श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)
Shri Bhaktamal of Nabhadas with Priyadas Commentary
गोस्वामी नाभादास जी / प्रियादास जी द्वारा
(श्री भक्तमाल वन्दना (८ श्रीभक्तमाल-वन्दना नमो नमो श्रीभक्त सुमाल। जाके सुनत महातम नाशत, उर झलकत राधा नँदलाल।। गद्गद स्वर पुलकत अंग अंगनि, लोचन बरषत अँसुवन जाल। उतरि जात अभिमान व्याल विष, लेत जिवाय सुरस तिहिं काल।। होत प्रीति हरि भक्तजनन सौं, लेत शीघ्र हठि चरण प्रछाल। तजत कुसंग लेत सत् संगति, भाग जगत कोउ अद्भुत भाल।। निसि वासर सोवत अरु जागत, रोम-रोम ह्वै करत निहाल। श्रीअग्र-नारायणदास प्रिया प्रिय, प्रगटी जीवन रसिक रसाल।। सन्त-वन्दना वांछाकल्पतरुभ्यश्च, कृपासिन्धुभ्य एव च। पतितानां पावनेभ्यो, वैष्णवेभ्यो नमो नमः ।। प्रह्लादनारदपराशरपुण्डरीक, व्यासाम्बरीषशुकशौनकभीष्मदाल्भ्यान्। रुक्मांगदार्जुनवशिष्ठविभीषणादीन्, एतानहं परमभागवत्तान्नमामि।। सन्त सरल चित जगत हित, जानि सुभाउ सनेहु। बाल विनय सुनि करि कृपा, राम चरण रति देहु।। वन्दौं सन्त समाज चित, हित अनहित नहिं कोय। अंजलिगत शुभ सुमन जिमि, सम सुगन्ध कर दोय।। बार बार पद वन्दौं, (श्री) नाभा आभा ऐन। (जिन) काढ्यौ गाथा वेद को, भक्तमाल रस दैन।। प्रियादास के पद कमल वन्दौं बारम्बार। कीनि भक्तिरसबोधिनी टीका अति सुखसार।। सन्त है अनन्त गुन अन्त कौन पावै जाकौ, जानै रतिवन्त कोऊ रीझै पहिचानिकै। औगुन न दीठि परै देखत ही नैन भरै, ढरै पग ओर उर प्रेम भर आनिकै।। जोपै घटि क्रिया कछु देखियत इन माँझ, करिलै विचार हरि ही की इच्छा मानिकै। बालक सिंगारिकै निहारि नेहवती माता, देत जो दिठौना कारौ दीठि डर जानिकै।। -(श्रीप्रियादास कृत अनन्यमोदिनी से)
8-1 प्रह्लाद विभीषण नारद वशिष्ठ पराशर अर्जुन पुण्डरीक रुक्माङ्गद व्यास दाल्भ्य अम्बरीष भीष्म शुकदेव शौनक पुण्यानिमान् परमभागवतान् स्मरामि
8-2 श्रीनाभाजी एवं सद्गुरुदेव श्रीअग्रदेवाचार्य जी महाराज
६) (श्री भक्तमाल ॥ श्रीहरिः॥ ॥ श्रीमद्भगवद्भक्तेभ्यो नमः॥ श्रीभक्तमाल ॥ श्रीप्रियादासजी कृत आज्ञानिरूपण मंगलाचरण॥ ॥ भक्तिरसबोधिनी टीका॥ मनहरण कवित्त महाप्रभु श्रीकृष्ण-चैतन्य मनहरन जू के चरन कौ ध्यान मेरे नाम मुख गाइयै। ताही समय नाभा जू ने आज्ञा दई, लई धारि, टीका विस्तारि भक्तमाल की सुनाइयै ।। कीजिये कवित्त वन्द छन्द अति प्यारो लगै, जगै जग माँहि कहि वाणी बिरमाइयै। जानौं निज मति, ऐपै सुन्यौं भागवत शुक द्रुमनि प्रवेश कियौ, ऐसेई कहाइयै ॥१॥ टीका का नाम स्वरूप वर्णन रची कविताई सुखदाई लागै निपट सुहाई औ सचाई पुनरुक्ति लै मिटाई है। अक्षर मधुरताई अनुप्रास जमकाई, अति छबि छाई मोद झरी-सी लगाई है।। काव्य की बड़ाई निज मुख न भलाई होति नाभा जू कहाई याते प्रौढ़िकै सुनाई है। हृदै सरसाई जोपै सुनिये सदाई, यह 'भक्तिरसबोधिनी' सुनाम टीका गाई है॥२॥ श्रीभक्ति स्वरूप वर्णन श्रद्धा ई फुलेल औ उबटनौ श्रवन कथा मैल अभिमान अंग-अंगनि छुड़ाइये। मनन सुनीर अन्हवाइ 'अँगु छाइ' दया नवनि वसन पन सौंधो लै लगाइये ।। आभरन नाम हरि साधुसेवा कर्णफूल मानसी सुनथ संग अंजन बनाइये। भक्ति महारानी कौ सिंगार चारु बीरी चाह रहै जो निहारि लहै लाल प्यारी गाइये ।।३।। श्रीभक्ति पंचरस वर्णन शान्त दास्य सख्य वात्सल्य औ श्रृंगार चारु, पाँचौ रस सार विस्तार नीके गाये हैं। टीका को चमत्कार जानौगे विचारि मन, इनके स्वरूप मैं अनूप लै दिखाये हैं।। जिनके न अश्रुपात पुलकित गात कभूँ, तिनहूँ को भावसिन्धु बोरिकै छकाये हैं। जोलौं रहैं दूर रहैं विमुखता पूर हियो, होय चूर-चूर नेकु श्रवण लगाये हैं ॥४॥
