श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)
Shri Bhaktamal of Nabhadas with Priyadas Commentary
गोस्वामी नाभादास जी / प्रियादास जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३) (श्री भक्तमाल अथ श्रीवैष्णवदासजी कृत श्रीभक्तमाल-माहात्म्य -दोहा- श्रीनारायनदास जी कृत भक्तन्ह की माल। पुनि ताकी टीका करी प्रियादास सु रसाल॥ ताकौ साधुन के कहे कहौं महातम बानि। लै ग्रन्थनि मत आधुनिक परिचै रस की खानि॥ भक्तन की महिमा कही कपिलदेव भगवान। नारायण आधीन हैं मैं कह कहौं बखान॥ सब संसार सुआरसी जन महिमा प्रतिबिम्ब। रति दृग बिन सूझै नहीं अन्धे को वह बिम्ब॥ वेद शास्त्र के श्रवण को अति फल हरि निरधार। सो याके श्रोता अहैं महिमा अगम अपार॥ भयौ चहै हरि पाँति को सुनै सोइ हरषाय। तहाँ दोय इतिहास हैं सुनिये चित्त लगाय॥ -चौपाई- प्रियादास जू के सुमित्र वर। श्रीगोवर्धननाथ नाम कर॥ ते श्रीभक्तमाल रंग छाये। पढ़ि साँभरि की रमति आये॥ मग में श्रीगोविन्ददेव जो। तिनके दर्शन को गमने सो॥ तहँ श्रीराधारमन पुजारी। हरिप्रिय रसिक अनन्य सु भारी॥ तिन तिनकौं राखो अटकाई। भक्तमाल सुनिवे के ताईं॥ होन लगी तहँ भक्त सुमाला। जहाँ विराजत गोविन्द लाला॥ जयपुर वासी सुनिवे आवैं। प्रेम मुदित ह्वै अश्रु बहावैं॥ कछु दिन बाँचि बन्द करि दीनी। श्रोतन ते निश्चय यह कीनी॥ साँभरि की रमति करि आऊँ। तब ही पूरी कथा सुनाऊँ॥ रमति गये बगदि फिरि आये। कथा कहन को फिरि बैठाये॥