भारतकोश
श्री गुरु गीता (स्कन्द पुराण - उमा-महेश्वर संवाद सान्वय सटीक)

श्री गुरु गीता (स्कन्द पुराण - उमा-महेश्वर संवाद सान्वय सटीक)

Shri Guru Gita from Skanda Purana with Hindi Commentary

भगवान् शिव / महर्षि वेदव्यास / डॉ. मोतीलाल खद्दर शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished82 पृष्ठ

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ईश्वर उवाच :- मम रूपासि देवि त्वं त्वत्प्रीत्यर्थं वदाम्यहं॥ लोकोपकारकः प्रश्नो न केनापि कृतः पुरा॥६॥ ईश्वर उवाच :- सूतजी कहते हैं कि ऋषियो, मईया के प्रश्न को सुन कर भोलेनाथ प्रशंसा करने लगे और कहने लगे कि हे देवि ! आपने बड़ा ही सुन्दर प्रश्न लोकहित के लिये कर दिया इससे केवल आपका ही नहीं अपितु समूची मानव जाति का कल्याण होगा। ऐसा प्रश्न आपसे पहले अभी तक किसी ने नहीं किया था। ०६

दुर्लभं त्रिषु लोकेषु तच्छृणुष्व वदाम्यहं। किञ्चिद् गुरुं विना नान्यत्सत्यं सत्यं वरानने॥७॥ भोलेनाथ कहते हैं देवि ! सच कहूं इस त्रैलोक्य मे बिना गुरुदेव की कृपा के कुछ भी पाना सम्भव नहीं है, सब दुर्लभ है। ०७ वेदशास्त्रपुराणानि इतिहासादिकानि च। मंत्रयंत्रादिविद्यानां स्मृतिरुच्चाटनादिकं ॥८॥ सूतजी कहते हैं ऋषियो - वेद, शास्त्र, पुराण की विद्यायें, मन्त्र तन्त्र बिना गुरु की कृपा के फलीभूत नहीं होती, इसलिये गुरुदेव के ही चरण-शरण में समर्पित हो जाना चाहिए। ०८

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