधिकैश्वर्ये जयानुपमविग्रहे॥ १४॥
अम्बिके! जगन्मातः! आपकी जय हो। सर्वजगन्मयी! आपकी जय हो। असीम ऐश्वर्यशालिनि! आपकी जय हो। आपके श्रीविग्रहकी कहीं उपमा नहीं है, आपकी जय हो॥ १४॥

जय वाङ्मनसातीते जयाचिद्ध्वान्तभञ्जिके।
जय जन्मजराहीने जय कालोत्तरोत्तरे॥ १५॥
मन, वाणीसे अतीत शिवे! आपकी जय हो। अज्ञानान्धकारका भंजन करनेवाली देवि! आपकी जय हो। जन्म और जरासे रहित उमे! आपकी जय हो। कालसे भी अतिशय उत्कृष्ट शक्तिवाली दुर्गे! आपकी जय हो॥ १५॥

जयानेकविधानस्थे जय विश्वेश्वरप्रिये।
जय विश्वसुराराध्ये जय विश्वविजृम्भिणि॥ १६॥
अनेक प्रकारके विधानोंमें स्थित परमेश्वरि! आपकी जय हो। विश्वनाथप्रिये! आपकी जय हो। समस्त देवताओंकी आराधनीया देवि! आपकी जय हो। सम्पूर्ण विश्वका विस्तार करनेवाली जगदम्बिके! आपकी जय हो॥ १६॥

जय मङ्गलदिव्याङ्गि जय मङ्गलदीपिके।
जय मङ्गलचारित्रे जय मङ्गलदायिनि॥ १७॥
मंगलमय दिव्य अंगोंवाली देवि! आपकी जय हो। मंगलको प्रकाशित करनेवाली! आपकी जय हो। मंगलमय चरित्रवाली सर्वमंगले! आपकी जय हो। मंगलदायिनि! आपकी जय हो॥ १७॥

नमः परमकल्याणगुणसंचयमूर्तये।
त्वत्तः खलु समुत्पन्नं जगत्त्वय्येव लीयते॥ १८॥
परम कल्याणमय गुणोंकी आप मूर्ति हैं, आपको नमस्कार है। सम्पूर्ण जगत् आपसे ही उत्पन्न हुआ है, अतः आपमेंही लीन होगा॥ १८॥

त्वद्विनान्तः फलं दातुमीश्वरोऽपि न शक्नुयात्।
जन्मप्रभृति देवेशि जनोऽयं त्वदुपाश्रितः॥ १९॥
अतोऽस्य तव भक्तस्य निर्वर्तय मनोरथम्।
देवेश्वरि! अतः आपके बिना ईश्वर भी फल देनेमें समर्थ नहीं हो सकते। यह जन जन्मकालसे ही आपकी शरणमें आया हुआ है। अतः देवि! आप अपने इस भक्तका मनोरथ सिद्ध कीजिये॥ १९॥

* वायवीयसंहिता * ७९५


पञ्चवक्त्रो दशभुजः शुद्धस्फटिकसंनिभः ॥ २० ॥
वर्णब्रह्मकलादेहो देवः सकलनिष्कलः ।
शिवमूर्त्तिसमारूढः शान्त्यतीतः सदाशिवः ।
भक्त्या मयार्चितो मह्यं प्रार्थितं शं प्रयच्छतु ॥ २१ ॥

प्रभो! आपके पाँच मुख और दस भुजाएँ हैं। आपकी अंगकान्ति शुद्ध स्फटिकमणिके समान निर्मल है। वर्ण, ब्रह्म और कला आपके विग्रहरूप हैं। आप सकल और निष्कल देवता हैं। शिव-मूर्त्तिमें सदा व्याप्त रहनेवाले हैं। शान्त्यतीत पदमें विराजमान सदाशिव आप ही हैं। मैंने भक्तिभावसे आपकी अर्चना की है। आप मुझे प्रार्थित कल्याण प्रदान करें॥ २०-२१॥

सदाशिवाङ्कमारूढा शक्तिरिच्छा शिवाह्वया ।
जननी सर्वलोकानां प्रयच्छतु मनोरथम् ॥ २२ ॥

सदाशिवके अंकमें आरूढ़, इच्छा-शक्तिस्वरूपा, सर्वलोकजननी शिवा मुझे मनोवांछित वस्तु प्रदान करें॥ २२॥

