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श्री गुरु गीता (स्कन्द पुराण - उमा-महेश्वर संवाद सान्वय सटीक)

Shri Guru Gita from Skanda Purana with Hindi Commentary

भगवान् शिव / महर्षि वेदव्यास / डॉ. मोतीलाल खद्दर शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished82 पृष्ठ

२. द्वितीय अध्याय: गुरु-मन्त्र, गुरु-दीक्षा, पादुका-पूजन एवं तत्त्व-ज्ञान

गूढ़विद्या जगन्माया देहे चाज्ञानसंभवा। उदयं स्वप्रकाशेन गुरुशब्देन कथ्यते ॥१२॥ सूतजी कहते हैं कि हे महर्षियों - इस संसार के गुरु तत्व को और संसार की माया से अर्थात (तत्वज्ञान पाने के लिये - और माया के प्रभाव से बचने के लिये) गुरुदेव के उपदेशों का श्रवण करना चाहिये और इसी के सहारे अपने आपको जगा लेना चाहिये, पहचान लेना चाहिये। १२

देही ब्रह्म भवेत्तस्य तत्कृपार्थं वदामि ते। सर्वपापविशुद्धात्मा श्रीगुरोः पादपंकजं ॥१३॥ इस प्रकार गुरु महिमा के क्रम में सूतजी कहते हैं कि है ब्रह्मर्षियों ये जीवात्मा गुरुदेव के चरणों में समर्पित होकर सेवा करते - करते उनकी कृपा के सहारे शुद्ध विशुद्ध को जाता है और साक्षात वही सिद्धान्तों के अनुपालन करने के कारण ब्रह्ममय हो जाता है अर्थात हर रूप में प्रभु का दर्शन करता है। १३

सर्वतीर्थावगाहस्य प्राप्नोति स फलं नरः । गुरुपादोदकं पीत्वा जलं शिरसि धारयेत् ॥१४॥ सूतजी कहते हैं कि महर्षियों ये जीवात्मा जो अनेक तीर्थ स्थलों पर जा-जाकर पुष्प अर्जित करने का प्रयास करता है। यदि पूर्ण तन्मयता से गुरुदेव के चरणों का प्रक्षालन करके श्रद्धापूर्वक उसी जल का पान कर ले तो सारा का सारा फल उसे उतने से प्राप्त हो जाएगा, तो तीर्थों में जाने का क्या लाभ ? १४

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शोषणं पापपंकस्य दीपनं ज्ञानतेजसां । गुरुपादोदकं सम्यक् संसारार्णवतारकं ॥१५॥ पूज्य गुरुदेव जी के श्रीचरण का प्रक्षालन जल पीकर ये जीवात्मा इस संसार सागर से पार हो जाता है और उसके सारे पाप समाप्त हो जाते हैं और साथ ही साथ एक दिव्य ज्ञान ज्योति प्रकाशित हो जाती है जिसके कारण सहजता में मुक्त हो जाता है। १५ अज्ञानमूलहरणं जन्मकर्मनिवारणं । ज्ञानवैराग्यसिद्धयर्थं गुरुपादोदकं पिबेत् ॥१६॥ सूतजी कहते हैं कि ऋषियो - गुरुदेव के पाँव प्रक्षालन जल के सहारे इस जीवात्मा के सारे बन्धन जड़ से मिट जाते हैं जन्म कर्म का बन्धन समाप्त हो जाता है और साथ ही साथ ज्ञान वैराग्य जीवन में जागृत हो जाता है। १६ गुरुपदोदकं पानं गुरोरुच्छिष्टभोजनं । गुरुमूर्तेः सदा ध्यानं गुरुस्तोत्रं सदा जपेत् ॥१७॥ इसलिये हे ऋषिगणों - गुरुदेव के प्रक्षालित चरण जल का पान करना चाहिये, मिल सके, सम्भव हो तो जूठा भोजन भी प्रसाद रूप में ग्रहण करना चाहिए और सदैव उन्हीं के ध्यान में डूबकर इस जीवात्मा को अपना कल्याण कर लेना चाहिए। १७

काशीक्षेत्र निवासोऽसौ जाह्नवीचरणोदकं । गुरुर्विश्वेश्वरः साक्षात् तारको ब्रह्म निश्चितं ॥१८॥ अब सूतजी कहते हैं कि हे महर्षियों, गुरुदेव की कृपा महिमा के बखान क्रम में भोलेनाथ पार्वती से कहते हैं कि हे प्रिये वाराणसी नगरी में निवास कर रहे जो भक्तजन हैं, गंगा में स्नान करके जलपान करके साक्षात गुरुदेव के ही धाम को प्राप्त होते हैं। १८

