श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)
Shri Bhaktamal of Nabhadas with Priyadas Commentary
गोस्वामी नाभादास जी / प्रियादास जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें(५ (श्री भक्तमाल दुहरे दुख परे हैं हम पर। चौहर दुख डारूँगो तुम पर॥ सुनिकै चोर उठे अधराता। ठाकुर को लै हरषित गाता॥ गावत बजवत नाचत आये। संग सकल सामग्री लाये॥ प्रातःकाल होन नहिं पायो। समाचार द्विज एक सुनायो॥ चोर तिहारे ठाकुर ल्यावत। नाचत गावत बजवत आवत॥ सुनि सब साधु निपट हरषाये। करत कीरतन सनमुख धाये॥ सुधि-बुधि गई प्रेम में छाये। जाय परस्पर लपटत भाये॥ चोरहु कुछ कहि सकै न बतियाँ। दृग भरि आवत फाटत छतियाँ॥ आँसू पोंछत गद्गद बानी। सपने की सब कथा बखानी॥ सुनि सबने अति ही सुख पायौ। प्रेम मग्न मन दुख नसायौ॥ मन्दिर में प्रभु को पधरायौ। बहु मंगल उच्छव करवायौ॥ भक्तमाल की कथा सुहाई। नाम कीरतन सहित कहाई॥ याके श्रोता श्रीहरि अहहीं। पुनि-पुनि साधु प्रेमवश कहहीं॥ -दोहा- हाथ कंकनहिं आरसी कहा दिखाये माहि। हरि श्रोता बिन सबन के यों मन अटकत नाहिं॥ -चौपाई- श्रोता वक्ता को फल जोई। कापै कहि आवत है सोई॥ जो लिखाय राखै उर मोहिं। अन्त समै हरि प्राप्ति कराहीं॥ तहाँ एक सुनिये इतिहासा। क्वौ जन प्रियदासा के पासा॥ आय कही मोहि देहु लिखाई। भक्तमाल सुन्दर सुखदाई॥ प्रियादास पूछी सुखरासा। कहन सुनन कछु है अभ्यासा॥ तिन कह मैं कछु कहि नहिंजानौ। सुनिवे हू की गति न पिछानौं॥ आपु कही तब करिहौं काहा। बात सुनाय दिखाई चाहा॥ महाराज मैं जग व्यौहारी। गृह कामन में अटक्यौ भारी॥ साधु संग को अवसर नाहीं। ताते मैं सोची मन माही॥ मरती बार हिये पर धरिहौं। इतने साधु संग उबरिहौं॥ सुनि यह बात नेत्र भरि आये। बहुत बड़ाई करि सुख छाये॥ ताको पोथी दई लिखाई। सो लै घर गवन्यौ सुख पाई॥