भारतकोश
श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)

श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)

Shri Bhaktamal of Nabhadas with Priyadas Commentary

गोस्वामी नाभादास जी / प्रियादास जी द्वारा

DevanagariHindipublished195 पृष्ठ

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(श्री भक्तमाल-माहात्म्य ४) कहँ तक भई सँभार सु नाहीं। श्रोता अरु वक्ता भ्रम माहीं॥ श्रीगोविन्ददेव विख्याता। कही पुजारी सौं यह बाता॥ श्रीरैदास भक्त की गाथा। भई कहो आगे अब नाथा॥ -दोहा- सुनि सु पुजारी के दृगन पानी बह्यौ अपार। याके श्रोता आप हैं यह कीनी निरधार॥ -चौपाई- पुनि दूजौ इतिहास सुनौ अब। प्रियादास टीका कीनी जब॥ तब ब्रज परिकरमा महँ आये। फिरत फिरत होड़ल जा छाये॥ लालदास तहँ रहे महन्ता। जनसेवी अनन्य रसवन्ता॥ सब समाज तिन रोकि सु लीनो। बाँचो भक्तमाल हठ कीनो॥ भक्तमाल तहँ होन सु लागी। सुनन लगे सब लोग सुभागी॥ इक दिन निसि तहँ आये चोरा। सबै वस्तु लीनी टकटोरा॥ ठाकुर हू को ते लै गये। हरि ही के ये कौतुक नये॥ प्रात भये सबही दुख छाये। प्रियादास हू अति अकुलाये॥ कही कथा न रसोई कीनी। महादुक्ख में मति अति भीनी॥ ठाकुर को ये चरित न प्यारे। ताते चोरन संग पधारे॥ श्रीमहन्त बोले कर जोरी। हम कहँ तजि ठाकुर गे चोरी॥ तुमहू त्याग करोगे जोपै। मेरी कुगति होयगी तोपै॥ ताते हरि इच्छा मन दीजै। कहिये कथा रसोई कीजै॥ प्रियादास बोले यों सुनहू। अब मैं कथा न कहिहौं कबहू॥ श्रीनाभा यों वचन उचारे। हरि को जन चरित्र ये प्यारे॥ सो. झूठी अब भई यहाँ ई। कथा त्याग हरि गये पराई॥ -दोहा- यों कहिकै भूखे रहे काहुहिं परी न चैन। सुपने चोरन ते कहें ठाकुर जू यों बैन॥ -चौपाई- मोहि जहाँ को तहँ करि आवौ। ना तर तुम बहुतै दुख पावौ॥ इक दुख भक्त रहे दुख माही। भक्तमाल पुनि सुनी सु नाहीं॥