गुरोः पादांकितं भूत्वा गयास्ते सोक्षयो वटः । तीर्थराजः प्रयागस्तु गुरुमूर्ते नमोनमः ॥१९॥ इसलिए महर्षियो - गुरुदेव के चरणों को अंकितरूप समझकर गया धाम में विराजमान अक्षयवट को और तीर्थराज प्रयाग को गुरुमूर्तिमय मानकर हम प्रणाम करते हैं। १९

गुरुमूर्तिं स्मरेन्नित्यं गुरुनाम सदा जपेत् । गुरोराज्ञां प्रकुर्वीत गुरोरन्यन्न भावयेत् ॥२०॥ इसलिए गुरुदेव की छवि का ध्यान प्रति क्षण करना चाहिए और शंकर रूपी गुरु का नाम जप करते रहना चाहिए, बिना गुरु की आज्ञा के कुछ भी नहीं करना चाहिए, जो गुरुदेव की भावना के अनुसार हो, वही कर्म करना चाहिए। २०

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गुरुवक्त्रंस्थितं ब्रह्म प्राप्यते तत्प्रसादतः । गुरुमूर्तेः सदा ध्यानं कुलस्त्री स्वपतेर्यथा ॥२१॥ सूतजी कहते हैं कि गुरुदेव के बताए सिद्धान्तों पर चलने से जीवात्मा ब्रह्म मे स्थित होकर जीने लगता है, इसलिए पतिव्रता को भी चाहिए कि जैसे पति मे डूबी रहती है, ऐसे ही गुरु के प्रति भी आदर भाव रखे। २१ स्वाश्रमं च स्वजातिं च स्वकीर्तिपुष्टिवर्धनं । अन्यत्सर्वं परित्यज्य गुरोरन्यं न भावयेत् ॥२२॥ इसलिए सूतजी इस तथ्य को स्वीकार करते हैं कि हे महर्षियों बिना गुरु की कृपा के कोई भी अपने आश्रम को पवित्र नहीं कर सकता, न ही अपनी जाति को सम्मानित कर सकता है और न ही अपने कुल की कीर्ति बढ़ा सकता है इसलिए गुरुदेव के चरण-कमल मे दण्डवत रहना चाहिए। २२ अनन्याश्चिंतयंतो मां सुलभं परमं पदम्। तस्मात्सर्वप्रयत्नेन गुरोराराधनं कुरु ॥२३॥ इसलिए अनन्य भाव से इसी को सर्वथा सरल सहज शाश्वत साधन स्वीकारते हुए सभी को गुरुदेव के ध्यान में डूबकर अपने को संसार के दुष्प्रभाव से मुक्त कर लेना चाहिए। २३ गुरुवक्त्रस्थिता विद्या गुरुभक्त्या तु लभ्यते । त्रैलोक्ये स्फुटवक्तारो देवाद्याः सुरपन्नगाः ॥२४॥ ( 23 ) Prof. Madhav Prasad Lamichhane Collection, Kathmandu, Nepal

सूतजी कहते हैं कि चाहे जितना गुणवान वक्ता हो (मनुष्य, देव) वो ये वाकपटुता, गुरु के पास से तभी ग्रहण कर सकता है जब उसमें भक्ति का भाव हो, अतः गुरु के प्रति स्नेहभाव रखना चाहिए। २४ गुकारस्त्वंधकारःस्यादरुकारस्तं निरासकृत्। अंधःकारविनाशत्वादुहुरित्यभिधीयते ॥२५॥ कहने का भाव यह है कि हे ऋषियों, गुरुनाम के उच्चारण मात्र से ही जीवात्मा के सारे अज्ञान समाप्त हो जाते हैं इसीलिए गुरु से बड़ा कोई और नहीं। २५ गुकारः प्रथमो वर्णो मायादि गुणभासकः । रुकारो द्वितीयं ब्रह्म मायाभ्रांतिविमोचकं ॥२६॥ सूतजी कहते हैं कि गुरु, दो वर्णों के मेल से बना हुआ शब्द है और इसका जो पहला शब्द गु-कार है, यह संसार की माया को पूरी तरह से व्यक्त करता है, और रु-कार इस माया के प्रभाव को नष्ट करता है, और इसी शब्द के उच्चारण भाव से ही जीव माया से मुक्त हो जाता है। २६ एवं गुरुपदं श्रेष्ठं देवानामपि दुर्लभं । हाहाहूहूगणैश्चैव गंधर्वाद्यैश्च पूज्यते ॥२७॥ इस तरीके गुरु शब्द की महिमा का उल्लेख करते हुए सूतजी ने कहा कि ऋषियों, गुरुदेव भगवान के पद से बढ़कर कोई दूसरा पद नहीं है, यह पद देवताओं के लिये भी दुर्लभ है, और आज भी हा हा हू हू गन्धर्व अपने समस्त गुण के सहित गुरु की पूजा करते हैं जो कि गन्धर्वराज हैं। २७ ( 24 ) Prof. Madhav Prasad Lamichhane Collection, Kathmandu, Nepal

