श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)
Shri Bhaktamal of Nabhadas with Priyadas Commentary
गोस्वामी नाभादास जी / प्रियादास जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें(श्री भक्तमाल नामावली २) माधोदास गुसाँई तुलसी, कृष्णदास परमानन्द। विष्णुपुरी श्रीधर मधुसूदन, पीपा गुरु रामानन्द॥ अलि भगवान मुरारि रसिक, श्यामानन्द रंका बंका। रामदास चीधर निष्किंचन, सम्हन भक्त निशंका॥ लाखा अंगद भक्त महाजन, गोविन्द नन्द प्रबोधा। दास मुरारि प्रेमनिधि विट्ठल, दास मथुरिया योधा॥ लालमती सीता प्रभुता झाली, गोपाली बाई। सुत विष दियौ पूजि सिलपिल्ले, भक्ति रसीली पाई॥ पृथीराज खेमाल चतुर्भुज, राम रसिक रस रासा। आशकरन जयमल मधुकर नृप हरीदास जन दासा॥ सेना धना कबीरा नामा, कूबा सदन कसाई। वारमुखी रैदास सभा में, सही न श्याम हँसाई॥ चित्रकेतु प्रह्लाद विभीषण, बलि ग्रह बाजैं बावन। जामवन्त हनुमन्त गीध गुह, किये राम जे पावन॥ प्रीति प्रतीति प्रसाद साधु सौं, इन्हें इष्ट गुरु जानौं। तजि ऐश्वर्य मरजाद वेद की, इनके हाथ बिकानौं॥ भूत भविष्य लोक चौदह में, भये होहिं हरि प्यारे। तिन तिन सौं व्यवहार हमारो, अभिमानिन ते न्यारे॥ ‘भगवतरसिक’ रसिक परिकर कर, सादर भोजन पावैं। ऊँचो कुल आचार अनादर, देखि ध्यान नहिं लावैं। प्रसाद-महिमा यह दिव्य प्रसाद प्रिया-प्रिय को। दरसत ही मन मोद बढ़ावत परसत पाप हरत हिय को॥ पावत परम प्रेम उपजावत भुलवत भाव पुरुष तिय को। ‘भगवतरसिक’ भावतो भूषण तिहि क्षण होत युगल जिय को॥