(श्री भक्तमाल स्वरूप वर्णन १०) भगवद् प्रियता पंचरस सोई पंचरंग फूल थाके नीके, पीके पहिराइवे को रुचिकै बनाई है। वैजयन्ती दाम, भाववती अलि 'नाभा' नाम, लाई अभिराम स्याम मति ललचाई है।। धारी उर प्यारी किहूँ करत न न्यारी, अहो ! देखौ गति न्यारी ढरि पायन कौं आई है। भक्ति छबि भार ताते नमित श्रृंगार होत, होत वश लखै जोई याते जानि पाई है।।५।। सत्संग प्रभाव वर्णन भक्तितरु पौधा ताहि विघ्न डर छेरी हू, कौ, वारि दै विचार वारि सींच्यो सत्संग सौं। लाग्योई बढ़न गोदा चहुँदिसि कढ़न सो, चढ़न आकाश यश फैल्यो बहुरंग सौं।। सन्त उर आलवाल सोभित विसाल छाया, जियें जीव जाल ताप गये यों प्रसंग सौं। देखौ बढ़वारि जाहि अजाहू की शंका हुती ताहि पेड़ बाँधे झूमैं हाथी जीते जंग सौ ।। ६ ।। श्रीनाभाजी का वर्णन जाको जो स्वरूप सो अनूप लै दिखाय दियो, कियो यों कवित्त पट मिहीं मध्य लाल है। गुण पै अपार साधु कहैं आँक चारि ही में अर्थ विस्तार कविराज टकसाल है।। सुनि सन्त सभा झूमि रही अलि श्रेणी मानो घूमि रही कहैं यह कहा धौं रसाल है। सुने हे "अगर" अब जाने मैं अगर सही चोवा भये नाभा सो सुगन्ध भक्तमाल है।।७।। श्रीभक्तमाल स्वरूप वर्णन बड़े भक्तिमान निसिदिन गुनगान करें, हरैं जग पाप जाप हियो परिपूर है। जानि सुखमानि हरि सन्त सनमान सचे, बचेऊ जगत रीति प्रीति जानी मूर है।। तऊ दुराराध्य कोऊ कैसे कै अराधि सकै समझो न जात, मन कम्प भयो चूर है। शोभित तिलक भाल, माल उर राजै ऐपै, बिना भक्तमाल भक्तिरूप अति दूर है।। ८।।
—=मूल-मंगलाचरण=— —दोहा— भक्त भक्ति भगवन्त गुरु चतुर नाम वपु एक। इनके पद वन्दन किये नाशहिं विघ्न अनेक।।१।। हरि गुरु दासनि सौं साँचो सोई भक्त सही, गही एक टेक फेरि उर ते न टरी है। भक्तिरसरूप कौ स्वरूप यहै छवि सार चारु हरिनाम लेत अँसुवन झरी है।। वही भगवन्त सन्त प्रीति को विचार करै, धरै दूरि ईशता हू पाण्डुन सौं करी है। गुरु गुरुताई की सचाई लै दिखाई जहाँ गई श्री पैहारी जू की रीति रँग भरी है।।६।। मंगल आदि विचारि रह, वस्तु न और अनूप। हरिजन को यश गावते, हरिजन मंगल रूप।।२।। सन्तन् निर्णय कियो मथि, श्रुति पुराण इतिहास। भजिवे को दोई सुघर, कै हरि कै हरिदास।।३।। श्रीगुरु अग्रदेव आज्ञा दई, हरि भक्तन को यश गाव। भवसागर के तरन कौ, नाहिन और उपाव।।४।। आज्ञा-निरुपण मानसी स्वरूप में लगे हैं अग्रदास जबै, करत ब्यार नाभा मधुर सँभार सौं। चढ़्यो हो जहाज पै जु शिष्य एक, आपदा में कर्यो ध्यान, खिंच्यो मन, छुट्यो रूपसार सौं।। कहत समर्थ 'गयो वोहित बहुत दूरि, आओ छबि पूरि, फिर ढरौ ताही ढार सौं।' लोचन उघारिकै निहारि, कह्यो 'बोल्यो कौन?' वही जौन पाल्यो सीथ दै-दै सकुँवार सौं।। अचरज दयो नयो यहाँ लौं प्रवेश भयो, मन सुख छयो जान्यो सन्तन प्रभाव को। आज्ञा तब दई यह भई तोपै साधु कृपा, उन्हीं को रूप गुन कहो हिये भाव को।। बोल्यो कर जोरि याको पावत न ओर छोर, गाऊँ राम कृष्ण नहीं पाऊँ भक्तदाव को। कही समझाय वोइ हृदय आइ कहैं सब, जिन लै दिखाय दई सागर में नाव को।।११।।
१२) (श्री भक्तमाल ━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━ श्रीनाभाजी की आदि अवस्था का वर्णन हनुमान वंश ही में जनम प्रसिद्ध जाकों भयो, दृगहीन सो नवीन बात धारिये। उमरि बरष पाँच मानिकै अकाल आँच, माता वन छोड़ि गई विपत्ति विचारिये।। 'कील्ह' औ 'अगर' ताहि डगर दरस दियौ, लियो यों अनाथ जानि पूछी सो उचारिये। बड़े सिद्ध जल लै कमण्डलु सौं सींचे नैन, चैन भयो खुले चख जोरी को निहारिये।। १२ ।। पाँय परि आँसू आये कृपा करि संग लाये, कील्ह आज्ञा पाइ मन्त्र अगर सुनायो है। गलते प्रकट साधुसेवा सो विराजमान, जानि उनमानि ताही टहल लगायो है।। चरन प्रछाल सन्त-सीथ सौं अनन्त प्रीति, जानी रसरीति ताते हृदय रँग छायो है। भई बढ़वारि ताकौ पावै कौन पारावार, जैसो भक्तिरूप सो अनूप गिरा गायो है।। १३ ।। ।। छप्पय ।। चौबीस अवतार चौबीस रूप लीला रुचिर श्रीअग्रदास उर पद धरौ।। जय जय मीन बराह कमठ नरहरि बलि बावन। परशुराम रघुवीर कृष्ण कीरति जगपावन।। बुद्ध कल्कि अरु व्यास पृथु हरि हंस मन्वन्तर। यज्ञ रिषभ हयग्रीव ध्रुववरदैन धनवन्तर।। बद्रीपति दत्त कपिलदेव सनकादिक करुणा करौ। चौबीस रूप लीला रुचिर श्रीअग्रदास उर पद धरौ ।। ५ ।। जिते अवतार सुखसागर न पारावार करें विस्तार लीला जीवन उधार कौं। जाही रूप माँझ मन लागै जाको पागै तहीं, जागै हिय भाव वही पावै कौन पार कौं।। सबही हैं नित्त ध्यान करत प्रकाशैं चित्त, जैसे रंक पावै वित्त जोपै जानै सार कौं। केशनि कुटिलताई ऐसे मीन सुखदाई, अगर सुरीति भाई बसौ उर हार कौं ।। १४ ।। श्रीचरण-चिह्न चरण-चिह्न रघुवीर के सन्तनि सदा सहायका।। अंकुश, अम्बर, कुलिश, कमल, जव, धुजा, धेनुपद। शंख, चक्र, स्वस्तीक, जम्बुफल, कलश, सुधाह्रद।।