शिवयोर्दयितौ पुत्रौ देवौ हेरम्बषण्मुखौ ।
शिवानुभावौ सर्वज्ञौ शिवज्ञानामृताशिनौ ॥ २३ ॥
तृप्तौ परस्परं स्निग्धौ शिवाभ्यां नित्यसत्कृतौ ।
सत्कृतौ च सदा देवौ ब्रह्माद्यैस्त्रिदशैरपि ॥ २४ ॥
सर्वलोकपरित्राणं कर्तुमभ्युदितौ सदा ।
स्वेच्छावतारं कुर्वन्तौ स्वांशभेदैरनेकणः ॥ २५ ॥
ताविमौ शिवयोः पार्श्वे नित्यमित्थं मयार्चितौ ।
तयोराज्ञां पुरस्कृत्य प्रार्थितं मे प्रयच्छताम् ॥ २६ ॥

शिव और पार्वतीके प्रिय पुत्र, शिवके समान प्रभावशाली सर्वज्ञ तथा शिव-ज्ञानामृतका पान करके तृप्त रहनेवाले देवता गणेश और कार्तिकेय परस्पर स्नेह रखते हैं। शिवा और शिव दोनोंसे सत्कृत हैं तथा ब्रह्मा आदि देवता भी इन दोनों देवोंका सर्वथा सत्कार करते हैं। ये दोनों भाई निरन्तर सम्पूर्ण लोकोंकी रक्षा करनेके लिये उद्यत रहते हैं और अपने विभिन्न अंशोंद्वारा अनेक बार स्वेच्छापूर्वक अवतार धारण करते हैं। वे ही ये दोनों बन्धु शिव और शिवाके पार्श्वभागमें मेरे द्वारा इस प्रकार पूजित हो उन दोनोंकी आज्ञा ले प्रतिदिन मुझे प्रार्थित वस्तु प्रदान करें॥ २३—२६॥

शुद्धस्फटिकसंकाशमीशानाख्यं सदाशिवम् ।
मूर्द्धाभिमानिनी मूर्तिः शिवस्य परमात्मनः ॥ २७ ॥
शिवार्चनरतं शान्तं शान्त्यतीतं खमास्थितम् ।
पञ्चाक्षरन्तिमं बीजं कलाभिः पञ्चभिर्युतम् ॥ २८ ॥
प्रथमावरणे पूर्वं शक्त्या सह समर्चितम् ।
पवित्रं परमं ब्रह्म प्रार्थितं मे प्रयच्छतु ॥ २९ ॥

जो शुद्ध स्फटिकमणिके समान निर्मल, ईशान नामसे प्रसिद्ध और सदा कल्याणस्वरूप है, परमात्मा शिवकी मूर्धाभिमानिनी मूर्ति है; शिवार्चनमें रत, शान्त, शान्त्यतीतकलामें प्रतिष्ठित, आकाशमण्डलमें स्थित शिव-पञ्चाक्षरका अन्तिम बीजस्वरूप, पाँच कलाओंसे युक्त और प्रथम आवरणमें सबसे पहले शक्तिके साथ पूजित है, वह पवित्र परब्रह्म मुझे मेरी अभीष्ट वस्तु प्रदान करे॥ २७—२९॥

बालसूर्यप्रतीकाशं पुरुषाख्यं पुरातनम् ।
पूर्ववक्त्राभिमानं च शिवस्य परमेष्ठिनः ॥ ३० ॥
शान्त्यात्मकं मरुत्संस्थं शम्भोः पादार्चने रतम् ।
प्रथमं शिवबीजेषु कलासु च चतुष्कलम् ॥ ३१ ॥
पूर्वभागे मया भक्त्या शक्त्या सह समर्चितम् ।
पवित्रं परमं ब्रह्म प्रार्थितं मे प्रयच्छतु ॥ ३२ ॥

जो प्रातःकालके सूर्यकी भाँति अरुणप्रभासे युक्त, पुरातन, तत्पुरुष नामसे विख्यात, परमेष्ठी शिवके पूर्ववर्ती मुखका अभिमानी, शान्तिकलास्वरूप या शान्ति-कलामें प्रतिष्ठित, वायुमण्डलमें स्थित,

