भारतकोश
श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)

श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)

Shri Bhaktamal of Nabhadas with Priyadas Commentary

गोस्वामी नाभादास जी / प्रियादास जी द्वारा

DevanagariHindipublished195 पृष्ठ

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(श्री भक्तमाल महात्मय ६) घर कारज में अटक्यौ भारी। आई ताहि मीच भयकारी॥ यम के दूतन आय दबायौ। दई त्रास अरु कण्ठ रुकायो॥ बेटा पोते ढिंग बिललाता। नैन सैन दै कही सुबाता॥ भक्तमाल की पोथी लाई। मम छाती ते देहु लगाई॥ ते उठाये पोथी लै आये। धरि छाती पर अचरज छाये॥ धरतहिं यम के दूत भजे यों। सूरन के आगे कायर ज्यों॥ कण्ठ खुल्यौ नैननि जल ढार्यौ। हरे कृष्ण गोविन्द उचार्यौ॥ बहु भक्तन के दर्शन पायौ। हिये माँझ आनन्द समायौ॥ सुत हरषित सब पूछत बाता। कहा भयौ सो कहिये ताता॥ तिन कह यमदूतन दुख दीनौ। भक्तनि अब उबार मैं लीनो॥ नामदेव रैदास कबीरा। सेन धना पीपा अति धीरा॥ ठाढ़े सकल कहत है बाता। हमरे संग चलो अब ताता॥ सो मैं अब इनके संग जैहौं। यमदूतन के मुख न चितैहौं॥ यह कहि राम-कृष्ण उच्चारत। नैन मूँदि हरि को उर धारत॥ प्रान त्यागि हरि धाम सिधायौ। बेटन के उर अति सुख छायौ॥ तबते तिनने नेम करे हैं। अन्त समय उर ग्रन्थ धरे हैं॥ तिनको कुटुम वनहिं को आयौ। तिननि सबै यह चरित सुनायौ॥ सो हम लिखन कियो है सही। सब दिन भक्तनि महिमा रही॥ शेष महेश जासु गुन गावैं। तेऊ चरण रेणु मन लावैं॥ आपु ते अधिक दास को गावै। जन की महिमा कहि नहिं आवै॥ प्रियादास अति ही सुखकारी। भक्तमाल टीका विस्तारी॥ तिनकौ पौत्र परम रँग भीनौ। वैष्णवदास महात्म् कीनौ॥ -दोहा- श्री भक्तमाल की गंध को लेत भक्त अलि आय। भेक विमुख ढिंगहीं बसैं रहे कीच लपटाय॥ ।। इति भक्तमाल-माहात्मय सम्पूर्णम् ।। मिति माह वदी ६ संवत् १८८६ वृन्दावन