12-1
12-2 (जप के समय ध्यान योग्य) ── श्रीसीताराम चरण-चिह्नानि ── दायाँ बायाँ भगवती श्री सीता जी के चरण चिह्न दायाँ बायाँ भगवान् श्रीराम जी के चरण चिह्न
द्वादश महाभागवत ) (१३ अर्द्धचन्द्र, षट्कोन, मीन, बिन्दु, ऊरधरेखा। अष्टकोन, त्रैकोन, इन्द्रधनु, पुरुषविशेखा।। सीतापत्ति पद नित बसत एते मंगलदायका। चरण-चिह्न रघुवीर के सन्तनि सदा सहायका।। ६।। सन्तनि सहाय काज धारे नृपराज राम, चरन सरोजन में चिह्न सुखदाइये। मन ही मतंग मतवारो हाथ आवै नाहिं, ताके लिये 'अंकुश' लै धार्यो हिये ध्याइये।। शठता सतावै सीत ताही तें 'अम्बर' धर्यो, हर्यो जन सोक ध्यान कीन्हे सुख पाइये। ऐसे ही कुलिश पाप पर्वत के फोरिवे को, भक्तिनिधि जोरिवे को 'कंज' मन ल्याइये।। १५।। 'जव' हेतु सुनो सदा दाता सिद्धि विद्या ही को, सुमति सुगति सुख सम्पति निवास है। छिन्नु में सभीत होत कलि की कुचाल लखि 'ध्वजा' सो विशेष जानौ अभै को विसवास है।। गोपद सो ह्वै हैं भवसागर सो नागर नर जोपै नैन हिय के लगावै, मिटै त्रास है। कपट कुचाल माया बल सबै जीतिवे को, 'दर' को दरस कर जीत्यो अनायास है।। १६।। कामहू निसाचर के मारिवे को 'चक्र' धार्यौ, मंगल कल्याण हेतु 'स्वस्तिक' हूँ मानिये। मंगलीक 'जम्बूफल' फल चारिहूँ को फल कामना अनेक विधिपूर्ण नित ध्यानिये।। 'कलस' सुधा को सर भर्यो हरिभक्ति रस, नैनपुट पान कीजै जीजै मन आनिये। भक्ति को बढ़ावै औ घटावै तीन तापहूँ को, 'अर्धचन्द्र' धारण ये कारण हूँ जानिये।। १७।। विषया भुजंग बलमीक तन मांहि बसे, दास को न डसै याते यत्न अनुसर्यो है। 'अष्टकोन' 'षट्कोन' औ 'त्रिकोन' जन्त्र किये जिये जोई जानि जाके ध्यान उर भर्यो है।। मीन बिन्दु रामचन्द्र कीन्ह्यो वशीकर्ण पायँ ताहि ते निकाय जन मन जात हर्यो है। सागर संसार ताको पारावार पावै, नाहिं 'उर्ध्वरेखा' दासन को सेतुबन्ध कर्यो है।। १८।। ध्नु पद मांहि धर्यो हर्यो सोक ध्यानिन को, मानिन को मार्यो मान रावणादि साखिये। 'पुरुष विशेष' पदकमल बसायो राम, हेतु सुनो अभिराम स्याम अभिलाखिये।। सूधो मन सूधी बैन सूधी करतूति सब ऐसो जन होय मेरो, याही के ज्यों राखिये। जोपै बुधिवन्त रसवन्त रूप सम्पति में, करिले विचार निसिदिन मुख भाखिये।। १९।। द्वादश महाभागवत इनकी कृपा और पुनि समझें द्वादश भक्त प्रधान।। विधि नारद शंकर सनकादिक कपिलदेव मनुभूप। नरहरिदास जनक भीषम बलि शुकमुनि धर्मस्वरूप।।
१४) (श्री भक्तमाल
अन्तरंग अनुचर हरि जू के जो इनकौ यश गावैं। आदि अन्त लौं मंगल तिनके श्रोता वक्ता पावैं।। अजामेल परसंग यह निर्णय परमधर्म के जान। इनकी कृपा और पुनि समझैं द्वादश भक्त प्रधान ।। ७ ।। श्रीशंकरजी द्वादश प्रसिद्ध भक्तराज कथा भागवत, अति सुखदाई नानाविधि करि गाये है। शिवजी की बात एक बहुधा न जानै कोऊ, सुनि रस सानै हियो भाव उरझाये है।। सीता के वियोग राम विकल विपिन देखि, शंकर निपुन सती वचन सुनाये है। कैसे ये प्रवीन ईश कौतुक नवीन देखौ, मनेहूँ करत अंग वैसे ही बनाये हैं।।२०।। सीता ही सो रूप वेश लेश हू न फेर फार, रामजी निहारि नेकु मन में न आई है। तब फिरि आयकै सुनाय दई शंकर को, अति दुख पाय बहुविधि समुझाई है।। इष्ट को स्वरूप धर्यो ताते तनु परिहर्यो, पर्यो बड़ो सोच मति अति भरमाई है। ऐसे प्रभु भाव पगे पोथिन में जगमगे, लगे मोको प्यारे यह बात रीझि गाई है।।२१।। चले जात मग उभै खरे शिव दीठि परे, करे परनाम हिये भक्ति लागी प्यारी है। पार्वती पूछें 'किये कौन को? जू ! कहौ मोसों दीखत न जन कोऊ' तब सो उचारी है।। बरष हजार दस बीते तहाँ भक्त भयो, नयो और ह्वैहैं दूजी ठौर बीते धारी है। सुनिकै प्रभाव हरिदासनि सौं भाव बढ़्यो, चढ़्यो कैसे जात चढ़्यो रँग अति भारी है।।