७९६* संक्षिप्त शिवपुराण *

शिवचरणार्चनपरायण, शिवके बीजोंमें प्रथम और कलाओंमें चार कलाओंसे युक्त है, मैंने पूर्वदिशामें भक्तिभावसे शक्तिसहित जिसका पूजन किया है, वह पवित्र परब्रह्म शिव मेरी प्रार्थना सफल करे॥ ३०–३२॥

अञ्जनादिप्रतीकाशमघोरं घोरविग्रहम्।
देवस्य दक्षिणं वक्त्रं देवदेवपदार्चकम्॥ ३३॥
विद्यापदं समारूढं वह्निमण्डलमध्यगम्।
द्वितीयं शिवबीजेषु कलास्वष्टकलान्वितम्॥ ३४॥
शम्भोर्दक्षिणदिग्भागे शक्त्या सह समर्चितम्।
पवित्रं परमं ब्रह्म प्रार्थितं मे प्रयच्छतु॥ ३५॥

जो अंजन आदिके समान श्याम, घोर शरीरवाला एवं अघोर नामसे प्रसिद्ध है, महादेवजीके दक्षिण मुखका अभिमानी तथा देवाधिदेव शिवके चरणोंका पूजक है, विद्याकलापर आरूढ़ और अग्निमण्डलके मध्य विराजमान है, शिवबीजोंमें द्वितीय तथा कलाओंमें अष्टकलायुक्त एवं भगवान् शिवके दक्षिणभागमें शक्तिके साथ पूजित है, वह पवित्र परब्रह्म मुझे मेरी अभीष्ट वस्तु प्रदान करे॥ ३३–३५॥

कुङ्कुमक्षोदसंकाशं वामाख्यं वरवेषधृक्।
वक्त्रमुत्तरमीशस्य प्रतिष्ठायां प्रतिष्ठितम्॥ ३६॥
वारिमण्डलमध्यस्थं महादेवार्चने रतम्।
तुरीयं शिवबीजेषु त्रयोदशकलान्वितम्॥ ३७॥
देवस्योत्तरदिग्भागे शक्त्या सह समर्चितम्।
पवित्रं परमं ब्रह्म प्रार्थितं मे प्रयच्छतु॥ ३८॥

जो कुंकुमचूर्ण अथवा केसरयुक्त चन्दनके समान रक्त-पीतवर्णवाला, सुन्दर वेषधारी और वामदेव नामसे प्रसिद्ध है, भगवान् शिवके उत्तरवर्ती मुखका अभिमानी है, प्रतिष्ठाकलामें प्रतिष्ठित है, जलके मण्डलमें विराजमान तथा महादेवजीकी अर्चनामें तत्पर है, शिवबीजोंमें चतुर्थ तथा तेरह कलाओंसे युक्त है और महादेवजीके उत्तरभागमें शक्तिके साथ पूजित हुआ है, वह पवित्र परब्रह्म मेरी प्रार्थना पूर्ण करे॥ ३६–३८॥

शङ्खकुन्देन्दुधवलं सद्याख्यं सौम्यलक्षणम्।
शिवस्य पश्चिमं वक्त्रं शिवपादार्चने रतम्॥ ३९॥
निवृत्तिपदनिष्ठं च पृथिव्यां समवस्थितम्।
तृतीयं शिवबीजेषु कलाभिश्चाष्टभिर्युतम्॥ ४०॥
देवस्य पश्चिमे भागे शक्त्या सह समर्चितम्।
पवित्रं परमं ब्रह्म प्रार्थितं मे प्रयच्छतु॥ ४१॥

जो शंख, कुन्द और चन्द्रमाके समान धवल, सौम्य तथा सद्योजात नामसे विख्यात है, भगवान् शिवके पश्चिम मुखका अभिमानी एवं शिवचरणोंकी अर्चनामें रत है, निवृत्तिकलामें प्रतिष्ठित तथा पृथ्वीमण्डलमें स्थित है, शिवबीजोंमें तृतीय, आठ कलाओंसे युक्त और महादेवजीके पश्चिमभागमें शक्तिके साथ पूजित हुआ है, वह पवित्र परब्रह्म मुझे मेरी प्रार्थित वस्तु दे॥ ३९–४१॥