एवं तेषां च सर्वेषां नास्ति तत्वं गुरोः परं । आसनं शयनं वस्त्रं वाहनं भूषणादिकं ॥२८॥ इसलिए हे शौनकादि ऋषियों गुरु से बढ़ कर इस त्रैलोक्य मे कोई दूसरा तत्व नहीं है, इसलिए चाहिए कि संसारी लोग, आसन, शयनसेज, वस्त्र, आभूषण, गो, इत्यादि गुरुदेव को दान करते हुए अपने आप को उनकी कृपा छांव से जोड़ कर रखें। २८ साधकेन प्रदातव्यं गुरुसंतोषकारकं । गुरोराराधनं कार्यं जीवितं वै निवेदयेत् ॥२९॥ हे महर्षियों - साधक को चाहिए कि गुरुदेव को संतुष्ट करने के लिये हर सम्भव प्रयास करे और उन्ही के नाम स्मरण के सहारे अपना कोई भी छोटा बड़ा कार्य करना शुरु करे, उनकी (सद्गुरुदेव) कृपा से कोई बाधा नहीं होगी। २९ कर्मणा मनसा वाचा नित्यमाराधयेद्गुरुं । दीर्घदंडं नमस्कृत्य निर्लज्जो गुरुसन्निधौ ॥३०॥ इसलिए इस जीवत्मा को मन से, कर्म से, वाणी से हमेशा गुरुदेव के चरणों में प्रेमभाव होना चाहिये और उन्हीं के सानिध्य मे जीना चाहिये। ३० शरीरार्थं च संप्राप्तं पशुपुत्रगृहाणि च । आत्मदारादिकं चैव सद्गुरुं वै निवेदयेत् ॥३१॥ अब सूतजी कहते हैं कि ऋषियों अपने शारीरिक स्वास्थ्य के लिये, सम्पत्ति की प्राप्ति के लिये, पशु, पुत्र, परिवारजन के कल्याण के लिये, ( 25 ) Prof. Madhav Prasad Lamichhane Collection, Kathmandu, Nepal

अपने आत्म कल्याण के लिये, पत्नी इत्यादि की सुदृढ़ वैभवपूर्ण स्थिति के लिये गुरुदेव से ही प्रार्थना करनी चाहिये, क्योंकि ये सब उन्हीं से सम्भव है। ३१ संसारवृक्षमारूढाः पतन्तो नरकार्णवे । येन चैवोद्धृताः सर्वे तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥३२॥ सूतजी कहते हैं कि ऋषियों हम उन गुरुदेव के चरण-कमल में प्रणाम करते हैं जो संसार रूपी वृक्ष पर आरूढ़ समस्त जीवात्माओं को नरकगामी होने से बचाते हुए आत्मस्वरूप का बोध कराते हुए मोक्ष की स्थिति प्रदान करते हैं। ३२ गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुदेवो महेश्वरः । गुरुरेकं परब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥३३॥ इसलिए महर्षियों और क्या कहें, साक्षात गुरुदेव ही ब्रह्मा, विष्णु और महेश हैं, गुरु ही साक्षात परमब्रह्म हैं उनके अतिरिक्त कहीं कुछ भी और नहीं, उनके श्रीचरण में मेरा प्रणाम है। ३३ हेतवे जगतामेव, संसारार्णव सेतवे । प्रभवे सर्वविद्यानां शंभवे गुरवे नमः ॥३४॥ इस प्रकार गुरुदेव की महिमा का विस्तारित वर्णन शुरु करते हैं और बताते हैं कि महर्षियों गुरुदेव ही संसार को प्रकटित करने के लिये स्रोत हैं और वही संसार सागर से पार पाने के लिए सभी के लिए पुल रूप होकर मुक्त भी करते हैं और वही समस्त विद्याओं के स्वामी हैं ऐसे शिव- स्वरूप गुरुदेव के दिव्य श्रीचरण में मेरा कोटि कोटि प्रणाम। ३४ ( 26 ) Prof. Madhav Prasad Lamichhane Collection, Kathmandu, Nepal