२२।। अजामिलजी धर्यौ पितु मातु नाम अजामेल साँचो भयो, भयो अजामेल तिया छूटी शुभ जात की। कियो मदपान सो सयान गहि दूरि डार्यो, गार्यो तनु वाहीं सौं जो कीन्हौं लैके पातकी।। करि परिहास काहू दुष्ट ने पठाये साधु, आये घर देखि बुद्धि आई गई सातकी। सेवा करि सावधान सन्तन रिझाय लियो, नारायन नाम धरो गर्भ बाल बातकी ।। २३ ।। आइ गयो काल मोहजाल में लपटि रह्यो, महा विकराल यमदूत सो दिखाइये। वही सुत नारायन नाम जो कृपा कै दियो, लियो सो पुकारि सुर आरत सुनाइये।। सुनत ही पार्षद आये ताही ठौर दौर, तोरि डारे पाश कह्यो धर्म समुझाइये। हारे लै बिडारे जाइ पति पै पुकारे कही, 'सुनो वजमारे ! मति जावो हरि गाइये' ।। २४ ।। मास परायण प्रथम विश्राम
श्रीहरिवल्लभ जी) (१५ षोडश पार्षद मो चित्तवृत्ति नित तहँ रहौ जहँ नारायण पार्षद।। विष्वक्सेन जय विजय प्रबल, बल मंगलकारी। नन्द सुनन्द सुभद्र, भद्र जग आमयहारी।। चण्ड प्रचण्ड विनीत, कुमुद कुमुदाक्ष करुणालय। शील सुशील सुषेन, भावभक्तन प्रतिपालय।। लक्ष्मीपति प्रीणन प्रवीन भजनानन्द भक्तनि सुहृद। मो चित्तवृत्ति नित तहँ रहौ जहँ नारायण पार्षद।। ८।। पार्षद मुख्य कहे सोरह सुभाव सिद्ध, सेवा ही की ऋद्धि हिये राखी बहु जोरिकै। श्रीपति नारायन के प्रीनन प्रवीन महा, ध्यान करै जन पालैं भाव दृग कोरिकै।। सनकादि दियो शाप प्रेरिकै दिवायो आप प्रगट ह्वै कह्यो पियो सुधा जिमि घोरिकै। गही प्रतिकूलताई जोपै यही मन भाई याते रीति हद गाई धरी रंग बोरिकै।। २५।। श्रीहरिवल्लभजी हरिवल्लभ सब प्रार्थौं जिन चरणरेणु आसा धरी।। कमला गरुड़ सुनन्द, आदि षोडश प्रभु पद रति। हनुमन्त जामवन्त सुग्रीव विभीषण शबरी खगपति।। ध्रुव उद्धव अम्बरीष, विदुर अक्रूर सुदामा। चन्द्रहास चित्रकेतु ग्राह, गज पाण्डव नामा।। कौषारव कुन्ती बधू पट ऐंचत लज्जा हरी। हरिवल्लभ सब प्रार्थौं जिन चरणरेणु आसा धरी।। ६।। हरि के जे वल्लभ हैं दुर्लभ भुवन माँझ, तिनही की पदरेणु आसा जिय करी है। योगी यती तपी तासौं मेरो कछु काज नाहिं, प्रीति परतीति रीति मेरी मति हरी है।। कमला गरुड़ जाम्बवान सुग्रीव आदि, सबै स्वादरूप कथा पोथिन में धरी है। प्रभु सौं सचाई जग कीरति चलाई अति, मेरे मन भाई सुखदाई रस भरी है।। २६।।
१६) (श्री भक्तमाल श्रीहनुमानजी रतन अपार क्षीरसागर उधार किये, लिये हितचायकै बनाय माला करी है। सब सुख साज रघुनाथ महाराज जू को, भक्ति सौं विभीषन जू आनि भेंट धरी है।। सभा ही की चाह अवगाह हनुमान गरे, डारि दई सुधि भई मति अरबरी है। राम बिन काम कौन फोरि मनि दीन्हें डारि, खोलि त्वचा नाम ही दिखायो बुद्धि हरी है।।२७।। श्रीविभीषणजी भक्ति जो विभीषन की कहै ऐसो कौन जन, ऐपै कछू कही जाति सुनो चित लायकै। चलत जहाज पर अटकि विचार कियो, कोऊ अंगहीन नर दियो लै बहायकै।। जाय लग्यो टापू ताहि राक्षसनि गोद लियो, मोद भरि राजा पास गये किलकायकै। देखत सिंहासन ते कूदि परे नैन भरे, याही के आकार राम देखे भाग पायकै।।२८।। रचिकै सिंहासन पै लै बैठायो ताहि छन, राक्षसन रीझि देत मानि शुभ घरी है। तऊ न प्रसन्न होत छन-छन छीन ज्योति, हूजिये कृपाल मति मेरी अति हरी है।। चाहत मुखारविन्द अति ही आनन्द भरि, ढरकत नैन नीर टेकि ठाढ़ो छरी है। करो सिन्धु पार मेरे यही सुखसार दियो, रतन अपार लाये वाही ठौर फिरी है।।२६।। राम नाम लिखि सीस मध्य धरि दियो याको, यही जल पार करै भाव साँचो पायो है। ताहि ठौर बढ़्यो मानो नयो और रूप भयो, गयो जो जहाज सोई फेरि करि आयो है।। लियो पहिचानि पूछ्यो सब सो बखान कियो, हियो हुलसायो सुनि विनै कै चढ़ायो है। पर्यो नीर कूदि नेकु माया ने प्रवेस कर्यो, हर्यो मन देखि रघुनाथ नाम भायो है।।३०।। श्रीशबरीजी वन में रहति नाम सबरी कहत सब, चाहत टहल साधु तनु न्यूनताई है। रजनी के शेष ऋषि आश्रम प्रवेस करि, लकरीन बोझ धरि आवै मनभाई है।। न्हाइवे को मग झारि काँकरनि बीनि डारि, वेगि उठि जाइ नेकु देति न लखाई है। उठत सँवारें कहै कौन धौं बुहारि गयो भयो, हिये सोच कोउ बड़ो सुखदाई है।।३१।। बड़ेई असंग वे मतंग रसरंग भरे, धरे देखि बोझ कह्यो 'कौन चोर आयो है'। करै नित चोरी अहो ! गहो वाहि एक दिन, बिना पाये प्रीति वाकी मन भरमायो है।। बैठे निसि चौकी देत शिष्य सब सावधान, आय गई, गहि लई, काँपै तनु नायो है। देखत ही ऋषि जलधारा बही नैनन ते, बैनन सौं कह्यो जात कहा कछु पायो है।।३२।।