शिवस्य तु शिवायाश्च हृन्मूर्ती शिवभाविते।
तयोराज्ञां पुरस्कृत्य ते मे कामं प्रयच्छताम्॥ ४२॥

शिव और शिवाकी हृदयरूपी मूर्तियाँ शिवभावसे भावित हो उन्हीं दोनोंकी आज्ञा शिरोधार्य करके मेरा मनोरथ पूर्ण करें॥ ४२॥

शिवस्य च शिवायाश्च शिखामूर्ती शिवाश्रिते।
सत्कृत्य शिवयोराज्ञां ते मे कामं प्रयच्छताम्॥ ४३॥

शिव और शिवाकी शिखारूपा मूर्तियाँ शिवके ही आश्रित रहकर उन दोनोंकी आज्ञाका आदर करके मुझे मेरी अभीष्ट वस्तु प्रदान करें॥ ४३॥

* वायवीयसंहिता * ७९७

शिवस्य च शिवायाश्च वर्मणा शिवभाविते।
सत्कृत्य शिवयोराज्ञां ते मे कामं प्रयच्छताम्॥ ४४॥
शिव और शिवाकी कवचरूपा मूर्तियाँ शिवभावसे भावित हो शिव-पार्वतीकी आज्ञाका सत्कार करके मेरी कामना सफल करें॥ ४४॥

शिवस्य च शिवायाश्च नेत्रमूर्ती शिवाश्रिते।
सत्कृत्य शिवयोराज्ञां ते मे कामं प्रयच्छताम्॥ ४५॥
शिव और शिवाकी नेत्ररूपा मूर्तियाँ शिवके आश्रित रह उन्हीं दोनोंकी आज्ञा शिरोधार्य करके मुझे मेरा मनोरथ प्रदान करें॥ ४५॥

अस्त्रमूर्ती च शिवयोर्नित्यमर्चनतत्परे।
सत्कृत्य शिवयोराज्ञां ते मे कामं प्रयच्छताम्॥ ४६॥
शिव और शिवाकी अस्त्ररूपा मूर्तियाँ नित्य उन्हीं दोनोंके अर्चनमें तत्पर रह उनकी आज्ञाका सत्कार करती हुई मुझे मेरी अभीष्ट वस्तु प्रदान करें ॥ ४६॥

वामो ज्येष्ठस्तथा रुद्रः कालो विकरणस्तथा।
बलो विकरणश्चैव बलप्रमथनः परः॥ ४७॥
सर्वभूतस्य दमनस्तादृशाश्चाष्टशक्तयः।
प्रार्थितं मे प्रयच्छन्तु शिवयोरेव शासनात्॥ ४८॥
वाम, ज्येष्ठ, रुद्र, काल, विकरण, बलविकरण, बलप्रमथन तथा सर्वभूत-दमन—ये आठ शिवमूर्तियाँ तथा इनकी वैसी ही आठ शक्तियाँ—वामा, ज्येष्ठा, रुद्राणी, काली, विकरणी, बलविकरणी, बलप्रमथनी तथा सर्वभूतदमनी—ये सब शिव और शिवाके ही शासनसे मुझे प्रार्थित वस्तु प्रदान करें॥ ४७-४८॥

अथानन्तश्च सूक्ष्मश्च शिवश्चाप्येकनेत्रकः।
एकरुद्रस्त्रिमूर्तिश्च श्रीकण्ठश्च शिखण्डिकः॥ ४९॥
तथाष्टौ शक्तयस्तेषां द्वितीयावरणेऽर्चिताः।
ते मे कामं प्रयच्छन्तु शिवयोरेव शासनात्॥ ५०॥
अनन्त, सूक्ष्म, शिव (अथवा शिवोत्तम), एकनेत्र, एकरुद्र, त्रिमूर्ति, श्रीकण्ठ और शिखण्डी—ये आठ विद्येश्वर तथा इनकी वैसी ही आठ शक्तियाँ—अनन्ता, सूक्ष्मा, शिवा (अथवा शिवोत्तमा), एकनेत्रा, एकरुद्रा, त्रिमूर्ति, श्रीकण्ठी और शिखण्डिनी, जिनकी द्वितीय आवरणमें पूजा हुई है, शिवा और शिवके ही शासनसे मेरी मनःकामना पूर्ण करें॥ ४९-५०॥