अज्ञानतिमिरान्धस्य ज्ञानांजनशलाकया । चक्षुरुन्मीलितं येन तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥३५॥ सूतजी कहते हैं कि महर्षियों - जिन श्री सद्गुरुदेव के ज्ञान रूपी अंजन के सहारे संसारी लोग अपने हृदय के अज्ञान रूपी अंधकार को मिटा देते हैं तो ये अनुपम स्थिति में जिनके दिव्य ज्ञान अंजन को शलाका के सहारे आँख में लगाते ही संसार के दोष समाप्त हो जाते हैं ऐसे सर्वशक्तिमान गुरुदेव के श्री चरणों मे मेरा प्रणाम है। ३५ अखंडमंडलाकारं व्याप्तं येन चराचरं । तत्पदं दर्शितं येन तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥३६॥ सूतजी कहते हैं कि ऋषियों ये जो चराचर जगत जड़ और चैतन्य से व्याप्त दिख रहा है यह सब कुछ (जड़, चेतन) रूप मे साक्षात गुरुदेव ही हैं और जिनकी कृपा होते ही ये जीवत्मा संसार न देखकर प्रत्यक्ष गुरुरूप का दर्शन करने लगती है ऐसे श्री गुरु के चरणों मे प्रणाम करता हूं। ३६ सर्वश्रुतिशिरोरत्नं विराजितपदांबुजं । वेदांतांबुजसूर्याय तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥३७॥ अब सूतजी समझाते हैं कि ऋषियों - श्रुतियां कहती हैं कि गुरुदेव सारे रत्नों से सुशोभित हैं वही वेद, जल और सूर्य रूप में भी है उनके कमलवत चरण मे मेरा प्रणाम है। ३७ ( 27 )

यस्य स्मरणमात्रेण ज्ञानमुत्पद्यते स्वयं । स एव सर्वसंपत्तिः तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥३८॥ इसलिए महर्षियों जिनके नाम स्मरण मात्र से ही ज्ञान अपने आप में ही (हृदय) में प्रकाशित हो उठता है और जिनकी कृपा से भारी सम्पत्ति जीव को प्राप्त हो जाती है ऐसे गुरुदेव के श्री चरण में मेरा प्रणाम है। ३८ चैतन्यं शाश्वतं शांतं व्योमातीतं निरंजनं । बिंदुनादकलातीतं तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥३९॥ अतः ऋषियों जो गुरुदेव साक्षात चैतन्य हैं शाश्वत हैं नित्य हैं और अपने ही आत्म स्वरूप में डूबे निर्गुण निराकार हैं ऐसे बिन्दुनाद की कला से परे गुरु के चरण मे मैं बारम्बार प्रणाम करता हूं। ३९ स्थावरं जंगमं चैव तथा चैव चराचरम् । व्याप्तं येन जगत् सर्वं तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥४०॥ सूतजी कहते हैं कि इस चराचर संसार में जो भी स्थावर और जंगम जीव हैं (स्थावर जड़) जंगम (चलते-फिरते) हर जीव में हम गुरु स्वरूप का दर्शन करते हुए हम उनके चरणों में प्रणाम करते हैं। ४० ज्ञानशक्तिसमारूढं तत्वमालाविभूषितं । भुक्तिमुक्तिप्रदातारं तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥४१॥ सूतजी कहते हैं कि वही गुरुदेव ही, ज्ञान शक्ति से युक्त तत्व की अलौकिक माला से विभूषित और भोग मोक्ष के दाता हैं ऐसे समर्थवान गुरु के श्रीचरण में मेरा प्रणाम है। ४१ ( 28 )

CC-0. In Public Domain. Digitization by eGangotri अनेकजन्मसंप्राप्तं कर्म बंधविदाहनं । स्वात्मज्ञानप्रभावेन तस्मै 'श्रीगुरवे नमः ॥४२॥ कहने का भाव यह है कि जो गुरुदेव अपने ज्ञान उपदेश के माध्यम से जीवात्माओं के अनेक जन्मों के पाप को नष्ट करते हुए उसे कर्म बन्धन से मुक्त कर देते है उन्हें मैं प्रणाम करता हूं। ४२ मन्नाथः श्रीजगन्नाथो मुद्गुरुः श्रीजगद्गुरुः । सर्वात्मा सर्व भूतात्मा तस्मै श्री गुरवे नमः ॥४३॥ सूतजी कहते हैं कि मेरे गुरु ही जगतनाथ हैं वही जगतगुरु हैं और वही सबकी आत्मा हैं ऐसे सर्वभूत सर्वात्मा श्री शिवस्वरूप गुरु के चरण मे प्रणाम करता हूं। ४३ ध्यानमूलं गुरोर्मूर्तिः पूजामूलं गुरोःपदं । मंत्रमूलं गुरोर्वाक्यं मोक्षमूलं गुरोः कृपा ॥४४॥ इसलिए अगर ध्यान मुद्रा में हो तो गुरुदेव के स्वरूप का ध्यान करो, पूजा करने की इच्छा है तो गुरु के चरण की पूजा करो, मंत्र जाप करने की इच्छा है तो उनके वाक्यों को भरिए और इस प्रकार उन्हीं की कृपा के सहारे संसार से मुक्त हो जाइए। ४४ सप्तसागरपर्यंतं तीर्थस्नानादिजं फलं । गुरोरंघ्रिपयो बिंदुसहस्रांशे न दुर्लभम् ॥४५॥ सूतजी कहते हैं कि ऋषियों सात समुद्र की यात्रा तथा समस्त तीर्थस्थलों ( 29 ) Prof. Madhav Prasad Lamichhane Collection, Kathmandu, Nepal