श्रीअम्बरीषजी) (१७ डीठि हू न सोहीं होत मानि तन गोत छोट, परी जाय सोच सोत कैसे कै निकारिये। भक्ति को प्रताप ऋषि जानत निपट नीके, कैऊ कोटि विप्रताई यापै वारि डारिये।। दियो वास आश्रम में श्रवन में नाम दियो, कियो सुनि रोष सबै कीनी पाँति न्यारिये। सबरी सौं कह्यो तुम राम दरसन करो, मैं तो परलोक जात आज्ञा प्रभु पारिये।। ३३।। गुरु को वियोग हिये दारुन लै शोक दियो, जियो नहीं जात तऊ राम आसा लागी है। न्हाइवे को घाट निसि जात ही बुहारि सब, भई यो अबार ऋषि देखि व्यथा पागी है।। छुयो गयो नेकु कहूँ खीझत अनेक भाँति, करिकै विवेक गयो न्हान यह भागी है। जल सो रुधिर भयो नाना कृमि भरि गयो, नयो पायो सोच तौहू जानै न अभागी है।। ३४।। लावै वन बेर लागी राम की अवसेर फल, चाखै धरि राखै फिर मीठे उन जोग हैं। मारग में जाइ रहै लोचन बिछाय, कभूँ आवैं रघुराइ दृग पावैं निज भोग है।। ऐसे ही बहुत दिन बीते मग जोहत ही, आय गये औचक सो मिटे सब सोग हैं। ऐपै तनु न्यूनताई आई सुधि छिपी जाय पूछें, आप ‘सबरी कहाँ?’ ठाढ़े सब लोग हैं।। ३५।। पूछि-पूछि आये तहाँ सबरी अस्थान जहाँ, ‘कहाँ वह भागवती? देखौं दृग प्यासे हैं’। आय गई आश्रम में जानिकै पधारे आप, दूर ही ते साष्टांग करी चख भासे हैं।। रवकि उठाय लई विथा तनु दूरि गई, नई नीर झरी नैन परे प्रेम पासे हैं। बैठे सुख पाइ फल खाइकै सराहबे वेई कौं कह्यौ कहा कहौं मेरे मग दुख नासे हैं।। ३६।। करत हैं सोच सब ऋषि बैठे आश्रम में, जल को बिगार सो सुधार कैसे कीजिये। आवत सुने हैं वन पन्थ रघुनाथ कहूँ, आवैं जब कहैं याको भेद कहि दीजिये।। इतने ही माँझ सुनी ‘सबरी के विराजे आन’, गयो अभिमान चलो पग गहि लीजिये। आये खुनसाय कही नीर कौ उपाय कहौ ‘गहौ पग भीलिनी के’ छुये स्वच्छ भीजिये।। ३७।। श्रीजटायुजी जानकी हरन कियो रावन मरन काज, सुनि सीता वानी खगराज दौरयो आयो है। बड़ी ये लड़ाई लीन्हीं देह वारि फेरि दीन्हीं, राखे प्रान राम मुख देखिवो सुहायो है।। आये आपु गोद सीस धारि दृगधार सींच्यो, दई सुधि लई गति तनहूँ जरायो है। दसरथवत मान कियो जल दान यह, अति सनमान निज रूप धाम पायो है।। ३८।। श्रीअम्बरीषजी अम्बरीष भक्त की जो रीस कोऊ करै और, बड़ो मति बौर किहूँ जान नहिं भाखिये। दुरवासा ऋषि सीख सुनी नहीं कहूँ साधु, मानि अपराध सिर जटा खैंचि नाखिये।।
१८) (श्री भक्तमाल लई उपजाय कालकृत्या विकराल रूप, भूप महाधीर रह्यो ठाढ़ो अभिलाखिये। चक्र दुख मानि लै कृशानु तेज राख करी, परी भीड़ ब्राह्मण को भागवत साखिये॥३९॥ भाज्यो दिशा-दिशा सब लोक लोकपाल पास, गये नयो तेज चक्र चून किये डारे हैं। ब्रह्मा शिव कही यह गही तुम टेव बुरी, दासनि को भेद नहीं जान्यो वेद धारे हैं॥ पहुँचे वैकुण्ठ जाय कह्यो दुख अकुलाय, 'हाय हाय राखौ प्रभु ! खरौ तन जारे हैं'। 'मैं तो हौं अधीन तीनि गुन को न मान मेरे, भक्तवात्सल्य गुन सबही को तारे हैं'॥४०॥ मोको अति प्यारे साधु उनकी अगाध मति, कर्यो अपराध तुम सह्यो कैसे जात है। धाम धन वाम सुत प्राण तनु त्याग करें, ढरैं मेरी ओर निसि भोर मोसौँ बात है। मेरेउ न सन्त बिनु और कछु साँची कहौं, जाओ वाही ठौर जाते मिटै उतपात है। बड़ेई दयाल सदा दीन प्रतिपाल करैं न्यूनता न धरैं कहूँ भक्ति गात-गात हैं॥४१॥ ह्वै करि निरास ऋषि आयो नृप पास चल्यो, गर्व सौं उदास पग गहे दीन भाष्यो है। राजा लाज मानि मृदु कहि सनमान कर्यो, ढर्यो चक्र ओर कर जोरि अभिलाष्यो है॥ भक्त निसकाम कभूँ कामना न चाहत हैं, चाहत हैं विप्र दुख दूरि करो चाख्यो है। देखिकै विकलताई सदा सन्त सुखदाई, आई मन माँझ सब तेज ढाँक राख्यो है॥४२॥ श्रीअम्बरीषजी की छोटी रानी एक नृपसुता सुनि अम्बरीष भक्तिभाव, भयो हिये भाव ऐसो वर कर लीजिये। पिता सौं निशंक ह्वैकैं कही पति कियो मैं ही, विनय मानि मेरी वेगि चीठी लिख दीजिये!! पाती लैके चल्यो विप्र क्षिप्र वही पुरी गयो, नयो चाव जान्यो ऐपै कैसे तिया धीजिये। कहो तुम जाय रानी बैठीं सत आय मोकौं, बोल्यो न सुहाय प्रभुसेवा माँझ भीजिये॥४३॥ कह्यो नृप सुता सौं जु कीजिये यतन कौन?, पौन जिमि गयो आयो काम नाहीं बिया कौ। फेरिकै पठायो सुख पायो मैं तो जान्यौं, वह बड़ो धर्मज्ञ वाके लोभ नाहीं तिया कौ॥ बोली अकुलाय मन भक्ति ही रिझाय लियो, कियो पति मुख नहीं देखौं और पिया कौ। जायके निशंक यह बात तुम मेरी कहौ, चेरी जौ न करौ तौ पै लेवो पाप जिया कौ॥४४॥ कही विप्र जाय सुनि चाय भहराय गये, दयो लै खड्ग 'यासौं फेरा फेरि लीजियै'। भयो जू विवाह उत्साह कहूँ मात नाहिं आई पुर अम्बरीष देखि छबि भीजियै॥ कह्यो 'नव मन्दिर में झारिकै बसेरो देवो, देवो राव भोग विभौ नाना सुख कीजिये। पूरब जनम कोऊ मेरे भक्ति गन्ध हुती याते सनबन्ध पायो यहै मानि धीजियै'॥४५॥
श्रीविदुरजी) (१६
रजनी के शेष पति भौन में प्रवेस कियो, लियो प्रेम साथ ढिग मन्दिर के आइये। बाहिरी टहल पात्र चौका करि रीझि रही, गही कौन जाय जामें होत ना लखाइये।। आवत ही राजा देखि लगै न निमेष हूँ, कौन चोर आयो मेरी सेवा लै चुराइये। देखी दिन तीनि फेरि चीन्हिकै प्रवीन कही, कि ऐसौ मन जौ पै प्रभु माथे पधराइये।।४६।। लई बात मानि मानो मन्त्र लै सुनायो कान, होत ही बिहान सेवा नीकी पधराई है। करति सिंगार फिर आपु ही निहारि रहै, लहै नहीं पार दृग झरी सी लगाई है।। भई बढ़वार राग भोग सौं अपार भाव, भक्ति विस्तार रीति पुरी सब छाई है। नृपहू सुनत अब लागि चौंप देखिवे की, आये ततकाल मति अति अकुलाई है।।४७।। हरे हरे पाँव धरैं पौरियानि मने करैं, खरे अरबरैं कब देखौं भागभरी को। गये चलि मन्दिर लौं सुन्दरी न सुधि अंग, रंग भीजि रही दृग लाइ रही झरी को।। बीन लै बजावै गावै लालन रिझावै त्यौं-त्यौं, अति मन भावै कहैं धन्य यह घरी को। द्वार पै रह्यौ न जाय गये ढिग ललचाय, भई उठि ठाढ़ि देखि राजा गुरु हरि को।।४८।। वैसे ही बजाओ बीन ताननि नवीन लैकैं, झीन सुर कान परै जाति मति खोइये। जैसे रंग भीजि रही कही सो न जात मोपै, ऐपै मन नैन चैन कैसे करि गोइये।। करिकै अलापचारी फेरिकै सँभारि तान, आइ गयो ध्यान रूप ताहि माँझ भोइये। प्रीति रसरूप भई राति सब बीति गई, नई कछु रीति अहो! जामें नहिं सोइये।।४६।। बात सुनी रानी और राजा गये नई ठौर, भई सिरमौर अब कौन वाकी सर है। हमहूँ लै सेवा करैं पति मति वश करैं, धरैं नित्य ध्यान विषय बुद्धि राखी धर है।। सुनिकै प्रसन्न भये अति अम्बरीष ईश, लागी चौंप फैलि गई भक्ति घर-घर है। बढ़ै दिन-दिन चाव ऐसोई प्रभाव कोई, पलटै सुभाव होत आनंद को भर है।।५०।।
श्रीविदुरानीजी
न्हात ही विदुर नारि अंगन पखारि करि, आइ गये द्वार कृष्ण बोलिकै सुनायो है। सुनत ही स्वर सुधि डारी लै निदरि मानो, राख्यो मद भरि दौरि आनिकै चितायो है।। डारि दियो पीत पट कटि लपटाय लियो, हियौ सकुचायो वेष वेगि ही बनायो है। बैठी ढिग आइ केरा छिलि छिलिका खवाइ, आयो पति खीझ्यो दुख कोटि गुनो पायो है।।५१।।
श्रीविदुरजी
प्रेम को विचारि आपु लागे फल सार दैन, चैन पायो हियो नारि बड़ी दुखदाई है। बोले रीझि स्याम तुम कीनो बड़ो काम ऐपै, स्वाद अभिराम वैसी वस्तु मैं न पाई है।।
