श्री गुरु गीता (स्कन्द पुराण - उमा-महेश्वर संवाद सान्वय सटीक)
Shri Guru Gita from Skanda Purana with Hindi Commentary
भगवान् शिव / महर्षि वेदव्यास / डॉ. मोतीलाल खद्दर शास्त्री द्वारा
पृष्ठ 33, कुल 82 में से
संदर्भ में पढ़ेंगूढ़विद्या जगन्माया देहे चाज्ञानसंभवा। उदयं स्वप्रकाशेन गुरुशब्देन कथ्यते ॥१२॥ सूतजी कहते हैं कि हे महर्षियों - इस संसार के गुरु तत्व को और संसार की माया से अर्थात (तत्वज्ञान पाने के लिये - और माया के प्रभाव से बचने के लिये) गुरुदेव के उपदेशों का श्रवण करना चाहिये और इसी के सहारे अपने आपको जगा लेना चाहिये, पहचान लेना चाहिये। १२
देही ब्रह्म भवेत्तस्य तत्कृपार्थं वदामि ते। सर्वपापविशुद्धात्मा श्रीगुरोः पादपंकजं ॥१३॥ इस प्रकार गुरु महिमा के क्रम में सूतजी कहते हैं कि है ब्रह्मर्षियों ये जीवात्मा गुरुदेव के चरणों में समर्पित होकर सेवा करते - करते उनकी कृपा के सहारे शुद्ध विशुद्ध को जाता है और साक्षात वही सिद्धान्तों के अनुपालन करने के कारण ब्रह्ममय हो जाता है अर्थात हर रूप में प्रभु का दर्शन करता है। १३
सर्वतीर्थावगाहस्य प्राप्नोति स फलं नरः । गुरुपादोदकं पीत्वा जलं शिरसि धारयेत् ॥१४॥ सूतजी कहते हैं कि महर्षियों ये जीवात्मा जो अनेक तीर्थ स्थलों पर जा-जाकर पुष्प अर्जित करने का प्रयास करता है। यदि पूर्ण तन्मयता से गुरुदेव के चरणों का प्रक्षालन करके श्रद्धापूर्वक उसी जल का पान कर ले तो सारा का सारा फल उसे उतने से प्राप्त हो जाएगा, तो तीर्थों में जाने का क्या लाभ ? १४
(२०)