पर पहुंच कर स्नान करने से जो फल प्राप्त होता हैं उसका १००० गुना फल केवल गुरु को दूध पिलाने से ही प्राप्त होता हैं, इसमें कोई सन्देह नहीं है। ४५ ज्ञानं विना मुक्तिपदं लभतेः गुरुभक्तितः । गुरोः समानता नास्ति श्रेयोऽसौ गुरुमार्गिणां ॥४६॥ महर्षियो - जीवात्माएँ संसार सागर से अपने आप को मोक्षपद की प्राप्ति तभी करा सकती हैं जब ज्ञान की प्राप्ति होगी और ये दिव्य ज्ञान की प्राप्ति तभी होगी जब गुरु के प्रति प्रीति विश्वास भक्ति का भाव होगा, इसलिए गुरु से बढ़कर उनके समान कोई और नहीं, अतः गुरु के ही अधीन होना चाहिए। ४६ यस्मात्परतरं नास्ति नेतिनेति च वै श्रुतिः । मनसा वचसा चैव सर्वदाऽऽराधयेद्गुरूम् ॥४७॥ सूतजी कहते हैं कि इसलिए श्रुतियां बार-बार गाती हैं, समझाती हैं कि गुरु से बढ़कर कोई और नहीं, इसलिए मन से, वाणी से सदैव गुरुदेव का ही ध्यान करना चाहिए और उन्हीं का गुणगान करना चाहिए। ४७ मदाहंकारगर्वेण विद्या तपबलान्वितः । संसारकुहरावर्ते घटीयंत्रं यथा पुनः ॥४८॥ अब सूतजी कहते हैं कि महर्षियों चाहे जैसा उच्चकोटि का विद्वान हो, चाहे जितना बड़ा तपस्वी हो, बलवान हो, लेकिन अगर इन सारी गुणवत्ता के साथ वह गुरु के चरण-शरण में न होकर अभिमान करता है

तो उसका सब कुछ तप, बल, धन पौरुष क्षणभाव में ऐसे क्षीण हो जाता है जैसे सूर्य का प्रकाश कुहरा भेद देता है, ऐसे ही जीव का अभिमान उसको खा लेता है। ४८ न मुक्ता देवगंधर्वाः पितरो यक्षकिन्नराः । ऋषयः सर्वसिद्धाश्च गुरुसेवापराङ्मुखाः ॥४९॥ चाहे देवता हो, गन्धर्वा हो, पितरगण, यक्ष, किन्नर, ऋषि हों, ये सब गुरुदेव भगवान के ही सहारे सिद्धि पद को प्राप्त होते हैं बिना गुरु के कुछ भी सम्भव नहीं है। ४९ ध्यानं शृणु महादेवि सर्वानंदप्रदायकं । सर्वसौख्यकरं चैव भुक्तिमुक्तिविशारदं ॥५०॥ इसलिए ऋषियों शिवजी कहते हैं कि हे पार्वती ! ध्यान से सुनो, संसार का सारा सुख, सारा वैभव, आनन्द की प्राप्ति, भोग और मोक्ष ये सब गुरुदेव से ही प्राप्त किया जा सकता है इसलिए उनके आश्रय में जीना चाहिए। ५० ब्रह्मानंदं परमसुखदं केवलं ज्ञानमूर्तिं । द्वन्दातीतं गगनसदृशं तत्वमस्यादिलक्ष्यं॥ एकं नित्यं विमलमचलं सर्वधीसाक्षिभूतं। भावातीतं त्रिगुणरहितं सद्गुरूंतं नमामि ॥५१॥ सूतजी कहते हैं कि गुरुदेव ही जो ज्ञानमूर्ति हैं वही हमेशा ब्रह्म के आनन्द में डूबकर सुख प्राप्त करते हैं और जीव रूप संसार में प्रकट होकर ( 31 )