भवाद्या मूर्तयश्चाष्टौ तासामपि च शक्तयः।
महादेवादयश्चान्ये तथैकादशमूर्तयः॥ ५१॥
शक्तिभिः सहिताः सर्वे तृतीयावरणे स्थिताः।
सत्कृत्य शिवयोराज्ञां दिशन्तु फलमीप्सितम्॥ ५२॥
भव आदि आठ मूर्तियाँ और उनकी शक्तियाँ तथा शक्तियोंसहित महादेव आदि ग्यारह मूर्तियाँ, जिनकी स्थिति तीसरे आवरणमें है, शिव और पार्वतीकी आज्ञा शिरोधार्य करके मुझे अभीष्ट फल प्रदान करें॥ ५१-५२॥

वृषराजो महातेजा महामेघसमस्वनः।
मेरुमन्दरकैलासहिमाद्रिशिखरोपमः ॥ ५३॥
सिताभ्रशिखराकारककुदा परिशोभितः।
महाभोगीन्द्रकल्पेन वालेन च विराजितः॥ ५४॥
रक्तास्यशृङ्गचरणो रक्तप्रायविलोचनः।
पीवरोन्नतसर्वाङ्गः सुचारुगमनोज्ज्वलः॥ ५५॥
प्रशस्तलक्षणः श्रीमान् प्रज्वलन्मणिभूषणः।
शिवप्रियः शिवासक्तः शिवयोर्ध्वजवाहनः॥ ५६॥
तथा तच्चरणन्यासपावितापरविग्रहः।
गोराजपुरुषः श्रीमाञ् श्रीमच्छूलवरायुधः।
तयोराज्ञां पुरस्कृत्य स मे कामं प्रयच्छतु॥ ५७॥
जो वृषभोंके राजा महातेजस्वी, महान् मेघके समान शब्द करनेवाले, मेरु, मन्दराचल, कैलास और हिमालयके

७९८ * संक्षिप्त शिवपुराण *

शिखरकी भाँति ऊँचे एवं उज्ज्वलवर्णवाले हैं, श्वेत बादलोंके शिखरकी भाँति ऊँचे ककुदसे शोभित हैं, महानागराज (शेष) के शरीरकी भाँति पूँछ जिनकी शोभा बढ़ाती है, जिनके मुख, सींग और पैर भी लाल हैं, नेत्र भी प्रायः लाल ही हैं, जिनके सारे अंग मोटे और उन्नत हैं, जो अपनी मनोहर चालसे बड़ी शोभा पाते हैं, जिनमें उत्तम लक्षण विद्यमान हैं, जो चमचमाते हुए मणिमय आभूषणोंसे विभूषित हो अत्यन्त दीप्तिमान् दिखायी देते हैं, जो भगवान् शिवको प्रिय हैं और शिवमें ही अनुरक्त रहते हैं, शिव और शिवा दोनोंके ही जो ध्वज और वाहन हैं तथा उनके चरणोंके स्पर्शसे जिनका पृष्ठभाग परम पवित्र हो गया है, जो गौओंके राजपुरुष हैं, वे श्रेष्ठ और चमकीला त्रिशूल धारण करनेवाले नन्दिकेश्वर वृषभ शिव और शिवाकी आज्ञा शिरोधार्य करके मुझे अभीष्ट वस्तु प्रदान करें॥ ५३—५७॥

नन्दीश्वरो महातेजा नगेन्द्रतनयात्मजः।
सनारायणकैर्देवैर्नित्यमभ्यर्च्य वन्दितः॥ ५८॥
शर्वस्यान्तःपुरद्वारि सार्धं परिजनैः स्थितः।
सर्वेश्वरसमप्रख्यः सर्वासुरविमर्दनः॥ ५९॥
सर्वेषां शिवधर्माणामध्यक्षत्वेऽभिषेचितः।
शिवप्रियः शिवासक्तः श्रीमच्छूलवरायुधः॥ ६०॥
शिवाश्रितेषु संसक्तस्त्वनुरक्तश्च तैरपि।
सत्कृत्य शिवयोराज्ञां स मे कामं प्रयच्छतु॥ ६१॥