२०) (श्री भक्तमाल तिया सकुचाय कर काटि डारौं हाय प्रान-प्यारे को खवाई छीलि छीलिका न भाई है। हित ही की बातें दोऊ पार पावैं नाहिं कोऊ, नीके कै लड़ावै सोई जानै यह गाई है ॥५२॥ मास परायण दूसरा विश्राम श्रीसुदामाजी बडो निसकाम सेर चूनहू न धाम ढिग, आई निज भाम प्रीति हरि सौं जनाई है। सुनि सोच पर्यो हियो खरो अरबर्यो मन, गाढ़ो लैके कर्यो ‘बोल्यो हाँ जू सरसाई है’। ‘जावो एक बार वह वदन निहार आवो, जोपै कछु पावो लावो मोकौं सुखदाई है’। कही भली बात सब लोक में कलंक ह्वै है, जानियत याही लिये कीन्हीं मित्रताई है॥५३॥ तिया सुनि कहै ‘कृष्ण रूप क्यों न चाहै? जाय दहै दुख आपही सो’ वचन सुनाये है। आई सुधि प्यारे की विचारे मति तारे तब, धारे पग मग झूमि द्वारावती आये हैं॥ देखिकै विभूति सुख उपज्यो अभूत कोऊ, चल्यो मुख माधुरी के लोचन तिसाये हैं। डरपत हियो ड्योढ़ी लाँघि मन गाढ़ो कियो, लियो कर गहि चाह तहाँ पहुँचाये हैं॥५४॥ देखो स्याम आयो मित्र चित्रवत रहे नेकु, हित को चरित्र दौरि रोइ गरे लागे है। मानो एक तन भयो लयो ऐसे लाइ छाती, नयो यह प्रेम छूटै नाहिं अंग पागे हैं। आई दुबराई सुधि मिलन छुटाई ताते, आने जल रानी पग धोये भाग जागे है। सेज पधारइ गुरु चरचा चलाइ, सुखसागर बुड़ाइ आपु अति अनुरागे हैं॥५५॥ चिउड़ा छिपाये काँख पूछैं कहा ल्याये मोकौं?, अति सकुचाये भूमि तकैं दृग भीजे हैं। खैंचि लई गाँठि मूँठि एक मुख माँझ दई, दूसरी हूँ लेत स्वाद पाइ आपु रीझे हैं॥ गह्यो कर रानी ‘सुखसानी प्यारी वस्तु यहै, पावो बाँटि’ मानो श्रीसुदामा प्रेम धीजे हैं। श्याम जू विचारि दीनी सम्पति अपार, विदा भये, पै न जानी सार बिछुरनि छीजे है॥५६। आये निज ग्राम वह अति अभिराम भयो, नयो पुर द्वारका सौं देखि मति गई है। तिया रँग भीनी संग सतनि सहेली लीनी, कीनी मनुहारि यों प्रतीति उर भई है॥ वैहै हरि ध्यान रूपमाधुरी को पान तासौं, राखैं निज प्रान जाके प्रीति नित नई है। भोग की न चाह ऐसे तनु निरवाह करैं, ढरैं सोई चाल सुखजाल रसमई हैं॥५७॥ श्रीचन्द्रहासजी हुतो नृप एक ताके सुत चन्द्रहास भयो, परी यों विपति धाई लाई और पुर है। राजा कौ दिवान ताके रही घर आन बाल, आपने समान संग खेलै रसढुर है॥
भयो ब्रह्मभोज कोई ऐसोई संयोग बन्यो, आये वै कुमार जहाँ विप्रन को सुर है। बोलि उठे सबै, ‘तेरी सुता कौ जु पति यहै’, हुवो चाहै जानी सुनि गयो लाज घुर है।।५८।। पऱ्यौ सोच भारी कहा करौं? यों विचारी अहो! सुता जो हमारी ताको पति ऐसो चाहिये। डारौं याहि मार याको यहै है विचार तब, बोलि नीचजन कह्यौ मारौ हिय दाहियै।। लैकै गये दूर देखि बाल छबि पूर, हम योनि परै धूर दुख ऐसो अवगाहियै। बोले अकुलाय तोहि मारेंगे सहाय कौन? माँगौ एक बात जब कहौं तब बाहियै।।५६।। मानि लीन्हौं बोल वे कपोल मध्य गोल एक, गण्डकी को सुत काढि; सेवा नीकी कीनी है। भयो तदाकार यों निहार सुख भार भरि, नैननि की कोर ही सौं आज्ञा बध दीनी है।। गिरे मुरझाइ दया आइ कछु भाय भरे, ढरे प्रभु ओर मति आनन्द सौं भीनी है। हुती छठी आँगुरी सो कटि लई दूषन हो, भूषन ही भयो जाइ कही साँचु चीन्ही है।।६०।। वहै देश भूमि में रहत लघु भूप और, और सुख सबै एक सुत चाह भारी है। निकस्यौ विपिन आनि देखि याहि मोद मानि, कीन्हीं खग छाँह घिरी मृगी पाँति सारी है।। दौरिकै निशंक लियो पाइ निधि रंक जियों, कियो मनभायो सो बँधायो श्री हु वारी है। कोऊ दिन बीते नृप भये चित चीते दियो, राज को तिलक भावभक्ति विसतारी है।।६१।। रहै जाके देश सो नरेस कछु पावै नाहीं, बाँह बल जोरि दियो सचिव पठाइकै। आयो घर जानि कियो अति सनमान सो, पिछान लियो वह बाल मारो छल छाइकै।। दई लिखि चीठी जाओ मेरे सुत हाथ दीजै, कीजै वही बात जाको आयो लै लिखाइकै। गये पुर पास बाग सेवा मति पागि करि, भरी दृग नींद नेकु सोयो सुख पाइकै।।६२।। खेलति सहेलिन सों आई वाहि बाग माँझ, करि अनुराग भई न्यारी देखि रीझी है। पाग मधि पाती छबिमाती झुकि खैचि लई, बाँचि खोलि लिख्यो विष देन पिता खीझी है।। विषया सुनाम अभिराम दृग अंंजन सौं, विषया बनाइ मनभाई रस भीजी है। आइ मिली आलिन में लालन को ध्यान हिये, पिये मद मानो गृह आइ तब धीजी है।।६३।। उठयो चन्द्रहास जिहि पास लिख्यो लायो आयो, देखि मनभायो गाढ़े गरे सौं लगायो है। दई कर पाती बात लिखी मो सुहाती बोलि, विप्र घरी एक माँझ ब्याह उघरायो है।। करी ऐसी रीति डारे बड़े नृप जीति, श्री देत गई बीति चाव पार पै न पायो है। आयो पिता नीच सुनि घूमि आई मीच मानो, वानौ लखि दूलह को शूल सरसायो है।।६४।। बैठ्यो लै इकान्त, ‘सुत! करी कहा भ्रान्त यह?’ कह्यो सो नितान्त कर पाती लै दिखाई है। बाँचि आँच लागी ‘मैं तो बड़ोई अभागी’! ऐपै मारौं मति पागी बेटी राँड हू सुहाई है।।