द्वन्दात्मक स्थिति में जीव को भटकाते रहते हैं और जब जीव गुरुदेव के चरण-शरण में हो जाता है तो मुक्त हो जाता है। ५१ नित्यं शुद्धनिराभासं निराकारं निरंजनं। नित्यबोधचिदानंदं गुरुं ब्रह्म नमाम्यहं ॥५२॥ सूतजी कहते हैं हम गुरुदेव की वन्दना करते हैं जो नित्य, शुद्ध, विशुद्ध, निराकार, निरंजन स्वरूप में भी हमेशा सत चित आनन्द में रमण करते हैं उन्हें प्रणाम करते हैं। ५२ हृदंबुजे कर्णिकमध्यसंस्थं सिद्धासने संस्थितदिव्यमूर्तिः। ध्यायेद्गुरुं चंद्रकलाप्रकाशं सच्चित्सुखाभीष्टवरप्रदानं ॥५३॥ इस प्रकार समझाते हुए कहते हैं कि हम उन गुरुदेव का ध्यान करते हैं जो कमल के मध्य भाग मे स्थित कमलासन पर विराजमान दिव्यमूर्ति, जो अपने तपोबल के प्रभाव से संसार को चन्द्रमा जैसी पावन प्रकाश से प्रकाशित करते हैं और अभीष्ट फल प्रदान करते हैं उन्हें प्रणाम करते हैं। ५३ आनंदमानंदकरं प्रसन्नं ज्ञानस्वरूपं निजबोधरूपं। योगींद्रमीड्यं भवरोगवैद्यं श्रीमद्गुरुं नित्यमहं नमामि ॥५४॥ सूतजी कहते हैं महर्षियों - जो अपने आत्मस्वरूप को जगाकर ज्ञानस्वरूप को जगाकर ज्ञान स्वरूप करके, प्रसन्नता के साथ परमानन्द में डूबे रहते हैं और जो योगियों के भी संसार रूपी रोग को समाप्त कर मुक्त कर देते हैं उनके श्री चरण में मेरा नित्य प्रणाम। ५४ (३२)

CC-0. In Public Domain. Digitization by eGangotri न गुरोरधिकं न गुरोरधिकं न गुरोरधिकः न गुरोरधिकः। शिवशासनतः शिवशासनतः शिवशासनतः शिवशासनतः ॥५५॥ इसलिए हे महर्षियों - गुरुदेव से बढ़कर कोई नहीं गुरुदेव के अतिरिक्त किसी को जानते हीं नही क्यों उनसे बढ़कर कोई दूसरा नहीं इसलिए शिव स्वरूप गुरु के श्री चरण में मैं प्रणाम करता हूं। ५५ एवं श्रुत्वा महादेवि गुरुनिंदां करोति यः। स याति नरकं घोरं यावच्चंद्रदिवाकरौ ॥५६॥ सूतजी कहतें हैं कि भगवान भोलेनाथ से ये अनुपम रहस्य जानने के पश्चात माता पार्वती कहती हैं कि जो गुरुदेव की निन्दा करता है, वह घोर नरक की अधोगति प्राप्त करता है। ५६ यो वै हुंकृत्य हुंकृत्य गुरुं निर्जित्य वादतः। अरण्ये निर्जले देशे स भवेद्ब्रह्मराक्षसः ॥५७॥ इस प्रकार मईया कहती है कि जो गुरु की आज्ञा का पालन न करके वाद-विवाद कुतर्क करता है वह जंगल में निर्जल प्रदेश में ब्रह्मराक्षस रूप धारण करता है। ५७ मुनिभिः पन्नगैर्वापि सुरैर्वा शापितो यदि। कालमृत्युभयाद्वापि गुरु रक्षति पार्वती ॥५८॥ सूतजी कहते हैं महर्षियों भगवान शिव कहते हैं कि प्रिये मुनिजन, पन्नग, देवता किसी को श्रापित भी किए हों तो वह (जीवात्मा) काल के मुख ( ३३ ) Prof. Madhav Prasad Lamichhane Collection, Kathmandu, Nepal

से भी गुरु कृपा के सहारे बचाया जा सकता है। ५८ अशक्ता हि सुराः सर्वेः ह्यशक्ता मुनयस्तथा। गुरुशापाहताः क्षीणा क्षयं यांति न संशयः ॥५९॥ सूतजी कहते हैं कि ऋषियों देवताओं के द्वारा श्रापित और मुनियों के द्वारा श्रापित जीव बच सकता है, पुष्टि प्राप्ति कर सकता है किन्तु गुरुदेव के द्वारा श्रापित व्यक्ति बच नहीं सकता। ५९ मंत्रराजमिदं देवि गुरुरित्यक्षरद्वयं। श्रुतिवेदांतवाक्येन गुरुः साक्षात्परं पदं ॥६०॥ इसलिए अब शिवजी कहते हैं कि पार्वती दो अक्षर से बना शब्द जो गुरु है यही मन्त्रों का राजा है, श्रुतियां वेद कहते हैं गुरु साक्षात परमपद है कोई सामान्य पद नहीं है। ६० श्रुतिस्मृतिमविज्ञाय केवलं गुरुसेवकाः। ते वै संन्यासिनः प्रोक्ता इतरे वेषधारिणः ॥६१॥ सूतजी कहते हैं जो सन्यासी महात्मा महापुरुष है वो भी यही कहते हैं कि श्रुतियाँ, स्मृतियां विज्ञाय भी सही सुझाव देते हैं कि केवल गुरुदेव की ही सेवा करनी चाहिए। ६१ नित्यं ब्रह्मनिराकारं निर्गुणं बोधयेत्परं। पूर्णब्रह्म निराभासं दीपो दीपांतरं यथा ॥६२॥

