भारतकोश
श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)

श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)

Shri Bhaktamal of Nabhadas with Priyadas Commentary

गोस्वामी नाभादास जी / प्रियादास जी द्वारा

DevanagariHindipublished195 पृष्ठ

पृष्ठ 17, कुल 195 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 17

(श्री भक्तमाल वन्दना (८ श्रीभक्तमाल-वन्दना नमो नमो श्रीभक्त सुमाल। जाके सुनत महातम नाशत, उर झलकत राधा नँदलाल।। गद्गद स्वर पुलकत अंग अंगनि, लोचन बरषत अँसुवन जाल। उतरि जात अभिमान व्याल विष, लेत जिवाय सुरस तिहिं काल।। होत प्रीति हरि भक्तजनन सौं, लेत शीघ्र हठि चरण प्रछाल। तजत कुसंग लेत सत् संगति, भाग जगत कोउ अद्भुत भाल।। निसि वासर सोवत अरु जागत, रोम-रोम ह्वै करत निहाल। श्रीअग्र-नारायणदास प्रिया प्रिय, प्रगटी जीवन रसिक रसाल।। सन्त-वन्दना वांछाकल्पतरुभ्यश्च, कृपासिन्धुभ्य एव च। पतितानां पावनेभ्यो, वैष्णवेभ्यो नमो नमः ।। प्रह्लादनारदपराशरपुण्डरीक, व्यासाम्बरीषशुकशौनकभीष्मदाल्भ्यान्। रुक्मांगदार्जुनवशिष्ठविभीषणादीन्, एतानहं परमभागवत्तान्नमामि।। सन्त सरल चित जगत हित, जानि सुभाउ सनेहु। बाल विनय सुनि करि कृपा, राम चरण रति देहु।। वन्दौं सन्त समाज चित, हित अनहित नहिं कोय। अंजलिगत शुभ सुमन जिमि, सम सुगन्ध कर दोय।। बार बार पद वन्दौं, (श्री) नाभा आभा ऐन। (जिन) काढ्यौ गाथा वेद को, भक्तमाल रस दैन।। प्रियादास के पद कमल वन्दौं बारम्बार। कीनि भक्तिरसबोधिनी टीका अति सुखसार।। सन्त है अनन्त गुन अन्त कौन पावै जाकौ, जानै रतिवन्त कोऊ रीझै पहिचानिकै। औगुन न दीठि परै देखत ही नैन भरै, ढरै पग ओर उर प्रेम भर आनिकै।। जोपै घटि क्रिया कछु देखियत इन माँझ, करिलै विचार हरि ही की इच्छा मानिकै। बालक सिंगारिकै निहारि नेहवती माता, देत जो दिठौना कारौ दीठि डर जानिकै।। -(श्रीप्रियादास कृत अनन्यमोदिनी से)