श्री गुरु गीता (स्कन्द पुराण - उमा-महेश्वर संवाद सान्वय सटीक)
Shri Guru Gita from Skanda Purana with Hindi Commentary
भगवान् शिव / महर्षि वेदव्यास / डॉ. मोतीलाल खद्दर शास्त्री द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंशैवं शाक्तागमादीनि अन्यदबहुमतानि च। अपभ्रंशः समस्तानि जीवानां भ्रांतचेतसां ॥९॥ अब ऋषियों को समझाते हुए कह रहे हैं कि महर्षियों सरल सहज साधन तो यही है कि गुरुजी के श्री चरण में ये जीवात्मा शाश्वत रहे लेकिन बहुत सारे मलों में उलझ करके संसार में भटकते रहते हैं और अपने आत्मस्वरूप को नहीं समझ पाते। ०९ यज्ञो व्रतं तपो दानं जपस्तीर्थं तथैव च। गुरुतत्त्वमविज्ञाय मूढास्ते चेतरे जनाः ॥१०॥ सूतजी का कहना है कि ये जीवात्मा चाहे जिस प्रकार से विशेष यत्न कर ले, व्रत कर ले, तप कर ले तथा चाहे जिस तीर्थ में जाकर विशेष जप अनुष्ठान कर ले इन सब का कोई प्रभाव तब तक नहीं होता जब तक गुरु की कृपा दृष्टि नहीं होती, इसलिए गुरु की संरक्षण स्थिति में जीना चाहिये अन्यथा मूर्ख की भाँति होकर विचरण ही करेगा। १० यदंघ्रिकमलद्वंद्वं द्वंद्वतापनिवारकं । तारकं भवसिंधौ हि सद्गुरोः प्रणमाम्यहं ॥११॥ इसलिये हे महर्षियों ! हम सब मिलकर श्री सदगुरुदेव के कमलवत चरणों में कोटि कोटि प्रणाम करते हैं जिसके सहारे जीवात्मा के तीनों ताप (दैहिक, दैविक, भौतिक) तत्काल नष्ट हो जाते हैं और जीव अपने आप को पहचान जाता है उसी श्रीचरण मे हम सबका बारम्बार प्रणाम है। ११ ( 19 )