२२) (श्री भक्तमाल बोलि नीच जाति बात कही तुम जावो मठ, आवै तहाँ कोऊ मारि डारौ मोहि भाई है। चन्द्रहास जू सौं भाष्यो देवी पूजि आवो आज, मेरी कुल पूज सदा रीति चलि आई है।।६५।। चल्योई करन पूजा देशपति राजा कही, मेरे सुत नाहीं राज वाही को लै दीजिये। सचिव सुवन सौं जु कह्यो तुम लावो जावो, पावो नहीं फेरि समय अब काम कीजिये।। दौर्यौ सुख पाइ चाइ मग ही में लियो जाइ, दियो सो पठाइ नृप रंग माहिं भीजिये। देवी अपमान ते न डरो सनमान करौं, जात मारि डार्यो यासों भाष्यो भूप लीजिये।।६६।। काहू आनि कही सुत तेरो मारो नीचनि ने, सींचन सरीर दृग नीर झरी लागी है। चल्यो ततकाल देखि गिर्यो ह्वै विहाल, सीस पाथर सौं फोरि मर्यो ऐसो ही अभागी है।। सुनि चन्द्रहास चलि वेगि मठ पास आये, ध्याये पग देवता के काटे अंग रागी है। कह्यो तेरो द्वेषी याहि क्रोध करि मार्यो मैं ही, उठैं दोऊ दीजै दान जिये बड़भागी है।।६७।। कर्यो ऐसो राज सब देश भक्तराज कर्यो, ढिंग को समाज ताकी बात कहा भाखिये। हरि-हरि नाम अभिराम धाम-धाम सुने, और काम कामना न सेवा अभिलाखिये।। काम क्रोध लोभ मद आदि लैके दूरि किये, जिये नृप पाइ ऐसो नैननि में राखिये। कही जिती बात आदि अन्त लौं सुहाति हिये, पढ़ें उठि प्रात फल जैमिनि में साखिये।।६८।। श्रीमैत्रेयजी कौषारव नाम सो बखान कियो नाभा जू ने मैत्रेय अभिराम ऋषि जानि लीजै बात में। आज्ञा प्रभु दई जाहु विदुर है भक्त मेरौ करौ उपदेस रूप गुन गान-गात में।। चित्रकेतु प्रेमकेतु भागवत ख्यात जाते पलट्यो जनम प्रतिकूल फल घात में। अक्रूर आदि ध्रुव भये सब भक्तभूप उद्धव से प्यारेन की ख्याति पात-पात में।।६६।। श्रीकुन्तीजी कुन्ती करतूति ऐसी करै कौन भूतप्राणी, माँगति विपत्ति जासों भाजैं सब जन हैं। देख्यो मुख चाहौं लाल ! देखे बिनु हिये शाल, हूजिये कृपाल नहीं दीजै वास वन है।। देखि विकलाई प्रभु आँखि भरि आई फेरि घर ही को लाई कृष्ण प्रान तन धन है। श्रवन वियोग सुनि तनक न रह्यो गयो, भयो वपु न्यारो अहो ! यही साँचो पन है।।७०।। श्रीद्रौपदीजी द्रोपदी सती की बात कहै ऐसो कौन पटु ? खैचत ही पट, पट कोटिगुने भये हैं। 'द्वारका के नाथ!' जब बोली तब साथ हुते द्वारका सौं फेरि आये भक्तवाणी नये हैं।।
श्रीश्रुतिदेवजी) (२३ गये दुर्वासा ऋषि वन में पठाये नीच धर्मपुत्र बोले विनय आवै पन लये हैं। भोजन निवारि तिया आइ कही सोच पर्यो, चाहैं तनु त्याग्यो ‘कह्यो कृष्ण कहूँ गये हैं’॥७१॥ सुन्यो भागवती को वचन भक्तिभाव भर्यो, कर्यो मन आये स्याम पूजे हिये काम है। आवत ही कही मोहि भूख लागी देवो कछु, महा सकुचाये माँगे प्यारो नहीं धाम है॥ विश्व के भरनहार धरे हैं अहार अजू, हमसों दुरावो कही वानी अभिराम है। लग्यो शाक पत्र पात्र जल संग पाइ गये, पूरन त्रिलोकी विप्र गिने कौन नाम है॥७२॥ पद पंकज वन्दौं सदा, जिनके हरि नित उर बसैं॥ योगेश्वर श्रुतिदेव अंग मुचुकुन्द प्रियव्रत जेता। पृथु परीक्षित शेष, सूत शौनक परचेता॥ सतरूपा त्रयसुता सुनीति सती सबही मन्दालस। यज्ञपत्नि ब्रजनारि, किये केशव अपने वश॥ ऐसे नर नारी जिते तिनहीं के गाऊँ जसैं। पद पंकज वन्दौं सदा, जिनके हरि नित उर बसैं॥१०॥ श्रीश्रुतिदेवजी जिनहीं के हरि नित उर बसैं तिनहीं की, पदरेनु चैन-दैन आभरन कीजिये। योगेश्वर आदि रस स्वाद में प्रवीन महा, विप्र श्रुतिदेव ताकी बात कही दीजिये॥ आये हरि घर देखि गयो प्रेम भरि हियो, ऊँचो कर करि पट फेरि मति भीजिये। जिते साधु संग तिन्हें विनय न प्रसंग कियो, कियो उपदेश ‘मोसों बाढ़ पाँव लीजिये’॥७३॥ अंघ्री अम्बुज पांशु को, जनम जनम हौं जाचिहौं॥ प्राचीनबर्हि सत्यव्रत, रहूगण सगर भगीरथ। बाल्मीकि मिथिलेश, गये जे जे गोविन्द पथ॥ रुक्मांगद हरिचन्द, भरत दधीचि उदारा। सुरथ सुधन्वा शिविर, सुमति अति बलि की दारा॥ नील मोरध्वज ताम्रध्वज, अलरक कीरति राचिहौं। अंघ्री अम्बुज पांशु को, जनम जनम हौं जाचिहौं॥११॥