जो गिरिराजनन्दिनी पार्वतीके लिये पुत्रके तुल्य प्रिय हैं, श्रीविष्णु आदि देवताओंद्वारा नित्य पूजित एवं वन्दित हैं, भगवान् शंकरके अन्तःपुरके द्वारपर परिजनोंके साथ खड़े रहते हैं, सर्वेश्वर शिवके समान ही तेजस्वी हैं तथा समस्त असुरोंको कुचल देनेकी शक्ति रखते हैं, शिवधर्मका पालन करनेवाले सम्पूर्ण शिवभक्तोंके अध्यक्षपदपर जिनका अभिषेक हुआ है, जो भगवान् शिवके प्रिय, शिवमें ही अनुरक्त तथा तेजस्वी त्रिशूल नामक श्रेष्ठ आयुध धारण करनेवाले हैं, भगवान् शिवके शरणागत भक्तोंपर जिनका स्नेह है तथा शिवभक्तोंका भी जिनमें अनुराग है, वे महातेजस्वी नन्दीश्वर शिव और पार्वतीकी आज्ञाको शिरोधार्य करके मुझे मनोवांछित वस्तु प्रदान करें॥ ५८—६१॥

महाकालो महाबाहुर्महादेव इवापरः।
महादेवाश्रितानां तु नित्यमेवाभिरक्षतु॥ ६२॥

दूसरे महादेवके समान महातेजस्वी महाबाहु महाकाल महादेवजीके शरणागत भक्तोंकी नित्य ही रक्षा करें॥ ६२॥

शिवप्रियः शिवासक्तः शिवयोरर्चकः सदा।
सत्कृत्य शिवयोराज्ञां स मे दिशतु काङ्क्षितम्॥ ६३॥

वे भगवान् शिवके प्रिय हैं, भगवान् शिवमें उनकी आसक्ति है तथा वे सदा ही शिव तथा पार्वतीके पूजक हैं, इसलिये शिवा और शिवकी आज्ञाका आदर करके मुझे मनोवांछित वस्तु प्रदान करें॥ ६३॥

सर्वशास्त्रार्थतत्त्वज्ञः शास्ता विष्णोः परा तनुः।
महामोहात्मतनयो मधुमांसासवप्रियः।
तयोराज्ञां पुरस्कृत्य स मे कामं प्रयच्छतु॥ ६४॥

जो सम्पूर्ण शास्त्रोंके तात्त्विक अर्थके ज्ञाता, भगवान् विष्णुके द्वितीय स्वरूप, सबके शासक तथा महामोहात्मा कद्रूके पुत्र हैं, मधु, फलका गूदा और आसव जिन्हें प्रिय हैं, वे नागराज भगवान् शेष शिव और पार्वतीकी आज्ञाको सामने रखते हुए मेरी इच्छाको पूर्ण करें॥ ६४॥

ब्रह्माणी चैव माहेशी कौमारी वैष्णवी तथा।
वाराही चैव माहेन्द्री चामुण्डा चण्डविक्रमा॥ ६५॥

  • वायवीयसंहिता * ७९९

एता वै मातरः सप्त सर्वलोकस्य मातरः। प्रार्थितं मे प्रयच्छन्तु परमेश्वरशासनात् ॥ ६६ ॥

ब्रह्माणी, माहेश्वरी, कौमारी, वैष्णवी, वाराही, माहेन्द्री तथा प्रचण्ड पराक्रमशालिनी चामुण्डादेवी—ये सर्वलोकजननी सात माताएँ परमेश्वर शिवके आदेशसे मुझे मेरी प्रार्थित वस्तु प्रदान करें ॥ ६५-६६ ॥

मत्तमातङ्गवदनो गङ्गोमाशङ्करात्मजः। आकाशदेहो दिग्बाहुः सोमसूर्याग्निलोचनः ॥ ६७ ॥ ऐरावतादिभिर्दिव्यैर्दिग्गजैर्नित्यमर्चितः। शिवज्ञानमदोद्भिन्नस्त्रिदशानामविघ्नकृत् ॥ ६८ ॥ विघ्नकृच्चासुरादीनां विघ्नेशः शिवभावितः। सत्कृत्य शिवयोराज्ञां स मे दिशतु काङ्क्षितम् ॥ ६९ ॥