सूतजी कहते हैं कि जो नित्य निरन्तर निर्गुण निराकार ब्रह्म में डूबे अपने आप को ऐसे प्रकाशित कर रहे हैं जैसे दीपक-दीपक की प्रकाशिक स्थिति में एक रहता है। ६२ गुरोः कृपाप्रसादेन आत्मारामो हि लभ्यते। अनेन गुरुमार्गेण आत्मज्ञानं प्रवर्तते ॥६३॥ इसलिए ऋषियों जो आत्माराम है, अर्थात जो आनन्द में ब्रह्ममयस्वरूप का अनुभव कर आनन्दित हो रहे हैं तो भी गुरु की कृपा के ही कारण से प्रकाशित हैं, गुरुदेव के बताए हुए अनेक मार्गों के सहारे अपने को आत्मज्ञान स्वरूपमय कर लेते हैं। ६३ आब्रह्मस्तंबपर्यंतं परमात्मस्वरूपकं। स्थावरं जंगमं चैव प्रणमामि जगन्मयं ॥६४॥ अब सूतजी कहते हैं कि ऋषियों ब्रह्मा की बनाई हुई सृष्टि के प्रत्येक जीवरूप में (स्थावरजड़, जंगम-चलता-फिरता) गुरुदेव की पावन छवि निहारता हुआ उनके चरणों में प्रणाम करता हूं। ६४ परात्परतरं ध्येयं नित्यमानंदकारकं। हृदयाकाशमध्यस्थं शुद्धस्फटिकसंनिभं ॥६५॥ कहने का भाव यह है कि हम प्रत्येक जीव के हृदय में निवास करने वाले शिवस्वरूप का हम ध्यान करते हैं जो जीव के हृदयमध्य भाग में शुद्ध विशुद्ध स्फटिक मणि की भांति प्रकाशित हो रहे हैं अर्थात चैतन्य स्वरूप ३५

हैं और छोटे-बड़े जीव सबमें वही है, चींटी से लेकर हाथी तक के हृदय मध्य में वही है। ६५ अगोचरं तथा गम्यं रूपनामादिवर्जितं। निःशब्दं तु विजानीयात्स्वभावं ब्रह्म पार्वति ॥६६॥ सूतजी कहते हैं कि महर्षियों इस प्रकार गुरु महिमा का विशद उल्लेख करते हुए कहते हैं कि जो गुरुस्वरूप परब्रह्म है यद्यपि अगोचर है, निर्गुण, निराकार शब्दों में नहीं कहा जा सकता है, जिसकी ये सारी गुणवत्ता है, ऐसा निर्गुण परमब्रह्म गुरु स्वाभाव कारण से अनुभवित किया जा सकता है। ६६ अंगुष्ठमात्रं पुरुषं ध्यायतश्चिन्मयं हृदि। तत्र स्फुरति यो भावः शृणु तं कथयाम्यहं ॥६७॥ सूतजी कहते हैं कि महर्षियो, शिवजी कहते है देवि ! जो जीवात्मा हृदय में प्रविष्ट सत स्वरूप गुरु का जो कि अंगुष्ठभाव रूप में है उनका जो भी ध्यान करता है उसको जो आनन्द सुख मिलता है उसे सुनो। ६७ स्वयं सर्वमयो भूत्वा स्थातव्यं यत्रकुत्रचित्। कीटभ्रमरवत्तत्र ध्यानं भवति तादृशम् ॥६८॥ जो इस प्रकार अंगुष्ठ स्वरूप सततत्व का ध्यान करता है वह स्वयं सर्वरूप हो जाता है उसे इस बात का बोध हो जाता है कि जो तत्व मुझको प्रकाशित है वही प्रत्येक जड़ चेतन रूप में है। ६८

CC-0. In Public Domain. Digitization by eGangotri यस्यावलोकनादेव सर्वसंगविवर्जितः। एकाकी निस्पृहः शांतः स्थातव्यं तत्प्रसादतः ॥६९॥ इस प्रकार वह जीवात्मा अपने प्रकाशित परमतत्व मे डूबा रहता है न कोई उसका मित्र रह जाता है, न शत्रु, क्योंकि सृष्टि शरीर में नहीं अपितु तत्व में निर्दिष्ट हो जाती है। ६९ सर्वज्ञोऽयमिति प्राहुर्देही सर्वमयो बुधः। सदानंदः सदा शांतो रमते यत्रकुत्रचित् ॥७०॥ सूतजी कहते हैं कि ऋषियों वह प्रकाशित जीवात्मा सर्वज्ञ हो जाता है सर्वभूतमय हो जाता है सबमे आपने आप को ही देखता हुआ आनन्दित रमण करता रहता है कोई समस्या नहीं होती। ७० उपदेशो मया देवि गुरुमार्गेण दर्शितः। गुरुभक्तिस्तथा ध्यानं सफलं तव कीर्तितं ॥७१॥ इस प्रकार महर्षियों शंकरजी ने कहा कि मेरे द्वारा दिया गया, किया गया यह पावन उपदेश गुरुमार्ग ही प्रदर्शित करता है और संसार में कीर्ति इसी की होती है जो गुरु में भक्ति का भाव रखता है और उन्ही का ध्यान करता रहता है इसलिए उनकी शरण मे ही रहना चाहिए। ७१ अनेन तु भवेत्कार्यं यद्वदामि महाशये। लोकोपकारकं देवि लौकिकं तु न भावयेत् ॥७२॥ Prof. Madhav Prasad Lamichhane Collection, Kathmandu, Nepal