जिनका मतवाले हाथीका-सा मुख है; जो गंगा, उमा और शिवके पुत्र हैं; आकाश जिनका शरीर है, दिशाएँ भुजाएँ हैं तथा चन्द्रमा, सूर्य और अग्नि जिनके तीन नेत्र हैं; ऐरावत आदि दिव्य दिग्गज जिनकी नित्य पूजा करते हैं, जिनके मस्तकसे शिवज्ञानमय मदकी धारा बहती रहती है, जो देवताओंके विघ्नका निवारण करते और असुर आदिके कार्योंमें विघ्न डालते रहते हैं, वे विघ्नराज गणेश शिवसे भावित हो शिवा और शिवकी आज्ञा शिरोधार्य करके मेरा मनोरथ प्रदान करें ॥ ६७–६९ ॥

षण्मुखः शिवसम्भूतः शक्तिवज्रधरः प्रभुः। अग्नेश्च तनयो देवो ह्यपर्णात Francis नयः पुनः ॥ ७० ॥ गङ्गायाश्च गणाम्बायाः कृत्तिकानां तथैव च। विशाखेन च शाखेन नैगमेयेन चावृतः ॥ ७१ ॥ इन्द्रजिच्चेन्द्रसेनानीस्तारकासुरजित्तथा। शैलानां मेरुमुख्यानां वेधकश्च स्वतेजसा ॥ ७२ ॥ तप्तचामीकरप्रख्यः शतपत्रदलेक्षणः। कुमारः सुकुमाराणां रूपोदाहरणं महत् ॥ ७३ ॥ शिवप्रियः शिवासक्तः शिवपादार्चकः सदा। सत्कृत्य शिवयोराज्ञां स मे दिशतु काङ्क्षितम् ॥ ७४ ॥

जिनके छः मुख हैं, भगवान् शिवसे जिनकी उत्पत्ति हुई है, जो शक्ति और वज्र धारण करनेवाले प्रभु हैं, अग्निके पुत्र तथा अपर्णा (शिवा)-के बालक हैं; गंगा, गणाम्बा तथा कृत्तिकाओंके भी पुत्र हैं; विशाख, शाख और नैगमेय—इन तीनों भाइयोंसे जो सदा घिरे रहते हैं; जो इन्द्र-विजयी, इन्द्रके सेनापति तथा तारकासुरको परास्त करनेवाले हैं; जिन्होंने अपनी शक्तिसे मेरु आदि पर्वतोंको छेद डाला है, जिनकी अंगकान्ति तपाये हुए सुवर्णके समान है, नेत्र प्रफुल्ल कमलके समान सुन्दर हैं, कुमार नामसे जिनकी प्रसिद्धि है, जो सुकुमारोंके रूपके सबसे बड़े उदाहरण हैं; शिवके प्रिय, शिवमें अनुरक्त तथा शिव-चरणोंकी नित्य अर्चना करनेवाले हैं; स्कन्द, शिव और शिवाकी आज्ञा शिरोधार्य करके मुझे मनोवांछित वस्तु दें ॥ ७०-७४ ॥

ज्येष्ठा वरिष्ठा वरदा शिवयोर्यजने रता। तयोराज्ञां पुरस्कृत्य सा मे दिशतु काङ्क्षितम् ॥ ७५ ॥

सर्वश्रेष्ठ और वरदायिनी ज्येष्ठादेवी, जो सदा भगवान् शिव और पार्वतीके पूजनमें लगी रहती हैं, उन दोनोंकी आज्ञा मानकर मुझे मनोवांछित वस्तु प्रदान करें ॥ ७५ ॥

त्रैलोक्यवन्दिता साक्षादुल्काकारा गणाम्बिका। जगत्सृष्टिविवृद्ध्यर्थं ब्रह्मणाभ्यर्थिता शिवात् ॥ ७६ ॥ शिवायाः प्रविभक्ताया भुवोरन्तरनिस्सृता। दाक्षायणी सती मेना तथा हैमवती ह्युमा ॥ ७७ ॥ कौशिक्याश्चैव जननी भद्रकाल्यास्तथैव च। अपर्णायाश्च जननी पाटलायास्तथैव च ॥ ७८ ॥ शिवार्चनरता नित्यं रुद्राणी रुद्रवल्लभा। सत्कृत्य शिवयोराज्ञां सा मे दिशतु काङ्क्षितम् ॥ ७९ ॥