CC-0. In Public Domain. Digitization by eGangotri सूतजी गुरुगीता के वर्णन विस्तार क्रम में अब ये समझाने का प्रयास करते हैं कि वैसे बहुत सारे कार्य बताए गए हैं महापुरुषों के द्वारा, किन्तु वे लौकिक मार्ग लोकहित मे नहीं है अतः गुरु सानिध्य ही बड़ा सानिध्य है। ७२ लौकिकाः कर्मतो यान्ति ज्ञानहीना भवार्णवे। ज्ञानेन भावयेत्सर्वं कर्म निष्कर्म सांप्रतं ॥७३॥ सूतजी कहते हैं कि ज्ञानहीन लौकिक कर्म चाहे जितने कर लो, संसार सागर से मुक्ति उनके द्वारा नहीं प्राप्त कर सकते है, और जब गुरु ज्ञान से युक्त कर्म जीवात्मा करता है तो उसे हर मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है। ७३ इदं तु भक्तिभावेन पठ्यते श्रूयते यदि। लिखित्वा यत्प्रदातव्यं तत्सर्वं सफलं भवेत् ॥७४॥ और इस प्रकार गुरुगीता का मर्म प्रकाशित करते हुए बताते हैं कि हे शौनकादि ऋषियों जो भी इस गुरुगीता का पाठ श्रद्धा भक्ति के साथ करता है, सुनता है, पढ़ता है, लिखता है वह सर्वत्र विजय प्राप्त करता है। ७४ गुरुगीताक्षरैकं तु यंत्रराजमिमं जपेत्। अन्ये च विविधा मंत्राः कलां नार्हन्ति षोडशीं ॥७५॥ इसलिए महर्षियों ! जो भी गुरुगीता के एक भी अक्षर को यंत्रराज समझकर जपता है, उसे अन्य मन्त्र इत्यादि सोलह कलाओं से भी कहीं ज्यादा लाभ एकाक्षर यंत्रराज के जप से ही प्राप्त होता है। ७५ ( 38 ) Prof. Madhav Prasad Lamichhane Collection, Kathmandu, Nepal

CC-0. In Public Domain. Digitization by eGangotri गुरुगीतात्मक देवि शुद्धं तत्वं मयोदितं। भवव्याधिविनाशाथं स्वयमेव सदा जपेत् ॥७६॥ भोलेनाथ कहते हैं कि प्रिये ! गुरुगीता रूप मे यह शुद्ध विशुद्ध तत्व मेरे द्वारा ही प्रकटित हुआ है जो भी इसका जप, ध्यान, पाठ करता है उसे भवबाधा नहीं भोगनी पड़ती है। ७६ अनंतफलमाप्नोति गुरुगीताजपेन तु। सर्वपापसमूहघ्नं सर्व दारिद्र्यनाशनं ॥७७॥ गुरुगीता के फल प्रभाव का.वर्णन करते हुए बताते हैं कि जो भी गुरुगीता का पाठ करता है वह अनन्त फल प्राप्त करता है, सारे पाप नष्ट हो जाते हैं और सारे दरिद्र समाप्त हो जाते हैं अर्थात जीवन वैभवपूर्ण बन जाता है। ७७ कालमृत्युभयहरं सर्वसंकटनाशनं। यक्षराक्षसभूतानां चोरव्याघ्रभयापहं ॥७८॥ इस गुरुगीता के पाठ से अकाल मृत्यु का भय, सारे संकट समाप्त हो जाते हैं यक्ष, राक्षस, भूत-प्रेत, चोर, हिंसक पशुओं का भय भी समाप्त हो जाता है अर्थात कोई बाधा नहीं होती। ७८ महाव्याधिहरं चैवं विभूतिसिद्धिदं भवेत्। अथवा मोहनं वश्यं स्वयमेव जपेत्सदा ॥७९॥ यहाँ तक कि महाव्याधि की बाधा भी दूर हो जाती है सारी विभूतियां ( 39 ) Prof. Madhav Prasad Lamichhane Collection, Kathmandu, Nepal